Posted in संस्कृत साहित्य

धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।

धर्म उसका नाश करता है जो
धर्म का नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्म का नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्म का नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है। मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करना,इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले। जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है, और जो धर्म की रक्षा करता है,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले,इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी नही करना चाहिए।
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स्वयम्भू मनु ने धर्म के दस
लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो
दशकं धर्म लक्षणम्॥

धृति (धैर्य),क्षमा(दूसरों के द्वारा
किये गये अपराध को क्षमा कर
देना,क्षमाशील होना),दम(अपनी
वासनाओं पर नियन्त्रण करना),
अस्तेय (चोरी न करना),शौच
(अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता),
इन्द्रिय निग्रहः(इन्द्रियों को वश
मे रखना),धी(बुद्धिमत्ता का
प्रयोग),विद्या(अधिक से अधिक
ज्ञान की पिपासा),सत्य (मन
वचन कर्म से सत्य का पालन)
और अक्रोध (क्रोध न करना);
ये दस धर्म के लक्षण हैं। जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये – यह धर्म की कसौटी है।
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श्रूयतां धर्म सर्वस्वं
श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि,
परेषां न समाचरेत्॥

धर्म का सर्वस्व क्या है,सुनो
और सुनकर उस पर चलो !
अपने को जो अच्छा न लगे,
वैसा आचरण दूसरे के साथ
नही करना चाहिये।
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धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः
मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

धर्म उसका नाश करता है जो
उसका(धर्म का)नाश करता है।
धर्म उसका रक्षण करता है जो
उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है।
अतः धर्मका नाश नहीं करना
चाहिए। ध्यान रहे धर्मका नाश करने वाले का नाश,अवश्यंभावी है।
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यत्र धर्मो ह्यधर्मेण
सत्यं यत्रानृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां
हतास्तत्र सभासदः।

जिस सभा में बैठे हुए
सभासदों के सामने अधर्म
से धर्म और झूठ से सत्य का
हनन होता है उस सभा में सब
सभासद् मरे से ही हैं।
‘‘जिस सभा में अधर्म से धर्म,
असत्य से सत्य,सब सभासदों
के देखते हुए मारा जाता है,उस
सभा में सब मृतक के समान
हैं,जानों उनमें कोई भी नहीं
जीता।’’
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धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण
सभां यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति
विद्धास्तत्र सभासदः।।

जिस सभा में अधर्म से घायल
होकर धर्म उपस्थित होता है जो
उसका शल्य अर्थात् तीरवत् धर्म
के कलंक को निकालना और
अधर्म का छेदन नहीं करते
अर्थात् धर्मों का मान,अधर्मी
को दण्ड नहीं मिलता उस सभा
में जितने सभासद् हैं वे सब
घायल के समान समझे जाते हैं।
‘‘अधर्म से धर्म घायल होकर
जिस सभा में प्राप्त होवे उसके
घाव को यदि सभासद् न पूर देवें
तो निश्चय जानो कि उस सभा में
सब सभासद् ही घायल पड़े हैं।’’
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ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च
सामवेदविदेव च।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया
धर्मसंशयनिर्णये।।

ऋग्वेदवित्,यजुर्वेदवित् और
सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों
की भी सभा धर्मसंशय अर्थात्
सब व्यवहारों के निर्णय के लिए
होनी चाहिए। ’और जिस सभा में ऋग्वेद,यजुर्वेद और सामवेद के
जानने वाले तीन सभासद
होके व्यवस्था करें,उस सभा
की,की हुई व्यवस्था का भी
कोई उल्लंघन न करे ।’
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