Posted in संस्कृत साहित्य

व्रत का सही अर्थ

व्रत का अर्थ यजुर्वेद में बहुत स्पष्ट रुप में बताया गया है। देखिए―

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि।।
―(यजु० 1/5)
भावार्थ―हे ज्ञानस्वरुप प्रभो! आप व्रतों के पालक और रक्षक हैं। मैं भी व्रत का अनुष्ठान करुँगा। मुझे ऐसी शक्ति और सामर्थ्य प्रदान कीजिए कि मैं अपने व्रत का पालन कर सकूँ। मेरा व्रत यह है कि मैं असत्य-भाषण को छोड़कर सत्य को जीवन में धारण करता हूँ।

इस मन्त्र के अनुसार व्रत का अर्थ हुआ किसी एक दुर्गुण, बुराई को छोड़कर किसी उत्तम गुण को जीवन में धारण करना।

उपवास का भी ऐसा ही अर्थ है―
उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मयोः।
उपवासः स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्।।
―(वराहोपनिषद् 2/39)
भावार्थ―जीवात्मा का परमात्मा के समीप होना, परमात्मा की उपासना करना, परमात्मा के गुणों को जीवन में धारण करना, इसी का नाम उपवास है। शरीर को सुखाने का नाम उपवास नहीं है।

प्राचीन साहित्य में विद्वानों, सन्तों और ऋषि-महर्षियों ने भूखे–मरनेरुपी व्रत का खण्डन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में न तो ‘सन्तोषी’ के व्रत का वर्णन है और न एकादशी आदि व्रतों का विधान है।

महर्षि मनु ने लिखा है―
पत्यौ जीवति या तु स्त्री उपवासव्रतं चरेत्।
आयुष्यं हरते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति।।
भावार्थ―जो स्त्री पति के जीवित रहते हुए भूखे-मरनारुप व्रत या उपवास करती है, वह पति की आयु को कम करती है और मरने पर स्वयं नरक को जाती है।
[मनुस्मृति में से अनेक श्लोकों को निकाला गया है। अनेक श्लोक पीछे से मिलाये गये हैं। यह श्लोक पाँचवें अध्याय में १५५ श्लोक के पश्चात् था। अब भी अनेक संस्करणों में यह श्लोक है। कुछ संस्करणों में से निकाल दिया गया है।]

इस प्रकार भूखा-मरनेवाले व्रत का भी सन्तों, ऋषि-मुनियों ने खण्डन किया है, आयुर्वेद की दृष्टि से भी आज जिस रुप में इन व्रतों को किया जाता है, उस रुप में ये व्रत शरीर को हानि पहुँचाते हैं। क्योंकि आजकल के व्रत ऐसे हैं कि दिन भर अन्न को छोड़कर कुछ न कुछ खाते रहो। इस प्रकार आयुर्वेद की दृष्टि से जो उपवास का लाभ पूरे दिन निराहार रहकर या अल्पाहार करके मिलना चाहिये था, वह नहीं मिल पाता (साप्ताहिक या पाक्षिक उपवास)।
व्रत के बहाने हर समय मुँह में कुछ-न-कुछ ठूँसते जाने का नाम व्रत नहीं है।

मैं व्रतों का खण्डन नहीं करता, आर्यसमाज भी व्रतों का खण्डन नहीं करता। आप एकादशी का व्रत लीजिए और खूब कीजिए, परन्तु एकादशी क्या है, इसे समझ लीजिए। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय तथा एक मन―ये ग्यारह हैं। इन सबको अपने वश में रखना, आँखों से शुभ देखना, कानों से शुभ सुनना, नासिका से ओ३म् का जप करना, वाणी से मधुर बोलना, जिह्वा से शरीर को बल और शक्ति देने वाले पदार्थों का ही सेवन करना, हाथों से उत्तम कर्म करना, पाँवों से उत्तम सत्सङ्ग में जाना, जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना―यह है सच्चा एकादशी-व्रत। इस व्रत के करने से आपके जीवन का कल्याण हो जाएगा। शरीर को गलाने और सुखाने से तो यह लोक भी बर्बाद हो जाएगा, मुक्ति मिलना तो दूर की बात है।

सत्यनारायणव्रत का अर्थ है कि मनुष्य अपने हृदय में विद्यमान सत्यस्वरुप परमात्मा के गुणों को अपने जीवन में धारण करे। जीवन में सत्यवादी बने। मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करें ।

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s