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रोचक मनोरंजन और सामान्य ज्ञान
31 May at 20:05 ·
बुराई –

एक व्यक्ति गंगा के किनारे-किनारे जा रहे थे। उन्होंने देखा कि एक जवान उम्र की लड़की है और चालीस वर्ष का पुरुष। आपस में हँस रहे हैं !

लड़की एक गिलास दे रही है और पुरुष पीने जा रहा है। उस देखने वाले व्यक्ति के मन में आया कि देखो गंगा के तट पर भी ये पाप की भावना करते हैं !

यह स्त्री और वह पुरुष। ये हँस रहे हैं। इनके मन में पाप आ गया। यह शराब का गिलास दे रही है और वे पुरुष पीने जा रहे हैं !

यह उसने सोच लिया। थोड़ी देर में वहाँ एक नाव निकली। नदी में एक भंवर था। उस भंवर में नाव फंस गयी। नाव डगमगायी और उसमें पानी आ गया !

वह उलट गयी। उसमें बीसों आदमी थे। उस व्यक्ति ने गिलास को फेंक दिया और तुरंत उस नदी में कूद पड़ा। बड़ी मुश्किल से अपनी जान को जोखिम में डालकर उसने उन आदमियों को बचा लिया !

अब देखने वाला सोचने लगा कि भाई, क्या बात है ?

अगर वह व्यभिचारी था, शराबी था, कामी था, तो इतना त्यागी कैसे था कि अपनी जान जोखिम में डालकर, प्राणों पर खेलकर उसने इतने लोगों को बचा लिया । यह बात कैसे हुई ?

उसे सन्देह हो गया अपने विचार पर। वह पास आया और पूछने लगा – आप कौन हैं ?

उन्होंने कहा – यह बात तो पीछे करना। अभी हमारी सहायता करो। इन लोगेां के पेट में पानी भर गया है। पहले इसे निकालें !

इस प्रकार उसे भी सेवा में संयुक्त कर लिया। वह लड़की भी सेवा करने लगी। तीनों सेवा में जुट गये !

अब कुछ देर बाद जब सब ठीक हो गया तब पूछा – आप कौन हैं ? यह लड़की कौन है ?

संदेह मन में था ही !

उन्होंने उत्तर दिया – यह मेरी बेटी है। ससुराल से आज ही आयी है। हम बगल के गाँव में रहते हैं !

घूमते-घूमते, बात करते हुए गंगाजी के किनारे आ गये। यह हँस-हँसकर अपने घर की बात सुना रही थी और मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी !

इतने में मुझे प्यास लगी। मैंने कहा, जा बेटी, गंगाजल तो ले आ। यह गंगाजल का गिलास ले आयी। मैं पीने जा रहा था कि इतने में नाव आ गयी !

अब उसने सोचा -‘देख, तू कितना बड़ा पापी है। शराब और व्यभिचार तो तेरे मन में था। तेरे मन में, तेरे मस्तिष्क में शराब था, व्यभिचार था !

इस पवित्र गंगाजल में तूने शराब की भावना की। पवित्र बाप-बेटी के विशुद्ध व्यवहार में व्यभिचार की भावना की !

तू पवित्र कहाँ है। तेरे मन में तो अभी तक कलुष भरा है !

ऐसा बहुत दफा होता है लोग अपने मन का पाप, अपने-आप की बुराई दूसरे पर आरोपित कर देते हैं और दोषी मान लेते हैं !!

दुर्गा दुर्गति दुर कर मंगल कर सब काज ।
मन मन्दिर मंगल करो कृपा करके आज ।।

Posted in सुभाषित - Subhasit

Verse

ॐ। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म सदसद्रूपं सदसदसीतं नान्यत् किञ्चिदस्ति त्रिकालधृतं त्रिकालातीतं वा सर्वन्तु खलु ब्रह्मैकं यत् किञ्च जगत्यामणु वा महद्वोदारं वानुदारं वा ब्रह्मैव तद् ब्रह्मैव जगदपि ब्रह्म सत्यं न मिथ्या॥

Transliteration

om| ekamevādvitīyaṁ brahma sadasadrūpaṁ sadasadasītaṁ nānyat kiñcidasti trikāladhṛtaṁ trikālātītaṁ vā sarvantu khalu brahmaikaṁ yat kiñca jagatyāmaṇu vā mahadvodāraṁ vānudāraṁ vā brahmaiva tad brahmaiva jagadapi brahma satyaṁ na mithyā ||

Anvaya

ॐ। एकम् एव अद्वितीयं ब्रह्म। तत् सत्-असत्-रूपं सत्-असत्-अतीतं। तद् बिहाय अन्यत् किञ्चित् न अस्ति। त्रिकाल-घृतं त्रिकाल-अतीतं वा सर्वं तु खलु एकं ब्रह्म। जगत्यां यत् किञ्च अणु वा महत् वा उदारं वा अनुदारं वा तत् ब्रह्म एव ब्रह्म एव। जगत् अपि ब्रह्म तत् सत्यं न मिथ्या॥

Anvaya Transliteration

om| ekam eva advitīyaṁ brahma| tat sat-asat-rūpaṁ sat-asat-atītaṁ| tad bihāya anyat kiñcit na asti| trikāla-ghṛtaṁ trikāla-atītaṁ vā sarvaṁ tu khalu ekaṁ brahma| jagatyāṁ yat kiñca aṇu vā mahat vā udāraṁ vā anudāraṁ vā tat brahma eva brahma eva| jagat api brahma tat satyaṁ na mithyā||

Meaning

OM. There is Brahman alone, the One without a second. Being and non-being are its forms and it is also beyond Being and Non-Being. There is nothing else except That. All that is contained in the three times and all that is beyond the three times is indeed that One Brahman alone. Whatever is in the universe, small or large, noble or mean, is Brahman alone, Brahman alone. The world is also Brahman. It is true, not false.

Hindi Meaning

ॐ। ब्रह्म ही एक मात्र सत्ता है। उसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी सत्ता नहीं है। सत् तथा असत् इसी के रूप हैं। यह सत् और असत् दोनों से परे भी है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। तीनों काल में जो कुछ है और तीनों काल से परे जो कुछ है वह वास्तव में एकमात्र वही ब्रह्म है। ब्रह्माण्ड में जो कुछ है लघु या विशाल, उदात्त अथवा हेय वह केवल ब्रह्म है, केवल ब्रह्म । विश्व भी ब्रह्म है । यह सत्य है, मिथ्या नहीं।

Glossary

एकम् ekam the One | एव eva alone| अद्वितीयम् advitīyam without a second | ब्रह्म brahma the Brahman | तत् tat that | सत्-असत्-रूपम् sat-asat-rūpam he with being and non-being its forms | सत्-असत्-अतीतम् sat-asat-atītam one beyond Being and Non-Being | तद् बिहाय tad bihāya except That | अन्यत् किञ्चित् न अस्ति anyat kiñcit na asti there is nothing else | त्रिकाल घृतम् trikāla ghṛtam all that is contained in the three times | त्रिकालातीतम् वा trikālātītam vā and all that is beyond the three times is | सर्वम् तु sarvam tu all that is | खलु khalu indeed | एकम् ब्रह्म ekam brahma that One Brahman alone | जगत्याम् jagatyām in the universe | यत् किञ्च yat kiñca whatever is | अणु वा aṇu vā small | महत् वा mahat vā or large | उदारम् वा udāram vā noble | अनुदारम् वा anudāram vā or mean | तत् ब्रह्म एव tat brahma eva is Brahman alone | ब्रह्म एव brahma eva Brahman alone | जगत् अपि ब्रह्म jagat api brahma the world is also Brahman | तत् सत्यम् tat satyam it is true | न मिथ्या na mithyā not false |

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K. Das

🙏🍀 #वृद्ध_माँ 🍀🙏

रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है घर मे #दो_बहुएँ हैं।

बर्तनों की आवाज से परेशान होकर वो पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती है। वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है

साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा-आरती, करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह।

जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो ।

बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है,

दोनो भाई रसोई में जाते है और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है , माँ मना करती पर वो नही मानते बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है , तो देखते है पिताजी भी जग रहे है
दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते है माँ सुबह जल्दी उठा देना हमे भी पूजा करनी है और सुबह पिताजी के साथ योगा करेंगे , माँ बोलती ठीक है ।

दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे तो पत्नियां बोली माता जी करती है आप क्यु कर रहे हो बर्तन साफ तो *

बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी* पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है ।

हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है

अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुवे जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी ।

कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुवे सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी ।

माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुऐं उनका सम्मान नही करती , माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे

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धर्मेन्द्र सिंग परमार

😊🌹 कहानी 🌹☺

एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें…बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते…

जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे…

एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी…संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई…

संत…मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे…

पिता…नहीं, आप कौन हैं…

संत ने अपना परिचय दिया…और फिर कहा…मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था…

पिता…ओह ये बात…खाली कुर्सी…आप…आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे…

संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया…

पिता…दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया…अपनी बेटी को भी नहीं…पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है…मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता…वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते….कुछ पल्ले नहीं पड़ता था…मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया…लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला…उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है….उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो…फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं…अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो…मैंने ऐसा करके देखा…मुझे बहुत अच्छा लगा…फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा…लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले…अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती…

ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की…सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा…संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था…इसलिए विदा लेकर चले गए..

दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे…

संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई…

बेटी ने जवाब दिया…नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया…मेरा माथा प्यार से चूमा…ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी…जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे…लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी…वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो…संत जी, वो क्या था…

ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले…बड़ी मुश्किल से बोल पाए…काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं… 🙏🏻

जय श्री कृष्ण जी।।

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दिनेश प्रताप सिंह

विचार संजीवनी 🕉

जब भोग सामने आते हैं तब सब सुनी-सुनाई बातों रद्दी हो जाती हैं।

एक कहानी है। एक पंडित जी थे। वे रोज रात्रि में कथा किया करते थे । उन्होंने एक बिल्ली को पालकर सिखा रखा था। वे बिल्ली को बैठाकर उसके सिर थोड़ी मिट्टी रखकर दीपक रख देते और उस दीपक के प्रकाश में कथा बाँचते।

कोई कहता कि हमारा मन ठीक नहीं है तो वह कहते–‘अरे यह बिल्ली ही ठीक है एकदम चुपचाप बैठी रहती है, तुम्हारी क्या बात है ?

एक आदमी ने विचार किया कि देखें बिल्ली कैसे चुपचाप बैठती है। वह दूसरे दिन अपने साथ एक चूहा ले गया। जब पंडित जी की कथा चल रही थी उस समय उसमें चूहे को बिल्ली के सामने छोड़ दिया। चूहे पर दृष्टि पड़ते ही बिल्ली उस पर झपट पड़ी और दीपक गिर गया।

यही दशा आदमियों की होती है। बातें सुनते समय तो चुपचाप बैठे रहते हैं पर जब भोग- पदार्थ सामने आ जाएं तो फिर वश की बात नहीं रहती कारण कि भीतर में रुपयों आदि का आकर्षण है इसलिए रुपये सामने आने पर मुश्किल हो जाती है।

लोगों का आकर्षण पहले नहीं था–यह बात नहीं है। आकर्षण तो पहले से ही था पर वह दबा हुआ था।

तांबे के कड़े के ऊपर सोने की पॉलिश कर दी जाए तो वह कड़ा सोने का ही दिखता है।

इस तरह सीखी हुई बातें पालिश की तरह होती हैं परंतु जानी हुई अनुभव की बात ठोस होती है।

जिसके भीतर में स्वयं का अनुभव होता है उसके सामने चाहे कुछ भी आ जाए वह विचलित नहीं होता वह हर परिस्थिति में ज्यों-का-त्यों रहता है।

राम ! राम !! राम !!!

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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दिनेश प्रताप सिंग

‼यह कथा बच्चो को जरूर सुनायें‼*
‼मोहन के गोपाल‼
छोटे-से गांव में एक दरिद्र विधवा ब्राह्मणी रहती थी। छह वर्षीय बालक मोहन के अतिरिक्त उसका और कोई नहीं था। वह दो-चार भले घरों से भिक्षा मांगकर अपना तथा बच्चे का पेट भर लेती और भगवान का भजन करती थी। भीख पूरी न मिलती तो बालक को खिलाकर स्वयं उपवास कर लेती। यह कम चलता रहा। ब्राह्मणी को लगा कि ब्राह्मण के बालक को दो अक्षर न आए यह ठीक नहीं है। गांव में पड़ाने की व्यवस्था नहीं थी। गाँव से दो कोस पर एक पाठशाला थी। ब्राह्मणी अपने बेटे को लेकर वहा गई। उसकी दरिद्रता तथा रोने पर दया करके वहा के अध्यापक ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार कर लिया। वहां पढने वाले छात्र गुरु के घर में रहते थे किंतु ब्राह्मणी का पुत्र मोहन अभी बहुत छोटा था और ब्राह्मणी को भी अपने पुत्र को देखे विना चैन नहीं पड़ता था अत: मोहन नित्य पढ़ने जाता और सायंकाल घर लौट आता उसको विद्या प्राप्ति के लिए प्रतिदिन चार कोस चलना पड़ता। मार्ग में कुछ दूर जंगल था। शाम को लौटने में अंधेरा होने लगता था। उस जंगल में मोहन को डर लगता था। एक दिन गुरुजी के यहा कोई उत्सव था। मोहन को अधिक देर हो गई और जब वह घर लौटने लगा रात्रि हो गई थी। अंधेरी रात जंगली जानवरों की आवाजों से बालक मोहन भय से थर-थर कांपने लगा। ब्राह्मणी भी देर होने के कारण बच्चे को ढूंढने निकली थी। किसी प्रकार अपने पुत्र को वह घर ले आई। मोहन ने सरलता से कहा : ”मां ! दूसरे लड़को को साथ ले जाने तो उनके नौकर आते हैं। मुझे जंगल में आज बहुत डर लगा। तू मेरे लिए भी एक नौकर रख दे।” बेचारी ब्राह्मणी रोने लगी। उसके पास इतना पैसा कहा कि नौकर रख सके। माता को रोते देख मोहन ने कहा : ”मां ! तू रो मत ! क्या हमारा और कोई नहीं है ” अब ब्राह्मणी क्या उत्तर दे ? उसका हृदय व्यथा से भर गया। उसने कहा : ”बेटा ! गोपाल को छोड़कर और कोई हमारा नहीं है।” बच्चे की समझ में इतनी ही बात आई कि कोई गोपाल उसका है। उसने पूछ ”गोपाल कौन ? वे क्या लगते हैं मेरे और कहा रहते हैं ?” ब्राह्मणी ने सरल भाव से कह दिया : ”वे तुम्हारे भाई लगते हैं। सभी जगह रहते हैं परंतु आसानी से नहीं दिखते। संसार में ऐसा कौन सा स्थान है जहां वे नहीं रहते। लेकिन उनको तो देखा था ध्रुव ने, प्रहलाद ने ओर गोकुल के गोपों ने।” बालक को तो अपने गोपाल भाई को जानना था। वह पूछने लगा : गोपाल मुझसे छोटे हैं या बड़े अपने घर आते हैं या नहीं? माता ने उसे बताया : ”तुमसे वे बड़े हैं और घर भी आते हैं पर हम लोग उन्हें देख नहीं सकते। जो उनको पाने के लिए व्याकुल होता है उसी के पुकारने पर वे उसके पास आते हैं।” मोहन ने कहा : ”जंगल में आते समय मुझे बड़ा डर लगता है। मैं उस समय खूब व्याकुल हो जाता हूं। वहां पुकारू तो क्या गोपाल भाई आएंगे ?” माता ने कहा : ”तू विश्वास के साथ पुकारेगा तो अवश्य वे आएंगे।” मोहन की समझ में इतनी बात आई कि जंगल में अब डरने की जरूरत नहीं है। डर लगने पर मैं व्याकुल होकर पुकारूंगा तो मेरा गोपाल भाई वहा आ जाएगा। दूसरे दिन पाठशाला से लौटते समय जब वह वन में पहुचा उसे डर लगा। उसने पुकारा : ”गोपाल भाई ! तुम कहां हो ? मुझे यहा डर लगता है। मैं व्याकुल हो रहा हूं। गोपाल भाई !” जो दीनबंधु हैं दीनों के पुकारने पर वह कैसे नहीं बोलेंगे। मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई पड़ा ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।” यह स्वर सुनते ही मोहन का भय भाग गया। थोड़ी दूर चलते ही उसने देखा कि एक बहुत ही सुंदर ग्वालबाल उसके पास आ गया। वह हाथ पकड़कर बातचीत करने लगा। साथ-साथ चलने लगा। उसके साथ खेलने लगा। वन की सीमा तक वह पहुंचाकर लौट गया। गोपाल भाई को पाकर मोहन का भय जाता रहा घर आकर उसने जब माता को सब बातें बताईं तब वह ब्राह्मणी हाथ जोडकर गदगद हो अपने प्रभु को प्रणाम करने लगी। उसने समझ लिया जो दयामयी द्रोपदी और गजेंद्र की पुकार पर दौड़ पड़े थे मेरे भोले बालक की पुकार पर भी वही आए थे। ऐसा ही नित्य होने लगा.. एक दिन उसके गुरुजी के पिता का श्राद्ध होने लगा। सभी विद्यार्थी कुछ न कुछ भेंट देंगे। गुरुजी सबसे कुछ लाने को कह रहे थे। मोहन ने भी सरलता से पूछा : “गुरुजी ! मैं क्या ले आऊं ?” गुरु को ब्राह्मणी की अवस्था का पता था। उन्होंने कहा : ‘बेटा ! तुमको कुछ नहीं लाना होगा।’ लेकिन मोहन को यह बात कैसे अच्छी लगती। सब लड़के लाएंगे तो मैं क्यों न लाऊं उसके हठ को देखकर गुरुजी ने कह दिया : ”अच्छा तुम एक लोटा दूध ले आना।” घर जाकर मोहन ने माता से गुरुजी के पिता के श्राद्ध की बात कही और यह भी कहा” मुझे एक लोटा दूध ले जाने की आज्ञा मिली है।” ब्राह्मणी के घर में था क्या जो वह दूध ला देती। मांगने पर भी उसे दूध कौन देता लेकिन मोहन ठहरा बालक। वह रोने लगा। अंत में माता ने उसे समझाया : ”तू गोपाल भाई से दूध मांग लेना। वे अवश्य प्रबंध कर देंगे।” दूसरे दिन मोहन ने जंगल में गोपाल भाई को जाते ही पुकारा और मिलने पर कहा : ”आज मेरे गुरुजी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध ले जाना है। मां ने कहा है कि गोपाल भाई से मांग लेना। सौ मुझे तुम एक लोटा दूध लाकर दो।” गोपाल ने कहा : ”मैं तो पहले से यह लौटा भर दूध लाया हूं । तुम इसे ले जाओ।” मोहन बड़ा प्रसन्न हुआ पाठशाला में गुरुजी दूसरे लड़कों के उपहार देखने और रखवाने में लगे थे। मोहन हंसता हुआ पहुंचा। कुछ देर तो वह प्रतीक्षा करता रहा कि उसके दूध को भी गुरुजी देखेंगे। पर जब किसी का ध्यान उसकी ओर न गया तब वह बोला : ‘गुरुजी ! मैं दूध लाया हू। गुरु जी ढेरों चीजें सम्हालने में व्यस्त थे। मोहन ने जब उन्हें स्मरण दिलाया तब झुंझलाकर बोले : ”जरा-सा दूध लाकर यह लड़का कान खाए जाता है जैसे इसने हमें निहाल कर दिया। इसका दूध किसी बर्तन से डालकर हटाओ इसे यहां से।” मोहन अपने इस अपमान से खिन्न हो गया। उसका उत्साह चला गया। उसके नेत्रों से आंसू गिरने लगे। नौकर ने लोटा लेकर दूध कटोरे मे डाला तो कटोरा भर गया फिर गिलास में डाला तो वह भी भर गया। बाल्टी में टालने लगा तो वह भी भर गई। भगवान के हाथ से दिया वह लोटा भर दूध तो अक्षय था। नौकर घबराकर गुरुजी के पास गया। उसकी बात सुनकर गुरुजी तथा और सब लोग वहां आए अपने सामने एक बड़े पात्र में दूध डालने को उन्होंने कहा। पात्र भर गया पर लोटा तनिक भी खाली नहीं हुआ। इस प्रकार बड़े-बड़े बर्तन दूध से भर गए। अब गुरुजी ने पूछा : ”बेटा ! तू दूध कहां से लाया हें ?” सरलता से बालक ने कहा : ”मेरे गोपाल भाईआ ने दिया।” गुरुजी और चकित हुए। उन्होंने पूछा : ”गोपाल भाई कौन ? तुम्हारे तो कोई भाई नहीं।” मोहन ने दृढ़ता से कहा : ”है क्यों नहीं। गौपाल भाई मेरा बड़ा भाई है। वह मुझे रोज वन में मिल जाते है। मां कहती हैं कि वह सब जगह रहता है पर दिखता नहीं कोई उसे खूब व्याकुल होकर पुकारे तभी वह आ जाता है। उससे जो कुछ मांगा जाए वह तुरंत दे देता है।” अब गुरुजी को कुछ समझना नहीं था। मोहन को उन्होंने हृदय से लगा लिया। श्राद्ध में उस दूध से खीर बनी और ब्राह्मण उसके स्वाद का वर्णन करते हुए तृप्त नहीं होते थे । गोपाल भाई के दूध का स्वाद स्वर्ग के अमृत में भी नहीं तब संसार के किसी पदार्थ में कहां से होगा। उस दूध का बना श्राद्धान्त पाकर गुरुजी के पितर तृप्त ही नहीं हुए, माया से मुक्त भी हो गए। श्राद्ध समाप्त हुआ। संध्या को सब लोग चले गए। मोहन को गुरुजी ने रोक लिया था। अब उन्होंने कहा : ”बेटा ! मैं तेरे साथ चलता हूं। तू मुझे अपने गोपाल भाई के दर्शन करा देगा न ?” मोहन ने कहा : ”चलिए मेरा गोपाल भाई तो पुकारते ही आ जाता है।” वन में पहुंच कर उसने पुकारा। उत्तर में उसे सुनाई पड़ा : ”आज तुम अकेले तो हो नहीं तुम्हें डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?” मोहन ने कहा : ”मेरे गुरुजी तुम्हें देखना चाहते हैं तुम जल्दी आओ !” जब मोहन ने गोपाल भाई को देखा तो गुरुजी से कहा : ”आपने देखा मेरा गोपाल भाई कितना सुदर है ?” गुरुजी कहने लगे : “मुझे तो दिखता ही नहीं। मैं तो यह प्रकाशमात्र देख रहा हूं।” अब मोहन ने कहा : “गोपाल भाई ! तुम मेरे गुरुजी को दिखाई क्यों नहीं पड़ते ” उत्तर मिला : ”तुम्हारी बात दूसरी है। तुम्हारा अत: करण शुद्ध है तुममें सरल विश्वास है, अत: मैं तुम्हारे पास आता हूं। तुम्हारे गुरुदेव को जो प्रकाश दिख गया उनके लिए वही बहुत है। उनका इतने से ही कल्याण हो जाएगा। उस अमृत भरे स्वर को सुनकर गुरुदेव का हृदय गदगद हो गया। उनको अपने हृदय में भगवान के दर्शन हुए। भगवान की उन्होंने स्तुति की। कुछ देर में जब भगवान अंतर्धान हो गए, तब मोहन को साथ लेकर वे उसके घर आए और वहां पहुंचकर उनके नेत्र भी धन्य हो गए। गोपाल भाई उस ब्राह्मणी की गोद में बैठे थे और माता के नेत्रों की अश्रुधार उनकी काली धराली अलकों को भिगो रही थी। माता को शरीर की सुध-बुध ही नहीं थी।
‼जय जय श्री राधे राधे जी‼यह कथा बच्चो को जरूर सुनायें‼*
‼मोहन के गोपाल‼
छोटे-से गांव में एक दरिद्र विधवा ब्राह्मणी रहती थी। छह वर्षीय बालक मोहन के अतिरिक्त उसका और कोई नहीं था। वह दो-चार भले घरों से भिक्षा मांगकर अपना तथा बच्चे का पेट भर लेती और भगवान का भजन करती थी। भीख पूरी न मिलती तो बालक को खिलाकर स्वयं उपवास कर लेती। यह कम चलता रहा। ब्राह्मणी को लगा कि ब्राह्मण के बालक को दो अक्षर न आए यह ठीक नहीं है। गांव में पड़ाने की व्यवस्था नहीं थी। गाँव से दो कोस पर एक पाठशाला थी। ब्राह्मणी अपने बेटे को लेकर वहा गई। उसकी दरिद्रता तथा रोने पर दया करके वहा के अध्यापक ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार कर लिया। वहां पढने वाले छात्र गुरु के घर में रहते थे किंतु ब्राह्मणी का पुत्र मोहन अभी बहुत छोटा था और ब्राह्मणी को भी अपने पुत्र को देखे विना चैन नहीं पड़ता था अत: मोहन नित्य पढ़ने जाता और सायंकाल घर लौट आता उसको विद्या प्राप्ति के लिए प्रतिदिन चार कोस चलना पड़ता। मार्ग में कुछ दूर जंगल था। शाम को लौटने में अंधेरा होने लगता था। उस जंगल में मोहन को डर लगता था। एक दिन गुरुजी के यहा कोई उत्सव था। मोहन को अधिक देर हो गई और जब वह घर लौटने लगा रात्रि हो गई थी। अंधेरी रात जंगली जानवरों की आवाजों से बालक मोहन भय से थर-थर कांपने लगा। ब्राह्मणी भी देर होने के कारण बच्चे को ढूंढने निकली थी। किसी प्रकार अपने पुत्र को वह घर ले आई। मोहन ने सरलता से कहा : ”मां ! दूसरे लड़को को साथ ले जाने तो उनके नौकर आते हैं। मुझे जंगल में आज बहुत डर लगा। तू मेरे लिए भी एक नौकर रख दे।” बेचारी ब्राह्मणी रोने लगी। उसके पास इतना पैसा कहा कि नौकर रख सके। माता को रोते देख मोहन ने कहा : ”मां ! तू रो मत ! क्या हमारा और कोई नहीं है ” अब ब्राह्मणी क्या उत्तर दे ? उसका हृदय व्यथा से भर गया। उसने कहा : ”बेटा ! गोपाल को छोड़कर और कोई हमारा नहीं है।” बच्चे की समझ में इतनी ही बात आई कि कोई गोपाल उसका है। उसने पूछ ”गोपाल कौन ? वे क्या लगते हैं मेरे और कहा रहते हैं ?” ब्राह्मणी ने सरल भाव से कह दिया : ”वे तुम्हारे भाई लगते हैं। सभी जगह रहते हैं परंतु आसानी से नहीं दिखते। संसार में ऐसा कौन सा स्थान है जहां वे नहीं रहते। लेकिन उनको तो देखा था ध्रुव ने, प्रहलाद ने ओर गोकुल के गोपों ने।” बालक को तो अपने गोपाल भाई को जानना था। वह पूछने लगा : गोपाल मुझसे छोटे हैं या बड़े अपने घर आते हैं या नहीं? माता ने उसे बताया : ”तुमसे वे बड़े हैं और घर भी आते हैं पर हम लोग उन्हें देख नहीं सकते। जो उनको पाने के लिए व्याकुल होता है उसी के पुकारने पर वे उसके पास आते हैं।” मोहन ने कहा : ”जंगल में आते समय मुझे बड़ा डर लगता है। मैं उस समय खूब व्याकुल हो जाता हूं। वहां पुकारू तो क्या गोपाल भाई आएंगे ?” माता ने कहा : ”तू विश्वास के साथ पुकारेगा तो अवश्य वे आएंगे।” मोहन की समझ में इतनी बात आई कि जंगल में अब डरने की जरूरत नहीं है। डर लगने पर मैं व्याकुल होकर पुकारूंगा तो मेरा गोपाल भाई वहा आ जाएगा। दूसरे दिन पाठशाला से लौटते समय जब वह वन में पहुचा उसे डर लगा। उसने पुकारा : ”गोपाल भाई ! तुम कहां हो ? मुझे यहा डर लगता है। मैं व्याकुल हो रहा हूं। गोपाल भाई !” जो दीनबंधु हैं दीनों के पुकारने पर वह कैसे नहीं बोलेंगे। मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई पड़ा ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।” यह स्वर सुनते ही मोहन का भय भाग गया। थोड़ी दूर चलते ही उसने देखा कि एक बहुत ही सुंदर ग्वालबाल उसके पास आ गया। वह हाथ पकड़कर बातचीत करने लगा। साथ-साथ चलने लगा। उसके साथ खेलने लगा। वन की सीमा तक वह पहुंचाकर लौट गया। गोपाल भाई को पाकर मोहन का भय जाता रहा घर आकर उसने जब माता को सब बातें बताईं तब वह ब्राह्मणी हाथ जोडकर गदगद हो अपने प्रभु को प्रणाम करने लगी। उसने समझ लिया जो दयामयी द्रोपदी और गजेंद्र की पुकार पर दौड़ पड़े थे मेरे भोले बालक की पुकार पर भी वही आए थे। ऐसा ही नित्य होने लगा.. एक दिन उसके गुरुजी के पिता का श्राद्ध होने लगा। सभी विद्यार्थी कुछ न कुछ भेंट देंगे। गुरुजी सबसे कुछ लाने को कह रहे थे। मोहन ने भी सरलता से पूछा : “गुरुजी ! मैं क्या ले आऊं ?” गुरु को ब्राह्मणी की अवस्था का पता था। उन्होंने कहा : ‘बेटा ! तुमको कुछ नहीं लाना होगा।’ लेकिन मोहन को यह बात कैसे अच्छी लगती। सब लड़के लाएंगे तो मैं क्यों न लाऊं उसके हठ को देखकर गुरुजी ने कह दिया : ”अच्छा तुम एक लोटा दूध ले आना।” घर जाकर मोहन ने माता से गुरुजी के पिता के श्राद्ध की बात कही और यह भी कहा” मुझे एक लोटा दूध ले जाने की आज्ञा मिली है।” ब्राह्मणी के घर में था क्या जो वह दूध ला देती। मांगने पर भी उसे दूध कौन देता लेकिन मोहन ठहरा बालक। वह रोने लगा। अंत में माता ने उसे समझाया : ”तू गोपाल भाई से दूध मांग लेना। वे अवश्य प्रबंध कर देंगे।” दूसरे दिन मोहन ने जंगल में गोपाल भाई को जाते ही पुकारा और मिलने पर कहा : ”आज मेरे गुरुजी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध ले जाना है। मां ने कहा है कि गोपाल भाई से मांग लेना। सौ मुझे तुम एक लोटा दूध लाकर दो।” गोपाल ने कहा : ”मैं तो पहले से यह लौटा भर दूध लाया हूं । तुम इसे ले जाओ।” मोहन बड़ा प्रसन्न हुआ पाठशाला में गुरुजी दूसरे लड़कों के उपहार देखने और रखवाने में लगे थे। मोहन हंसता हुआ पहुंचा। कुछ देर तो वह प्रतीक्षा करता रहा कि उसके दूध को भी गुरुजी देखेंगे। पर जब किसी का ध्यान उसकी ओर न गया तब वह बोला : ‘गुरुजी ! मैं दूध लाया हू। गुरु जी ढेरों चीजें सम्हालने में व्यस्त थे। मोहन ने जब उन्हें स्मरण दिलाया तब झुंझलाकर बोले : ”जरा-सा दूध लाकर यह लड़का कान खाए जाता है जैसे इसने हमें निहाल कर दिया। इसका दूध किसी बर्तन से डालकर हटाओ इसे यहां से।” मोहन अपने इस अपमान से खिन्न हो गया। उसका उत्साह चला गया। उसके नेत्रों से आंसू गिरने लगे। नौकर ने लोटा लेकर दूध कटोरे मे डाला तो कटोरा भर गया फिर गिलास में डाला तो वह भी भर गया। बाल्टी में टालने लगा तो वह भी भर गई। भगवान के हाथ से दिया वह लोटा भर दूध तो अक्षय था। नौकर घबराकर गुरुजी के पास गया। उसकी बात सुनकर गुरुजी तथा और सब लोग वहां आए अपने सामने एक बड़े पात्र में दूध डालने को उन्होंने कहा। पात्र भर गया पर लोटा तनिक भी खाली नहीं हुआ। इस प्रकार बड़े-बड़े बर्तन दूध से भर गए। अब गुरुजी ने पूछा : ”बेटा ! तू दूध कहां से लाया हें ?” सरलता से बालक ने कहा : ”मेरे गोपाल भाईआ ने दिया।” गुरुजी और चकित हुए। उन्होंने पूछा : ”गोपाल भाई कौन ? तुम्हारे तो कोई भाई नहीं।” मोहन ने दृढ़ता से कहा : ”है क्यों नहीं। गौपाल भाई मेरा बड़ा भाई है। वह मुझे रोज वन में मिल जाते है। मां कहती हैं कि वह सब जगह रहता है पर दिखता नहीं कोई उसे खूब व्याकुल होकर पुकारे तभी वह आ जाता है। उससे जो कुछ मांगा जाए वह तुरंत दे देता है।” अब गुरुजी को कुछ समझना नहीं था। मोहन को उन्होंने हृदय से लगा लिया। श्राद्ध में उस दूध से खीर बनी और ब्राह्मण उसके स्वाद का वर्णन करते हुए तृप्त नहीं होते थे । गोपाल भाई के दूध का स्वाद स्वर्ग के अमृत में भी नहीं तब संसार के किसी पदार्थ में कहां से होगा। उस दूध का बना श्राद्धान्त पाकर गुरुजी के पितर तृप्त ही नहीं हुए, माया से मुक्त भी हो गए। श्राद्ध समाप्त हुआ। संध्या को सब लोग चले गए। मोहन को गुरुजी ने रोक लिया था। अब उन्होंने कहा : ”बेटा ! मैं तेरे साथ चलता हूं। तू मुझे अपने गोपाल भाई के दर्शन करा देगा न ?” मोहन ने कहा : ”चलिए मेरा गोपाल भाई तो पुकारते ही आ जाता है।” वन में पहुंच कर उसने पुकारा। उत्तर में उसे सुनाई पड़ा : ”आज तुम अकेले तो हो नहीं तुम्हें डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?” मोहन ने कहा : ”मेरे गुरुजी तुम्हें देखना चाहते हैं तुम जल्दी आओ !” जब मोहन ने गोपाल भाई को देखा तो गुरुजी से कहा : ”आपने देखा मेरा गोपाल भाई कितना सुदर है ?” गुरुजी कहने लगे : “मुझे तो दिखता ही नहीं। मैं तो यह प्रकाशमात्र देख रहा हूं।” अब मोहन ने कहा : “गोपाल भाई ! तुम मेरे गुरुजी को दिखाई क्यों नहीं पड़ते ” उत्तर मिला : ”तुम्हारी बात दूसरी है। तुम्हारा अत: करण शुद्ध है तुममें सरल विश्वास है, अत: मैं तुम्हारे पास आता हूं। तुम्हारे गुरुदेव को जो प्रकाश दिख गया उनके लिए वही बहुत है। उनका इतने से ही कल्याण हो जाएगा। उस अमृत भरे स्वर को सुनकर गुरुदेव का हृदय गदगद हो गया। उनको अपने हृदय में भगवान के दर्शन हुए। भगवान की उन्होंने स्तुति की। कुछ देर में जब भगवान अंतर्धान हो गए, तब मोहन को साथ लेकर वे उसके घर आए और वहां पहुंचकर उनके नेत्र भी धन्य हो गए। गोपाल भाई उस ब्राह्मणी की गोद में बैठे थे और माता के नेत्रों की अश्रुधार उनकी काली धराली अलकों को भिगो रही थी। माता को शरीर की सुध-बुध ही नहीं थी।
‼जय जय श्री राधे राधे जी‼

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विपिन खुराना#नीरा #आर्य की कहानी। जेल में जब स्तन काटे गए !
आज मै उनकी आत्मकथा पढ रहा था तो मुझे लगा कि आप सब के बीच इसको रखुं ।नीरा आर्य (1902 – 1998) की संघर्ष पूर्ण जीवनी:
नीरा आर्य का विवाह ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के साथ हुआ था | नीरा ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बचाने के लिए अंग्रेजी सेना में अपने अफसर पति श्रीकांत जयरंजन दास की हत्या कर दी थी ।।नीरा आर्य आजाद हिन्द फौज में रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं, जिन पर अंग्रेजी सरकार ने गुप्तचर होने का आरोप भी लगाया था।।
इन्हें नीरा नागिनी के नाम से भी जाना जाता है। |आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई।
आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।।नीरा ने अपनी एक आत्मकथा भी लिखी है ,
इस आत्म कथा का एक ह्रदयद्रावक अंश प्रस्तुत है –
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी।
हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है?जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।।अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था।
‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है।।मैंने एक बार दुःखी होकर कहा, ‘‘क्याअंधा है, जो पैर में मारता है?’’‘‘पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’
उसने मुझे कहा था।‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ…’’ फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, ‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’
‘‘नेताजी जिंदा हैं….झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’
‘तो कहाँ हैं…।’’
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’
जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, ‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया…लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था…लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे…’’उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, ‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ सलाम हैं ऐसे देश भक्त को। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।।
जय हिन्द, जय माँ भारती, वन्देमातरम !!!