Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

विकास खुराना

संत रविदास
जिन्हें #रैदास भी कहा जाता है,
ईस्वी वर्ष 1376-77 के माघ माह की पूर्णिमा को जन्मे थे । पिता #चमार थे तो जाहिर है ये भी चमार थे । चमार यानि कि #शूद्र, जो कि वर्तमान हिसाब से #दलित हुये ।

पिता श्री संतोखदास अपने नगर के सरपंच भी थे और प्राकृतिक तौर पर मृत पशुयों का चमड़ा उतार कर चप्पल/जूते बनाते थे।

गौरतलब बात ये है कि इनके गुरु का नाम है
— “पण्डित शारदा नंद”, जो कि एक ब्राह्मण थे ।

अब मेरे कुछ सवाल हैं !!
▪ जैसा की आजकल पढाया जाता है कि भारत मे मनुवादी संस्कृति के चलते शूद्रों को समाज में अछूत माना जाता था, तो एक शूद्र – चमार #सरपंच कैसे बन गया ?

▪ आजकल बताया जाता है कि शूद्र के कान में कोई श्लोक, वेद वाणी की ध्वनी पड़ जाये तो उसके कानों में पिघला शीशा भर देते थे — पर रैदास जी को शूद्र होते हुये वैदिक पाठशाला में शिक्षा मिली थी जहाँ अनेक बृह्माण वर्ण के बालक वेद और शाश्त्र अध्ययन करते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि मनुवादी समाज में ब्राह्मण व अन्य उच्च वर्ग के लोग शूद्रों को स्पर्श तक नहीं करते थे – जबकि रैदास जी के गुरु पण्डित शारदा नंद ना केवल अपनी पाठशाला में पढ़ाते थे उन्हें बल्कि अपने साथ ही भोजन कराते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि शूद्रों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था जबकि रैदास जी तो मंदिरों में भजन गाया करते थे और मीरा बाई इन्हीं की शिष्या थीं ।

एक बार आंखें बंद करके, अपने हृदय पर हाथ रख के स्वयं से पूछिये कि कहीं आपको असत्य और भ्रामक इतिहास तो नहीं पढाया गया है किसी षडयंत्र के तहत ?

क्योंकि अगर मनुवादी हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव था — तो वो वाराणसी के सन्त रैदास से लेकर मेवाड़ के सेनानायक कोटिया भील तक और झांसी की सेनापति झलकारी बाई से लेकर भीमराव अम्बेडकर तक जब एक क्षत्रिय राजा/रानी इन्हें अपना सेनानायक/सेनापति बनाता है, जब एक ब्राह्मण गुरु इन्हें शिक्षा देता है और जब एक ब्राह्मण अपनी कन्या इनसे ब्याहता है तब ये भेदभाव कहीं नज़र क्यों नहीं आता है ?

ऐसा क्यों है कि #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आप जिस श्रीकृष्ण को ईश्वर ना मान कर एक चरित्रहीन, व्याभिचारी सिद्ध करते नहीं अघा रहे हो उसी श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित करने वाले रैदास के मंदिर के लिये उग्र हो कर हिंसा पर उतारू हुये जा रहे हो ?

🙏🙏🙏

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