Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजीव सुक्ला

🔴दर्पण

एक राजधानी में एक संध्या बहुत स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। सारा नगर दीयों से सजाया गया था। रास्तों पर बड़ी भीड़ थी और देश का सम्राट खुद गांव के बाहर एक संन्यासी की प्रतीक्षा में खड़ा था। एक संन्यासी का आगमन हो रहा था। और जो संन्यासी आने को था नगर में, सम्राट के बचपन के मित्रों में से था। उस संन्यासी की दूर-दूर तक सुगंध पहुंच गई थी। उसके यश की खबरें दूर-दूर के राष्ट्रों तक पहुंच गई थीं। और वह अपने ही गांव में वापस लौटता था, तो स्वाभाविक था कि गांव के लोग उसका स्वागत करें। और सम्राट भी बड़ी उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा में नगर के द्वार पर खड़ा था।

संन्यासी आया, उसका स्वागत हुआ, संन्यासी को राजमहल में लेकर सम्राट ने प्रवेश किया। उसकी कुशलक्षेम पूछी। वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटा था। राजा ने अपने मित्र उस संन्यासी से कहा, सारी पृथ्वी घूम कर लौटे हो, मेरे लिए क्या ले आए हो? मेरे लिए कोई भेंट?

संन्यासी ने कहा, मुझे भी खयाल आया था, पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटूं तो तुम्हारे लिए कुछ लेता चलूं। बहुत चीजें खयाल में आईं, लेकिन जो चीज भी मैंने लानी चाही, साथ में खयाल आया, तुम बड़े सम्राट हो, निश्चित ही यह चीज भी तुमने अब तक पा ली होगी। तुम्हारे महलों में किस बात की कमी होगी, तुम्हारी तिजोरियों में जो भी पृथ्वी पर सुंदर है, बहुमूल्य है, पहुंच गया होगा, और मैं हूं गरीब फकीर, नग्न फकीर, मैं तुम्हें क्या ले जा सकूंगा। बहुत खोजा, लेकिन जो भी खोजता था यही खयाल आता था तुम्हारे पास होगा और जो तुम्हारे पास हो उसे दुबारा ले जाने का कोई अर्थ न था। फिर भी एक चीज मैं ले आया हूं। और मैं सोचता हूं, वह तुम्हारे पास नहीं होगी।

सम्राट भी विचार में पड़ गया कि यह क्या ले आया होगा? उसके पास कुछ दिखाई भी न पड़ता था, सिवाय एक झोले के। उस झोले में क्या हो सकता था? आप भी कल्पना न कर सकेंगे, वह उस झोले में क्या ले आया था? कोई भी कल्पना न कर सकेगा वह क्या ले आया था? उसने झोले को खोला और एक बड़ी सस्ती सी और एक बड़ी सामान्य सी चीज उसमें से निकाली। एक आईना, एक दर्पण। और सम्राट को दिया और कहा, यह दर्पण मैं तुम्हारे लिए भेंट में लाया हूं, ताकि तुम इसमें स्वयं को देख सको।

दर्पण राजा के भवन में बहुत थे, दीवारें दर्पणों से ढकी थीं। राजा ने कहा, दर्पण तो मेरे महल में बहुत हैं। लेकिन उस फकीर ने कहा, होंगे जरूर, लेकिन तुमने उनमें शायद ही स्वयं को देखा हो। मैं जो दर्पण लाया हूं इसमें तुम खुद को देखने की कोशिश करना।

जमीन पर बहुत ही कम लोग हैं जो खुद को देखने में समर्थ हो पाते हैं। और वह व्यक्ति जो स्वयं को नहीं देख पाता, वह चाहे सारी पृथ्वी देख डाले, तो भी मानना कि वह अंधा था, उसके पास आंखें नहीं थीं। क्योंकि जो आंखें स्वयं को देखने में समर्थ न हो पाएं, वे आंखें ही नहीं।♣️

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दीनेश प्रताप सिंग

“प्रभु की ओर”*
🕉
जब भगवान् की लगन लग जाती है या भगवान् की ओर जीवन की गति हो जाती है तो जीवन दूसरी ओर जा ही नहीं सकता। यदि जाता है तो इसका यही अर्थ है कि जीवन की गति भगवान् की ओर नहीं है।
एक बूढ़े महात्मा जंगल में रहते थे। उनके पास एक राजा संन्यास लेकर आये। बूढ़े महात्मा ने सोचा जरा इसकी परीक्षा की जाय। एक बार नये महात्मा क्षेत्र में रोटी लेकर आ रहे थे तो इन्होंने जरा कोहनी मार दी। इस पर रोटी गिर गयी, किन्तु उन्होंने बड़े प्रेमपूर्वक बिना किसी क्षोभ के रोटी उठा ली और चल दिये। फिर पीछे गये, धक्का दिया और रोटी फिर गिर गयी। इस बार नये महात्मा ने रोटी उठा ली पर जरा हँसे । पुनः आगे बढ़े फिर उन्होंने वैसा ही किया और रोटी गिरा दी। इस बार वे हँसे और खड़े हो गये। हाथ जोड़कर बोले-“महाराज ! आपने बड़ी कृपा की जो मेरी परीक्षा ली। मैं इतने बड़े राज्य का जब त्याग करके यहाँ आ गया हूँ तो इस रोटी वाली बात में मुझे कौन-सा क्षोभ होगा ?” महात्मा बोले- “इसीलिये रोटी गिराई है। तुम्हें अभी तक राज्य के त्याग की बात याद है। इतना बड़ा त्याग करके आ गये यह तुम अपने मन में याद रखते हो और यही सुनना भी चाहोगे कि कितना बड़ा त्यागी है। अगर, राज्य का महत्व तुम्हारे मन में बना हुआ है तो राज्य का त्याग कहाँ हुआ ? इस त्याग का भी त्याग कर दो तब ठीक है।”
एक बार की बात है कि काशी में मणिकर्णिका घाट पर कुछ लोग बैठे थे। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष को चाँदनी रात थी। कुछ के मन में बात आयी कि चाँदनी रात में नाव पर बैठकर के प्रयाग चलते हैं। वहाँ नाव भाडे पर लिया और उसमें सवार हो गये। काशी में भाँग घुटती है इस कारण बैठने वाले भी भाँग पिये थे और केवट भी। सब बैठ गये तो नाव चलने लगी। सभी सो गये। चलाते-चलाते सबेरा हो गया। सबेरे जब नशा उतरा तो देखा कि नाव वहीं मणिकर्णिका घाटपर ही पड़ी है। आगे गयी ही नहीं। एक ने केवट से पूछा कि क्या तुमने डाँड नहीं चलायी ? उसने कहा कि, “डाँड चलाते-चलाते हमारे हाथ थक गये।” फिर पूछा कि, “तुमने डाँड चलाया तो नाव गयी कैसे नहीं ?” बाद में देखा गया कि रस्सा खोला ही नहीं गया था। इसी प्रकार हम लोगों ने साधना की कहाँ ? जगत् का रस्सा बँधा ही है। रस्सा बाँधे रखकर कहते हैं कि भगवान् हमें मिले ही नहीं। अरे ! उधर तुम गये ही कहाँ ? रस्सा खोलो और भगवान् की ओर नाव ले जाओ फिर तुरन्त वहाँ पहुँचोगे।
*

जय जय श्री राधे*🙏🙏🏻🙏🏻🌹

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पुष्पा गुप्ता

. “नियम का महत्व”

एक संत थे। एक दिन वे एक जाट के घर गए। जाट ने उनकी बड़ी सेवा की। सन्त ने उसे कहा कि रोजाना नाम -जप करने का कुछ नियम ले लो। जाट ने कहा बाबा, हमारे को वक्त नहीं मिलता। सन्त ने कहा कि अच्छा, रोजाना ठाकुर जी की मूर्ति के दर्शन कर आया करो। जाट ने कहा मैं तो खेत में रहता हूँ और ठाकुर जी की मूर्ति गाँव के मंदिर में है, कैसे करूँ ?
संत ने उसे कई साधन बताये, कि वह कुछ-न-कुछ नियम ले लें। पर वह यही कहता रहा कि मेरे से यह बनेगा नहीं, मैं खेत में काम करूँ या माला लेकर जप करूँ। इतना समय मेरे पास कहाँ है ? बाल-बच्चों का पालन पोषण करना है। आपके जैसे बाबा जी थोड़े ही हूँ। कि बैठकर भजन करूँ। संत ने कहा कि अच्छा तू क्या कर सकता है ? जाट बोला कि पड़ोस में एक कुम्हार रहता है। उसके साथ मेरी मित्रता है। उसके और मेरे खेत भी पास-पास हैं, और घर भी पास-पास है। रोजाना एक बार उसको देख लिया करूँगा। सन्त ने कहा कि ठीक है, उसको देखे बिना भोजन मत करना। जाट ने स्वीकार कर लिया। जब उसकी पत्नी कहती कि भोजन कर लो। तो वह चट बाड़ पर चढ़कर कुम्हार को देख लेता। और भोजन कर लेता। इस नियम में वह पक्का रहा।
एक दिन जाट को खेत में जल्दी जाना था। इसलिए भोजन जल्दी तैयार कर लिया। उसने बाड़ पर चढ़कर देखा तो कुम्हार दीखा नहीं। पूछने पर पता लगा कि वह तो मिट्टी खोदने बाहर गया है। जाट बोला कि कहाँ मर गया, कम से कम देख तो लेता। अब जाट उसको देखने के लिए तेजी से भागा। उधर कुम्हार को मिट्टी खोदते-खोदते एक हाँडी मिल गई। जिसमें तरह-तरह के रत्न, अशर्फियाँ भरी हुई थीं। उसके मन में आया कि कोई देख लेगा तो मुश्किल हो जायेगी। अतः वह देखने के लिए ऊपर चढा तो सामने वह जाट आ गया।
कुम्हार को देखते ही जाट वापस भागा। तो कुम्हार ने समझा कि उसने वह हाँडी देख ली। और अब वह आफत पैदा करेगा। कुम्हार ने उसे रूकने के लिए आवाज लगाई। जाट बोला कि बस देख लिया, देख लिया। कुम्हार बोला कि अच्छा, देख लिया तो आधा तेरा आधा मेरा, पर किसी से कहना मत।
जाट वापस आया तो उसको धन मिल गया। उसके मन में विचार आया कि संत से अपना मनचाहा नियम लेने में इतनी बात है। अगर सदा उनकी आज्ञा का पालन करूँ तो कितना लाभ है। ऐसा विचार करके वह जाट और उसका मित्र कुम्हार दोनों ही भगवान् के भक्त बन गए।
तात्पर्य यह है कि हम दृढता से अपना एक उद्देश्य बना ले, नियम ले लें तो वह भी हमारी डुबती किश्ती पार लगा सकता है।

“जय जय श्री राधे”


“श्रीजी की चरण सेवा”

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अरुण पांडे

मैनेजमेंट लेसन:

एक दिन एक कुत्ता 🐕 जंगल में रास्ता खो गया..

तभी उसने देखा, एक शेर 🦁 उसकी तरफ आ रहा है..

कुत्ते की सांस रूक गयी..
“आज तो काम तमाम मेरा..!”

He thought, & applied A lesson of
MBA..

फिर उसने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ ☠ पड़ी देखी..

वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया..

और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा,
और जोर जोर से बोलने लगा..

“वाह ! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है..
एक और मिल जाए तो पूरी दावत हो जायेगी !”

और उसने जोर से डकार मारी..
इस बार शेर सोच में पड़ गया..

उसने सोचा-
“ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है ! जान बचा कर भागने मे ही भलाइ है !”

और शेर वहां से जान बचा के भाग गया..

पेड़ पर बैठा एक बन्दर 🐒 यह सब तमाशा देख रहा था..

उसने सोचा यह अच्छा मौका है,
शेर को सारी कहानी बता देता हूँ ..

शेर से दोस्ती भी हो जायेगी,
और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी दूर हो जायेगा..

वो फटाफट शेर के पीछे भागा..

कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया की कोई लोचा है..

उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी, की कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है..

शेर जोर से दहाडा –
“चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूँ”..

और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ चल दिया..

Can you imagine the quick “management” by the DOG…???

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया,

मगर फिर हिम्मत कर कुत्ता उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया l

He applied Another lesson of MBA ..

और जोर जोर से बोलने लगा..

“इस बन्दर को भेजे 1 घंटा हो गया..
साला एक शेर को फंसा कर नहीं ला सकता !”

यह सुनते ही शेर ने बंदर को वही पटका और वापस पिछे भाग गया ।

शिक्षा 1:- मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं

शिक्षा 2:- हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें क्योंकि यहीं जीवन की असली सफलता मिलेगी

शिक्षा 3 :- आपका ऊर्जा, समय और ध्यान भटकाने वाले कई बन्दर आपके आस पास हैं, उन्हें पहचानिए और उनसे सावधान रहिये

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजू तिवारी

एक छोटी सी कहानी मुझे प्रीतिकर है,
वह मैं कहूं!
एक बड़ा मंदिर, उस बड़े मंदिर में सौ पुजारी,
बड़े पुजारी ने एक रात स्वप्न देखा है कि
प्रभु ने खबर की है स्वप्न में कि कल मैं आ रहा हूँ!
विश्वास तो न हुआ पुजारी को क्योंकि पुजारियों से ज्यादा अविश्वासी आदमी खोजना सदा ही कठिन है।
विश्वास इसलिए भी न हुआ कि जो दुकान करते हैं धर्म की, उन्हें धर्म पर कभी विश्वास नहीं होता!
धर्म से वे शोषण करते हैं, धर्म उनकी श्रद्धा नहीं है!
और जिसने श्रद्धा को शोषण बनाया, उससे ज्यादा
अश्रद्धालु कोई भी नहीं होता!
पुजारी को भरोसा तो न आया कि भगवान आएगा,
कभी नहीं आया! वर्षों से पुजारी है, वर्षों से पूजा
की है, भगवान कभी नहीं आया! भगवान को भोग भी
लगाया है, वह भी अपने को ही लग गया है!
भगवान के लिए प्रार्थनाएं भी की हैं,
वे भी खाली आकाश में, जानते हुए कि कोई नहीं
सुनता, की हैं! सपना मालूम होता है! समझाया
अपने मन को कि सपने कहीं सच होते हैं!
लेकिन फिर डरा भी, भयभीत भी हुआ कि कहीं सच ही न हो जाए! कभी—कभी सपने भी सच हो जाते हैं; कभी—
कभी जिसे हम सच कहते हैं, वह भी सपना हो जाता है, कभी—कभी जिसे हम सपना कहते हैं, वह सच हो जाता है।
तो अपने निकट के पुजारियों को उसने कहा कि सुनो, बड़ी मजाक मालूम पड़ती है, लेकिन बता दूं! रात सपना देखा कि भगवान कहते हैं कि कल आता हूँ! दूसरे पुजारी भी हंसे; उन्होंने कहा, पागल हो गए! सपने की बात
किसी और से मत कहना, नहीं तो लोग पागल समझेंगे! पर उस बड़े पुजारी ने कहा कि कहीं अगर वह आ ही गया! तो कम से कम हम तैयारी तो कर लें! नहीं आया
तो कोई हर्ज नहीं, आया तो हम तैयारतो मिलेंगे।
तो मंदिर धोया गया, पोंछा गया, साफ किया गया,
फूल लगाए गए, दीये जलाए गए; सुगंध छिडकी गई, धूप—दीप सब; भोग बना, भोजन बने! दिन भर में पुजारी थक गए; कई बार देखा सड़क की तरफ, तो कोई आता हुआ दिखाई न पड़ा! और हर बार जब देखा तब लौटकर कहा, सपना सपना है, कौन आता है!
नाहक हम पागल बने!
अच्छा हुआ, गांव में खबर न की, अन्यथा लोग हंसते!
सांझ हो गई! फिर उन्होंने कहा, अब भोग हम अपने
को लगा लें! जैसे सदा भगवान के लिए लगा भोग
हमको मिला, यह भी हम ही को लेना पड़ेगा! कभी
कोई आता है! सपने के चक्कर में पड़े हम, पागल
बने हम— जानते हुए पागल बने!
दूसरे पागल बनते हैं न जानते हुए!
हम…….हम जो जानते हैं भलीभांति कभी कोई
भगवान नहीं आता!
भगवान है कहां?
बस यह मंदिर की मूर्ति है, हम पुजारी हैं,
यह हमारी पूजा है, यह व्यवसाय है!
फिर सांझ उन्होंने भोग लगा लिया, दिन भर के
थके हुए वे जल्दी ही सो गए!
आधी रात गए कोई रथ मंदिर के द्वार पर रुका!
रथ के पहियों की आवाज सुनाई पड़ी! किसी पुजारी को नींद में लगा कि मालूम होता है उसका रथ आ गया! उसने जोर से कहा, सुनते हो, जागो!
मालूम होता है जिसकी हमने दिन भर प्रतीक्षा
की, वह आ गया!
रथ के पहियों की जोर—जोर की आवाज सुनाई पड़ती है!
दूसरे पुजारियों ने कहा, पागल, अब चुप भी रहो;
दिन भर पागल बनाया, अब रात ठीक से सो लेने दो!
यह पहियों की आवाज नहीं, बादलों की गड़गड़ाहट है! और वे सो गए, उन्होंने व्याख्या कर ली!
फिर कोई मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ा, रथ द्वार पर रुका, फिर किसी ने द्वार खटखटाया, फिर किसी पुजारी की नींद खुली, फिर उसने कहा कि मालूम होता है वह आ गया मेहमान, जिसकी हमने प्रतीक्षा की! कोई द्वार खटखटाता है! लेकिन दूसरों ने कहा कि कैसे पागल हो, रात भर सोने दोगे या नहीं? हवा के थपेडे हैं, कोई द्वार
नहीं थपथपाता है! उन्होंने फिर व्याख्या कर ली, फिर वे सो गए!
फिर सुबह वे उठे, फिर वे द्वार पर गए! किसी के
पद—चिह्न थे, कोई सीढ़ियां चढ़ा था, और ऐसे
पद—चिह्न थे जो बिलकुल अशात थे! और किसी ने
द्वार जरूर खटखटाया था! और राह तक कोई रथ
भी आया था! रथ के चाको के चिह्न थे। वे छाती
पीटकर रोने लगे! वे द्वार पर गिरने लगे! गांव की
भीड़ इकट्ठी हो गई! वह उनसे पूछने लगी, क्या हो
गया है तुम्हें?
वे पुजारी कहने लगे, मत पूछो! हमने व्याख्या कर ली और हम मर गए! उसने द्वार खटखटाया, हमने समझा
हवा के थपेडे हैं! उसका रथ आया, हमने समझी बादलों
की गड़गड़ाहट है! और सच यह है कि हम कुछ भी न
समझे थे, हम केवल सोना चाहते थे, और इसलिए हम
व्याख्या कर लेते थे!
तो वह तो सभी के द्वार खटखटाता है!
उसकी कृपा तो सब द्वारों पर आती है!
लेकिन हमारे द्वार हैं बंद!
और कभी हमारे द्वार पर दस्तक भी दे तो हम कोई व्याख्या कर लेते हैं!
पुराने दिनों के लोग कहते थे, अतिथि देवता है!
थोड़ा गलत कहते थे!
देवता अतिथि है!
देवता रोज ही अतिथि की तरह खड़ा है!
लेकिन द्वार तो खुला हो!
उसकी कृपा सब पर है!
इसलिए ऐसा मत पूछें कि उसकी कृपा से मिलता है!
लेकिन उसकी कृपा से ही मिलता है, हमारे प्रयास
सिर्फ द्वार खोल पाते हैं, सिर्फ मार्ग की बाधाएं
अलग कर पाते हैं, जब वह आता है, अपने से आता
है!
-ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजू तिवारी

जापान में एक बहुत बड़ा राजा हुआ। उसने सुनी खबर कि पास के पहाड़ पर एक फकीर लोगों को ध्यान सिखाता है। बहुत लोगों ने खबर दी कि बहुत शांति मिली है, बहुत आनंद मिला है और प्रभु की झलक दिखाई पड़ी है। तो वह राजा भी गया। दूर-दूर तक पहाड़ में फैला हुआ आश्रम था, बीच में बड़ा भवन था, जो उस पूरे आश्रम में सबसे ऊपर और अलग दिखाई पड़ता था, बाकी तो झोपड़े थे। तो वह फकीर झोपड़ों का तो बताने लगा कि वे यहां स्नान करते हैं, यहां भोजन करते हैं, यहां पढ़ते हैं, यहां वह करते हैं। वह राजा बोला कि मैं समझ गया झोपड़ों की बात, लेकिन इस बीच के बड़े भवन में क्या करते हैं? लेकिन फकीर इस बात को पूछते ही चुप हो जाता था। राजा बहुत परेशान हुआ। वह दूसरे झोपड़ों के बाबत फिर बताने लगा। आखिर विदा होने का वक्त आ गया, न तो वह उस बड़े भवन में ले गया और न उसके संबंध में कुछ कहा।

राजा ने चलते हुए कहा कि या तो तुम पागल हो या मैं पागल हूं। जिस चीज को देखने आया था उसको तो तुमने दिखाया भी नहीं, उस बड़े भवन में मुझे ले भी नहीं गए, उसके संबंध में कुछ कहते भी नहीं। मैं दो-चार बार पूछ भी चुका। और तुम यह सब फिजूल–कि भिक्षु यहां स्नान करते हैं, यहां पानी है, यहां यह है–यह सब तुमने मुझे बताया, इससे क्या प्रयोजन है?

वह फकीर बोला, मैं जरा मुश्किल में पड़ गया जब आप पूछते थे कि भिक्षु यहां क्या करते हैं? तो कठिनाई हो गई कि बात गड़बड़ हो जाएगी। भिक्षु वहां कुछ करते नहीं, वहां ध्यान में जाते हैं। और ध्यान कोई करना नहीं है। इसलिए मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। अगर मैं कहूं कि ध्यान करते हैं, तो गलती हो जाएगी, क्योंकि ध्यान किया नहीं जाता।

वह कोई एक्ट नहीं है आपका, आपकी कोई क्रिया नहीं है। बल्कि जब आप सारी क्रियाएं छोड़ कर मौन हो जाते हैं, वहां कोई क्रिया नहीं रह जाती; शरीर कुछ नहीं कर रहा है, मन भी कुछ नहीं कर रहा है; शरीर भी शांत हो गया, मन भी शांत हो गया। दो ही तो क्रियाएं होती हैं–शरीर की या मन की। आत्मा की कोई क्रिया नहीं होती। आत्मा की कोई भी क्रिया नहीं होती। शरीर की क्रिया होती है या मन की क्रिया होती है। ध्यान वह स्थिति है जब शरीर की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं, मन की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं। फिर क्या है? वहां कोई एक्शन नहीं है, वहां सिर्फ बीइंग है। वहां कोई कर्म नहीं है, मात्र आत्मा है। वहां मात्र होना मात्र है। वहां कुछ किया नहीं जा रहा है, हम सिर्फ हैं।

इस फर्क को समझ लेंगे तो आपको खयाल में आ जाएगा कि अकेला ध्यान ऐसी स्थिति और अवस्था है जिसको अज्ञानी भी कर सकता है। भाषा की भूल है। अज्ञानी भी कर सकता है और कुछ बुरा नहीं होगा। बल्कि इसके ही द्वारा उसका अज्ञान टूटेगा और नष्ट होगा।

मैं एक शिविर में था। वहां एक अत्यंत वृद्ध महिला, कोई अस्सी वर्ष की बूढ़ी महिला भी उस शिविर में आईं। वे बड़ी सीधी महिला हैं, अत्यंत गांव की हैं, बिलकुल बे-पढ़ी-लिखी हैं। बहुत लोग उनको आदर करते हैं। कारण खोजना कठिन है आदर का। क्योंकि न वे कुछ बोलती हैं, न कोई खास बात है, गांव की बिलकुल सामान्य महिला हैं। फिर भी उनके घर को लोग तीर्थ मानते हैं और आसपास उनके घर के चक्कर लगा जाते हैं।

वे भी आ गईं। किसी उनके भक्त ने कहा कि वहां चलिए, तो उन्होंने कहा, ठीक है, तो वे भी आ गईं। उनके पास गुजरात के एक बहुत प्रतिष्ठित वकील कोई बीसत्तीस वर्षों से सब कुछ छोड़ कर उनके पास ही रहते हैं, उनके पैर दाबते रहते हैं, उनके कपड़े धोते रहते हैं। वे उनके साथ आए हुए थे।

सुबह की चर्चा में मैंने ध्यान के लिए समझाया। रात को हम ध्यान के लिए बैठे तो वे वकील मेरे पास आए और उन्होंने कहा उन महिला के बाबत कि वे तो नहीं आती हैं। मैंने बहुत कहा कि ध्यान करने चलो, तो वे हंसती हैं और कहती हैं, तुम जाओ। मैं नहीं समझा, उन्होंने कहा। वकील ने मुझसे कहा कि मैं नहीं समझ पाया वे क्यों नहीं आती हैं?

मैंने कहा, कल सुबह मेरे सामने ही उनसे पूछना।

कल सुबह उन वकील ने खड़े होकर उनसे पूछा कि मैं यह निवेदन करता हूं कि यह बताइए आप कल आईं क्यों नहीं? जब मैंने आपसे बार-बार कहा कि ध्यान करने चलिए तो आप नहीं आईं।

तो वे हंसने लगीं और मुझसे बोलीं, आपने इतना समझाया सुबह कि ध्यान किया नहीं जाता। मगर ये फिर भी मुझसे कहने लगे कि ध्यान करनेचलिए, ध्यान करने चलिए। तो मुझे हंसी आने लगी कि ये कुछ समझे नहीं तो ध्यान क्या करेंगे? तो मैंने इनसे कहा, तुम जाओ। और जब ये चले आए तो मैं ध्यान में चली गई। उन्होंने मुझसे कहा, जब ये चले आए और कमरा सन्नाटा हो गया, तो मैं ध्यान में चली गई। ये यहां ध्यान करते रहे और वहां मैं ध्यान में चली गई।

ध्यान करना नहीं है, क्योंकि करने में एक एफर्ट है, कोशिश है, काम है। ध्यान कोई काम नहीं है, ध्यान एक अवस्था है। ध्यान ऐसी अवस्था है जहां कोई क्रिया नहीं हो रही है।
~ ओशो

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, मातृदेवो भव:

संजू तिवारी

टॉल्सटॉय की प्रसिद्ध कहानी है कि एक आदमी के घर एक संन्यासी मेहमान हुआ – एक परिव्राजक। रात गपशप होने लगी; उस परिव्राजक ने कहा कि तुम यहाँ क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में मैं यात्रा पर था तो वहाँ जमीन इतनी सस्ती है मुफ्त ही मिलती है। तुम यह जमीन छोड़-छाड़कर, बेच-बाचकर साइबेरिया चले जाओ। वहाँ हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी इतनी जमीन में। वहाँ करो फसलें और बड़ी उपयोगी जमीन है और लोग वहाँ के इतने सीधे-सादे हैं कि करीब-करीब मुफ्त ही जमीन दे देते हैं।
उस आदमी को वासना जगी। उसने दूसरे दिन ही सब बेच-बाचकर साइबेरिया की राह पकड़ी। जब पहुँचा तो उसे बात सच्ची मालूम पड़ी। उसने पूछा कि मैं जमीन खरीदना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा, जमीन खरीदने का तुम जितना पैसा लाए हो, रख दो; और जीवन का हमारे पास यही उपाय है बेचने का कि कल सुबह सूरज के ऊगते तुम निकल पड़ना और साँझ सूरज के डूबते तक जितनी जमीन तुम घेर सको घेर लेना।
बस चलते जाना… जितनी जमीन तुम घेर लो। साँझ सूरज के डूबते-डूबते उसी जगह पर लौट आना जहाँ से चले थे- बस यही शर्त है। जितनी जमीन तुम चल लोगे, उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी।
रात-भर तो सो न सका वह आदमी। तुम भी होते तो न सो सकते; ऐसे क्षणों में कोई सोता है ? रातभर योजनाएँ बनाता रहा कि कितनी जमीन घेर लूँ। सुबह ही भागा। गाँव इकट्ठा हो गया था। सुबह का सूरज ऊगा, वह भागा। उसने साथ अपनी रोटी भी ले ली थी, पानी का भी इंतजाम कर लिया था। रास्ते में भूख लगे, प्यास लगे तो सोचा था चलते ही चलते खाना भी खा लूँगा, पानी भी पी लूँगा। रुकना नहीं है; चलना क्या है; दौड़ना है। दौड़ना शुरू किया, क्योंकि चलने से तो आधी ही जमीन कर पाऊँगा, दौड़ने से दुगनी हो सकेगी – भागा …भागा।
सोचा था कि ठीक बारह बजे लौट पड़ूँगा; ताकि सूरज डूबते – डूबते पहुँच जाऊँ। बारह बज गए, मीलों चल चुका है, मगर वासना का कोई अंत है? उसने सोचा कि बारह तो बज गए, लौटना चाहिए; लेकिन सामने और उपजाऊ जमीन, और उपजाऊ जमीन…थोड़ी सी और घेर लूँ। जरा तेजी से दौड़ना पड़ेगा लौटते समय – इतनी ही बात है, एक ही दिन की तो बात है, और जरा तेजी से दौड़ लूँगा।
उसने पानी भी न पीया; क्योंकि रुकना पड़ेगा उतनी देर – एक दिन की ही तो बात है, फिर कल पी लेंगे पानी, फिर जीवन भर पीते रहेंगे। उस दिन उसने खाना भी न खाया। रास्ते में उसने खाना भी फेंक दिया, पानी भी फेंक दिया, क्योंकि उनका वजन भी ढोना पड़ा रहा है, इसलिए दौड़ ठीक से नहीं पा रहा है। उसने अपना कोट भी उतार दिया, अपनी टोपी भी उतार दी, जितना निर्भार हो सकता था हो गया।
एक बज गया, लेकिन लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे और-और सुंदर भूमि आती चली जाती है। मगर फिर लौटना ही पड़ा; दो बजे तक वो लौटा। अब घबड़ाया। सारी ताकत लगाई; लेकिन ताकत तो चुकने के करीब आ गई थी। सुबह से दौड़ रहा था, हाँफ रहा था, घबरा रहा था कि पहुँच पाऊँगा सूरज डूबते तक कि नहीं। सारी ताकत लगा दी। पागल होकर दौड़ा। सब दाँव पर लगा दिया। और सूरज डूबने लगा…। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई है; लोग दिखाई पड़ने लगे। गाँव के लोग खड़े हैं और आवाज दे रहे हैं कि आ जाओ, आ जाओ! उत्साह दे रहे हैं, भागे आओ! अजीब सीधे-सादे लोग हैं – सोचने लगा मन में; इनको तो सोचना चाहिए कि मैं मर ही जाऊँ, तो इनको धन भी मिल जाए और जमीन भी न जाए। मगर वे बड़ा उत्साह दे रहे हैं कि भागे आओ!
उसने आखिरी दम लगा दी – भागा – भागा…। सूरज डूबने लगा; इधर सूरज डूब रहा है, उधर वो भाग रहा है…। सूरज डूबते – डूबते बस जाकर गिर पड़ा। कुछ पाँच – सात गज की दूरी रह गई है, घिसटने लगा।
अभी सूरज की आखिरी कोर क्षितिज पर रह गई. घिसटने लगा। और जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुँचा, जहाँ से भागा था, उस खूँटी पर, सूरज डूब गया। वहाँ सूरज डूबा, यहाँ यह आदमी भी मर गया। इतनी मेहनत कर ली! शायद हृदय कर दौरा पड़ गया। और सारे गाँव के सीधे – सादे लोग जिनको वह समझाता था, हँसने लगे और एक – दूसरे से बात करने लगे!
ये पागल आदमी आते ही जाते हैं! इस तरह के पागल लोग आते ही रहते हैं! यह कोई नई घटना न थी; अक्सर लोग आ जाते थे खबरें सुनकर, और इसी तरह मरते थे। यह कोई अपवाद नहीं था; यही नियम था। अब तक ऐसा एक भी आदमी नहीं आया था, जो घेरकर जमीन का मालिक बन पाया हो।
यह कहानी तुम्हारी कहानी है, तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, सबकी जिंदगी की कहानी है। यही तो तुम कर रहे हो – दौड़ रहे हो कि कितनी जमीन घेर लें! बारह भी बज जाते हैं, दोपहर भी आ जाती है, लौटने का भी समय होने लगता है – मगर थोड़ा और दौड़ लें! न भूख की फिक्र है, न प्यास की फिक्र है।
जीने का समय कहाँ है; पहले जमीन घेर लें, पहले जितोड़ी भर लें, पहले बैंक में रुपया इकट्ठा हो जाए, फिर जी लेंगे, फिर बाद में जी लेंगे, एक ही दिन का तो मामला है। और कभी कोई नहीं जी पाता। गरीब मर जाते हैं भूखे; अमीर मर जाते हैं भूखे, कभी कोई नहीं जी पाता। जीने के लिए थोड़ी विश्रांति चाहिए। जीने के लिए थोड़ी समझ चाहिए। जीवन मुफ्त नहीं मिलता – बोध चाहिए।
– ओशो
[ मृत्योर्मा अमृतं गमय ]