Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजू आनंद

यह भी नहीं रहने वाला 🙏🏻🌹🙏🏻

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका।
आनंद ने साधू की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।”

साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।” साधू आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया ।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है । पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया । झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया । खाने के लिए सूखी रोटी दी । दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे । साधू कहने लगा – “हे भगवान् ! ये तूने क्या किया ?”

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “महाराज आप क्यों दु:खी हो रहे है ? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान् इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो ! यह भी नहीं रहने वाला।”

साधू मन ही मन सोचने लगा – “मैं तो केवल भेष से साधू हूँ । सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।”

कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है । मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया।

साधू ने आनंद से कहा – “अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया । भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।”

यह सुनकर आनंद फिर हँस पड़ा और कहने लगा – “महाराज ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।”

साधू ने पूछा – “क्या यह भी नहीं रहने वाला ?”

आनंद उत्तर दिया – “हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा । कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।”

आनंद की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है ।

साधू कहता है – “अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है ? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ । लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।”

साधू कहने लगा – “धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।”

साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद ने अपनी तस्वीर पर लिखवा रखा है – “आखिर में यह भी नहीं रहेगा ।”

विचार करे👆🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

♨♨♨हरि🕉तत्सत♨♨♨

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संजू तिवारी

जापान में एक बहुत बड़ा राजा हुआ। उसने सुनी खबर कि पास के पहाड़ पर एक फकीर लोगों को ध्यान सिखाता है। बहुत लोगों ने खबर दी कि बहुत शांति मिली है, बहुत आनंद मिला है और प्रभु की झलक दिखाई पड़ी है। तो वह राजा भी गया। दूर-दूर तक पहाड़ में फैला हुआ आश्रम था, बीच में बड़ा भवन था, जो उस पूरे आश्रम में सबसे ऊपर और अलग दिखाई पड़ता था, बाकी तो झोपड़े थे। तो वह फकीर झोपड़ों का तो बताने लगा कि वे यहां स्नान करते हैं, यहां भोजन करते हैं, यहां पढ़ते हैं, यहां वह करते हैं। वह राजा बोला कि मैं समझ गया झोपड़ों की बात, लेकिन इस बीच के बड़े भवन में क्या करते हैं? लेकिन फकीर इस बात को पूछते ही चुप हो जाता था। राजा बहुत परेशान हुआ। वह दूसरे झोपड़ों के बाबत फिर बताने लगा। आखिर विदा होने का वक्त आ गया, न तो वह उस बड़े भवन में ले गया और न उसके संबंध में कुछ कहा।

राजा ने चलते हुए कहा कि या तो तुम पागल हो या मैं पागल हूं। जिस चीज को देखने आया था उसको तो तुमने दिखाया भी नहीं, उस बड़े भवन में मुझे ले भी नहीं गए, उसके संबंध में कुछ कहते भी नहीं। मैं दो-चार बार पूछ भी चुका। और तुम यह सब फिजूल–कि भिक्षु यहां स्नान करते हैं, यहां पानी है, यहां यह है–यह सब तुमने मुझे बताया, इससे क्या प्रयोजन है?

वह फकीर बोला, मैं जरा मुश्किल में पड़ गया जब आप पूछते थे कि भिक्षु यहां क्या करते हैं? तो कठिनाई हो गई कि बात गड़बड़ हो जाएगी। भिक्षु वहां कुछ करते नहीं, वहां ध्यान में जाते हैं। और ध्यान कोई करना नहीं है। इसलिए मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। अगर मैं कहूं कि ध्यान करते हैं, तो गलती हो जाएगी, क्योंकि ध्यान किया नहीं जाता।

वह कोई एक्ट नहीं है आपका, आपकी कोई क्रिया नहीं है। बल्कि जब आप सारी क्रियाएं छोड़ कर मौन हो जाते हैं, वहां कोई क्रिया नहीं रह जाती; शरीर कुछ नहीं कर रहा है, मन भी कुछ नहीं कर रहा है; शरीर भी शांत हो गया, मन भी शांत हो गया। दो ही तो क्रियाएं होती हैं–शरीर की या मन की। आत्मा की कोई क्रिया नहीं होती। आत्मा की कोई भी क्रिया नहीं होती। शरीर की क्रिया होती है या मन की क्रिया होती है। ध्यान वह स्थिति है जब शरीर की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं, मन की भी सारी क्रियाएं शांत हो गई हैं। फिर क्या है? वहां कोई एक्शन नहीं है, वहां सिर्फ बीइंग है। वहां कोई कर्म नहीं है, मात्र आत्मा है। वहां मात्र होना मात्र है। वहां कुछ किया नहीं जा रहा है, हम सिर्फ हैं।

इस फर्क को समझ लेंगे तो आपको खयाल में आ जाएगा कि अकेला ध्यान ऐसी स्थिति और अवस्था है जिसको अज्ञानी भी कर सकता है। भाषा की भूल है। अज्ञानी भी कर सकता है और कुछ बुरा नहीं होगा। बल्कि इसके ही द्वारा उसका अज्ञान टूटेगा और नष्ट होगा।

मैं एक शिविर में था। वहां एक अत्यंत वृद्ध महिला, कोई अस्सी वर्ष की बूढ़ी महिला भी उस शिविर में आईं। वे बड़ी सीधी महिला हैं, अत्यंत गांव की हैं, बिलकुल बे-पढ़ी-लिखी हैं। बहुत लोग उनको आदर करते हैं। कारण खोजना कठिन है आदर का। क्योंकि न वे कुछ बोलती हैं, न कोई खास बात है, गांव की बिलकुल सामान्य महिला हैं। फिर भी उनके घर को लोग तीर्थ मानते हैं और आसपास उनके घर के चक्कर लगा जाते हैं।

वे भी आ गईं। किसी उनके भक्त ने कहा कि वहां चलिए, तो उन्होंने कहा, ठीक है, तो वे भी आ गईं। उनके पास गुजरात के एक बहुत प्रतिष्ठित वकील कोई बीसत्तीस वर्षों से सब कुछ छोड़ कर उनके पास ही रहते हैं, उनके पैर दाबते रहते हैं, उनके कपड़े धोते रहते हैं। वे उनके साथ आए हुए थे।

सुबह की चर्चा में मैंने ध्यान के लिए समझाया। रात को हम ध्यान के लिए बैठे तो वे वकील मेरे पास आए और उन्होंने कहा उन महिला के बाबत कि वे तो नहीं आती हैं। मैंने बहुत कहा कि ध्यान करने चलो, तो वे हंसती हैं और कहती हैं, तुम जाओ। मैं नहीं समझा, उन्होंने कहा। वकील ने मुझसे कहा कि मैं नहीं समझ पाया वे क्यों नहीं आती हैं?

मैंने कहा, कल सुबह मेरे सामने ही उनसे पूछना।

कल सुबह उन वकील ने खड़े होकर उनसे पूछा कि मैं यह निवेदन करता हूं कि यह बताइए आप कल आईं क्यों नहीं? जब मैंने आपसे बार-बार कहा कि ध्यान करने चलिए तो आप नहीं आईं।

तो वे हंसने लगीं और मुझसे बोलीं, आपने इतना समझाया सुबह कि ध्यान किया नहीं जाता। मगर ये फिर भी मुझसे कहने लगे कि ध्यान करनेचलिए, ध्यान करने चलिए। तो मुझे हंसी आने लगी कि ये कुछ समझे नहीं तो ध्यान क्या करेंगे? तो मैंने इनसे कहा, तुम जाओ। और जब ये चले आए तो मैं ध्यान में चली गई। उन्होंने मुझसे कहा, जब ये चले आए और कमरा सन्नाटा हो गया, तो मैं ध्यान में चली गई। ये यहां ध्यान करते रहे और वहां मैं ध्यान में चली गई।

ध्यान करना नहीं है, क्योंकि करने में एक एफर्ट है, कोशिश है, काम है। ध्यान कोई काम नहीं है, ध्यान एक अवस्था है। ध्यान ऐसी अवस्था है जहां कोई क्रिया नहीं हो रही है।
~ ओशो

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मैंने सुना है, एक ऋषि किसी पर नाराज हो गया, तो उसने अभिशाप दे दिया कि तुझे तीन जन्मों तक संसार में भटकना पड़ेगा। जिस पर नाराज हो गया था, उसने बड़ी ऋषि की सेवा की, तो वह प्रसन्न हो गया; लेकिन अभिशाप को काटा नहीं जा सकता, दे दिया, दे दिया। छूट गए तीर शब्द के, उन्हें वापस कैसे लौटाओगे? जो शब्द छूट गया छूट गया, अब उसे लौटाया नहीं जा सकता। जो हो चुका, हो चुका।
तो ऋषि बहुत प्रसन्न हो गया। उसने कहाः मजबूरी है। अब मैं वापस नहीं लौटा सकता, जो हो गया। शाप तो दे दिया। तीन जन्म तू भटकेगा। अब तू कोई वरदान चाहता हो तो वह मैं दे सकता हूं। तू वरदान मांग ले।
तो उसने कहा कि तीन जन्म भटकूंगा, आप मुझे एक ही वरदान दे दें कि मैं परमात्मा को कभी भूलूं न। उस ऋषि ने बहुत सोचा। उसने कहाः अच्छा जा, तू नास्तिक हो जा।
वह आदमी बहुत घबड़ाया। उसने कहाः यह कैसा वरदान? यह तो अभिशाप हो गया। पहले से भी बुरा हो गया। तीन जन्म के बाद तो वापस लौटना हो जाता; अब ये तीन जन्म अगर नास्तिक रहे, तो फिर लौटना कैसे होगा? यह तो हद हो गई। अब आप कहोगे, ये शब्द भी निकल गए, वापस नहीं लौट सकते।
ऋषि ने कहाः मैं तुझे सोच कर अनुभव से कहता हूं। आस्तिक तो कभी-कभी भूल जाता है, नास्तिक कभी नहीं भूलता। वह कहता ही रहता है, ईश्वर नहीं है। चैबीस घंटे लड़ने को तत्पर है कि ईश्वर नहीं है। विवाद करने को हजार काम छोड़ कर तैयार है। आस्तिक भी कहता है भई, अभी तो फुरसत नहीं है, दुकान में लगे हैं। नास्तिक लड़ने को तैयार है। उसकी भी चेष्टा ईश्वर की याददाश्त की है; वह भुलाने की कोशिश कर रहा है, भुला नहीं पाता। वह चाहता है, ईश्वर न हो; लेकिन चाहने से क्या होता है? वह सिद्ध करता है कि नहीं है, लेकिन उसी को सिद्ध करने में लग जाता है।
नहीं, कोई उपाय नहीं है। न आस्तिक भूल सकता है, न नास्तिक। भूल तो तुम नहीं सकते हो, लेकिन तुम दूसरी चीजों की याददाश्त से भर सकते हो।
ध्यान का कुल इतना अर्थ है कि तुम बाकी याददाश्त को हटा दो, उसकी याददाश्त आर्विभूत हो जाएगी..जैसे ज्वालामुखी फूट पड़े! वह तुम्हारे भीतर दबी है।
प्रेम का इतना ही अर्थ है कि तुम दूसरी याददाश्तों को हटा दोः अचानक तुम पाओगे कि उसके विरह का गीत उठने लगा। अचानक तुम पाओगे, तुमने उसे टटोलना शुरू कर दिया, खोजना शुरू कर दिया। और जब भी किसी ने पाया है..चाहे ध्यानी ने चाहे प्रेमी ने..सभी ने अपने को भीतर पाया है।
इसलिए तुम अलग नहीं हो जो उसे भूल जाओ। तुम वही हो। स्वयं को कोई कैसे भूल सकेगा? हां, भूलने का खेल चाहे जितनी देर खेलना हो खेल लो। इसलिए संसार को हम लीला कहते हैं; वह परमात्मा की लुका-छिपी है। उसको जितनी देर खेलना है वह खेल ले सकता है। जिस दिन भी तुम्हारी अभीप्सा प्रगाढ़ होगी कि अब घर लौटना है, तुम लौट जाओगे।
अंत करना चाहूंगा बुद्ध की एक घटना से।
बुद्ध गुजर रहे हैं एक गांव से। नदी के तट पर उन्होंने कुछ बच्चों को रेत के घर बनाते देखा। वे खड़े हो गए। ऐसी उनकी आदत थी। भिक्षु भी चुपचाप, उनके साथ थे, वे खड़े हो गए। बच्चे खेल रहे हैं, रेत के घर बना रहे हैं नदी के तट पर। किसी का पैर किसी के घर में लग जाता है। रेत का घर बिखर जाता है। झगड़ा हो जाता है। मार-पीट भी होती है, गाली-गलौज भी होती है कि तूने मेरा घर मिटा दिया। वह उसके घर पर कूद पड़ता है। वह उसका घर मिटा-मिटा देता है। फिर अपना घर बनाने में लग जाते हैं। बड़े तल्लीन हैं! उनको पता भी नहीं है कि बुद्ध आकर चुपचाप खड़े हो गए हैं। वे घाट पर चुपचाप खड़े देख रहे हैं। वे बच्चे इतने व्यस्त हैं कि उन्हें कुछ पता भी नहीं है। घर बनाना ऐसी व्यस्तता की बात भी है। और फिर दूसरे दुश्मन हैं, उनसे ज्यादा अच्छा बनाना है, प्रतियोगिता है, जलन है, ईष्र्या है, सब अपने-अपने घर को बड़ा करने में लगे हैं। और जितना बड़ा घर होता है उतनी ही जल्दी गिर जाने का डर भी होता है। उसकी रक्षा भी करनी है, यह सब हो रहा है। और तभी अचानक एक स्त्री ने आकर घाट पर आवाज दी कि सांझ हो गई, मां घरों में याद करती हैं, घर चलो। बच्चों ने चैंक कर देखा, दिन बीत गया, सूरज डूब गया, अंधेरा उतर रहा है। वे उछले-कूदे अपने ही घरों पर, सब मटियामेट कर डाला। अब कोई झगड़ा भी नहीं किसी दूसरे से कि तू मेरे घर पर कूद रहा है कि मैं तेरे घर पर। अपने ही घर पर कूदे। अब कोई लड़ा भी नहीं। कोई ईष्र्या भी न उठी, कोई जलन भी न उठी। खेल ही खत्म हो गया! मां की घर से आवाज आ गईः वे सब भागते-दौड़ते अपने घर की तरफ चले गए। दिन भर का सारा झगड़ा व्यवसाय, मकान, अपना-पराया सब भूल गया। घर से आवाज आ गई!
बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा। ऐसे ही एक दिन जब घर से आवाज आ जाती है तब तुम्हारे बाजार, तुम्हारी राजधानियां ऐसी ही पड़ी रह जाती हैं। रेत के घर! जब तक खेलना हो खेलो, खेल रहे हो तब भी घर भूल थोड़े ही गए हो। अगर भूल ही गए होते घर तो जब द्वार पर आकर कोई आवाज देता है, या घाट पर आवाज देता है कि मां घर याद करती है, चलो, तब तुम कैसे पहचानते होः कौन मां, कैसा घर?
अगर मैंने तुम्हें आवाज दी है और कहा है कि सांझ हो गई है, अब घर चलो..और अगर तुमने उस आवाज को सुना, और तुम अगर थोड़ा भी समझ पाए हो, तो उसका अर्थ यही है कि परमात्मा को भूल कर भी भूला नहीं जा सकता। भुलाने की कोशिश कर सकते हो; सफल उसमें कभी कोई भी नहीं हुआ है। परमात्मा को भुलाने की कोशिश असफल ही होती है। वह सफल हो ही नहीं सकती। सफलता संभव ही नहीं है। हां, देर हो सकती है। लेकिन एक न एक दिन सांझ होगी, सूरज डूबेगा, तुम्हें आवाज सुनाई पड़ेगी। आवाज सुनाई पड़ते ही यह सारा संसार ऐसे ही हो जाता है जैसे रेत के घर-घुले। फिर उसमें पैदा हुए वैमनस्य, ईष्र्या, संघर्ष..सब खो जाते हैं। अदालत, मुकदमे, बाजार, हिसाब-किताब सब व्यर्थ हो जाता है जब घर की याद आ जाती है! और घर को कोई कभी भूलता है? कोई कभी नहीं भूलता।
ठीक ऐसी ही घटना कबीर के जीवन में है। एक बाजार से गुजरते हैं। एक बच्चा अपनी मां के साथ बाजार आया है। मां तो शाक-सब्जी खरीदने में लग गई और बच्चा एक बिल्ली के साथ खेलने में लग गया है। वह बिल्ली के साथ खेलने में इतना तल्लीन हो गया है कि भूल ही गया कि बाजार में हैं; भूल ही गया कि मां का साथ छूट गया है; भूल ही गया कि मां कहां गई।
कबीर बैठे उसे देख रहे हैं। वे भी बाजार आए हैं, अपना जो कुछ कपड़ा वगैरह बुनते हैं, बेचने। वे देख रहे हैं। उन्होंने देख लिया है कि मां भी साथ थी इसके और वे जानते हैं कि थोड़ी देर में उपद्रव होगा, क्योंकि मां तो बाजार में कहीं चली गई है और बच्चा बिल्ली के साथ तल्लीन हो गया है। अचानक बिल्ली न छलांग लगाई। वह एक घर में भाग गई। बच्चे को होश आया। उसने चारों तरफ देखा और जोर से आवाज दी मां को। चीख निकल गई। दो घंटे तक खेलता रहा, तब मां की बिल्कुल याद न थी..क्या तुम कहोगे?
कबीर अपने भक्तों से कहतेः ऐसी ही प्रार्थना है, जब तुम्हें याद आती है और एक चीख निकल जाती है। कितने दिन खेलते रहे संसार में, इससे क्या फर्क पड़ता है? जब चीख निकल जाती है, तो प्रार्थना का जन्म हो जाता है।
तब कबीर ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा, उसकी मां को खोजने निकले। तब कोई सदगुरु मिल ही जाता है जब तुम्हारी चीख निकल जाती है। जिस दिन तुम्हारी चीख निकलेगी, तुम सदगुरु को कहीं करीब ही पाओगे..कोई फरीद, कोई कबीर, कोई नानक, तुम्हारा हाथ पकड़ लेगा और कहेगा कि हम उसे जानते हैं भलीभांति; हम उस घर तक पहुंच गए हैं, हम तुझे पहुंचा देते हैं।

~ओशो

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संजू तिवारी

यह भी नहीं रहने वाला 🙏🏻🌹🙏🏻

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका।
आनंद ने साधू की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।”

साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।” साधू आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया ।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है । पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया । झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया । खाने के लिए सूखी रोटी दी । दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे । साधू कहने लगा – “हे भगवान् ! ये तूने क्या किया ?”

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “महाराज आप क्यों दु:खी हो रहे है ? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान् इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो ! यह भी नहीं रहने वाला।”

साधू मन ही मन सोचने लगा – “मैं तो केवल भेष से साधू हूँ । सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।”

कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है । मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया।

साधू ने आनंद से कहा – “अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया । भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।”

यह सुनकर आनंद फिर हँस पड़ा और कहने लगा – “महाराज ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।”

साधू ने पूछा – “क्या यह भी नहीं रहने वाला ?”

आनंद उत्तर दिया – “हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा । कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।”

आनंद की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है ।

साधू कहता है – “अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है ? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ । लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।”

साधू कहने लगा – “धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।”

साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद ने अपनी तस्वीर पर लिखवा रखा है – “आखिर में यह भी नहीं रहेगा ।”

विचार करे👆🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

♨♨♨हरि🕉तत्सत♨♨♨

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हरीश कुमार

निर्जला एकादशी से अगले दिन एक भिखारी एक सज्जन की दुकान पर भीख मांगने पहुंचा। सज्जन व्यक्ति ने 1 रुपये का सिक्का निकाल कर उसे दे दिया।
भिखारी को प्यास भी लगी थी,वो बोला बाबूजी एक गिलास पानी भी पिलवा दो,गला सूखा जा रहा है। सज्जन व्यक्ति गुस्से में तुम्हारे बाप के नौकर बैठे हैं क्या हम यहां,पहले पैसे,अब पानी,थोड़ी देर में रोटी मांगेगा,चल भाग यहां से।

भिखारी बोला:-
बाबूजी गुस्सा मत कीजिये मैं आगे कहीं पानी पी लूंगा।पर जहां तक मुझे याद है,कल इसी दुकान के बाहर मीठे पानी की छबील लगी थी और आप स्वयं लोगों को रोक रोक कर जबरदस्ती अपने हाथों से गिलास पकड़ा रहे थे,मुझे भी कल आपके हाथों से दो गिलास शर्बत पीने को मिला था।मैंने तो यही सोचा था,आप बड़े धर्मात्मा आदमी है,पर आज मेरा भरम टूट गया।
कल की छबील तो शायद आपने लोगों को दिखाने के लिये लगाई थी।
मुझे आज आपने कड़वे वचन बोलकर अपना कल का सारा पुण्य खो दिया। मुझे माफ़ करना अगर मैं कुछ ज्यादा बोल गया हूँ तो।*l
सज्जन व्यक्ति को बात दिल पर लगी, उसकी नजरों के सामने बीते दिन का प्रत्येक दृश्य घूम गया। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वह स्वयं अपनी गद्दी से उठा और अपने हाथों से गिलास में पानी भरकर उस बाबा को देते हुए उसे क्षमा प्रार्थना करने लगा।

भिखारी:-
बाबूजी मुझे आपसे कोई शिकायत नही,परन्तु अगर मानवता को अपने मन की गहराइयों में नही बसा सकते तो एक दो दिन किये हुए पुण्य व्यर्थ है।
मानवता का मतलब तो हमेशा शालीनता से मानव व जीव की सेवा करना है।
आपको अपनी गलती का अहसास हुआ,ये आपके व आपकी सन्तानों के लिये अच्छी बात है।
आप व आपका परिवार हमेशा स्वस्थ व दीर्घायु बना रहे ऐसी मैं कामना करता हूँ,यह कहते हुए भिखारी आगे बढ़ गया।

सेठ ने तुरंत अपने बेटे को आदेश देते हुए कहा:-
कल से दो घड़े पानी दुकान के आगे आने जाने वालों के लिये जरूर रखे हो।उसे अपनी गलती सुधारने पर बड़ी खुशी हो रही थी।

सिर्फ दिखावे के लिए किये गए पुण्यकर्म निष्फल हैं, सदा हर प्राणी के लिए आपके मन में शुभकामना शुभ भावना हो यही सच्चा पुण्य है

Posted in Kashmir

कल हमारे गृहमंत्री अमित शाह ने अपने मंत्रालय में ताबड़तोड़ मीटिंग्स किये और जम्मू कश्मीर में परिसीमन करने एवं परिसीमन आयोग बनाने की बात कही.

परिसीमन का मतलब होता है कि…. आबादी के और क्षेत्रफल के हिसाब से किसी भी लोकसभा अथवा विधानसभा क्षेत्र का पुनर्गठन करना.

अभी जम्मू कश्मीर के विधानसभा का परिसीमन किया जा रहा है.

असल में…. कश्मीर विधानसभा में कुल 111 सीटें हैं… लेकिन, इनमें से 24 सीटों को जम्मू-कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ गया है… और, बाकी बची 87 सीटों पर ही चुनाव होता है.

राज्य में आखिरी परिसीमन 1995 में किया गया था… और , गवर्नर जगमोहन के आदेश पर जम्मू-कश्मीर में 87 सीटों का गठन किया गया था.

अब चूंकि…. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल सीटों की संख्या 87 है, सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 44 सीटों का बहुमत चाहिए.

झमेला यहीं पर है…..

हालांकि…. क्षेत्रफल की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल राज्य के क्षेत्रफल का मात्र 15.73% है… लेकिन, यहां से कुल 46 विधायक चुने जाते हैं.

जबकि, राज्य का 25.93 फीसदी क्षेत्रफल जम्मू संभाग के अंतर्गत आता है… लेकिन, विधानसभा की मात्र 37 सीटें ही यहां से चुनी जाती है.

इसके अलावा राज्य के 58.33% क्षेत्रफल वाले लद्दाख संभाग में 4 विधानसभा सीटें हैं.

इसी गिनती में बहुत बड़ा झोल है क्योंकि….

इसमें …. कश्मीर घाटी जो कि मुस्लिम बहुत क्षेत्र है में मात्र 25,000 लोगों पर ही एक विधानसभा क्षेत्र है….

जबकि, जम्मू क्षेत्र जो कि हिन्दू बहुल क्षेत्र है में लगभग 2,00,000 लोगों पर एक विधानसभा क्षेत्र है.

इसीलिए…. जम्मू कश्मीर के चुनाव में हमेशा कश्मीर घाटी से ही ज्यादा सदस्य चुने जाते हैं … जो कि ज्यादातर आतंकवाद समर्थक होते हैं…. क्योंकि, घाटी में अधिकतर आबादी “”उन्हीं”” की है.

इसीलिए…. जम्मू क्षेत्र से काफी लंबे समय से ये मांग उठती रही है कि… जम्मू-कश्मीर का परिसीमन किया जाए …. ताकि, सभी को आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से बराबर का प्रतिनिधित्व मिले…!

और…. नियम के अनुसार ये परिसीमन 1995 के दस साल बाद अर्थात 2005 में हो जाना चाहिए था …. लेकिन, साजिशन अब्दुल्ला सरकार ने 2002 में इसके परिसीमन पर 2026 तक रोक लगा दी.

क्योंकि, अगर परिसीमन हुआ तो जम्मू क्षेत्र को अधिक विधानसभा सीट मिल जाएगी और फिर कश्मीर में गैर मुस्लिम मुख्यमंत्री भी बन सकता है.

हालांकि, जम्मू-कश्मीर के परिसीमन के लिए वहां की विधानसभा की अनुमति चाहिए लेकिन…. चूंकि, अभी वहाँ विधान सभा निरस्त है और राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है इसीलिए, अभी वहाँ परिसीमन के लिए राज्यपाल की अनुमति ही पर्याप्त है.

परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र से विधानसभा की सीटें यदि बढ़ती है और कश्मीर क्षेत्र की सीटें कम होती है…. तो सरकार चलाने के लिए भाजपा को बहुमत प्राप्त हो सकता है… और, जम्मू कश्मीर में हिन्दू मुख्यमंत्री बन सकता है!

और…. इधर केंद्र में….. 2020-21 तक मोदी सरकार को राज्यसभा में बहुमत प्राप्त हो जाएगा…!

मतलब कि… संसद के दोनों सदनों में बहुमत.

तो…. परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में यदि भाजपा बहुमत प्राप्त कर लेती है तो धारा 370 का समाप्त होना शत प्रतिशत निश्चित है.

क्योंकि, उस स्थिति में…. जम्मू कश्मीर के विधानसभा से धारा 370 को हटाने की अनुशंसा की जाएगी जिसे यहाँ संसद से पास कर दिया जाएगा…!

इसीलिए…. जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का फैसला बेहद दूरदर्शिता वाला फैसला है और इसके बेहद दूरगामी परिणाम होंगे.

शॉर्टकट में… ये कहा जा सकता है कि…. ये फैसला धारा 370 को समाप्त करने की एक बहुत अहम कड़ी है…

और…. ये फैसला धारा 370 के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी.

जय महाकाल…!!!