Posted in मूर्ति पूजा - Idolatry

हिन्दू धर्म एक

मुर्तिपूजा आखिर क्यो करते हैं?
Jai ho…..
Jai Siya Ram……
वैसे सनातन धर्म के 4 वेद है , जिनमे मूर्तिपूजा वर्णित नही है , यह बात सब जानते है के वेद एक दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ है और सनातन धर्म का मूल है , वेदो मे केवल एक ईश्वर बताया गया है जो निराकार है , जिसकी उपासना करने के कई तरीके है हवन यज्ञ होम उन मे से एक है ।

अब आते है मूल बात पर के सनातन धर्म मे मूर्तिपूजा कब और क्यो आई ? तो जब ईश्वर ने वेदो का ज्ञान मनुष्य को दिया तब सतयुग था , मनुष्य की बुद्दि , स्मरण शक्ति , आयु , तपस्या बहुत तेज थे , पाप कम और भक्ति बहुत ज्यादा थी ,

फिर आया त्रेता युग मनुष्य की आयु ,बुद्दि , शक्ति थोडे कम हो गए पाप थोडा बढ गया मनुष्य मे लालच क्रोध बदले की भावना आदि आ गई तभी सीता हरण भी हुआ , इस युग मे लोग वेदो को पढते थे परन्तु सभी मनुष्य इन्हे समझ नही पाते थे हम देखते है के इस युग मे भगवान राम ने समुन्दर किनारे रेत का शिवलिंग बनाया उसकी पूजा आर्चना की फिर भगवान राम ने जीत के उद्शेय से माँ भावनी की मूर्ति बनाई और जीत का वरदान प्राप्त किया

अब आ गया दवापर यानि कृष्ण युग , मनुष्य की बुद्दि बहुत ही कम हो गई ,भक्ति कम हो गई , पाप बढ गया , अग्नि पुत्री द्रोपदी का बरी सभा मे चीर हरण की कोशिश हुई , अब इस युग मे मनुष्य वेद पढेंगे तो सकते थे किन्तु धर्म को समरण रखने योग्य नही थे ,

तभी कृष्ण भगवान ने भगवद् गीता मे कहा जो मुझे साकार (मूर्तिपूजा) या निराकार रूप मे भजता है मै दोनो को ही प्राप्त हो जाता हूँ , भगवद्गीता मे कृष्ण जी ने भक्ति के कई मार्ग बताए है जैसे के

  1. ध्यान (meditation)
  2. साकार (मूर्तिपूजा)
  3. होम ( हवन यज्ञ)
  4. उपवास
  5. नृत्य
  6. सत्संग कीर्तन
  7. नाम जपना
  8. निष्काम भाव की सेवा (बिना किसी स्वारथ के)
    9.कर्म योग ( जो केवल अपना कर्म निष्काम भाव से करता है )
  9. योग आदि

भगवान कृष्ण कहते है जो इन मार्गो मे किसी एक मे अच्छी तरह स्थित हो जाता है वह मुझे प्राप्त कर लेता है ।
मूर्तिपूजा के उद्देशय केवल उस मूर्ति को देख कर उस निराकार प्रमात्मा का ध्यान करना है , मूर्ति स्वय भगवान नही है और जिसको ध्यान करना आ जाता है जो समाधी प्राप्त कर लेता है उसे कोई मूर्ति की आवश्यकता नही होती , किन्तु हर मनुष्य की बुद्दि ऐसी नही है के वह समाधी लगा सके ध्यान कर सके , उनके उदार का एक सरल तरीका है मूर्तिपूजा क्योकि वह एक निराकार ही है जो अपने आप को तीन शक्तियो मे बाँटता है ब्ह्मा , विषणु और महेश और संसार को चलाती है ।

यदि आप निराकार का ध्यान कर सकते हो तो सबसे उत्म है नही तो मूर्तिपूजा , यज्ञ, उपवास जिसमे मन लगे वह किजीए किन्तु सच्ची भावना से , बिना भावना का ध्यान मूर्तिपूजा , यज्ञ सब पाखंड है अपने आप से ईमानदार रहीऐ , याद रहे धन्ने जट्ट और मीरा बाई ने प्रत्थर से ही कृष्ण पाया था

अंत अगर कोई मूर्ति पूजा का विरोध है तो वह न तो मूर्तिपूजा के विष्य मे कुछ जानता है न हो निराकार को जान पाया है वह केवल एक अंहकारी भेड ह….radhe radhe……

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