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सवेरे टीवी खोला तो देखा तो पता चला कि गिरीश कर्नाड मर गया।
न्यूजचैनलों पर यह भी याद दिलाया जा रहा है कि इस देश ने गिरीश कर्नाड को पद्मश्री, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित भी किया था।
लेकिन उन्हीं न्यूजचैनलों द्वारा यह नहीं बताया जा रहा कि इसी गिरीश कर्नाड ने पाकिस्तान परस्त देशद्रोही अरुंधति रॉय के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु की फांसी की सज़ा के खिलाफ बड़ी जोरदार ज़ंग भी लड़ी थी।

न्यूजचैनलों द्वारा यह नहीं बताया जा रहा कि इसी गिरीश कर्नाड ने कर्नाटक के महान योद्धा और अत्यधिक सम्मानित शासक रहे केम्पेगौड़ा के नाम पर बने बंगलुरू एयरपोर्ट का नाम बदलकर टीपू सुल्तान एयरपोर्ट कर देने की मांग का अभियान इसलिए चलाया था क्योंकि उसके अनुसार केम्पेगौड़ा और छत्रपति शिवा जी तथा महाराणा प्रताप से भी बड़ा और महान योद्धा टीपू सुल्तान था। गिरीश कर्नाड की इस कुकर्मी मांग के खिलाफ कर्नाटक की जनता सड़कों पर उतर आई थी और हज़ारों की संख्या में उसके पुतले फूंक कर, उसके घर पर अद्धे गुम्मों की जमकर बरसात की थी। परिणामस्वरूप इस गिरीश कर्नाड को हाथ पांव जोड़कर माफी मांगनी पड़ी थी।

न्यूजचैनलों द्वारा यह नही

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रानी वेलु नचियार और आत्मघाती हमले
By :- Anand Kumar

वेलु नचियार रामनद राज्य की राजधानी रामनाथपुरम से शासन करने वाले राजा चेल्लामुथु सेथुपरी और रानी सकंधीमुथल की इकलौती बेटी थी। वलारी और सिलंबम जैसी युद्ध कलाओं के अलावा वो अंग्रेजी फ्रेंच, उर्दू जैसी कई भाषाएँ भी जानती थी। उनकी शादी शिवगंगे के राजा से हुई जिस से उन्हें एक बेटी थी। आजादी के लिए इसाई हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली पहली रानी, दक्षिण भारत की वेलु नचियार थी। वो 1750-1800 के दौर की थीं, यानि भारत के पहले बड़े स्वतंत्रता संग्राम से करीब सौ साल पहले लड़ रही थीं।

अर्कोट के नवाब के साथ मिलकर इसाई हमलावरों ने उनके पति को मार डाला तो उन्हें युद्ध में शामिल होना पड़ा। अपनी बेटी के साठ वो कोपल्ला नायक्कर के संरक्षण में डिंडीगुल भाग गई और आठ साल वहीँ से संघर्ष किया। इसी दौरान उन्होंने गोपाल नायक्कर और हैदर अली से भी संधि की और 1780 में उनके आक्रमण कामयाब होने लगे। ये हमले महत्वपूर्ण क्यों हैं ? इसलिए क्योंकि इन आक्रमणों में पहले आधुनिक काल के युद्धों में पहले हिन्दू आत्मघाती हमले का जिक्र यहीं मिलता है। फिरंगियों से अपना राज्य वापस लेने के लिए रानी वेलु नचियार ने सबसे पहले आत्मघाती हमले और महिलाओं की सैन्य टुकड़ियों का इस्तेमाल किया था।

अपनी गोद ली हुई बेटी उदैयाल के नाम पर ही उनकी स्त्री सैन्य टुकड़ी का नाम उदैयाल था। उन्होंने ढूंढ निकाला कि फिरंगियों ने अपना गोला बारूद किले में कहाँ इकठ्ठा कर रखा है। रानी की बेटी, उदैयाल ने शरीर पर तेल डाला और गोला बारूद के गोदाम में खुद को आग लगा कर घुस गई। बारूद का भयावह विस्फोट और तोपों के नाकाम होते ही रानी की जीत पक्की हो गई थी। रानी वेलु नचियार इसलिए भी महत्वपूर्ण होती हैं क्योंकि तमिल लोककथाओं और लोकगीतों की ये नायिका भारत की वो इकलौती रानी थी जिसने फिरंगी भेड़ियों के जबड़े से अपना राज्य वापस छीन लिया था। उनके अलावा किसी ने अपना राज्य फिरंगियों से वापस जीतने में कामयाबी नहीं पाई थी।
1780 में ही मरुदु बंधुओं को उनके इलाके के काम-काज सम्बन्धी अधिकार उन्होंने दिए थे। बाद में उनकी बेटी वेल्लाची ने 1790 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में शासन संभाला। रानी वेलु नचियार की मृत्यु 25 दिसम्बर, 1796 को हुई थी।

रानी वेलु नचियार और उनकी बेटी उदैयाल की कहानी इसलिए याद आई क्योंकि भारतीय हिन्दू बार बार आत्मघाती फिदायीनों का हमला झेलते तो हैं, लेकिन खुद उसका इस्तेमाल करना, या उसे पहचानना भूल जाते हैं। वो भूल जाते हैं कि जो खुद के पेट पर बम बांध कर लोगों को मारने पर तुला हो, उसके मानवाधिकारों की बात करना मतलब उसके दर्जनों शिकारों के मानवाधिकारों से इनकार करना है। मानवाधिकार हैं भी तो पहले किसके हैं ? शोषित-पीड़ित आम नागरिक के जो कानूनों का पालन करता देश का संविधान मान रहा है या उसके जो कानूनों को ताक पर रखकर कत्ले-आम पर अमादा है ? अपराधों पर जेल जाता तो भी वोट देने जैस नागरिक अधिकार नहीं रहते, ऐसे व्यक्ति के मानवाधिकारों की जिम्मेदारी राज्य पर कैसे है ?

फिदायीन हमलावर को पहचानना इसलिए भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि वो आतंक फैलाने के लिए आम लोगों की निहत्थी भीड़ पर ही हमला करेगा। वो अपने आकाओं को बचाने के लिए ऐसे हमले कर रहा है। उसे अपनी जिहादी सोच फैलाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों को डराना है। वो विरोध के हर स्वर को कुचल कर खामोश कर देना चाहता है। वो मीडिया मुगलों जैसा है जो आज अंकित सक्सेना की हत्या पर दोमुंहा रवैया दिखा कर आपका निशाना बदलना चाहते हैं। मुद्दा था कि ऑटो रिक्शा वाले रविन्द्र, डॉ. नारंग, चन्दन गुप्ता सबकी हत्या में जो सच दिख रहा है, उसे देखने से इनकार क्यों किया जा रहा है ? आई.एस.आई.एस. जैसा सर कलम करने की घटनाओं में इस्लामिक जिहाद के सच की तरफ आँखे खुलती क्यों नहीं हैं ?

आप सोचते हैं कि तैरना नहीं आता तो क्या ? आपको कौन सा समंदर में जाकर गोता लगाना है ! लेकिन यहाँ समंदर तो घर में घुस आया है मियां ! सवाल ये भी है कि मियां अब तैरना सीखेंगे या सेकुलरिज्म की पट्टी आँख पर बांधे रखनी है !

दिल्ली के अंकित सक्सेना की मौत और पेड मीडिया के बर्ताव पर अजित भारती का लेख

“पति को मारकर ले जाना मंजरी को ! ऐसे तो नहीं ले जाने दूँगी”, मंजरी की माँ ने कहा। ये भोजपुरी लोककथा की नायिका, मंजरी, मेहरा नाम के एक यादव सरदार की बेटी थी। ये लोककथा कहीं ना कहीं ये भी दर्शा देती है कि “उठा ले जाने” से बचाने के लिए विवाह कर देने की परंपरा कैसे शुरू हुई होगी। इस लोककथा के शुरू होने का समय करीब वही रहा होगा जो आज के महाराष्ट्र-गुजरात के कुछ इलाकों में यादव राजवंश के शासन का काल था। करीब इसी से थोड़ा पहले राजा सुहेलदेव राजभर ने गज़नवी के भांजे-भतीजे, “गाज़ी सलार मसूद” और उसकी फौज़ को खदेड़ कर गाजर-मूलियों की तरह काटा था।

कहानी कुछ यूँ है कि अगोरी नाम के राज्य में मोलागत नाम के राजा का शासन था। मेहरा नाम का सरदार शायद सत्ता को चुनौती देने लायक शक्तिशाली हो चला होगा, तो ऐसी ही किसी वजह से राजा मोलागत, मेहरा से जलते थे। उसे नीचा दिखाने के लिए उन्होंने मेहरा तो जूआ खेलने का न्योता भेजा। उम्मीद के मुताबिक राजा मोलागत जीत नहीं पाए, उल्टा अपना राज-पाट भी हार गए। निराश हारे हुए राजा जब अपने भूतपूर्व हो चुके राज्य से जा रहे थे, तो भेष बदले ब्रह्मा, उनपर तरस खा के, उनके पास आये। उन्होंने राजा को कुछ सिक्के दिए और कहा इनको दांव पर लगाओ तो जीतोगे।

राजा मोलागत वापस आये और मेहरा से फिर से एक बाजी खेली। इस बार मेहरा हारने लगे, हारते हारते वो अपनी गर्भवती पत्नी के पेट में पल रहे बच्चे को भी हार गए। राजा मोलागत को अपना राज्य वापस मिल गया था तो ज्यादा लालच करने की जरुरत नहीं रह गई थी। उन्होंने कहा कि अगर होने वाली संतान लड़का हुआ तो वो अस्तबल में काम करेगा, अगर लड़की हुई तो उसे रानी की सेवा में रखा जाएगा। हारा मेहरा लौट गया। समय बीतने पर जब संतान का जन्म हुआ तो वो एक अद्भुत सी लड़की थी। राजा के आदमी जब उसे लेने आये तो इस लड़की की माँ ने कहा, इसे ऐसे नहीं ले जा सकते ! इसके पति को युद्ध में जीतकर मार देना तो इसे ले जा कर नौकर रखना।

समाजशास्त्रियों की कथाओं को मानें तो उस काल में ऐसा होना नहीं चाहिए था। स्त्रियों को बोलने, अपनी राय रखने, या संपत्ति पर अधिकार जैसा कुछ नहीं जताना चाहिए। आश्चर्यजनक ये भी है कि इस लोककथा के काफी बाद के यानि मराठा काल तक भी जब मंदिरों का निर्माण देखें तो भूमि और बनाने-जीर्णोद्धार की आज्ञा रानी अहिल्याबाई होल्कर और कई अन्य रानियों की निकल आती है। पता नहीं क्यों पैत्रिक संपत्ति में स्त्रियों के हिस्से के लिए दायभाग और सम्बन्धियों में “दायाद” या “दियाद” जैसे शब्द भी मिल जाते हैं। हो सकता है समाजशास्त्री कल्पनाओं में पूरा सच ना बताया गया हो।

खैर तो लोककथा में आगे कुछ यूँ हुआ कि मेहरा की ये सातवीं संतान अनोखी थी। उसे अपने पूर्वजन्मों की याद थी और उसके आधार पर उसने अपनी माँ को बताया कि आप लोग बलिया नाम की जगह पर लोरिक को ढूंढें। मेहरा लोरिक के घर जाते हैं और शादी भी तय हो जाती है। लोककथा की अतिशयोक्ति जैसा ही लोरिक डेढ़ लाख बारातियों के साथ मंजरी से शादी के लिए आते हैं। राजा मोलागत को जब इसका पता चलता है तो उनकी सेना भी युद्ध के लिए सजती है। लड़ाई होती है मगर लोरिक जीत नहीं पा रहे थे। उनकी हार की संभावना देखकर मंजरी फिर से सलाह देती है।

वो बताती है कि अगोरी के किले के पास ही गोठानी गाँव है जहाँ भगवान शिव का मंदिर है। अगर लोरिक वहां शिव की उपासना करे तो उसे जीत का वर मिल सकता है। लोरिक ऐसा ही करता है और जीत जाता है। दोनों की शादी होती है और विदाई से पहले मंजरी कहती है कि कुछ ऐसा करो जिस से लोग लोरिक-मंजरी के प्रेम को सदियों याद रखें। कुछ कथाएँ कहती हैं कि मंजरी देखना चाहती थी कि आखिर तलवार का वो कैसा वार था जिसने राजा को हरा दिया ? उसके पूछने पर लोरिक वहीँ पास की चट्टान पर तलवार चला देता है। कहते हैं पहले वार में चट्टान का एक टुकड़ा नीचे खाई में जा गिरा और मंजरी उतने से खुश नहीं हुई। दूसरी बार फिर से वार करने पर चट्टान आधी कटी।

मंजरी-लोरिक की कहानी के ये पत्थर जमाने से यहीं खड़े हैं। कहते हैं यहाँ से प्रेमी कभी मायूस नहीं लौटते। हर साल गोवर्धन पूजा पर उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले में यहाँ पर मेला लगता है। रोबर्ट्सगंज नाम क्यों और कैसे, किसने रख दिया, ये हमें मालूम नहीं। जहाँ तक कला का प्रश्न है, कुछ लोगों को पिकासो जैसों की ना समझ में आती ऐबस्ट्रैक्ट पेंटिंग पसंद आती है, कुछ को माइकल एंजेलो जैसों की स्पष्ट कहानियों पर बनी तस्वीरें अच्छी लगती है। कला का ही मामला देखें तो आप ताजमहल पर अकाल के दौर में करोड़ों के खर्च में विद्रूपता भी देख सकते हैं। प्रेम की निशानी इस साधारण से आधे कटे चट्टान में सौन्दर्य भी दिख सकता है।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |

रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |

अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?

लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?
✍🏻
आनन्द कुमार

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गिरीश कर्नाड का वास्तविक चेहरा….

“गिरीश कर्नाड की मौत मुझे अपने बचपन की ओर ले गयी… शायद कक्षा 4 या 5 में पढ़ते होंगे कि पिक्चरों में अरुचि रखने वाले पिता जी ने एक इतवार को कहा कि हिन्द टाकीज में एक बढ़िया पिक्चर ‘मंथन’ लगी है ,चलो देखने चलते थे… घर के सभी सदस्य 3 रिक्शों पर सवार होकर हिन्द टाकीज पहुचे.. पिता के उत्साह का रहस्य खुला… पिक्चर एक कला फ़िल्म थी और साथ मे टैक्सफ्री भी ! शायद ढाई रुपये का ड्रैस सर्किल का टिकिट था ! बालकनी में कितने लोग होंगे…मगर ड्रैस सर्किल में हमारा ही परिवार था ! हाल खाली पड़ा था…
पिक्चर गुजरात की दुग्ध क्रांति Operation Flood पर थी… हीरो गिरीश कर्नाड थे… हीरोइन पिक्चर में आदिवासी बनी हुई… स्मिता पाटिल थीं ! पिक्चर में कोऑपरेटिव,दूध उत्पादन और गांव वगैरा था… मगर हमे स्मिता पाटिल और गिरीश कर्नाड का नैन मटक्का ही अच्छा लगा… एक कोई गाना भी था पिक्चर में ” मोरे घर आँगड़ा ” टाइप का ! मगर धीर -गंभीर गिरीश कर्नाड हमे भा गए ! स्मिता पाटिल की शक्ल हमारे घर की महरी से मिलती जुलती लगी तो उनसे हमारा लगाव आगे न बढ़ सका !… पिक्चर के बाद हम सभी भाई -बहन और मां… पिता जी से नाराज़ हो गए ! हम सब समझे थे कि कोई धर्मेंद्र – माला सिन्हा जैसे किसी हीरो -हीरोइन की फ़िल्म देखने को मिलेगी !
बाद में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में ‘मालगुडी डेज़’ में गिरीश कर्नाड ‘स्वामी’ के पिता के रूप में दिखाई दिए .. जनाब, यह वह सीरियल था जो आज भी दक्षिणी भारत के घर,पोस्ट ऑफिस,गाँव का रेलवे स्टेशन… हरे भरे खेत, बारिश, जंगल और स्वामी के बालमन से उत्पन्न परिस्थियों से उपजी कहानियों की याद दिला देता है !…
मगर असली ज़िन्दगी में गिरीश कर्नाड एक गुस्सैल,दंभी,वामपंथी साम्यवादी थे ! तीन विषयों में ऑक्सफोर्ड से परास्नातक थे ! अनेक किताबे भी लिखी… वी बी कारंत के बाद सबसे लब्धप्रतिष्ठ नाट्यकार थे… लिखते भी थे… अभिनय क्या बात थी ,वाह ! मगर सनातन संस्कृति से उनकी नफरत इस हद तक थी वह इसके खत्म हो जाने की कामना करते थे ! हिंदुहन्ता टीपू सुल्तान के नाम से बंगलौर हवाई अड्डे का नामकरण चाहते थे ! गौरी लंकेश,तीस्ता सीतलवाड़,जावेद आनंद ,प्रकाशराज और प्रशांत भूषण जैसों से उनका याराना था ! JNU में गिरीश कर्नाड पूजे जाते थे !…
टाटा लिटरेरी फेस्टिवल 2012 का मुम्बई में आयोजन था ! विश्व-प्रसिद्ध बुकर और नोबल पुरस्कार विजेता सर वी एस नायपाल का स्वागत होना था, उनका व्याख्यान भी था ! उनसे पहले गिरीश कर्नाड को थियेटर में योगदान हेतु 20 मिनट के व्याख्यान के लिए बुलाया गया ! दरअसल कर्नाड… सर नायपाल की पुस्तक ‘A Wounded Civilization ‘ से बहुत नाराज थे ! Wounded Civilization में सर नायपाल ने कर्नाटक में हम्पी नगर को मुस्लिम बादशाहों द्वारा नष्ट करने का भावपूर्ण वर्णन किया था ! साथ ही साथ बाबरी ध्वंस को हिंदुओं का साहसिक कार्य बताया था… मुम्बई दंगों में मुस्लिम आतंक की चर्चा की थी ! यह किताब पूरी दुनिया मे सराही गई… हिंदुओं के पक्ष को दुनिया ने जाना ! गिरीश कर्नाड एक वामपंथी और नक्सली समर्थक होने के नाते हिंदु सभ्यता की तारीफ या बाबरी ध्वंस का महिमा मंडन कैसे सुन सकते थे ?..
कार्यक्रम में वी एस नायपाल अपनी पत्नी के साथ मौजूद थे ! जैसे ही गिरीश कर्नाड को भाषण का मौका मिला, उन्होंने अपना विषय छोड़… सर वी एस नायपाल पर चढ़ाई कर दी ! उन्हें वस्तुतः गलियों से नवाजा… उन्हें गद्दार कहा… एक नोबिल पुरुस्कार विजेता… जिसका सम्मान पूरी दुनिया करती थी ,इंग्लैंड ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी थी… उनकी पत्नी लेडी नादिरा नायपाल भी कार्यक्रम में अपने पति का… उनके पुरखों के देश मे सम्मान होते देखने साथ आईं हुई थी ! गिरीश कर्नाड ने 40 मिनट तक सर नायपाल को सैकड़ो राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सामने गलियाया… आयोजक अनिल धारकर ने भी गिरीश की बदतमीज़ी को चालू रहने दिया….
अंततः विश्वप्रसिद्ध दर्जनों किताबों के लेखक नोबिल पुरुस्कार विजेता, जो खुद को भारत की संतान कहता था… फफक- फफक कर रो पड़ा… उनकी पत्नी भी अपमान के सन्निपात से जड़ रह गईं… अपमानित और रोते हुए… सर वी एस नायपाल कार्यक्रम छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गए ! गिरीश कर्नाड हंसते हुए मंच से उतरे ! उसके बाद मृत्यु होने तक सर वी एस नायपाल ने भारत की ओर कभी मुख उठा कर नहीं देखा !! …
गिरीश कर्नाड !! यह लेख… मैंने आपको श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं… वरन सर वी एस नायपाल को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा है ! कर्नाड साहेब आपकी तुलना मैं वी पी सिंह से करूँगा जो 26/11 के दौरान दुखदायी मौत को प्राप्त हुए थे और उनको श्रद्धांजलि देने की फुरसत किसी के पास नहीं थी ….”