Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

दिनेश प्रताप सिंह

विचार संजीवनी 🕉

जब भोग सामने आते हैं तब सब सुनी-सुनाई बातों रद्दी हो जाती हैं।

एक कहानी है। एक पंडित जी थे। वे रोज रात्रि में कथा किया करते थे । उन्होंने एक बिल्ली को पालकर सिखा रखा था। वे बिल्ली को बैठाकर उसके सिर थोड़ी मिट्टी रखकर दीपक रख देते और उस दीपक के प्रकाश में कथा बाँचते।

कोई कहता कि हमारा मन ठीक नहीं है तो वह कहते–‘अरे यह बिल्ली ही ठीक है एकदम चुपचाप बैठी रहती है, तुम्हारी क्या बात है ?

एक आदमी ने विचार किया कि देखें बिल्ली कैसे चुपचाप बैठती है। वह दूसरे दिन अपने साथ एक चूहा ले गया। जब पंडित जी की कथा चल रही थी उस समय उसमें चूहे को बिल्ली के सामने छोड़ दिया। चूहे पर दृष्टि पड़ते ही बिल्ली उस पर झपट पड़ी और दीपक गिर गया।

यही दशा आदमियों की होती है। बातें सुनते समय तो चुपचाप बैठे रहते हैं पर जब भोग- पदार्थ सामने आ जाएं तो फिर वश की बात नहीं रहती कारण कि भीतर में रुपयों आदि का आकर्षण है इसलिए रुपये सामने आने पर मुश्किल हो जाती है।

लोगों का आकर्षण पहले नहीं था–यह बात नहीं है। आकर्षण तो पहले से ही था पर वह दबा हुआ था।

तांबे के कड़े के ऊपर सोने की पॉलिश कर दी जाए तो वह कड़ा सोने का ही दिखता है।

इस तरह सीखी हुई बातें पालिश की तरह होती हैं परंतु जानी हुई अनुभव की बात ठोस होती है।

जिसके भीतर में स्वयं का अनुभव होता है उसके सामने चाहे कुछ भी आ जाए वह विचलित नहीं होता वह हर परिस्थिति में ज्यों-का-त्यों रहता है।

राम ! राम !! राम !!!

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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