Posted in सुभाषित - Subhasit

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :

#अरण्यानी_सूक्त

अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि
कथाग्रामं न पृछसि न त्वा भीरिव विन्दतीऽऽऽन्
हे अरण्य देवते! वन में जो तू देखते-देखते ही अन्तर्धान हो जाती है, वह तू नगर-ग्राम की कुछ विचारणा कैसे नहीं करती? निर्जन अरण्य में ही क्यों जाती हो? तुझे डर भी नहीं लगता?

वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः
आघाटिभिरिवधावयन्नरण्यानिर्महीयते
ओर से बड़ी आवाज़ से शब्द करनेवाले प्राणी के समीप जब ची-ची शब्द करनेवाले प्राणी प्राप्त होता है, उस समय मानो वीणा के स्वरों के समान स्वरोच्चारण करके अरण्य देवता का यशोगान करता है।

उत गाव इवादन्त्युत वेश्मेव दृश्यते
उतो अरण्यानिःसायं शकटीरिव सर्जति
और गौवों के समान अन्य प्राणि भी इस अरण्य में रहते हैं और लता-गुल्म आदि गृह के समान दिखाई देते हैं। और सायंकाल के समय वन से विपुल गाड़ियाँ चारा, लकड़ी आदि लेकर निकलती हैं- मानो अरण्यदेवता उन्हें अपने घर भेज रहे हैं।

गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत्
वसन्नरण्यान्यां सायमक्रुक्षदिति मन्यते
हे अरण्य देवता! यह एक पुरुष गाय को बुला रहा है और दूसरा काष्ठ काट रहा है। रात्रि में अरण्य में रहनेवाला मनुष्य नानाविध शब्द सुनकर कोई भयभीत होकर पुकारता है, ऐसे मानता है।

न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगछति
स्वादोःफलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते
अरण्यानि किसी की हिंसा नहीं करती। और दूसरा भी कोई उस पर आक्रमण नहीं करता। वह मधुर फलों का आहार करके अपनी इच्छा के अनुसार सुख से रहता है।

आञ्जनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम्
प्राहम्मृगाणां मातरमरण्यानिमशंसिषम्
कस्तूरी आदि उत्तम सुवास से युक्त, सुगंधी, विपुल फल-मूलादि भक्ष्य अन्न से पूर्ण, कृषिवलों से रहित और मृगों की माता- ऐसी अरण्यानि की मैं स्तुति करता हूँ।
—#ऋग्वेद, 10.146.1-6

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