Posted in Kashmir

कश्मीर के रक्षक ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल

वो व्यक्ति जिसके कारण आज कश्मीर भारत का हिस्सा है।

—उड़ी सेक्टर में लड़ी गई उस जंग के सेनापति जिसे भारत का थर्मोपल्ली(300 फ़िल्म वाला) कहा जाता है जहां लियोनिडास ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल थे जिनके नेतृत्व में 150 डोगरा राजपूत सैनिकों ने 10 हजार पाकिस्तानी कबाइली और सैनिकों को 4 दिन तक रोके रखा।—

22 अक्टूबर 1947 को महाराज हरिसिंह ने जब मुजफ्फराबाद पर पाक सेना के कब्जे और उनके मुस्लिम सैनिकों की बगावत की खबर सुनी तो उन्होंने खुद दुश्मन से मोर्चा लेने का फैसला करते हुए सैन्य वर्दी पहनकर ब्रिगेडियर राजेंद्रसिंह को बुलाया। सिंह ने महाराजा को मोर्चे से दूर रहने के लिए मनाते हुए खुद दुश्मन का आगे जाकर मुकाबला करने का निर्णय लिया।
महाराजा हरि सिंह ने ब्रिगेडियर को आखरी जवान और आखरी गोली तक आक्रमणकारियों का मुकाबला करने का आदेश दिया।

राजेंद्रसिंह महाराजा के साथ बैठक के बाद जब बादामी बाग पहुंचे तो वहां 150 के करीब ही सिपाही थे। इन डेढ़ सौ सिपाहियों को लेकर ब्रिगेडियर उड़ी के लिए निकले। उनके पास हथियारों, साजो सामान और रसद की कमी थी क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए थे, उनके पास पेट्रोल भी नही था इसलिए वो प्राइवेट गाड़ियों से निकले। वहीं दुश्मन उस समय के अत्याधुनिक हथियारों से लैस और दस हजार से ज्यादा की संख्या में था।

पहले गढ़ी और बाद में उड़ी में पाकिस्तानियो से खूनी झड़प हुई जिसमे कम संख्या के बावजूद ब्रिगेडियर सिंह के नेतृत्व में डोगरों ने आक्रमणकारियों को भारी नुकसान पहुँचाया। उसके बाद उड़ी में मोर्चाबंदी की और उड़ी नाले के ऊपर पुल को उड़ा दिया। यहां दो दिन तक दुश्मन हमले करता रहा लेकिन आगे नही बढ़ पाया। इस दौरान डोगरा फौज के भी अनेको सैनिक खेत रहे। ब्रिगेडियर सिंह ने हेडक्वार्टर से सहायता भेजने को कहा। उस समय 70 के करीब सैनिक ही और उपलब्ध थे जो महाराजा हरी सिंह कैप्टेन ज्वाला सिंह के नेतृत्व में यह कहकर भेजे कि किसी भी कीमत पर दुश्मन को उड़ी में रोका जाए। ब्रिगेडियर सिंह ने हालात देखकर अब माहुरा में मोर्चाबंदी करने का फैसला लिया। सुबह होते ही फिर दुश्मन ने हमला बोल दिया लेकिन जवाब ऐसा मिला कि पाकिस्तानियो को फिर से पीछे हटना पड़ा।

छोटी सी टुकड़ी से पार ना पाते देख आक्रमणकारियों ने झेलम किनारे आगे बढ़ पैदल पुलों से घुसने की कोशिश की। ब्रिगेडियर को इसका आभास हो गया और उन्होंने एक टुकड़ी भेजकर सभी पुलों को नष्ट करवा दिया लेकिन तब तक बड़ी संख्या में हमलावर अंदर आ गए थे। ब्रिगेडियर ने रामपुर में मोर्चाबंदी करने का फैसला किया। रात भर जवानों ने खंदक खोदी और तड़के ही दुश्मनों के हमले का सामना करना पड़ा। पूरे दिन गोलाबारी हुई लेकिन दुश्मन एक इंच भी आगे नही बढ़ पाया।

दुश्मन की एक टुकड़ी ने पीछे से आकर सड़क पर अवरोधक तैयार कर दिए, ताकि महाराजा के सिपाहियों को वहां से निकलने का मौका नहीं मिले।

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को दुश्मन की योजना का पता चल गया और उन्होंने 27 अक्टूबर की सुबह एक बजे अपने सिपाहियों को पीछे हटने और सेरी पुल पर डट जाने को कहा। पहला अवरोधक तो उन्होंने आसानी से हटा लिया, लेकिन बोनियार मंदिर के पास दुश्मन की फायरिंग की चपेट में आकर राज्य के सिपाहियों के वाहनों का काफिला थम गया। आगे के तीनो वाहनों के चालक शहीद हो गए। ब्रिगेडियर सिंह अपने वाहन चालक के शहीद होने पर खुद ही वाहन लेकर आगे निकल गए। सेरी के पुल पर दुश्मन के हमले का जवाब देते हुए वो जख्मी हो गए। उनकी दाई टांग बुरी तरह जख्मी थी।

उन्होंने उसी समय जवानों को बारामूला में मोर्चा बनाकर दुश्मनों को रोकने के लिए कहा। जब उन्हें जवानों ने उठाने का प्रयास किया तो उन्होंने जाने से मना किया और कहा की उन्हें रिवाल्वर देकर पुलिया की आड़ में लिटा दिया जाए, वो यहीं से दुश्मनों का मुकाबला करेंगे क्योंकि उन्होंने महाराज हरि सिंह को वचन दिया है कि दुश्मन उनकी लाश पर से ही उड़ी से आगे बढ़ेगा। उसके बाद उन्हें किसी ने नही देखा और 27 अक्टूबर की दोपहर को सेरी के पुल पर दुश्मनों का अकेले मुकाबला करते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुए।

26 अक्टूबर 1947 की शाम को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को लेकर समझौता हो चुका था और 27 अक्टूबर को जब राजेंद्रसिंह शहीद हुए तो उस समय कर्नल रंजीत राय भारतीय फौज का नेतृत्व करते हुए श्रीनगर एयरपोर्ट पर पहुंच चुके थे।

दुनिया में ऐसी वीरता का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले जहां इतनी छोटी सैनिकों की टुकड़ी जिसके पास संसाधनों की जबरदस्त कमी थी ने अपने से सौ गुना विशाल और साधन सम्पन्न दुश्मन को 4 दिन तक रोके रखा। सभी सैन्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अगर ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपनी इस छोटी सी टुकड़ी को लेकर आखरी दम तक लड़ने के इरादे और सूझबूझ के साथ हमलावरों को रोका नही होता तो पाकिस्तानी हमलावर 23 तारीख को ही श्रीनगर पहुँच जाते और फिर ना तो कभी भारतीय सेना वहां पहुँचती और ना आज कश्मीर भारत का हिस्सा होता।

(हालांकि भारतीय सेना 27 से पहले पहुँच जाति लेकिन नेहरू के भेजे हुए दूत वीपी मेनन ने instrument ऑफ accesion को sign करवाने में देरी करवाई, वो महाराज हरी सिंह पर नेहरू के चहेते शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाने और उन्हें अन्य कई अधिकार देने के लिए दबाव डाल रहे थे जबकि सरदार पटेल ने कहा था कि महाराज अगर समझौता पे दस्तखत करने को तैयार हैं तो कोई और शर्त ना लादी जाए। वीपी मेनन के इस रवैय्ये से परेशान होकर महाराज ने अपने सेवको से कह दिया कि अगर कल तक समझौता नही होता है तो मुझे सोते हुए गोली मार दी जाए। अगले दिन 26 को समझौता हुआ और 27 को भारतीय फौज कश्मीर पहुँची।)

लेकिन ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह और अन्य डोगरा सैनिकों के इस बलिदान को वो सम्मान नही मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। डेढ़ साल बाद उन्हें भारत का पहला महावीर चक्र मिला लेकिन भारतीय राजनीतिक वर्ग ने उनके बलिदान को बिलकुल दरकिनार कर दिया जिस कारण भारत में बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं। जिस व्यक्ति के बलिदान के कारण कश्मीर आज भारत का हिस्सा है उसे तो भारत रत्न मिलना चाहिए था लेकिन उनके नाम कश्मीर में एक कॉलेज तक नही है। आज जब सब जगह कश्मीर की बात हो रही है, लोग नेताओ की जयजयकार कर रहे हैं, ऐसे में भी ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल का कहीं कोई जिक्र नही है।

इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह जामवाल और उन डोगरा राजपूतो के बलिदान के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगो को पता चले, इसलिए इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s