Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रसाद देवरानी

गया तीर्थ

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ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई. गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी. वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था।

उसके मन में एक खटका था. वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा. इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले।

गयासुर ने कठोर तप से भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया. भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा- आप मेरे शरीर में वास करें. जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं. वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले।

भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा. जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता।

इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई. कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते. यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता. यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था।

यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी है. पापी भी गयासुर के प्रभाव से स्वर्ग भोंगेगे।

ब्रह्माजी ने उपाय निकाला. उन्होंने गयासुर से कहा कि तुम्हारा शरीर सबसे ज्यादा पवित्र है इसलिए तुम्हारी पीठ पर बैठकर मैं सभी देवताओं के साथ यज्ञ करुंगा।

उसकी पीठ पर यज्ञ होगा यह सुनकर गया सहर्ष तैयार हो गया. ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ पत्थर से गया को दबाकर बैठ गए. इतने भार के बावजूद भी वह अचल नहीं हुआ. वह घूमने-फिरने में फिर भी समर्थ था।

देवताओं को चिंता हुई. उन्होंने आपस में सलाह की कि इसे श्री विष्णु ने वरदान दिया है इसलिए अगर स्वयं श्री हरि भी देवताओं के साथ बैठ जाएं तो गयासुर अचल हो जाएगा. श्री हरि भी उसके शरीर पर आ बैठे।

श्री विष्णु जी को भी सभी देवताओं के साथ अपने शरीर पर बैठा देखकर गयासुर ने कहा- आप सब और मेरे आराध्य श्री हरि की मर्यादा के लिए अब मैं अचल हो रहा हूं. घूम-घूमकर लोगों के पाप हरने का कार्य बंद कर दूंगा।

लेकिन मुझे चूंकि श्री हरि का आशीर्वाद है इसलिए वह व्यर्थ नहीं जा सकता इसलिए श्री हरि आप मुझे पत्थर की शिला बना दें और यहीं स्थापित कर दें।

श्री हरि उसकी इस भावना से बड़े खुश हुए. उन्होंने कहा- गया अगर तुम्हारी कोई और इच्छा हो तो मुझसे वरदान के रूप में मांग लो।

गया ने कहा- ” हे नारायण मेरी इच्छा है कि आप सभी देवताओं के साथ अप्रत्यक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तीर्थस्थल बन जाए.”

श्री विष्णु ने कहा- गया तुम धन्य हो. तुमने लोगों के जीवित अवस्था में भी कल्याण का वरदान मांगा और मृत्यु के बाद भी मृत आत्माओं के कल्याण के लिए वरदान मांग रहे हो. तुम्हारी इस कल्याणकारी भावना से हम सब बंध गए हैं।

भगवान ने आशीर्वाद दिया कि जहां गया स्थापित हुआ वहां पितरों के श्राद्ध-तर्पण आदि करने से मृत आत्माओं को पीड़ा से मुक्ति मिलेगी. क्षेत्र का नाम गयासुर के अर्धभाग गया नाम से तीर्थ रूप में विख्यात होगा. मैं स्वयं यहां विराजमान रहूंगा।

इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा।साथ ही वहा भगवान “श्री विष्णुजी* ने अपने पेर का निशान स्थापित किया जो आज भी वहा के मंदिर मे दर्शनीय हे |
गया विधि के अनुसार श्राद्ध फल्गू नदी के तट पर विष्णु पद मंदिर में व अक्षयवट के नीचे किया जाता है।

वह स्थान बिहार के गया में हुआ जहां श्राद्ध आदि करने से पितरों का कल्याण होता हैl

पिंडदान की शुरुआत कब और किसने की, यह बताना उतना ही कठिन है जितना कि भारतीय धर्म-संस्कृति के उद्भव की कोई तिथि निश्चित करना। परंतु स्थानीय पंडों का कहना है कि सर्व प्रथम सतयुग में ब्रह्माजी ने पिंडदान किया था। महाभारत के ‘वन पर्व’ में भीष्म पितामह और पांडवों की गया-यात्रा का उल्लेख मिलता है। श्रीराम ने महाराजा दशरथ का पिण्ड दान यहीं (गया) में किया था। गया के पंडों के पास साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मौर्य और गुप्त राजाओं से लेकर कुमारिल भट्ट, चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस व चैतन्य महाप्रभु जैसे महापुरुषों का भी गया में पिंडदान करने का प्रमाण मिलता है। गया में फल्गू नदी प्रायः सूखी रहती है। इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है।

भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीताजी के साथ पिता दशरथ का श्राद्ध करने गयाधाम पहुंचे। श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री लाने वे चले गये। तब तक राजा दशरथ की आत्मा ने पिंड की मांग कर दी। फल्गू नदी तट पर अकेली बैठी सीताजी अत्यंत असमंजस में पड़ गई। माता सीताजी ने फल्गु नदी, गाय, वटवृक्ष और केतकी के फूल को साक्षी मानकर पिंडदान कर दिया।जब भगवान श्री राम आए तो उन्हें पूरी कहानी सुनाई, परंतु भगवान को विश्वास नहीं हुआ।

तब जिन्हें साक्षी मानकर पिंडदान किया था, उन सबको सामने लाया गया। पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्यवादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली….।
इससे क्रोधित होकर सीताजी ने फल्गू नदी को श्राप दे दिया कि तुम सदा सूखी रहोगी जबकि गाय को मैला खाने का श्राप दिया केतकी के फूल को पितृ पूजन मे निषेध का। वटवृक्ष पर प्रसन्न होकर सीताजी ने उसे सदा दूसरों को छाया प्रदान करने व लंबी आयु का वरदान दिया। तब से ही फल्गू नदी हमेशा सूखी रहती हैं, जबकि वटवृक्ष अभी भी तीर्थयात्रियों को छाया प्रदान करता है। आज भी फल्गू तट पर स्थित सीता कुंड में बालू का पिंड दान करने की क्रिया (परंपरा) संपन्न होती है।

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हेमंत कुमार शर्मा

सूर्य को जल दे रहे राजा मनु ने जैसे ही नदी के पानी मे हाथ डालकर अंजली भरकर जल बाहर निकाला …..उनके कानों में आवाज गूंजी…. राजन मुझे बचा लो राजन,मैं मर जाऊंगा….

महाराज मनु हैरान थे …..ये आवाज उनकी अंजली में पड़े जल में दिखाई दे रही छोटी सी मछली की थी।। राजा ने ऐसा चमत्कार पहले नही देखा….मछली मानव की भाषा बोल रही थी।

मनु महाराज बोले—कौन हो तुम???

मछली बोली— मैं मत्स्य हु महराज,अभी बहुत छोटा हु,ये बड़ी मछलियां हम छोटी मछलियों को खा जाती है….इसलिए मुझे पुनः नदी में मत डालिये महराज….मुझे अपने महल ले चलिए….मैं वहां चैन से जी सकूंगा…..

महाराज मनु उस मत्स्य को अपने महल ले आये….एक कटोरी में जल भरकर उसी में मत्स्य को डाल दिया….मगर ये क्या…मत्स्य चीखने लगा…. राजन राजन मुझे इस कटोरी से बाहर निकालिये राजन….मेरा आकार बढ़ रहा है राजन…मैं सांस नही ले पाऊंगा राजन….मैं मर जाऊँगा…

मनु ने देखा….मछली का आकार अचानक बढ़ने लगा… राजा ने तुरंत बड़ा जल पात्र बुलाया और उसी में मछली को डाल दिया।

थोड़ी देर बाद फिर मछली बोली—. राजन राजन मुझे इस पात्र से भी बाहर निकालिये राजन….मेरा आकार बढ़ रहा है राजन…मैं सांस नही ले पाऊंगा.. मैं मर जाऊंगा ….

मनु हैरान थे… मानव जाति के पिता राजा मनु ….जिनसे सम्पूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति बताई जाती है। ऐसा चमत्कार उन्होंने कभी नही देखा।

राजा ने फिर एक बड़ा पात्र मँगाया और उसमे मछ्ली डाली….मगर फिर वही कहानी…..मत्स्य फिर बोला—-लगा…. राजन राजन मुझे इस पात्र से बाहर निकालिये राजन….मेरा आकार बढ़ रहा है राजन…मैं सांस नही ले पाऊंगा… मैं मर जाऊंगा…

महाराज ने तुरंत मछली को लिया और ले जाकर समुद्र में फेंक दिया…..और फिर जो देखा वो रोंगटे खड़े कर देने वाला था…वो मछली समुद्र में गिरते ही भयानक आकार धारण करने लगी…ऐसा लगा जैसे महासागर भी छोटा हो जाएगा… राजा मनु हैरान थे।।

और देखते ही देखते एक विराट पुरुष प्रगट हुआ जिसका आधा शरीर मछली और आधा पुरुष का था। उसके 4 हाथ थे और वो भयंकर तेजस्वी था।

मनु ने कहा—हे देव आप कौन है?? क्यों मेरी परीक्षा ले रहे है??

वो देवपुरुष बोले—राजन,मैं चराचर जगत का स्वामी नारायण हु….संसार मुझे ही ईश्वर कहता है…. हे नरेश आज से ठीक एक सप्ताह बाद महाप्रलय इस धरती को डूबा देगी। सातों महासागर इस पृथ्वी को अपने जल में डूबा देंगे….. तब मैं मछली बनकर तुम्हारी रक्षा हेतु आऊंगा….तुम इसी स्थान पर मेरी प्रतीक्षा करना…. यहां एक नाव तैरती हुई आएगी तुम अपनी पत्नी और ऋषि मुनियों के साथ उसी में बैठ जाना और शेषनाग की रस्सी से नाव और मुझे बांध देना…. जब तक ब्रह्मा की एक रात्रि चलेगी तब तक मैं तुम्हे इसी महाप्रलय से बचाता रहूंगा….और उसके बाद नए सतयुग का आरंभ हो जाएगा। राजन जिस तरह किसान खेती के बाद कुछ बीजो को खेती के लिए फिर से बचा लेता है उसी तरह मैं भी महाप्रलय के समय कुछ श्रेष्ठ पुरुषो को बचा लेता हूं….ताकि नई सृष्टि की रचना की जा सके।

और इस तरह भगवान विष्णु ने मत्स्यवतार धारण करते हुए राजा मनु को महाप्रलय के समय बचाया था। इस कहानी का जिक्र सभी हिन्दू ग्रंथो में तो है ही…..इस कहानी का जिक्र बाइबिल में भी है। उन्होंने हमारी कहानी चोरी करके खुद के धर्म की नींव रख दी 😀