Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजू तिवारी

जापान में एक बहुत बड़ा राजा हुआ। उसने सुनी खबर कि पास के पहाड़ पर एक फकीर लोगों को ध्यान सिखाता है। बहुत लोगों ने खबर दी कि बहुत शांति मिली है, बहुत आनंद मिला है और प्रभु की झलक दिखाई पड़ी है। तो वह राजा भी गया। दूर-दूर तक पहाड़ में फैला हुआ आश्रम था, बीच में बड़ा भवन था, जो उस पूरे आश्रम में सबसे ऊपर और अलग दिखाई पड़ता था, बाकी तो झोपड़े थे। तो वह फकीर झोपड़ों का तो बताने लगा कि वे यहां स्नान करते हैं, यहां भोजन करते हैं, यहां पढ़ते हैं, यहां वह करते हैं। वह राजा बोला कि मैं समझ गया झोपड़ों की बात, लेकिन इस बीच के बड़े भवन में क्या करते हैं? लेकिन फकीर इस बात को पूछते ही चुप हो जाता था। राजा बहुत परेशान हुआ। वह दूसरे झोपड़ों के बाबत फिर बताने लगा। आखिर विदा होने का वक्त आ गया, न तो वह उस बड़े भवन में ले गया और न उसके संबंध में कुछ कहा।

राजा ने चलते हुए कहा कि या तो तुम पागल हो या मैं पागल हूं। जिस चीज को देखने आया था उसको तो तुमने दिखाया भी नहीं, उस बड़े भवन में मुझे ले भी नहीं गए, उसके संबंध में कुछ कहते भी नहीं। मैं दो-चार बार पूछ भी चुका। और तुम यह सब फिजूल–कि भिक्षु यहां स्नान करते हैं, यहां पानी है, यहां यह है–यह सब तुमने मुझे बताया, इससे क्या प्रयोजन है?

वह फकीर बोला, मैं जरा मुश्किल में पड़ गया जब आप पूछते थे कि भिक्षु यहां क्या करते हैं? तो कठिनाई हो गई कि बात गड़बड़ हो जाएगी। भिक्षु वहां कुछ करते नहीं, वहां ध्यान में जाते हैं। और ध्यान कोई करना नहीं है। इसलिए मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। अगर मैं कहूं कि ध्यान करते हैं, तो गलती हो जाएगी, क्योंकि ध्यान किया नहीं जाता।

वह कोई एक्ट नहीं है आपका, आपकी कोई क्रिया नहीं है। बल्कि जब आप सारी क्रियाएं छोड़ कर मौन हो जाते हैं, वहां कोई क्रिया नहीं रह जाती; शरीर कुछ नहीं कर रहा है, मन भी कुछ नहीं कर रहा है; शरीर भी शांत हो गया, मन भी शांत हो गया। दो ही तो क्रियाएं होती हैं–शरीर की या मन की। आत्मा की कोई क्रिया नहीं होती। आत्मा की कोई भी क्रिया नहीं होती। शरीर की क्रिया होती है या मन की क्रिया होती है। ध्यान वह स्थिति है जब शरीर की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं, मन की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं। फिर क्या है? वहां कोई एक्शन नहीं है, वहां सिर्फ बीइंग है। वहां कोई कर्म नहीं है, मात्र आत्मा है। वहां मात्र होना मात्र है। वहां कुछ किया नहीं जा रहा है, हम सिर्फ हैं।

इस फर्क को समझ लेंगे तो आपको खयाल में आ जाएगा कि अकेला ध्यान ऐसी स्थिति और अवस्था है जिसको अज्ञानी भी कर सकता है। भाषा की भूल है। अज्ञानी भी कर सकता है और कुछ बुरा नहीं होगा। बल्कि इसके ही द्वारा उसका अज्ञान टूटेगा और नष्ट होगा।

मैं एक शिविर में था। वहां एक अत्यंत वृद्ध महिला, कोई अस्सी वर्ष की बूढ़ी महिला भी उस शिविर में आईं। वे बड़ी सीधी महिला हैं, अत्यंत गांव की हैं, बिलकुल बे-पढ़ी-लिखी हैं। बहुत लोग उनको आदर करते हैं। कारण खोजना कठिन है आदर का। क्योंकि न वे कुछ बोलती हैं, न कोई खास बात है, गांव की बिलकुल सामान्य महिला हैं। फिर भी उनके घर को लोग तीर्थ मानते हैं और आसपास उनके घर के चक्कर लगा जाते हैं।

वे भी आ गईं। किसी उनके भक्त ने कहा कि वहां चलिए, तो उन्होंने कहा, ठीक है, तो वे भी आ गईं। उनके पास गुजरात के एक बहुत प्रतिष्ठित वकील कोई बीसत्तीस वर्षों से सब कुछ छोड़ कर उनके पास ही रहते हैं, उनके पैर दाबते रहते हैं, उनके कपड़े धोते रहते हैं। वे उनके साथ आए हुए थे।

सुबह की चर्चा में मैंने ध्यान के लिए समझाया। रात को हम ध्यान के लिए बैठे तो वे वकील मेरे पास आए और उन्होंने कहा उन महिला के बाबत कि वे तो नहीं आती हैं। मैंने बहुत कहा कि ध्यान करने चलो, तो वे हंसती हैं और कहती हैं, तुम जाओ। मैं नहीं समझा, उन्होंने कहा। वकील ने मुझसे कहा कि मैं नहीं समझ पाया वे क्यों नहीं आती हैं?

मैंने कहा, कल सुबह मेरे सामने ही उनसे पूछना।

कल सुबह उन वकील ने खड़े होकर उनसे पूछा कि मैं यह निवेदन करता हूं कि यह बताइए आप कल आईं क्यों नहीं? जब मैंने आपसे बार-बार कहा कि ध्यान करने चलिए तो आप नहीं आईं।

तो वे हंसने लगीं और मुझसे बोलीं, आपने इतना समझाया सुबह कि ध्यान किया नहीं जाता। मगर ये फिर भी मुझसे कहने लगे कि ध्यान करनेचलिए, ध्यान करने चलिए। तो मुझे हंसी आने लगी कि ये कुछ समझे नहीं तो ध्यान क्या करेंगे? तो मैंने इनसे कहा, तुम जाओ। और जब ये चले आए तो मैं ध्यान में चली गई। उन्होंने मुझसे कहा, जब ये चले आए और कमरा सन्नाटा हो गया, तो मैं ध्यान में चली गई। ये यहां ध्यान करते रहे और वहां मैं ध्यान में चली गई।

ध्यान करना नहीं है, क्योंकि करने में एक एफर्ट है, कोशिश है, काम है। ध्यान कोई काम नहीं है, ध्यान एक अवस्था है। ध्यान ऐसी अवस्था है जहां कोई क्रिया नहीं हो रही है।
~ ओशो

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