Posted in હાસ્ય કવિતા

॥पत्नी पचासा॥मेरी पुस्तक “दहेज मे साली”से

जैसे हनुमान चालीसा है, वैराग्य शतक है वैसे ही यह पत्नी पचासा है।इसका नित्य पाठ करने से अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है और दाम्पत्य जीवन सुखी होता है।

     जय जय हे पति कल्यानी
     तेरी इस जग मे ना सानी।

     पति के लिये तो तू है कामिनी
     पति पर चमके जैसे दामिनी।

     एक हाथ में बेलन साजे
     एक हाथ से चिमटा भांजे।

     बड़े बड़े नाखून तुम्हारे
     दंत नुकीले नयन करारे।

     रौद्र रूप जब तू दिखलावे
     पति को छठी का दूध याद आवे।

     दोनो प्रहर जब करो श्रीन्गार 
     पड़ोसियों को होय बुखार।

     गले मे स्वर्ण सुशोभित माला
     मोटे होठ लिपस्टिक काला।

     नये नये नित फैसन करती
     सास ससुर से कभी न डरती।।

     पति का भाई साग बराबर।
     अपना भाई हो सर्वोपरि॥

     पति की सतत करे निगरानी ।
     पति को समझे वह अज्ञानी॥

     खुद को समझे पति से स्यानी
     करती वही जो मन मे ठानी।।

     पति ने गर कर दी नादानी
     समझो उसकी शामत आनी।।

     पति को पतला दाल खिलाती
     खुद खा जाती दाल मखानी।।

     अपना सिर ऊँचा करने को
      पति का धन दे बनती दानी।।    

     पति को दूध दही गर देवे
     उसके बदले सब कुछ लेवे।।

     पति से खाना भी बनवाना
     अच्छा खाना खुद खा जाना।।

     पति को बहुविधी कष्ट वो देवे
     खुद खा जाये मिठाई मेवे।।

     पति को पाकेट नित्य टटोले
     पति की क्या हिम्मत जो बोले ॥

     उसका रहता ऐसा जज्बा।
     तनखा पर झट कर ले कब्जा॥

     पति जो मागें पचास रुपैया।
     कहती हंस क्या करोगे भैया॥

     खाली हाथ मैके से आवे।
     पति का धन मैके पहुंचावे॥

     तलाक की दे हरदम धमकी।
     पति को करार करा दे सनकी॥

     पति को कहती दुष्ट निशाचर।
     पति कहता हे देवी दया कर॥

     पति रात को देर से आवे।
     तो उसकी शामत आ जावे॥

     रोष से तब छुटकारा पावे
     जब पत्नी का पैर दबावे॥

     पति की करती हुक्म उदूली
      गाजर मांगे तो देती मूली॥

     पत्नी से है को सुख पावा
     पत्नी है बस एक छलावा॥

     पत्नी यदि पहले मर जावे
     पति को स्वर्ग में जल्द बुलावे॥

     भुत पिशाच निकट नही आवे
     पत्नी को गर साथ सुलावे॥

      पति का राज उगलवा लेती
     अपना राज न हरगिज देती॥

     मैके की नित करे बड़ाई
     कहती ऊंचे कुल से आई॥

     बडी मान मर्यादा वाले
     उसके पापा उसके भाई॥

     जब वह अपने मैके जाती
     सहेलियों पर रोब जमाती॥

     कहती उसका पति धनवान
     उसकी है समाज में मान॥
     इतना दरिया दिल उसका पति
     साल में लाखो देता दान॥

     सिगरेट को ना हाथ लगाता
     ना खाता वो खैनी पान॥
     लाखों मे वह रोज खेलता
    फिर भी उसे नही अभिमान॥

     पति का करना हो जब दोहन
     उसे खिलाती हलवा सोहन॥

     पत्नी लडे गर कोई चुनाव
     उसका बढ जाता है भाव॥

     पत्नी गर चुनाव जीत ले
     करती रहती वो देशाटन॥
     कभी घुमती झुमरीतलैया
     कभी घुमती देवीपाटन॥

     करे फोन से वार्ता लम्बी
     अन्जाना हो या संबंधी॥

     वाकयुद्ध मे तुम अति माहिर
     कटु सत्य करता जगजाहिर॥

     अगर गलत नम्बर मिल जावे
     तो भी वो घंटों बतियावे ॥
     टेलीफोन का बिल जब आवे
     पति की आंखें चुधिंया जावे॥

     राज की बात करे जगजाहिर
     चुगली करने मे अति माहिर॥

     सास ससुर या ननद भौजाई
     भूले से गर उसे सताये॥
     तो दहेज की नालीश करके
     अपनी उन्हें औकात बतावे॥

     इसीलिए तुम इस कलियुग मे
     पत्नी से तकरार न करना।
     पत्नी भले यार भी कर ले
     तुम न किसी चक्कर मे पड़ना।
     दूजी पत्नी मिलनी मुश्किल
     सो पत्नी से रार न करना॥

     लक्ष्मी दुर्गा और सरस्वती जी
     देवी तो हैं बस मंदिर की
     लेकिन पत्नी होती है देवी
     केवल घर के अन्दर की॥

युग बदला अब पत्नी चलती आगे आगे
पति देव चले पत्नी के पीछे भागे भागे॥

     पत्नी आफिस से डयूटी करके
     देर रात घर आती है
     पति थके हुए सोये रहते
     सोये से उन्हें जगाती है॥

     खाना गरमा वे लाते हैं
     व दस्तरखान बिछाते हैं।
     पानी लाते पंखा झलते
     और फिल्मी गाना गाते हैं॥

     तू ही दुर्गा तू ही काली।
     तू ही माया तू ही भवानी।
     करती हो तुम वही सदा
     जो अपने मन मे तुमने ठानी॥

     पति ने गर कर दी नादानी।
     याद करा दे उसकी नानी।
     रिस्ते बहुत बनाये प्रभु ने
     पर ना इस रिश्ते की सानी॥

     त्रिया चरित्र समग्र रुप से
     पत्नी उपर ही है फबता।
     भाग्य पुरुष का सब जाने है
     पत्नी के बल से है चलता॥

     जो नित पढे यह पत्नी पचासा।
     होय न फिर पत्नी का दासा॥

लड़कों के बारें में दुनिया की सबसे बड़ी गलतफहमी
“शादी कर दो सुधर जाएगा”
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     जो शत बार पाठ करे सोई।
     अगले जन्म पतिदेव न होई॥
             ॥समाप्त॥-
         जगदीश खेतान
               मौलिक

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