Posted in गौ माता - Gau maata

सुबोध कुमार

असहाय गौ ?
AV 3-28-1
1. एकैकयैषा सृष्टया संबभूव यत्रा गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपा: | यत्रा विजायते यमिन्यपर्तु: स पशून् क्षिणाति रिफती रूशती।।
अथर्व3.28.1
जिन गौओं की ठीक से देख भाल होती है वे एक के बाद एक नियम से संतान उत्पन्न कर के हमारा कल्याण करती हैं। जिन गौओं का ठीक से ध्यान नहीं हो पाता वे बिखर जाती है,समाज को कलंक लगाती हैं और स्वयं नष्ट हो कर समाज को भी नष्ट कर देती हैं।
गौशाला क्यों ?
2.एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद भूत्वा व्यदवरी।
उतैना ब्रह्मणे दद्यात तथा स्योना शिवा स्याता ।। अथर्व वेद 3।28।2
असहाय गौ जो घूमती फिरती अभक्षणीय पदार्थों को खा कर अपनी भूख मिटाती हैं , संक्रामक संघातक गुप्त रोगों से ग्रसित हो जा़ती हैं। (ये रोग उपचार द्वारा भी असाध्य पाए जाते हैं, और ऐसी गौ के संपर्क से यह रोग मनुष्यों में भी आने की संभावना रहती है)
ऐसी असहाय गौओं को अच्छी भावनाओं से प्रेरित, निस्वार्थ जनों के संरक्षण मे पहुंचाने के लिए गोशालाओं/ गोसदनों की व्यवस्था करनी चाहिए,जिस से उन की ठीक से देख भाल हो सके।
3.शि॒वा भ॑व॒ पुरु॑षेभ्यो॒ गोभ्यो॒ अश्वे॑भ्यः शि॒वा । शि॒वास्मै सर्व॑स्मै॒ क्षेत्रा॑य शि॒वा न॑ इ॒हैधि॑ ॥ AV 3-28-3
इन गोशालाओं /गोसदनों में सब गौएं और घोड़े भी भूमि पर कल्याण करने वले सिद्ध हों ।
4. इ॒ह पुष्टि॑रि॒ह रस॑ इ॒ह स॑हस्र॒सात॑मा भव । प॒शून्य॑मिनि पोषय ॥ AV 3-28-4
इन गोशालाओं //गोसदनों के संचालन करने वाले सदस्य यम नियम का पालन करने वाले जितेंद्रिय उत्तम आचरण वाले हों । जिससे यहां रखे सब पशु स्वस्थ हों और समाज के लिए कल्याणकारी साधन उपलब्ध कराएं ।
5. यत्रा॑ सु॒हार्दः॑ सु॒कृतो॒ मद॑न्ति वि॒हाय॒ रोगं॑ त॒न्व॑१ स्वाया॑ह् । तं लो॒कं य॒मिन्य॑भि॒संब॑भूव॒ सा नो॒ मा हिं॑सी॒त्पुरु॑षान्प॒शूंश्च॑ ॥ AV 3.28.5
इन स्थानों पर पुण्यकर्मा यम नियम का पालन करने वाले लोग स्वस्थ और निरोग हो कर गोसेवा करते हुए आनंद से निवास करते हैं । (ऐसे वातावरण में स्वास्थ लाभ के लिए और निस्वार्थ गोसेवा करने के लिए स्वयंस एवकों का भी स्वागत हो।)
6. यत्रा॑ सु॒हार्दां॑ सु॒कृता॑मग्निहोत्र॒हुता॒म्यत्र॑ लो॒कः । तं लो॒कं य॒मिन्य॑भि॒संब॑भूव॒ सा नो॒ मा हिं॑सी॒त्पुरु॑षान्प॒शूंश्च॑ ॥ AV 3.28.6
इन स्थानों पर पुण्यकर्मा यम नियम का पालन करने वाले लोग स्वस्थ और निरोग हो कर आनंद से अग्निहोत्रादि गोसेवा पुण्य कर्म करते हुए निवास करते हैं । (ऐसे वातावरण में स्वास्थ लाभ के लिए और निस्वार्थ गोसेवा करने के लिए स्वयं सेवकों का भी स्वागत हो।)

Posted in संस्कृत साहित्य

अरुण सुक्ला

इस्लाम में अलग से भूगोल की कोई किताब नहीं है.सिर्फ कुरान में एक जगह लिख दिया कि धरती चपटी इस्लाम में अलग से भूगोल की कोई किताब नहीं है.सिर्फ कुरान में एक जगह लिख दिया कि धरती चपटी है……………बस हो गया भूगोल

जबकि विश्व की पहली भूगोल पुस्तक – श्री विष्णु पुराण है….
विष्णु पुराण के रचयिता है… महान ऋषि पाराशर…
ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे… राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की…
यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है।
यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-
“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि।
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥”
इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।
ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-
१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग
यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता… क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है … परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके “पूर्व भाग-द्वितीय अंश” का परिचय देना चाहूँगा …. इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है…
ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं…

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है… (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि – Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)
ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं –
१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है… इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है…
सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।
सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।
इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,
ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-
पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व
ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।
मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।
मेरु के पूर्व में
शीताम्भ,
कुमुद,
कुररी,
माल्यवान,
वैवंक आदि पर्वत हैं।
मेरु के दक्षिण में
त्रिकूट,
शिशिर,
पतंग,
रुचक
और निषाद आदि पर्वत हैं।
मेरु के उत्तर में
शंखकूट,
ऋषभ,
हंस,
नाग
और कालंज पर्वत हैं।
समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।
भारतवर्ष के नौ भाग हैं:
इन्द्रद्वीप,
कसेरु,
ताम्रपर्ण,
गभस्तिमान,
नागद्वीप,
सौम्य,
गन्धर्व
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।
यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन –
प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय,
शिशिर,
सुखोदय,
आनंद,
शिव,
क्षेमक,
ध्रुव ।
यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।
इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:
गोमेद,
चंद्र,
नारद,
दुन्दुभि,
सोमक,
सुमना
और वैभ्राज।
इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों :
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
इसमें महाद्वीप में
कुमुद,
उन्नत,
बलाहक,
द्रोणाचल,
कंक,
महिष,
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।
इस महाद्वीप में –
योनि,
तोया,
वितृष्णा,
चंद्रा,
विमुक्ता,
विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।
यहाँ –
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।
यहां –
कपिल,
अरुण,
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।
इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल
इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
विद्रुम,
हेमशौल,
द्युतिमान,
पुष्पवान,
कुशेशय,
हरि
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
धूतपापा,
शिवा,
पवित्रा,
सम्मति,
विद्युत,
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल नामक सात वर्ष हैं।
वर्ण –
दमी,
शुष्मी,
स्नेह
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।
इनके सात पुत्रों :
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
क्रौंच,
वामन,
अन्धकारक,
घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत,
दिवावृत,
पुण्डरीकवान,
महापर्वत
दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
गौरी,
कुमुद्वती,
सन्ध्या,
रात्रि,
मनिजवा,
क्षांति
और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि और
दुन्दुभि ।
वर्ण –
पुष्कर,
पुष्कल,
धन्य
और तिष्य नामक चार वर्ण हैं।

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।
इनके सात पुत्रों :
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं।
यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
उदयाचल,
जलाधार,
रैवतक,
श्याम,
अस्ताचल,
आम्बिकेय
और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
सुमुमरी,
कुमारी,
नलिनी,
धेनुका,
इक्षु,
वेणुका
और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि सवन थे।
इनके दो पुत्र थे:
महावीर
और धातकि।
यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।
पर्वत –
मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।
नदियां –
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।
वर्ष –
महवीर खण्ड
और धातकि खण्ड।
महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन –
यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो… हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी…
१. विष्णु पुराण में पारसीक – ईरान को कहा गया है,
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था,
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है… ये थी हमारे ऋषियों की महानता

अब एक महत्त्वपूर्ण बात –
महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था।
महाभारत में कहा गया है कि – यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है-
उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
“अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।”
अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।है……………बस हो गया भूगोल

जबकि विश्व की पहली भूगोल पुस्तक – श्री विष्णु पुराण है….
विष्णु पुराण के रचयिता है… महान ऋषि पाराशर…
ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे… राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की…
यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है।
यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-
“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया।
मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।
योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्।
मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि।
अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः।
वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥”
इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।
ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-
१. पूर्व भाग-प्रथम अंश
२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश
३. पूर्व भाग-तीसरा अंश
४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश
५. पूर्व भाग-पंचम अंश
६. पूर्व भाग-छठा अंश
७. उत्तरभाग
यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता… क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है … परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके “पूर्व भाग-द्वितीय अंश” का परिचय देना चाहूँगा …. इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है…
ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं…

जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।

ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है… (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि – Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)
ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं –
१. जम्बूद्वीप
२. प्लक्षद्वीप
३. शाल्मलद्वीप
४. कुशद्वीप
५. क्रौंचद्वीप
६. शाकद्वीप
७. पुष्करद्वीप
ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।
इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है… इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है…
सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।
सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।
मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।
इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,
ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-
पूर्व में मंदराचल
दक्षिण में गंधमादन
पश्चिम में विपुल
उत्तर में सुपार्श्व
ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।
मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।
मेरु के पूर्व में
शीताम्भ,
कुमुद,
कुररी,
माल्यवान,
वैवंक आदि पर्वत हैं।
मेरु के दक्षिण में
त्रिकूट,
शिशिर,
पतंग,
रुचक
और निषाद आदि पर्वत हैं।
मेरु के उत्तर में
शंखकूट,
ऋषभ,
हंस,
नाग
और कालंज पर्वत हैं।
समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।
भारतवर्ष के नौ भाग हैं:
इन्द्रद्वीप,
कसेरु,
ताम्रपर्ण,
गभस्तिमान,
नागद्वीप,
सौम्य,
गन्धर्व
और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।
यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।

प्लक्षद्वीप का वर्णन –
प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:
शान्तहय,
शिशिर,
सुखोदय,
आनंद,
शिव,
क्षेमक,
ध्रुव ।
यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।
इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं:
गोमेद,
चंद्र,
नारद,
दुन्दुभि,
सोमक,
सुमना
और वैभ्राज।
इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।

प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।

शाल्मल द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों :
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
इसमें महाद्वीप में
कुमुद,
उन्नत,
बलाहक,
द्रोणाचल,
कंक,
महिष,
ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।
इस महाद्वीप में –
योनि,
तोया,
वितृष्णा,
चंद्रा,
विमुक्ता,
विमोचनी
एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।
यहाँ –
श्वेत,
हरित,
जीमूत,
रोहित,
वैद्युत,
मानस
और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं।
यहां –
कपिल,
अरुण,
पीत
और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं।

यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

कुश द्वीप का वर्णन
इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे।
इनके सात पुत्रों :
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल
इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
विद्रुम,
हेमशौल,
द्युतिमान,
पुष्पवान,
कुशेशय,
हरि
और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
धूतपापा,
शिवा,
पवित्रा,
सम्मति,
विद्युत,
अम्भा
और मही नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
उद्भिद,
वेणुमान,
वैरथ,
लम्बन,
धृति,
प्रभाकर,
कपिल नामक सात वर्ष हैं।
वर्ण –
दमी,
शुष्मी,
स्नेह
और मन्देह नामक चार वर्ण हैं।

यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

क्रौंच द्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे।
इनके सात पुत्रों :
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि
और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
क्रौंच,
वामन,
अन्धकारक,
घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत,
दिवावृत,
पुण्डरीकवान,
महापर्वत
दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
गौरी,
कुमुद्वती,
सन्ध्या,
रात्रि,
मनिजवा,
क्षांति
और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
कुशल,
मन्दग,
उष्ण,
पीवर,
अन्धकारक,
मुनि और
दुन्दुभि ।
वर्ण –
पुष्कर,
पुष्कल,
धन्य
और तिष्य नामक चार वर्ण हैं।

यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।

शाकद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।
इनके सात पुत्रों :
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं।
यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।
पर्वत –
उदयाचल,
जलाधार,
रैवतक,
श्याम,
अस्ताचल,
आम्बिकेय
और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।
नदियां –
सुमुमरी,
कुमारी,
नलिनी,
धेनुका,
इक्षु,
वेणुका
और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।
सात वर्ष –
जलद,
कुमार,
सुकुमार,
मरीचक,
कुसुमोद,
मौदाकि
और महाद्रुम ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।

पुष्करद्वीप का वर्णन –
इस द्वीप के स्वामि सवन थे।
इनके दो पुत्र थे:
महावीर
और धातकि।
यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।
पर्वत –
मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।
नदियां –
यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।
वर्ष –
महवीर खण्ड
और धातकि खण्ड।
महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है ।
वर्ण –
वंग,
मागध,
मानस
और मंगद नामक चार वर्ण हैं।

यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।

समुद्रो का वर्णन –
यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।

पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)

आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो… हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी…
१. विष्णु पुराण में पारसीक – ईरान को कहा गया है,
२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था,
३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.
४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.
५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.
६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.
७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है… ये थी हमारे ऋषियों की महानता

अब एक महत्त्वपूर्ण बात –
महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था।
महाभारत में कहा गया है कि – यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है-
उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।
“अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।”
अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ओम प्रकाश त्रेहन

हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

शिवाजी की लड़ाइयों में से एक लड़ाई उंबरखिंड की लड़ाई थी, जो तीन फ़रवरी 1661 को लड़ी गयी थी। इस लड़ाई के बारे में बहुत कम जानकारी है।
शायस्ता खान जो बाद में उँगलियाँ कटवाकर ही दुम दबाकर भागा था, उसने एक उज़बेक सरदार को शिवाजी को मारने के लिए रवाना किया। करतलब खान कोंकण के इलाके को फतह करने के हुक्म के साथ 30,000 सिपाहियों को लेकर रवाना हुआ। उसका इरादा खंडाला घाट की तरफ से पनवेल की ओर बढ़कर शिवाजी को चौंका देने का था। मजबूत गुप्तचर दल रखने वाले शिवाजी तक जब ये खबर पहुंची तो उन्होंने घोषणा की कि वो पनवेल की तरफ बढ़ रहे हैं।

जासूसों के मार्फ़त करतलब खान को ये खबर मिली तो उसने एक दूसरा, कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना। करतलब खान चिंचवड़, तलेगाओं, और मालवली से होता हुआ लोहागढ़ की तरफ मुड़ा। ये वो घाटी है जिसे छोड़कर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने कोंकण की तरफ से रेलवे लाइन बिछाई थी। उंबरखिंड की ये घाटी, कोंकण की तुलना में काफी संकरी है। खान तक जब ये खबर पहुंची कि शिवाजी और उसके सेना पेन नाम की जगह पर हैं, जो लोनावला से मुश्किल से पांच किलोमीटर होगी तो वो तेजी से फ़ौज लेकर जंगलों को पार करके शिवाजी को चौंकाने चला।

उंबरखिंड की पहाड़ियों पर शिवाजी अपने करीब 1000 मावला सैनिकों के साथ पहले ही तैयार थे! जबतक करतलब खान की फ़ौज घाटी के निचले हिस्से तक आई तबतक शिवाजी के सैनिक सामने की पहाड़ियों पर पत्थरों के साथ तैनात थे। अब आगे की तरफ से करतलब खान के तीस हजार सिपाहियों पर पत्थर बरस रहे थे, और पीछे हटने की कोशिश में उनपर तीर और बंदूकों की मार पड़ती थी। मुश्किल से तीन-चार घंटे चले युद्ध में ही करतलब खान की फौज़ का सफाया हो गया।

बची-खुची फौज़ के साथ जब करतलब खान ने आत्मसमर्पण किया तो उसके सैनिकों को मराठा सेना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था। वो हथियार, घोड़े या रसद लेकर वापस नहीं जा सकते थे। इस तरह 1000 मावला सैनिकों के साथ शिवाजी ने उंबरखिंड की लड़ाई में इस्लामिक हमलावरों को छठी का दूध याद दिलाया था।
हिन्दू को अपने अस्तित्व को प्रखर और मुखर बनाना है तो शिवाजी को राष्ट्र के महा नायक के रूप में स्थापित किया जाना है

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

विकास खुराना

संत रविदास
जिन्हें #रैदास भी कहा जाता है,
ईस्वी वर्ष 1376-77 के माघ माह की पूर्णिमा को जन्मे थे । पिता #चमार थे तो जाहिर है ये भी चमार थे । चमार यानि कि #शूद्र, जो कि वर्तमान हिसाब से #दलित हुये ।

पिता श्री संतोखदास अपने नगर के सरपंच भी थे और प्राकृतिक तौर पर मृत पशुयों का चमड़ा उतार कर चप्पल/जूते बनाते थे।

गौरतलब बात ये है कि इनके गुरु का नाम है
— “पण्डित शारदा नंद”, जो कि एक ब्राह्मण थे ।

अब मेरे कुछ सवाल हैं !!
▪ जैसा की आजकल पढाया जाता है कि भारत मे मनुवादी संस्कृति के चलते शूद्रों को समाज में अछूत माना जाता था, तो एक शूद्र – चमार #सरपंच कैसे बन गया ?

▪ आजकल बताया जाता है कि शूद्र के कान में कोई श्लोक, वेद वाणी की ध्वनी पड़ जाये तो उसके कानों में पिघला शीशा भर देते थे — पर रैदास जी को शूद्र होते हुये वैदिक पाठशाला में शिक्षा मिली थी जहाँ अनेक बृह्माण वर्ण के बालक वेद और शाश्त्र अध्ययन करते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि मनुवादी समाज में ब्राह्मण व अन्य उच्च वर्ग के लोग शूद्रों को स्पर्श तक नहीं करते थे – जबकि रैदास जी के गुरु पण्डित शारदा नंद ना केवल अपनी पाठशाला में पढ़ाते थे उन्हें बल्कि अपने साथ ही भोजन कराते थे ।

▪आजकल बताया जाता है कि शूद्रों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था जबकि रैदास जी तो मंदिरों में भजन गाया करते थे और मीरा बाई इन्हीं की शिष्या थीं ।

एक बार आंखें बंद करके, अपने हृदय पर हाथ रख के स्वयं से पूछिये कि कहीं आपको असत्य और भ्रामक इतिहास तो नहीं पढाया गया है किसी षडयंत्र के तहत ?

क्योंकि अगर मनुवादी हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव था — तो वो वाराणसी के सन्त रैदास से लेकर मेवाड़ के सेनानायक कोटिया भील तक और झांसी की सेनापति झलकारी बाई से लेकर भीमराव अम्बेडकर तक जब एक क्षत्रिय राजा/रानी इन्हें अपना सेनानायक/सेनापति बनाता है, जब एक ब्राह्मण गुरु इन्हें शिक्षा देता है और जब एक ब्राह्मण अपनी कन्या इनसे ब्याहता है तब ये भेदभाव कहीं नज़र क्यों नहीं आता है ?

ऐसा क्यों है कि #जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आप जिस श्रीकृष्ण को ईश्वर ना मान कर एक चरित्रहीन, व्याभिचारी सिद्ध करते नहीं अघा रहे हो उसी श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना जीवन समर्पित करने वाले रैदास के मंदिर के लिये उग्र हो कर हिंसा पर उतारू हुये जा रहे हो ?

🙏🙏🙏

Posted in Rajniti Bharat ki

चिदंबरम


आज वो चिदंबरम जेल में है और उसे गिरफ्तार करते हुए हम सबने टीवी पर लाइव देखा.

चिदंबरम ने कुछ गलत किया है ये तो सब जानते हैं लेकिन… वो किस मामले में जेल में है… और, असल में उसने किया क्या है … ये बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा.

असल में ये सारा खेल 2006 में शुरू हुआ था…. जब, पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी ने मिलकर INX MEDIA नामक एक कंपनी शुरू की जिसके लिए उन दोनों विदेशी निवेश की आवश्यकता थी.

अब नियम यह है कि…. अगर, आप को अपना बिजनेस चलाने के लिये विदेशी फंड की आवश्यकता है तो आप Direct route से पैसे ले सकते हैं.

लेकिन…. अगर आपको देश की सुरक्षा या सम्प्रभुता से जुड़े किसी बिजनेस जैसे कि…. रक्षा, बैंकिग या फिर मीडिया जैसे कार्यों के लिये विदेशी निवेश चाहिये तो उसके लिये आपको सरकार के FIPB (Foreign Investment Promotion Board) से मंजूरी लेनी पड़ती है.

सरकारी भाषा में इसे Approved Route कहते हैं.

तो, नियम के तहत…. पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी FIPB के पास गए और और दो चीजों की परमिशन माँगी….!

जिसमें से पहला…. विदेशी निवेश की.

और, दूसरा…. उस निवेश का 26% पैसा अपने ही किसी और बिजनेस ( INX News ) में लगाने की.

लेकिन…. FIPB ने मुखर्जी को सिर्फ 4.62 करोड़ रूपये की ही विदेशी निवेश की परमिशन दी तथा 26% पैसा INX news में लगाने की मंजूरी नहीं दी और उसके लिए मना कर दिया.

लेकिन…. मुखर्जीयों ने 4.62 करोड़ की मंजूरी को नजरअंदाज कर 305 करोड़ का विदेशी निवेश ले आये… जिससे, यह कानून का उल्लंघन हुआ … और, यह अवैध मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बन गया.

इसके साथ ही मुखर्जीयों ने FIPB के मंजूरी के खिलाफ जाकर विदेशी निवेश का 26% पैसा INX news में लगा दिया.

लेकिन… आयकर विभाग को गड़बड़ की भनक लगी और इसकी जाँच शुरू हुई.

आयकर के जाँच में जब…. मुखर्जी फंसने लगे तो, उन्होंने सोचा किसी बड़े आदमी को अगर अपने बिजनेस से जोड़ लें तो हम बच सकते हैं.

और, इस काम के लिए उन्होंने पकड़ा तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को और कार्ति चिदंबरम के बेटे की कंपनी Chess Management Services limited को अपनी कंपनी का Consultant बना दिया.

पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम के INX Media से जुड़ते ही मुखर्जी के खिलाफ चल रही Revenue Department की सारी जाँच बंद हो गयी क्योंकि कार्ति की पिता पी चिदंबरम देश के वित्त मंत्री थे और देश के सारे REVENUE DEPARTMENT उनके ही अधीन थे.

सिर्फ इतना ही नहीं…. कार्ति चिदंबरम के जुड़ने के बाद …. अब FIPB ने भी INX Media को नया प्रपोजल भेजने कहा और उनकी विदेशी निवेश की लिमिट बढा दी.

यह सब कुछ इसलिये हो रहा था क्योंकि…. पी चिदंबरम भारत के वित्त मंत्री थे.

अब…. कार्ति की कंपनी CMSL को कंसल्टंट होने की वजह से 3.5 करोड़ दिये जाने थे… लेकिन, कार्ति चिदंबरम सयाना था और उसे लगा कि पैसा अगर डायरेक्ट अपनी कंपनी लिया तो आगे चलकर फँस सकता हूँ…. इसलिये, उसने एक बेनामी कंपनी Advanced Consulting Limited and Services के द्वारा पैसा लिया।

बस… यहीं से सारा घोटाला फंस गया.

2014 में सरकार बदली.

और… 2017 में ED ने कार्ति चिंदबरम, INX Media उसके Directors पर केस दर्ज किया.

और, उसकी CBI जाँच हुई तथा कार्ति एक महीना जेल में भी रहा.

जाँच चलती रही…. और, जांच में देश विदेश में इसके पास 54 करोड़ की आय से ज्यादा संपत्ति का भी पता लगा.

अब तक तो केवल कार्ति ही लपेटे में था…. लेकिन, पी चिदंबरम तब फँस गया जब इंद्राणी मुखर्जी ने सरकारी गवाह बन यह कह दिया कि मैंने पी चिंदबरम को रिश्वत दी थी.

चिदंबरम ने केस दर्ज होने से ही पहले Anticipatory bail ले लिया और हर बार बचता रहता तथा, जाँच में सहयोग नहीं किया.

लेकिन इस बार दिल्ली HC के जज ने बेल से मना कर दिया और अरेस्ट वारंट जारी हो गया और इस तरह अब पी चिदंबरम फिलहाल जेल में है.

वैसे मेरा निजी तौर पर मानना है कि…. राजदंड सबपर समान रूप से लागू होना बिल्कुल न्यायसंगत है क्योंकि हमारा संविधान ही कहता है कि…. राजा हो या रंक… कानून की नजर में सब बराबर है.

जय महाकाल…!!!

नोट : जानकार बताते हैं कि चिदंबरम साहब बहुत गुणवान है और उनकी उपलब्धियां बहुत बड़ी बड़ी है….
और, ये inx media केस तो बहुत ही छोटी है उन कारनामों के सामने.

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जय श्री कृष्ण ।

हम लोग हवेली में या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या ओटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?
अभी तो लोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं ।
श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से ठाकुर जी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।ठाकुर जी के स्वरूप का ,श्री चरणों, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं, उस स्वरूप का ध्यान करें ।मंदिर में नैत्र नहीं बंद करना, बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें, और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं ।

यह प्रार्थना है याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है, घर ,व्यापार ,नौकरी ,पुत्र पुत्री, दुकान ,सांसारिक सुख या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना है ।वह भीख है ।

हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का विशेष अर्थ है ।
प्र अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ ।अर्थना अर्थात निवेदन ।ठाकुर जी से प्रार्थना करें ,और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है ।

श्लोक का अर्थ है

“अनायासेना मरणम” अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो, बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु नहीं चाहिए ।चलते चलते ही श्री जी शरण हो जाएं।

” बिना दैन्येन जीवनम ” अर्थात परवशता का जीवन न हो। किसी के सहारे न रहना पड़े ,।जैसे लकवा हो जाता है ,और व्यक्ति पर आश्रित हो जाता है ।वैसे परवश, बेबस न हों। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख मांगे जीवन बसर हो सके।

” देहान्ते तव सानिध्यम ” अर्थात जब मृत्यु हो तब ठाकुर जी सन्मुख खड़े हो। जब प्राण तन से निकले , आप सामने खड़े हों। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए । उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

यह प्रार्थना करें । गाड़ी ,लाड़ी ,लड़का, लड़की पति, पत्नी ,घर ,धन यह मांगना नहीं ।यह तो ठाकुर जी आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको दे देते हैं ।तो दर्शन करने के बाद बाहर बैठकर यह प्रार्थना अवश्य पढ़ें ।

जय श्री कृष्ण

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अरुण सुक्ला

आप लोगों ने लगान फिल्म अवश्य देखी होगी। एक अँगरेज़ अधिकारी उन गंवारों से क्रिकेट मैच जीतने की शर्त लगाता है जिन्हे क्रिकेट की ए, बी, सी, डी तक नहीं आती थी। दुष्ट अँगरेज़ मैच जीतने पर लगान माफ़ करने का प्रलोभन देता है और मैच हारने पर तिगुना लगान वसूलने की बात कहता है। उस अँगरेज़ की बहन दयालु प्रकृति की है और वो ग्रामीणों को चोरी छिपे क्रिकेट के नियम बताने से लेकर उन्हें क्रिकेट के उपकरण भी उपलब्ध कराती है और अंत में यही गंवार विजयी होते हैं जिसका पूरा श्रेय उस अँगरेज़ लड़की को जाता है।
ऐसा ही एक दयालु था पीटर विली जो एक अँगरेज़ था। छोटे, मोटे अख़बार का पत्रकार होने के साथ साथ वो एक चित्रकार भी था। उसे भारतीयों से बड़ी सहानुभूति थी। सन 1962 में वो भारत ये देखने के लिए आया कि आजादी के बाद का भारत कैसा है? पर उसे भारतीयों की दशा देखकर कोई विशेष ख़ुशी नहीं हुई। दुर्भाग्य से उसी समय चीन से युद्ध भी छिड़ गया। सेना के जवानों को देखकर वो हैरत में आ गया। हिमालय की भीषण ठंड में कुछ लोग चप्पल में तो कुछ नँगे पैर। कुछ लोग स्वेटर में तो कुछ केवल शर्ट में और शर्ट के अंदर रुई के टुकड़े। गोलियां भी गिनकर दी जा रही थी। उसने एक बेहद गरीब जवान को अपनी जैकेट देनी चाही, पर उसने ये कहकर लेने से मनाकर दिया कि उसके अन्य साथी भी उसके जैसी स्थिति में लड़ रहे हैं। पीटर विली ने फौरन एक तैल चित्र बनाया जिसमे एक जवान एक हाथ में बन्दूक और एक हाथ में गिनती की गोलियां लिए हुए दीन दरिद्र अवस्था में हिम्मत और स्वाभिमान से लबरेज पर्वतीय क्षेत्र में खड़ा हुआ था।
उस चित्रकार महाशय ने वो तैल चित्र नेहरू जी को भेंट करने की सोचा। पर नेहरू जी से उसकी मुलाकात न हो सकी। पता लगता नेहरू जी अपने स्टडी रूम में कभी कोई नॉवेल लिख रहे हैं तो कभी इधर उधर मीटिंग में व्यस्त रहते। चीन युद्ध को भी वो अपने रक्षा मंत्री मेनन के जिम्मे डालकर पूर्ण निश्चिन्त थे और वैसे भी उनका मानना था कि चीन एक पुराना दोस्त है जो फिलहाल कुछ समय के लिए नाराज़ चल रहा है, शीघ्र ही वो रूठे हुए दोस्त को मना लेंगे।
उस पत्रकार को लगा कि वो अपना दुर्लभ चित्र एक अयोग्य व्यक्ति को भेंट कर रहा है। भारतीय जवान इस हिमालय की हाड़ कँपाती ठंड में नँगे पैर युद्ध लड़ने जा रहे हैं और ये साहब नॉवेल पूरा कर रहे हैं। वो अँगरेज़ महाशय उस चित्र को अपने साथ इंग्लैण्ड ले गये, जहां कई लोगों ने उस चित्र को मुंहमांगे दामों पर लेने की पेशकश की पर उन्होंने वो चित्र किसी को नहीं बेचा। उनके मरने के बाद वो चित्र भी चोरी हो गया। उनकी डॉयरी के एक पन्ने पर लिखा था भारतीय सेना दुनिया की सबसे महान सेना है पर उनकी महानता को समझने वाले लोग भारत में नहीं हैं।