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पुस्पा गुप्ता

हरे रामा ।

हरे कृष्णा ।।

श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे ,इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था । जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते , कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते । एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं । वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे । पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा – पंडित जी , रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है ,हम तो फक्कड़ साधु है । माला ,लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा । पंडित जी ने कहा – ठीक है महाराज , संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे ।

पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती । संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा – पंडित जी ,आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी । हम बहुत प्रसन्न है ,हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो । संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे , श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे । पंडित जी बोले – महाराज हम बहुत गरीब है ,हमें बहुत सारा धन मिल जाये । संत बोले – संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये । भगवान् ने मुस्कुरा दिया , संत बोले – तथास्तु । फिर संत ने पूछा – मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले – हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए । संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए । संत बोले – तथास्तु ,तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा ।

फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले – श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति ,प्रेम हमें प्राप्त हो । संत बोले – नहीं ! यह नहीं मिलेगा । पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए । पंडित जी ने पूछा – संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी । संत बोले – तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन ,सम्मान ,घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है । जब तक हम संसार को , परिवार ,धन ,पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती । भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा ।

प्रभु ने पूछा – तुम्हे बहुत सा धन देते है , केवट बोला नहीं । प्रभु ने कहा – ध्रुव पद लेलो ,केवट बोला – नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा , और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की । हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए – बल, बुद्धि , सिद्धि ,अमरत्व आदि परंतु उन्हे प्रसन्नता नहीं हुई । अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया । प्रह्लाद जी ने भी कहा की हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की ।

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अरुण पांडे

✍दो भाई पवन और कमल बड़े ही प्रेम और खुशी से एक ही घर में अपने परिवार के साथ रहते थे। दोनों साथ – साथ ही व्यापार करते थे और बहुत सा पैसा कमाते थे।

एक दिन दोनों भाइयों में किसी बात को लेकर कहा सुनी हो गयी। बात इतनी बढ़ गयी कि छोटे भाई कमल ने अपने बड़े भाई पवन को कुछ अपशब्द कह दिए।

छोटे भाई द्वारा कहे गए अपशब्द बड़े भाई को बहुत बुरे लग गए और उसके दिल में बुरी तरह चुभ गए।

इस घटना के बाद दोनों के बीच दरार पड़ गयी। दोनों भाई उसी दिन से एक दूसरे से अलग हो गए। दोनों अलग रहने लगे और अलग ही व्यापार करने लगे।

दोनों न तो कभी मिलते थे और ना ही कभी बात करते थे। इसी तरह कई साल बीत गए।

छोटे भाई कमल की एक बेटी थी जो अब बड़ी हो गयी थी। कमल ने उसकी शादी एक अच्छे परिवार में तय कर दी।

अब जब विवाह का समय आया तो कमल ने सोचा कि “बड़ा भाई आखिर बड़ा ही होता है, मैंने उनसे कुछ अपशब्द कह दिए थे जो मेरी गलती थी, चलो अब चलकर बड़े भाई को मना लेना चाहिए।”

अगले ही दिन कमल अपने बड़े भाई के घर गया और पहले की सभी बातों के लिए अपने बड़े भाई से माफी मांगी और कहा, “मैंने आपसे उस दिन जो भी अपशब्द कहे उसके लिए मैं आज बहुत शर्मिन्दा हूँ। मैं उन गलत शब्दों के लिए आपसे आज माफी चाहता हूँ। मेरी बेटी की शादी तय हो गयी है। चलिए और शादी के काम को देखिये।”

छोटे भाई के बहुत कहने पर भी बड़ा भाई का दिल बिलकुल भी नहीं पिघला और उसने शादी में आने से और कमल को माफ़ करने से मना कर दिया।

कमल ने कई बार अपने बड़े भाई को मनाने की कोशिश की लेकिन हर बार वह असफल रहा। अब वह सोच में पड़ गया कि आखिर बड़े भाई को कैसे मनाया जाये।

शादी के लिए भी अब बहुत कम दिन बचे थे। बहुत कोशिश के बाद उसे एक व्यक्ति मिला जिसने उसे बताया कि आपका बड़ा भाई नगर के सबसे बड़े ज्योतिषी के पास हर हफ्ते जाता है और उनकी सभी बातों को मानता है।

छोटा भाई तुरंत नगर के उस सबसे बड़े ज्योतिषी के पास पहुंचा और अपनी सभी बातें उन्हें बतायीं और उनसे प्रार्थना की। उसने अपने द्वारा कहे गए अपशब्दों के बारे में भी बताया और कहा कि उससे भूल हो गयी थी। लेकिन अब किसी भी तरह वह उसके बड़े भाई को उसके घर शादी में आने के लिए मना लें।

ज्योतिषी बोला, “ठीक है, मैं आपके बड़े भाई को मनाऊंगा। वह हर हफ्ते मेरे पास आता है और मैं हर बार उसे बहुत सी अच्छी बातें बताता हूँ। वह मेरी बातों को मानता है। आप जाइये कल। वह आएगा तो मैं उसे मना लूंगा।”

दूसरे दिन जब बड़ा भाई ज्योतिषी के पास पहुंचा तो ज्योतिषी बोला, “तुम्हारे छोटे भाई की बेटी की शादी है, तुम क्या कार्य संभाल रहे हो?”

बड़ा भाई बोला, “जी मैं छोटे भाई की बेटी की शादी में शामिल नहीं हो रहा हूँ। कुछ सालों पहले मेरे भाई ने मुझसे अपशब्द कह दिए थे, वह आज भी मेरे दिल में कांटे की तरह चुभते हैं।”

ज्योतिषी बोला, “तुम शादी में शामिल नहीं होना चाहते, कोई बात नहीं, अच्छा यह बताओ मैंने तुमसे पिछले हफ्ते जीवन से जुडी हुईं क्या – क्या अच्छी बातें बतायीं थीं? उन्हीं बातों से आगे की बातें मैं तुम्हें आज बताऊंगा।”

बड़ा भाई ज्योतिषी द्वारा पिछले हफ्ते कही गयीं बातों को याद करने की कोशिश करने लगा।

लेकिन बहुत प्रयास करने के बाद भी उसे कुछ याद नहीं आया तो ज्योतिषी बोला, “देखो! मेरे द्वारा कही गयीं अच्छी बातें तो तुम्हें 8 दिन बाद भी याद नहीं रहीं और छोटे भाई द्वारा कहे गए कड़वे बोल तुम्हें वर्षों बाद आज भी बहुत अच्छी तरह याद हैं और तुम्हारे दिल में चुभ रहे हैं। जब तुम अच्छी बातों को याद नहीं रख सकते तो उन्हें अपने जीवन में कैसे अपना पाओगे। और जब जीवन में अच्छी बातों को नहीं अपनाओगे तो आगे कैसे बढ़ पाओगे? मेरे द्वारा बतायी गयीं अच्छी बातों के काबिल तुम नहीं हो अतः अगले हफ्ते से मेरे पास नहीं आना।”

अब बड़े भाई की आखें खुल गयीं। उसे एहसास होने लगा कि अब वह गलत है और अपने छोटे भाई के साथ गलत कर रहा है। वह सोचने लगा अब वास्तव में मैं ही गलत हूँ क्योंकि छोटे भाई ने तो माफी मांग ली थी। पुरानी बातों को याद करने से कोई फायदा नहीं है, अब उसे आगे की सोचना चाहिए।

उसने तुरंत ज्योतिषी से माफ़ी मांगी। उसी दिन अपने छोटे भाई के घर गया और उसे गले लगाते हुए बोला, “अब तुम्हें चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है, तुम्हारा बड़ा भाई अब तुम्हारे साथ है। बताओ क्या – क्या इंतजाम करना है शादी का।”

और इस तरह बातें करते हुए दोनों भाई बेटी की शादी की तैयारी करने लगे।

दोस्तों, आजकल लोग अपने परिवार, अपने रिश्तेदार, अपने दोस्तों और अपने मिलने वालों की बातों को बिना सोचे समझे बहुत जल्दी बुरा मान जाते हैं। उनकी बातें लोगों को कभी -कभी इतनी बुरी लग जाती हैं कि आपस में बोलचाल तक बंद हो जाती है। कभी – कभी तो बोलचाल कुछ लम्बे समय तक न हो पाए तो रिश्ते भी टूट जाते हैं।

सबसे बुरा तो तब होता है जब एक व्यक्ति दूसरे से माफी मांगता है और सभी कहासुनी को भूलना भी चाहता है लेकिन दूसरा व्यक्ति पहली बातों को बार बार याद करके खुद भी दुखी होता है और माफ़ी मांगने वाले को भी दुखी करता है। वह पुरानी बातों को अपने दिल में इतनी गहराई से बैठा लेता है कि अब उसे कुछ अच्छा समझ ही नहीं आता।

उसे दोनों के बीच की कोई भी अच्छी बात याद नहीं रहती लेकिन कहासुनी में हुई एक गलत बात उसे हमेशा याद रहती है।

आप ही बताइये क्या ऐसा करना सही है?

आज की दुनिया बहुत व्यस्त हो चुकी है। लोगों के पास एक दूसरे के लिए बहुत कम समय ही मिल पाता है। ऐसे में यदि किसी से कोई अपशब्द निकल भी जाता है तो ऐसे में बिलकुल बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए और न ही रिश्ता तोड़ना चाहिए बल्कि उस बात को जल्दी से जल्दी आपस में मिलकर सुलझा लेना चाहिए।

ध्यान रखिये कि जो बात बीत चुकी है उसे बार -बार याद करके कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि वह बात तो बीत चुकी है, उसे अब नहीं बदला जा सकता।

लेकिन वर्तमान और भविष्य तो आपके सामने खड़े हैं, दोनों वैसे ही बन जायेंगे जैसा आप उन्हें बनाएंगे। वर्तमान और भविष्य दोनों को संवारना आपके हाथ में है।

अब आपकी मर्जी है पुरानी बातों को याद करके दोनों को बिगाड़ लीजिये या पुरानी बातों को भूलकर मेल मिलाप कर लीजिये और आज की तथा आने वाले कल की खुशियों में डूब जाइये। आखिर खुशियों से भरा जीवन अपनों के साथ ही मिलता है।💕

🙏🙏🙏

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संजीव सुक्ला

🔴भामती

मौन की एक गरिमा है। असल में शब्द भी आक्रमण है। शब्द भी दूसरे पर हमला है। मौन अनाक्रमण है।
सुना है मैंने, वाचस्पति विवाह करके आए। पर वे तो धुनी आदमी थे और बारह वर्षों तक वे तो भूल ही गए कि पत्नी घर में है। कथा बड़ी मीठी है। वाचस्पति लिख रहे थे ब्रह्मसूत्र पर अपनी टीका। वे सुबह से सांझ और रात, आधी रात तक टीका लिखने में लगे रहते। पत्नी को घर ले आए। पिता ने कहा, शादी करनी है।
पिता बूढ़े थे। सुखी होते थे। शादी करके घर आ गए। पत्नी घर में चली गई। वाचस्पति अपनी टीका लिखने में लग गए। बारह वर्ष!
उन्हें खयाल ही न रहा, वह जो शादी हो गई, और पत्नी घर में आ गई। वह सब बात समाप्त हो गई।
लेकिन उन्होंने एक निर्णय किया था कि जिस दिन यह ब्रह्मसूत्र की टीका पूरी हो जाएगी, उस दिन मैं संन्यास ले लूंगा। बारह वर्ष बाद आधी रात टीका पूरी हो गई। अचानक वाचस्पति की आंखें पहली दफा टीका को छोड्कर इधर—उधर गईं। देखा कि एक सुंदर सा हाथ पीछे से आकर दीये की ज्योति को ऊंचा कर रहा है। सोने की चूडियां हैं हाथ पर।
लौटकर उन्होंने देखा, और कहा, कोई स्त्री इस आधी रात में मेरे पीछे! पूछा, तू कौन है? स्त्री ने कहा कि धन्य मेरे भाग्य कि आपने पूछा। बारह वर्ष पहले मुझे आप विवाह करके ले आए थे, तब से मैं प्रतीक्षा कर रही हूं कि कभी आप जरूर पूछेंगे कि तू कौन है! पर इतनी देर तू कहां थी? उसने कहा कि मैं रोज आती थी। जब दीये की लौ कम होती, तब बढ़ा जाती थी। दीया सांझ जला जाती थी, सुबह हटा लेती थी। आपके काम में बाधा न पड़े, इसलिए आपके सामने कभी नहीं आई। आपके काम में रंचमात्र बाधा न पड़े, इसलिए कभी मैंने कोशिश नहीं की कि बताऊं मैं भी हूं। मैं थी, और आप अपने काम में थे।
वाचस्पति की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, अब तो बहुत देर हो गई। क्योंकि मैंने तो निर्णय किया है कि जिस दिन जिस क्षण टीका पूरी हो जाएगी, उसी क्षण घर छोड्कर संन्यासी हो जाऊंगा। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं! तूने बारह वर्ष प्रतीक्षा की और आज की रात मेरे जाने का वक्त है! अब मैं उठकर बस घर के बाहर होने को हूं। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं? वाचस्पति की आंख में आंसू..।
उनकी स्त्री का नाम भामती था। इसलिए उन्होंने अपनी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती रखा है। भामती से कोई संबंध नहीं है। उनकी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती से कोई लेना—देना नहीं है। लेकिन अपनी टीका का नाम उन्होंने भामती रखा है। बड़ी अदभुत टीका है।
वाचस्पति अदभुत आदमी थे। कहा कि बस, तेरी स्मृति में भामती इसका नाम रख देता हूं और घर से चला जाता हूं। लेकिन तू दुखी होगी। उनकी पत्नी ने कहा, दुखी नहीं, मुझसे ज्यादा धन्यभागी और कोई भी नहीं। इतना क्या कम है कि आपकी आंखों में मेरे लिए आंसू आ गए! मेरा जीवन कृतार्थ हो गया।
इतनी ही बात वाचस्पति की अपनी स्त्री से हुई है। लेकिन यह बारह साल के मौन के बाद ये जो थोड़े से शब्द हैं, इनको हम वाणी कह सकते हैं, वाक् कह सकते हैं। स्त्री के परम मौन से जब कुछ निकलता है! लेकिन उसका परम मौन होना बड़ा मुश्किल है।
ओशो♣️

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एक सूफी फकीर फरीद से किसीने कहा कि मैं कैसे अपनी बुरी आदतों को छोड़ू ? उन्होंने मुझे बिल्कुल जकड़ लिया है ।

फरीद ने उसकी बात सुनी, उसको उत्तर नहीं दिया, उठकर खड़ा हुआ, पास में एक खभा था, खंभे को पकडकर जोर जोर से चिल्लाने लगा कि बचाओ, बचाओ, छुड़ाओ, छुड़ाओ !

वह आदमी एकदम हैरान हो गया । बेचारा जिज्ञासु, आध्यात्मिक प्रश्न पूछने आया था और यह कोई पागल मालूम होता है ! उसने कहा कि मैं तो सोचता था कि आप ज्ञानी हैं, आप तो विक्षिप्त मालूम होते हैं ।
फरीद ने कहा, ये बात पीछे होंगी, पहले मुझे बचाओ ! पहले मुझे छुड़ाओ ! उस आदमी ने कहा छुड़ाने की कोई जरुरत ही नहीं है, खभा तुम पकड़े हो, खम्भा तुम्हें नहीं पकड़े है ।

फरिदने कहा, फिर तो तू होशियार है । फिर तु मुझ से क्या पूछने आया है ? आदतें तुझे नहीं पकड़े है, तूने आदतों को पकड़ा है । रास्ते पर लग ! अगर तुझे इतनी अक्ल है कि मुझे बता सकता है कि खम्भा मुझे नहीं पकड़े है, तो कौन तुझे पकड़े है ? तुम्हारी आदत में कुछ स्वाथॅ होगा, उसे देख लो ।

छोड़ो यह आदतें । पूरानी है, छूटते छूटते ही छूटेगी, मगर होश रखा तो निश्चित छूट जायेगी । कोई आदतें हमें नहीं पकड़ती । मगर हम अजीब हैं, हम कहते हैं, कैसे छोड़े, आदत ने पकड़ लिया है । आदत क्या तुम्हें खाक पकड़ेगी ।

ओशो – रामदुवारे जो मरे