Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ओम प्रकाश त्रेहन

हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

शिवाजी की लड़ाइयों में से एक लड़ाई उंबरखिंड की लड़ाई थी, जो तीन फ़रवरी 1661 को लड़ी गयी थी। इस लड़ाई के बारे में बहुत कम जानकारी है।
शायस्ता खान जो बाद में उँगलियाँ कटवाकर ही दुम दबाकर भागा था, उसने एक उज़बेक सरदार को शिवाजी को मारने के लिए रवाना किया। करतलब खान कोंकण के इलाके को फतह करने के हुक्म के साथ 30,000 सिपाहियों को लेकर रवाना हुआ। उसका इरादा खंडाला घाट की तरफ से पनवेल की ओर बढ़कर शिवाजी को चौंका देने का था। मजबूत गुप्तचर दल रखने वाले शिवाजी तक जब ये खबर पहुंची तो उन्होंने घोषणा की कि वो पनवेल की तरफ बढ़ रहे हैं।

जासूसों के मार्फ़त करतलब खान को ये खबर मिली तो उसने एक दूसरा, कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना। करतलब खान चिंचवड़, तलेगाओं, और मालवली से होता हुआ लोहागढ़ की तरफ मुड़ा। ये वो घाटी है जिसे छोड़कर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने कोंकण की तरफ से रेलवे लाइन बिछाई थी। उंबरखिंड की ये घाटी, कोंकण की तुलना में काफी संकरी है। खान तक जब ये खबर पहुंची कि शिवाजी और उसके सेना पेन नाम की जगह पर हैं, जो लोनावला से मुश्किल से पांच किलोमीटर होगी तो वो तेजी से फ़ौज लेकर जंगलों को पार करके शिवाजी को चौंकाने चला।

उंबरखिंड की पहाड़ियों पर शिवाजी अपने करीब 1000 मावला सैनिकों के साथ पहले ही तैयार थे! जबतक करतलब खान की फ़ौज घाटी के निचले हिस्से तक आई तबतक शिवाजी के सैनिक सामने की पहाड़ियों पर पत्थरों के साथ तैनात थे। अब आगे की तरफ से करतलब खान के तीस हजार सिपाहियों पर पत्थर बरस रहे थे, और पीछे हटने की कोशिश में उनपर तीर और बंदूकों की मार पड़ती थी। मुश्किल से तीन-चार घंटे चले युद्ध में ही करतलब खान की फौज़ का सफाया हो गया।

बची-खुची फौज़ के साथ जब करतलब खान ने आत्मसमर्पण किया तो उसके सैनिकों को मराठा सेना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था। वो हथियार, घोड़े या रसद लेकर वापस नहीं जा सकते थे। इस तरह 1000 मावला सैनिकों के साथ शिवाजी ने उंबरखिंड की लड़ाई में इस्लामिक हमलावरों को छठी का दूध याद दिलाया था।
हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

विकास खुराना

संत रविदास
जिन्हें #रैदास भी कहा जाता है,
ईस्वी वर्ष 1376-77 के माघ माह की पूर्णिमा को जन्मे थे । पिता #चमार थे तो जाहिर है ये भी चमार थे । चमार यानि कि #शूद्र, जो कि वर्तमान हिसाब से #दलित हुये ।

पिता श्री संतोखदास अपने नगर के सरपंच भी थे और प्राकृतिक तौर पर मृत पशुयों का चमड़ा उतार कर चप्पल/जूते बनाते थे।

गौरतलब बात ये है कि इनके गुरु का नाम है
— “पण्डित शारदा नंद”, जो कि एक ब्राह्मण थे ।

अब मेरे कुछ सवाल हैं !!
▪ जैसा की आजकल पढाया जाता है कि भारत मे मनुवादी संस्कृति के चलते शूद्रों को समाज में अछूत माना जाता था, तो एक शूद्र – चमार #सरपंच कैसे बन गया ?

▪ आजकल बताया जाता है कि शूद्र के कान में कोई श्लोक, वेद वाणी की ध्वनी पड़ जाये तो उसके कानों में पिघला शीशा भर देते थे — पर रैदास जी को शूद्र होते हुये वैदिक पाठशाला में शिक्षा मिली थी जहाँ अनेक बृह्माण वर्ण के बालक वेद और शाश्त्र अध्ययन करते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि मनुवादी समाज में ब्राह्मण व अन्य उच्च वर्ग के लोग शूद्रों को स्पर्श तक नहीं करते थे – जबकि रैदास जी के गुरु पण्डित शारदा नंद ना केवल अपनी पाठशाला में पढ़ाते थे उन्हें बल्कि अपने साथ ही भोजन कराते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि शूद्रों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था जबकि रैदास जी तो मंदिरों में भजन गाया करते थे और मीरा बाई इन्हीं की शिष्या थीं ।

एक बार आंखें बंद करके, अपने हृदय पर हाथ रख के स्वयं से पूछिये कि कहीं आपको असत्य और भ्रामक इतिहास तो नहीं पढाया गया है किसी षडयंत्र के तहत ?

क्योंकि अगर मनुवादी हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव था — तो वो वाराणसी के सन्त रैदास से लेकर मेवाड़ के सेनानायक कोटिया भील तक और झांसी की सेनापति झलकारी बाई से लेकर भीमराव अम्बेडकर तक जब एक क्षत्रिय राजा/रानी इन्हें अपना सेनानायक/सेनापति बनाता है, जब एक ब्राह्मण गुरु इन्हें शिक्षा देता है और जब एक ब्राह्मण अपनी कन्या इनसे ब्याहता है तब ये भेदभाव कहीं नज़र क्यों नहीं आता है ?

ऐसा क्यों है कि #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आप जिस श्रीकृष्ण को ईश्वर ना मान कर एक चरित्रहीन, व्याभिचारी सिद्ध करते नहीं अघा रहे हो उसी श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित करने वाले रैदास के मंदिर के लिये उग्र हो कर हिंसा पर उतारू हुये जा रहे हो ?

🙏🙏🙏