Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

🗣गीता पढ़ने के दुर्लभ लाभ…..🌹🙏🏾

👉1. जब हम पहली बार भगवत गीता पढ़ते हैं। तो हम एक अंधे व्यक्ति के रूप मे पढ़ते हैं बस इतानाही समझ मे आता हैं कि कौन किसके पिता, कौन किसकी बहन, कौन किसका भाई। बस इससे ज्यादा कुछ समझ मे नही आता।

👉2. जब दुसरी बार भगवत गीता पड़ते हैं तो हमारे मन मे सवाल जागते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया या उन्होंने वैसा क्यों किया।

👉3. जब तीसरी बार भगवत गीता को पड़ेंगे, तो हमें धीरे- धीरे उसके मतलब समझ मे आने शुरू हो जायेंगे। लेकिन हर एक को वो मतलब अपने तरीके से ही समझ मे आयेंगे।

👉4. जब चौथी बार हम भगवन गीता को पड़ेंगे, तो हर एक पात्र की जो भावनायें हैं, इमोशन… उसको आप समझ पायेंगे कि किसके मन मे क्या चल रहा हैं। जैसे अर्जुन के मन मे क्या चल रहा हैं या दुर्योधन के मन मे क्या चल रहा हैं। इसको हम समझ पायेंगे।

👉5. जब पाँचवी बार हम भगवत गीता को पड़ेंगे तो पूरा कुरूक्षेत्र हमारे मन मे खड़ा होता हैं, तैयार होता हैं, हमारे मन मे अलग- अलग प्रकार की कल्पनायें होती हैं।

👉6. जब हम छठी बार भगवत गीता को पढ़ते हैं, तब हमें ऐसा नही लगता कि हम पढ़ रहे हैं… हमें ऐसा ही लगता हैं कि कोई हमें बता रहा हैं।

👉7. जब सातवीं बार भगवत गीता को पड़ेंगे तब हम अर्जुन बन जाते हैं और ऐसा ही लगता हैं कि सामने वो ही भगवान हैं, जो मुझे ये बता रहे हैं।

👉8. और जब आठवीं बार भगवत गीता को पढ़ते हैं तब यह एहसास होता हैं कि कृष्ण कही बाहर नही हैं। वो तो हमारे अंदर हैं और हम उनके अंदर हैं। जब हम आठ बार भगवत गीता पढ़ लेंगे तब हमें गीता का महत्व पता चलेगा।

🙏कि संसार मे भगवत गीता से अलग कुछ हैं ही नही और इस संसार मे भगवत गीता ही हमारे मोक्ष का सबसे सरल उपाय हैं।
💫भगवत गीता मे ही मनुष्य के सारे प्रश्नों के उत्तर लिखें हैं। जो प्रश्न मनुष्य ईश्वर से पूछना चाहता हैं। वो बस गीता मे सहज ढ़़ग से लिखें हैं। मनुष्य की सारी परेशानियों के उत्तर भगवत गीता मे लिखें हैं। गीता अमृत हैं। समय निकाल कर गीता अवश्य पढ़ें।

जय जय श्री राधे कृष्ण🌹🙏🏾
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Posted in काश्मीर - Kashmir, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

कश्मीर के आखिरी राजा हरिसिह ने शेखअब्दुल्ला को देशद्रोह के आरोप मे जेल मे डाला था,शेखअब्दुल्ला के वकील
जवाहर लाल नेहरु
थे !

कश्मीर के हिंदू राजा हरिसिंह ने भरे दरबार में जवाहरलाल नेहरु को थप्पड़ भी मारा था
पूरी कहानी पढ़िए …. ————

आप लोगों में से बहुत ही कम जानते होंगे कि नेहरू पेशे से वकील था लेकिन किसी भी क्रांतिकारी का उसने केस नहीं लड़ा ॥

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया ॥

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी , जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं , वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं , महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं ॥

राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है , बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते , अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं ॥

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा ॥ तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया ॥

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था ॥

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया और 1955 में जब वहां की विधानसभा ने अपना प्रस्ताव पारित करके जवाहरलाल नेहरू को पत्र सौंपा कि हम भारत में सभी शर्तों के साथ कश्मीर का विलय करना चाहते हैं तो जवाहरलाल नेहरू ने कहा —- नहीं अभी वह परिस्थितियां नहीं आई है कि कश्मीर का पूर्ण रूप से भारत में विलय हो सके ॥ इस प्रकार उस पत्र को प्रधानमंत्री नेहरू ने ठुकरा दिया था और उसका खामियाजा भारत आज तक भुगत रहा है ॥

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

स्कंदपुराण के अनुसार :

लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को सदा आँवले(आँवले का रस-जल) से स्नान करना चाहिए ।

अर्थात नहाने के पानी में आँवले का रस डालकर या शरीर पर आँवले का रस लगाकर स्नान कर सकते हैं ।

कुछ धर्म ग्रंथो में आंवले के चूर्ण(पावडर) के उपयोग करने का भी लिखा गया है, इसलिए आप आंवले के चूर्ण को भी नहाने के पानी में डालकर या शरीरपर रगड़ कर स्नान कर सकते हैं ।
लेकिन कोशिश कीजिये की यथासंभव आँवले के रस का ही उपयोग करें ।

विशेषतः एकादशी तिथि को आँवले से स्नान करने पर भगवान् विष्णु संतुष्ट होते हैं ।

जिनके सिर के बाल आँवला मिश्रित जल से रंगे जाते हैं वे मनुष्य कलियुग के दोषों का नाश करके भगवान् विष्णु को प्राप्त होते हैं ।

जिसके घर में सदा आँवला रखा रहता है वहाँ भूत, प्रेत, कुष्मांड और राक्षस नहीं आते।

आज कल बहुत सारी कंपनियों के आँवला रस बाज़ार में उपलब्ध हैं आप वो उपयोग कर सकते हैं या बाज़ार से आँवले लाकर घर पर ही उनका रस निकालकर उपयोग कर सकते हैं ।

Nasibwala के पाठकों को आँवले के रस से स्नान के लिए हमने अगस्त महीने का तैयार चार्ट इस पोस्ट के साथ दिया है ताकि आप सभी लाभ ले सकें ।

हाँ-उस दिन आँवले से स्नान करना है
नहीं-उस दिन आँवले से स्नान नहीं करना है

नोट:पोस्ट शेयर जरूर करें, ताकि सभी इसका लाभ उठा सकें !

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का फायदा ले सकें ।

आँवले से स्नान कीजिये, लक्ष्मीवान बनिए
नसीबवाला से जुड़िये, नसीबवाला बनिए

शुभमस्तु

जय श्री नारायण
हर हर महादेव

नसीबवाला
Nasibwala

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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‼️🌸🌸भगवान पर सच्चा विश्वास🌸🌸‼️
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एक अत्यंत गरीब महिला थी जो ईश्वरीय शक्ति पर बेइंतहा विश्वास करती थी। एक बार अत्यंत ही विकट स्थिति में आ गई, कई दिनों से खाने के लिए पुरे परिवार को कुछ नहीं मिला।

एक दिन उसने रेडियो के माध्यम से ईश्वर को अपना सन्देश भेजा कि वह उसकी मदद करे। यह प्रसारण एक नास्तिक ,घमण्डी और अहंकारी उद्योगपति ने सुना और उसने सोचा कि क्यों न इस महिला के साथ कुछ ऐसा मजाक किया जाये कि उसकी ईश्वर के प्रति आस्था डिग जाय।

उसने आपने सेक्रेटरी को कहा कि वह ढेर सारा खाना और महीने भर का राशन उसके घर पर देकर आ जाये, और जब वह महिला पूछे किसने भेजा है तो कह देना कि ” शैतान” ने भेजा है।

जैसे ही महिला के पास सामान पंहुचा पहले तो उसके परिवार ने तृप्त होकर भोजन किया, फिर वह सारा राशन अलमारी में रखने लगी।

जब महिला ने पूछा नहीं कि यह सब किसने भेजा है तो सेक्रेटरी से रहा नहीं गया और पूछा- आपको क्या जिज्ञासा नही होती कि यह सब किसने भेजा है।

उस महिला ने बेहतरीन जवाब दिया- मैं इतना क्यों सोंचू या पूंछू, मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है, मेरा भगवान जब आदेश देते है तो शैतानों को भी उस आदेश का पालन करना पड़ता है
🙏🏽🙏🏼🙏🏿 जय जय श्री राधे🙏🏾🙏🏻🙏

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

क्यूं जरूरी है घर में बड़े बुजुर्गों की उपस्थिति।एक मार्मिक कहानी । आज छुट्टी है इसलिए थोड़ा लम्बी होने के बावजूद फुरसत से अवश्य पढ़ें ।

गायत्री निवास
बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई.

सुहावना मौसम, हल्के बादल और पक्षियों का मधुर गान कुछ भी उसके मन को वह सुकून नहीं दे पा रहे थे, जो वो अपने पिछले शहर के घर में छोड़ आई थी.

शालू की इधर-उधर दौड़ती सरसरी नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं.

‘ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से उसके घर की ओर ताकती है?’

शालू की उदासी बेचैनी में तब्दील हो गई, मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी शालू उस बुढ़िया को तीन-चार बार नोटिस कर चुकी थी.
दो महीने हो गए थे शालू को पूना से गुड़गांव शिफ्ट हुए, मगर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई थी.

पति सुधीर का बड़े ही शॉर्ट नोटिस पर तबादला हुआ था, वो तो आते ही अपने काम और ऑफ़िशियल टूर में व्यस्त हो गए. छोटी शैली का तो पहली क्लास में आराम से एडमिशन हो गया, मगर सोनू को बड़ी मुश्किल से पांचवीं क्लास के मिड सेशन में एडमिशन मिला. वो दोनों भी धीरे-धीरे रूटीन में आ रहे थे, लेकिन शालू, उसकी स्थिति तो जड़ से उखाड़कर दूसरी ज़मीन पर रोपे गए पेड़ जैसी हो गई थी, जो अभी भी नई ज़मीन नहीं पकड़ पा रहा था.

सब कुछ कितना सुव्यवस्थित चल रहा था पूना में. उसकी अच्छी जॉब थी. घर संभालने के लिए अच्छी मेड थी, जिसके भरोसे वह घर और रसोई छोड़कर सुकून से ऑफ़िस चली जाती थी. घर के पास ही बच्चों के लिए एक अच्छा-सा डे केयर भी था. स्कूल के बाद दोनों बच्चे शाम को उसके ऑफ़िस से लौटने तक वहीं रहते. लाइफ़ बिल्कुल सेट थी, मगर सुधीर के एक तबादले की वजह से सब गड़बड़ हो गया.

यहां न आस-पास कोई अच्छा डे केयर है और न ही कोई भरोसे लायक मेड ही मिल रही है. उसका करियर तो चौपट ही समझो और इतनी टेंशन के बीच ये विचित्र बुढ़िया. कहीं छुपकर घर की टोह तो नहीं ले रही? वैसे भी इस इलाके में चोरी और फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण कोई नई बात नहीं है. सोचते-सोचते शालू परेशान हो उठी.

दो दिन बाद सुधीर टूर से वापस आए, तो शालू ने उस बुढ़िया के बारे में बताया. सुधीर को भी कुछ चिंता हुई, “ठीक है, अगली बार कुछ ऐसा हो, तो वॉचमैन को बोलना वो उसका ध्यान रखेगा, वरना फिर देखते हैं, पुलिस कम्प्लेन कर सकते हैं.” कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए.

शालू का घर को दोबारा ढर्रे पर लाकर नौकरी करने का संघर्ष जारी था, पर इससे बाहर आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी.

एक दिन सुबह शालू ने टैरेस से देखा, वॉचमैन उस बुढ़िया के साथ उनके मेन गेट पर आया हुआ था. सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे. पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी. शालू को लगा उसने यह चेहरा कहीं और भी देखा है, मगर कुछ याद नहीं आ रहा था. बात करके सुधीर घर के अंदर आ गए और वह बुढ़िया मेन गेट पर ही खड़ी रही.

“अरे, ये तो वही बुढ़िया है, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था. ये यहां क्यों आई है?” शालू ने चिंतित स्वर में सुधीर से पूछा.

“बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी. जैसा तुम उसके बारे में सोच रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. जानती हो वो कौन है?”

शालू का विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था.

“वो इस घर की पुरानी मालकिन हैं.”

“क्या? मगर ये घर तो हमने मिस्टर शांतनु से ख़रीदा है.”

“ये लाचार बेबस बुढ़िया उसी शांतनु की अभागी मां है, जिसने पहले धोखे से सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर ये घर हमें बेचकर विदेश चला गया, अपनी बूढ़ी मां गायत्री देवी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर.

छी… कितना कमीना इंसान है, देखने में तो बड़ा शरीफ़ लग रहा था.”

सुधीर का चेहरा वितृष्णा से भर उठा. वहीं शालू याद्दाश्त पर कुछ ज़ोर डाल रही थी.

“हां, याद आया. स्टोर रूम की सफ़ाई करते हुए इस घर की पुरानी नेमप्लेट दिखी थी. उस पर ‘गायत्री निवास’ लिखा था, वहीं एक राजसी ठाठ-बाटवाली महिला की एक पुरानी फ़ोटो भी थी. उसका चेहरा ही इस बुढ़िया से मिलता था, तभी मुझे लगा था कि इसे कहीं देखा है, मगर अब ये यहां क्यों आई हैं?

क्या घर वापस लेने? पर हमने तो इसे पूरी क़ीमत देकर ख़रीदा है.” शालू चिंतित हो उठी.

“नहीं, नहीं. आज इनके पति की पहली बरसी है. ये उस कमरे में दीया जलाकर प्रार्थना करना चाहती हैं, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी.”

“इससे क्या होगा, मुझे तो इन बातों में कोई विश्वास नहीं.”

“तुम्हें न सही, उन्हें तो है और अगर हमारी हां से उन्हें थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाती है, तो हमारा क्या घट जाएगा?”

“ठीक है, आप उन्हें बुला लीजिए.” अनमने मन से ही सही, मगर शालू ने
हां कर दी.

गायत्री देवी अंदर आ गईं. क्षीण काया, तन पर पुरानी सूती धोती, बड़ी-बड़ी आंखों के कोरों में कुछ जमे, कुछ पिघले से आंसू. अंदर आकर उन्होंने सुधीर और शालू को ढेरों आशीर्वाद दिए.

नज़रें भर-भरकर उस पराये घर को देख रही थीं, जो कभी उनका अपना था. आंखों में कितनी स्मृतियां, कितने सुख और कितने ही दुख एक साथ तैर आए थे.

वो ऊपरवाले कमरे में गईं. कुछ देर आंखें बंद कर बैठी रहीं. बंद आंखें लगातार रिस रही थीं.

फिर उन्होंने दीया जलाया, प्रार्थना की और फिर वापस से दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगीं, “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी. सोचा था, अर्थी पर ही जाऊंगी, मगर…” स्वर भर्रा आया था.

“यही कमरा था मेरा. कितने साल हंसी-ख़ुशी बिताए हैं यहां अपनों के साथ, मगर शांतनु के पिता के जाते ही…” आंखें पुनः भर आईं.

शालू और सुधीर नि:शब्द बैठे रहे. थोड़ी देर घर से जुड़ी बातें कर गायत्री देवी भारी क़दमों से उठीं और चलने लगीं.

पैर जैसे इस घर की चौखट छोड़ने को तैयार ही न थे, पर जाना तो था ही. उनकी इस हालत को वो दोनों भी महसूस कर रहे थे.

“आप ज़रा बैठिए, मैं अभी आती हूं.” शालू गायत्री देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और इशारे से सुधीर को भी बाहर बुलाकर कहने लगी, “सुनिए, मुझे एक बड़ा अच्छा आइडिया आया है, जिससे हमारी लाइफ़ भी सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा.

क्यों न हम इन्हें यहीं रख लें? अकेली हैं, बेसहारा हैं और इस घर में इनकी जान बसी है. यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम यहां वृद्धाश्रम से अच्छा ही खाने-पहनने को देंगे उन्हें.”

“तुम्हारा मतलब है, नौकर की तरह?”
“नहीं, नहीं. नौकर की तरह नहीं. हम इन्हें कोई तनख़्वाह नहीं देंगे. काम के लिए तो मेड भी है. बस, ये घर पर रहेंगी, तो घर के आदमी की तरह मेड पर, आने-जानेवालों पर नज़र रख सकेंगी. बच्चों को देख-संभाल सकेंगी.

ये घर पर रहेंगी, तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी. मुझे भी पीछे से घर की, बच्चों के खाने-पीने की टेंशन नहीं रहेगी.”

“आइडिया तो अच्छा है, पर क्या ये मान जाएंगी?”

“क्यों नहीं. हम इन्हें उस घर में रहने का मौक़ा दे रहे हैं, जिसमें उनके प्राण बसे हैं, जिसे ये छुप-छुपकर देखा करती हैं.”

“और अगर कहीं मालकिन बन घर पर अपना हक़ जमाने लगीं तो?”

“तो क्या, निकाल बाहर करेंगे. घर तो हमारे नाम ही है. ये बुढ़िया क्या कर सकती है.”

“ठीक है, तुम बात करके देखो.” सुधीर ने सहमति जताई.

शालू ने संभलकर बोलना शुरू किया, “देखिए, अगर आप चाहें, तो यहां रह सकती हैं.”

बुढ़िया की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं. क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं.

आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा. वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे?

“नहीं, नहीं. आपको नाहक ही परेशानी होगी.”

“परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा.”

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी गायत्री देवी शालू की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं.

गायत्री देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली.

सभी उन्हें अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा.

घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर शालू ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली.
सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला.

अम्मा सुबह दोनों बच्चों को उठातीं, तैयार करतीं, मान-मनुहार कर खिलातीं और स्कूल बस तक छोड़तीं. फिर किसी कुशल प्रबंधक की तरह अपनी देखरेख में बाई से सारा काम करातीं. रसोई का वो स्वयं ख़ास ध्यान रखने लगीं, ख़ासकर बच्चों के स्कूल से आने के व़क़्त वो नित नए स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन तैयार कर देतीं.

शालू भी हैरान थी कि जो बच्चे चिप्स और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ भी मन से न खाते थे, वे उनके बनाए व्यंजन ख़ुशी-ख़ुशी खाने लगे थे.

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे. उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे. समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते.

अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर व़क़्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं.

शालू और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था.

पहली बार शालू ने महसूस किया कि घर में किसी बड़े-बुज़ुर्ग की उपस्थिति, नानी-दादी का प्यार, बच्चों पर कितना सकारात्मक प्रभाव डालता है. उसके बच्चे तो शुरू से ही इस सुख से वंचित रहे, क्योंकि उनके जन्म से पहले ही उनकी नानी और दादी दोनों गुज़र चुकी थीं.

आज शालू का जन्मदिन था. सुधीर और शालू ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था. सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी, मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था.

वहीं अम्मा ने शालू की मनपसंद डिशेज़ और केक बनाए हुए थे. इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से शालू अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं.

इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था.

बच्चे दौड़कर शालू के पास आ गए और जन्मदिन की बधाई देते हुए पूछा, “आपको हमारा सरप्राइज़ कैसा लगा?”

“बहुत अच्छा, इतना अच्छा, इतना अच्छा… कि क्या बताऊं…” कहते हुए उसने बच्चों को बांहों में भरकर चूम लिया.

“हमें पता था आपको अच्छा लगेगा. अम्मा ने बताया कि बच्चों द्वारा किया गया छोटा-सा प्रयास भी मम्मी-पापा को बहुत बड़ी ख़ुशी देता है, इसीलिए हमने आपको ख़ुशी देने के लिए ये सब किया.”

शालू की आंखों में अम्मा के लिए कृतज्ञता छा गई. बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था और वो भी उन्हीं के संस्कारों के कारण.
केक कटने के बाद गायत्री देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और शालू की ओर बढ़ा दी.

“ये क्या है अम्मा?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”
शालू ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी.

वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है.”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं. कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था. मैं अब इसका क्या करूंगी. तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी.”

शालू की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे इकलौते स्वर्णधन को भी वह उसे सहज ही दे रही हैं.

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती.”

“ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख ले. मेरी तो उम्र भी हो चली. क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं.”

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर शालू उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन शालू कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार. वो जन्मदिन गायत्री देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनकी उस घर में पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी.

घर की बड़ी, आदरणीय, एक मां के रूप में, जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था
‘गायत्री निवास’.
वन्दे मातरम

क्या आपकी भी आंखे इस सच्ची कहानी को पढ़कर भर भरा आई हो तो मुझे मेरे पर जरूर बताना ताकि लार्ड मैकाले की ऐसी शिक्षा की सच्चाई उन संभ्रांत लोगो को भी समझाई जाय जो अमीर होने के घमण्ड में अपने बुढ़ापे को बर्बाद करके पाई पाई के मोहताज होकर जीते है और ………….? बाकी आप समझदार है

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

#एकनास्तिककी_भक्ति

हरिराम एक मेडिकल स्टोर का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी, दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई 💊कहाँ रखी है।
वह इस व्यवसाय को बड़ी सावधानी और बहुत ही निष्ठा से करता था।

दिन भर उसकी दुकान में भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों💊 को सावधानी और समझदारी से देता था।

परन्तु उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था । वह एक नास्तिक था,उसका मानना था की प्राणी मात्र की सेवा करना ही सबसे बड़ी पूजा है। और वह जरूरतमंद लोगों को दवा निशुल्क भी दे दिया करता था।
और समय मिलने पर वह मनोरंजन हेतु अपने दोस्तों के संग दुकान में लूडो खेलता था।

एक दिन अचानक बारिश🌧 होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था। बस फिर क्या, दोस्तों को बुला लिया और सब दोस्त मिलकर लूडो खेलने लगे।

तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भींगा था।

हरिराम लूडो खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।

ठंड़ से ठिठुरते हुए उस बच्चे ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए। बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरी मां बच जाएगी।

उस लड़के की पुकार सुनकर लूडो खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई देने को उठा, लूडो के खेल में व्यवधान के कारण अनमने से दवाई देने के लिए उठा ही था की बिजली चली गयी। अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।

दवा के पैसे दे कर लड़का👨 खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया।
अंधेरा होने के कारण खेल बन्द हो गया और दोस्त भी चले गऐ।

अब वह दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था। तभी लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई समझकर उस लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा की शीशी थी। जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और लूडो खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि खेल समाप्त करने के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा !!

उसका दिल 💓जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की विश्वसनीयता पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा।

यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को पिला दी, तो वह अवश्य मर जाएगी। लड़का भी छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा।
एक पल वह अपने लूडो खेलने के शौक को कोसने लगा और दूकान में खेलने के अपने शौक को छोड़ने का निश्चय कर लिया
पर यह बात तो बाद के बाद देखी जाएगी। अब उस गलत दी दवा का क्या किया जाए ?

उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ 👵🏻 को बचाया जाए?

सच कितना विश्वास था उस लड़के की आंखों में। हरिराम👨 को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।

पहली बार श्रद्धा से उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके श्री बांके बिहारी का छोटा सा चित्र दुकान के उदघाटन के वक्त लगा दिया था , पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने हरिराम से श्री बांके बिहारी को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।

उन्होंने कहा था कि भगवान 🙏की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और श्री बांके बिहारी जी में हर बिगडे काम को ठीक करने की शक्ति है । हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर, आंखें👀 बंद करके कुछ बोलते हुऐ देखा था।

उसने भी आज पहली बार दूकान के कोने में रखी उस धूल भरी श्री बांके बिहारी श्री कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर🙏 वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। हरिराम बहुत अधीर हो उठा। क्या बच्चे ने माँ को दवा समझ के जहर पिला दिया ? इसकी माँ मर तो नही गयी !!

हरिराम का रोम रोम कांप उठा ।पसीना पोंछते हुए उसने संयत हो कर धीरे से कहा- क्या बात है बेटा अब तुम्हें क्या चाहिए?

लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी…बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के निकट पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिर कर टूट गई। क्या आप मुझे दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी?
हरिराम हक्का बक्का रह गया। क्या ये सचमुच श्री बांके बिहारी जी का चमत्कार है !

हाँ! हाँ ! क्यों नहीं? हरिराम👨 ने चैन की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई!
पर मेरे पास पैसे नहीं है।”उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।

कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना। 🧒लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।

हरिराम की आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह निकली। श्री बांके बिहारी को धन्यवाद 🙏देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी छाती से पोंछने लगा और अपने माथे से लगा लिया
आज के चमत्कार को वह पहले अपने परिवार को सुनाना चाहता था।

जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए हरिराम की प्रतीक्षा कर रही

!!!! जय श्री राधे राधे जी !!!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

A person started to walk on a rope tied between two tall towers at several hundred feet above the ground. He is slowly walking balancing a long stick in his hands. He has his son sitting on his shoulders.

Everyone down were watching him in bated breath and were tensed. He slowly reached the second tower. Everyone clapped, whistled and welcomed him. They shook hands and took selfies.

He asked the crowd “do you all think I can walk back on the same rope now from this side to that side?”. Crowd shouted “Yes, Yes, you can”. Do you trust me he asked. They said yes, yes we are ready to bet on you.

He said okay, can any one of you sit on my shoulder; I will take you to the other side safely.

Everyone became quite. There was stunned silence.

Belief is different. Trust is different. For Trust you need total surrender.

This is what we are lacking towards God in today’s world.

We believe in God. But we don’t trust Him.

Posted in गौ माता - Gau maata

(ओशो का जबर्दस्त तीखा प्रवचन)
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भारत अकेला देश है जो गौ भक्त है | भारत भी पूरा नहीं सिर्फ हिंदू, ना सिख, ना इसाई, ना जैन, ना मुसलमान, ना पारसी इन सबको छोड़ दो | सिर्फ हिंदू और हिंदू ही सिर्फ भारत नहीं है | हिंदुओं की संख्या तो 20 करोड़ है बाकी 50 करोड़ लोग और भी इस देश में हैं |
यह हिंदुओं की धारणा को बाकी 50 करोड़ लोगों के ऊपर थोपने का किसको अधिकार है? और “विनोवा भावे” ने जो अनशन किया था उसको मैं हिंसा मानता हूं, वह जबरदस्ती है, हिंदुओं की जबरदस्ती | फिर जिन्ना ठीक ही कहता था कि अगर भारत एक रहा तो हिंदू जबरदस्ती करेंगे | वह जबरदस्ती दिखाई पड़ती है, फिर तो जिन्ना ठीक था और गांधी गलत थे | अच्छा किया कि उसने पाकिस्तान तोड़ लिया | फिर तो सीख भी ठीक हैं उनको भी सीखस्थान तोड़ लेना चाहिए, फिर तो ईसाई भी सही हैं उनको भी कहना चाहिए कि हमें इसाईस्थान अलग कर दो और जैनियों को अपना जैनस्थान अलग कर लेना चाहिए और पारसियों को कहना चाहिए बंबई हमारी |
फिर हिंदू अपनी गौ रक्षा करें, जो उनको करना है करें, सब गौ को ले जाए और रक्षा करें, जो उनको करना है करें | यह देश सबका है | इसमें हिंदू धारणाओं को जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता | हिंदू धारणा थोपना है, मगर बातें ऊंची कर रहे हैं, बातें अहिंसा की कर रहे हैं और हिंसा करने का आग्रह है | यह क्या है? “बिनोवा” का अनशन करना कि मैं मर जाऊंगा अगर गौ हत्या पर निषेध नहीं लगाया गया | यह हिंसा की धमकी है, किसी को मारने की धमकी दो या मरने की धमकी दो बात तो एक ही है | किसी की छाती पर छुरा रख दो या अपनी छाती पर छुरा रख लो और कहो कि मैं मर जाऊंगा यह बात तो एक ही है | इसमें कुछ भेद नहीं है, इसमें कुछ अहिंसा नहीं है, यह शुद्ध हिंसा है और जबरदस्ती है | और एक आदमी जबरदस्ती करे और सारे देश पर अपने इरादे थोप देना चाहे यह कैसा लोकतंत्र है?
हिंदुओं को गौ बचानी है बचाएं, कौन मना करता है | कल मुसलमान कहने लगे कि सबका खतना होना चाहिए वह भी खतने के लिए आधार खोज सकते हैं | यहूदियों ने खोज लिए हैं, यहूदियों ने किताबें लिखी हैं कि खतने के बड़े फायदे हैं उन फायदे में एक फायदा यह गिनाया है कि जब व्यक्ति का खतना किया जाता है तो उसकी बुद्धि विकसित होती है और उनके दावे की दुनिया में सबसे ज्यादा नोबेल प्राइज यहूदियों को मिलती है | क्यों? क्योंकि उनके ख़तनें होते हैं और ख़तना जल्दी करनी चाहिए, जितनी जल्दी हो उतना फायदा इसलिए मुसलमान का ख़तना तो जरा देर से होता है उसको यहूदी नहीं मानते | यहूदी तो मानते हैं कि बच्चा पैदा हो और जितनी जल्दी खतना हो उतना अच्छा है क्योंकि उसकी उर्जा जन्म इंद्री से हटकर मस्तिष्क में प्रवेश कर जाती है | क्योंकि जब उसकी जन्म इंद्री की चमड़ी काटी जाती है तो ऊर्जा एकदम सरक जाती है | जन्म इंद्री से मस्तिष्क में और प्रतिभा पैदा हो जाती है | #अगरइसतरहकीबेवकूफ़ियोंकोएकदूसरेकेऊपरथोपनेकाआग्रह शुरू हो जाए तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी |
गौ हत्या नहीं होनी चाहिए | क्यों? क्योंकि जीव दया है, तो मच्छर क्यों मारते हो? और यह कैसी जीव दया है? दया करनी हो तो मच्छर पर करो कुछ पता चले क्योंकि गौ को तो तुम शोषण करते हो उसके बछड़ों के लिए जो दूध है उसको खुद पीते हो और कहते हो कि गौ भक्त हूं मैं | गौ को माता कहते हो और उसके असली बच्चों से वंचित करते हो, उसके असली बेटों को भूखा मारते हो | शंभू महाराज दूध पी रहे हैं और नंदी महाराज भूखे बैठे हैं और असली बेटा नंदी महाराज, शंभू महाराज नहीं | नंदी महाराज बैठे देख रहे हैं कि यह क्या हो रहा है, जरा नदियों से तो पूछो तो वह कहेंगे कि बाबा यह दूध हमारे लिए है, अगर तुम्हारी गौ भक्ति इतनी बड़ी है तो अपने स्त्रियों का दूध बछड़े को पिलाओ तो समझ में आएगा गौ भक्ति | यह कैसी गौ भक्ति की दूध पी रहे हो उनका, चूस रहे हो गायों को और बातें कर रहे हो गौ भक्ति की | फिर तो मच्छरों की भक्ति करो, मच्छर भक्त हो जाओ, क्योंकि मच्छर तुम्हारा खून चूसते हैं | तब पता चलेगा भक्ति का | लेट जाओ खाटों पर नंग-धड़ंग, चूसने दो मच्छरों को, खटमलों को, पिलाओ खून और कहो कि यह जीव दया है | तब मैं कहूंगा की यह भक्ति है क्योंकि भक्ति में कुछ तुम दो तब भक्ति है | यह कैसी भक्ति है कि उल्टा ले रहे हो? गायों से तो पूछो कि तुमने उनकी क्या गती कर दी? सारी दुनिया में गायों की हालत बेहतर है भारत को छोड़कर |
भारत अकेला देश है जहां गायों की सबसे दयनीय दसा है, हड्डी-हड्डी हो रही है, मांस सूख गया है और लोग दूध खींचे जा रहे हैं निचोड़े जा रहे हैं निकलता भी नहीं है | कुछ दो पाव निकल आए तो बहुत, शेर-भर निकल आए तो गजब | स्विडन में एक गाय इतना दूध देती है जितना भारत में 40 गाय देती हैं, और स्विडन में कोई लोग गौ भक्त नहीं हैं | स्विट्जरलैंड में कोई गौ भक्त नहीं हैं | अभी यहां मेरे पास सन्यासी हैं, सारी दुनिया से आए हुए हैं, विवेक मुझसे बार-बार कहती है कि अगर आप एक दफा पश्चिम की गाय का दूध पी लें तो फिर गाय का दूध | भारत का दूध तो पीने जैसा ही नहीं है, ना इसमें स्वाद है, क्योंकि वह मुझे कह रही थी कि हमने तो कभी सुना ही नहीं था पश्चिम में की दूध में शक्कर मिलाई जाती है | दूध खुद ही इतना मीठा होता है उसमें शक्कर मिलाने की बात ही बेहूदी है | और दूध इतना गाढ़ा होता है, इतना पौष्टिक होता है और यह कोई गौ भक्त देश नहीं है | लेकिन कारण है उसका, उतनी ही गाय बचाते हैं वह जितनी गायों को ठीक पोषण दिया जा सके, ठीक जीवन दिया जा सके, सुविधा दी जा सके | तुम गायों को क्या दे रहे हो ? और तुम बातें दया की कर रहे हो | यह ज्यादा दया-पूर्ण होगा कि यह मरती हुई गायों को सड़कों पर सड़ने के बजाए, पिंजड़ा पोलो में सड़ने के बजाय मुक्त कर दो, इनकी सड़ी-गली देह से इनको मुक्त कर दो |
यही मैंने कहा था | सुन के अड़चन हो गई बेचैनी हो गई मैंने इतना ही कहा था की भारत उतनी ही गाय बचा ले जितनी गाय बचा सकते हैं हम | जब ज्यादा बचा सकेंगे तो ज्यादा बचा लेंगे | यह दया का काम होगा | लेकिन उन्होंने क्या तरकीब निकाली, उन्होंने यह तरकीब निकाली की इसका तो मतलब यह हुआ कि भारत में सिर्फ 40% लोगों को छोड़कर 60% तो दीन-हीन हैं तो इनकी भी हत्या कर दी जाए? मैं नहीं कहूंगा कि इनकी हत्या कर दी जाए लेकिन अगर तुमको गाय बचानी है तो इनकी हत्या हो जाएगी | तुम इसके लिए जिम्मेवार होगे | अगर भारत में थोड़ी वैज्ञानिक बुद्धि का प्रयोग किया जाए तो भारत की 60% जनता भी सुखी हो सकती है, आनंदित हो सकती है | और अगर मेरी बातें ना सुनी गई और शंभू महाराज जैसे लोगों की बातें सुनी गई तो वह 60% जनता, मैं तो नहीं कहता कि मारी जाए लेकिन प्रकृति मार डालेगी | आकाल में मरेगी, भूख में मरेगी, बाढ़ में मरेगी, बीमारियों में मरेगी | इस सदी के अंत में तुम देख लेना | इस सदी के पूरे होते होते भारत में दुनिया का सबसे बड़ा अकाल पड़ने वाला है | सारे दुनिया के वैज्ञानिक घोषणा कर रहे हैं क्योंकि इस सदी के पूरे होते होते भारत की संख्या चीन से आगे निकल जाएगी | एक अरब की आंकड़ा पार कर जाएगी और एक अरब का आंकड़ा पार करते ही तुम्हारी क्या हालत होगी? अभी ही तुम अधमरे हालत में हो | एक अरब का आंकड़ा पूरा हुआ कि भारत में महा भयंकर बीमारियां, अकाल फैलने वाला है | प्रकृति मारेगी, मुझे मारने की कोई जरूरत नहीं है | मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है | परमात्मा मारेगा |
अगर उस घटना के पहले कुछ कर सकते हो तो समझने की कोशिश करो | भारत के मन को व्यर्थ के उलझनों में ना उलझाओ, कि गौहत्या बचानी है और शराबबंदी करवानी है और चरखा चलवाना है | इन पागलपन की बातों में ना उलझो, बड़े उद्योग बनाओ विज्ञान ने पूरे साधन खोज दिए हैं, उन साधनों को लाओ | चरखे में मत अटके रहो |
उतनी ही गाय बचा लो जितनी तुम अभी बचा सकते हो | हां, कल जब हम ज्यादा बचा सकेंगे तो ज्यादा बचाएंगे | पहले आदमी को बचाओ फिर दूसरी बात है, सबसे ऊपर मनुष्य का सत्य है उसके ऊपर कुछ भी नहीं | अगर मनुष्य को बचाने के लिए और सब भी नष्ट करना पड़े तो मैं करने को तैयार हूं | लेकिन मनुष्य को बचाना जरूरी है क्योंकि मनुष्य बच जाए तो शेष सबको पुनर्जीवित किया जा सकता है | लेकिन अगर मनुष्य मर जाए तो कौन तुम्हारी गाय बचाएगा? और कौन तुम्हारी भैंस बचाएगा? और कौन तुम्हारी धर्म और संस्कृति और महानतम बातों को बचाएगा? कौन तुम्हारे वेद, उपनिषद, गुरु-ग्रंथ को बचाएगा? यह पागलपन की बातों को छोड़ो | यह पागलपन की बातों को मैं सीधा पागलपन कह देता हूं इससे उनको एकदम आग लग जाती है | लोगों को थोड़े जीने की स्वतंत्रता, थोड़ा सांस लेने की स्वतंत्रता दो | वह भी नहीं हो पा रहा है, खाने पीने की तक स्वतंत्रता नहीं है |
मैं शराब का विरोधी हूं लेकिन शराबबंदी का पक्षपाती नहीं हूं | क्योंकि यह तो व्यक्ति का निजी स्वतंत्रता है अगर कोई व्यक्ति शराब पीना ही चाहता है तो उसे पीने का हक है यधपि हमें फिक्र करनी चाहिए कि उसे पूरी तरह ज्ञात हो कि शराब के क्या क्या नुकसान है | देश में हवा होनी चाहिए कि शराब के नुकसान क्या क्या है | लेकिन फिर भी कोई तय करे पीने का तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उस पर जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए |
किसी एक आदमी को क्या हक है? “मोरारजी देसाई” शराब के विरोध में हो सकते हैं लेकिन उनको क्या हक है कि अपनी जिद को अपनी हट को सारे देश की छाती पर थोप दें? कल समझ लो कोई शराबी मुल्क का प्रधानमंत्री हो जाए और कहे कि सब को शराब पीना पड़ेगा तब तुम कहोगे कि यह कैसा लोकतंत्र है हुआ | तुम्हें पीना हो पियो, न पीना हो न पियो, तुम्हें जो ठीक लगता है उसका प्रचार करो, उसका हवा पैदा करो, लोकमत बनाओ लेकिन जबरदस्ती क्यों? मैं कोई गौ हत्या का पक्षपाती नहीं हूं लेकिन फिर भी इस तरह की धमकियां देना हिंसात्मक है | बकरों की हत्या हो “बिनोवा जी” को कोई फर्क नहीं, “विनोवा जी” जरा अपने गुरु महात्मा गांधी को याद करो, जिंदगी भर बकरी का दूध पीकर जिए | बकरियां कटती रहे, बकरे कटते रहे कोई मतलब नहीं | बकरी-बकरे जैसे मुसलमान हैं, गाय हिंदू है | यह भी खूब रहा | बकरे बकरियों को यह पता ही नहीं कि वह कब मुसलमान हो गए |
हिंसा नहीं होनी चाहिए | लेकिन इसका वातावरण पैदा करो फिर भी अगर लोग कुछ मांसाहार करना ही चाहते हैं तो उनको जबरदस्ती से रोकना तो गलती बात है | फिर तो कल अगर कोई जैन सत्ता में होगा तो वह कहेगा कि मछली भी मत खाओ, फिर तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी | वह कहेगा कि प्याज भी मत खाओ, आलू भी नहीं क्योंकि जैन धर्म में जमीन के नीचे गड़ी हुई सब्जियां वर्जित है | उन्हें खाने से पाप होता है | तो आलू, मूली, गाजर सब पाप |
प्रत्येक को अपने ढंग से जीने दो, लोकतंत्र का अर्थ ही यही होता है जब तक कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे के जीवन में बाधा ना डालने लगे तुम बाधा ना बनो | लोकतंत्र का अर्थ नकारात्मक होता है |
और जो करने योग्य है वह तो करेंगे नहीं, संततिनिमन होना चाहिए, वह तो करेंगे नहीं | शराबबंदी होना चाहिए, जैसे शराब बंद हो जाएगी तो देश की समस्याएं हल हो जाएंगी | तुम सोचते हो गरीबी मिट जाएगी, बीमारी मिट जाएगी, अशिक्षा मिट जाएगी, गौ-वध बंद हो जाएगा तो | तुम सोचते हो समस्याएं मिट जाएंगी, गरीबी मिट जाएगी, एकदम धन की वर्षा हो जाएगी | अगर ऐसा होता तो अमेरिका जैसा देश को तो दुनिया का सबसे गरीब देश होना चाहिए | क्योंकि गौ हत्या चलती है | #लेकिनयहतरकीबेंहैतुम्हारेमनकोउलझानेकी, गौ हत्या की बंदी होनी चाहिए यह सुनकर हिंदू खुश हो जाता हैं, वोट दे देता है | गौ हत्या के होने से ना होने से कोई समस्या का हल नहीं है और याद रखना मैं यह नहीं कह रहा हूं कि गौ हत्या होनी चाहिए लेकिन एक वातावरण होना चाहिए, सुसंस्कार की एक हवा पैदा होनी चाहिए, जोर जबरदस्ती नहीं |
आज इतना ही |

ओशो🙏🏻🌿🌷
दिनांक 10 अक्टूबर 1980 | श्री ओशो आश्रम पुणे

Posted in काश्मीर - Kashmir

“धारा 370″( पढ़ कर आगे औरों के शेयर करे)
“जरूर जानिए”

Please 5 minutes tak is msg ko
aaram se padhiye,
samajhiye

जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है ।


जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है

जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है

जबकी भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5

वर्ष का होता है ।

जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है ।

भारत के उच्चतम न्यायलय के आदेश जम्मू – कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं

भारत की संसद को जम्मू – कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यंत सीमित

क्षेत्र में कानून बना सकती है ।

जम्मू कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के
व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी ।
इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के

किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू – कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी ।

और

धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI लागु नहीं है ।
RTE लागू नहीं है ।
CAG लागू नहीं होता ।

भारत का कोई भी कानून लागु नहीं होता ।

कश्मीर में महिलाओ पर शरियत कानून लागु है ।
कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं ।
कश्मीर में चपरासी को 2500 ही मिलते है.

कश्मीर में अल्पसंख्यको [ हिन्दू- सिख ] को 16 % आरक्षण नहीं मिलता ।

धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते है ।

धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तानियो को भी भारतीय
नागरीकता मिल जाता है ।

इसके लिए पाकिस्तानियो को केवल किसी कश्मीरी लड़की से

शादी करनी होती है ।

अच्छी शुरुवात है कम से कम 370 हटाने की दिशा में एक कदम आगे की ओर मोदी जी को धन्यवाद जो उन्होनें धारा 370
का मुद्दा उठाया ।

अब यदि कोई सेकुलर इन तथ्यों के विषय में कुछ कहना चाहे
तो स्वागत हैं…!!!
370 धारा हटाना ही है…. इसलिए मेसेज को ज्यादा से ज्यादा फैलाओ
कश्मीर में आप
तिरंगा नहीं फहरा सकते,

कन्याकुमारी में रिक्शे के पीछे आप जय श्री राम नहीं लिख सकते,

हैदराबाद में मन्दिर की आप
घंटी नहीं बजा सकते,

कलकत्ता में आप अपने घर के दरवाजे पर
बजरंगबली की मूर्ति नहीं लगा सकते.

फिर कैसे कहूं की कश्मीर से
कन्याकुमारी तक भारत एक है ??

65 सालो के इतिहास में :-
पहली बार जिसने खुल के 370 का विरोध किया हे । तो उसका साथ दीजिये ।
सुशील कुमार सराओगी, पत्रकार, दिल्ली
आपको सिर्फ 3 लोगो को मेसेज जरुर करना है , जनहित का ये मेसेज सिर्फ आप सब के पढने के लिए नहीं है…. आगे क्या करना है इस मेसेज का, आप खुद समझदार है

भारत माता की जय

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

एक दिन चेन्नई में समुद्र के किनारे धोती व शाल पहने हुए एक सज्जन भगवद गीता पढ़ रहे थे, तभी वहां एक लड़का आया और बोला-
“आज साइंस का जमाना है, फिर भी आप लोग ऐसी किताबे पढ़ते हो,? देखिए जमाना चांद पर पहुंच गया है और आप लोग वही गीतारामायण पर ही अटके हुए हो?”

उन सज्जन ने उस लड़के से पूछा –
“आप गीता जी के विषय में क्या जानते हो?”

वह लड़का जोश में आकर बोला-
“अरे छोड़ो..! मैं विक्रम साराभाई रीसर्च संस्थान का छात्र हूँ, I’m a Scientist.. यह गीता बेकार है हमारे लिये।”

वह सज्जन हसने लगे, तभी दो बड़ी बड़ी गाड़िया वहां आयीं.l

एक गाड़ी से कुछ ब्लैक कमांडो निकले और एक गाड़ी से एक सैनिक, सैनिक ने पीछे का दरवाजा खोला तो वो सज्जन पुरुष चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गये।

लड़का यह सब देखकर हक्का बक्का था, उसने दौड़कर उनसे पूंछा-
“सर.. सर आप कौन हो?”

वह सज्जन बोले-
“मैं विक्रम साराभाई हूँ।”
सुनकर लड़के को 440 वोल्टस का झटका लगा।

यह लड़का डा. अब्दुल कलाम थे।

इसी भगवद गीता को पढ़कर डॉ. अब्दुल कलाम ने आजीवन मांस न खाने की प्रतिज्ञा कर ली थी।

गीता एक महाविज्ञान है,
गर्व कीजिये।