Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

काशी संवाद

“एक नवयुवक का प्रतिदिन प्रातः व्यायामशाला में जाने का नियम था। एक दिन किसी कारणवश वह व्यायाम करने न जा सका। नियम न टूटे इस बात को ध्यान में रखते हुए वह कॉलेज जाते समय व्यायामशाला में गया और उसकी माटी को मस्तक पर लगाकर सीधे कॉलेज चला गया.!”
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“पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे हुए छात्र उसके मस्तक पर लगे माटी के टीके को देखकर हैरान हो गए। एक ने व्यंग्य के स्वर में पूछा:– तुमने कौन सा सौन्दर्य प्रसाधन (Cosmetic) अपने मस्तक पर लगा रखा है। इसे सुनकर पास खड़े और छात्र भी हंसने लगे.!”
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“उस युवक ने बिना विचलित हुए उत्तर दिया:- कि मैँने मस्तक पर अपने देश की माटी का टीका लगा रखा है, यह माटी तुम्हारे मुख पर लगे विदेशी चुने (Powder) से लाख गुना अच्छी है। उस युवक का उत्तर सुनकर पूछने वाला और हँसने वाले छात्र चुप हो गए.!”
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“वह नवयुवक थे परम् पूजनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर जी, जो आगे चलकर श्री गुरूजी के नाम से विख्यात हुए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दूसरे सरसंघचालक बने। उनकी शिक्षा-दीक्षा ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ में हुई। यहीं पर वे आचार्य भी बने। यह ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ के लिए गर्व की बात है.!”
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“वन्दे-मातरम्”
‘जय माँ भारती’

Posted in सुभाषित - Subhasit

“स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरायुरस्तु॥
विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥
ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्र भक्ति सदास्तु॥
वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु..!!!
जीवेम शरदः शतम !
प्रब्रवाम शरदः शतम!
शृणुयाम शरदः शतम!
मोदाम शरदः शतम!
कुर्वन्नेव कर्माणि जीजीविशेम शतम समा..!!!!”
“आप सदैव आनंद कुशल से रहे तथा दीर्घायु प्राप्त करें |
विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें |
ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे |
आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे |
आप शतायुषी हो, सदैव अच्छा बोले,
सदैव अच्छा सुने, सदैव प्रसन्न रहे,
अपने अच्छे कर्मो को करते हुए सभी आकांक्षाओ को पूर्ण करे …!!

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आचार्य विनितजी

🌹भक्त सूरदास🌹

एक बार सूरदास जी कहीं जा रहे थे, चलते-चलते मार्ग में एक गढ्ढा आ गया और सूरदास जी उसमें गिर गए और जैसे ही गढ्ढे में गिरे तो किस को पुकारते ? अपने कान्हा को ही पुकारने लगे, भक्त जो ठहरे। एक भक्त अपने जीवन में मुसीबत के समय में प्रभु को ही पुकारता है, और पुकारने लगे की अरे मेरे प्यारे छोटे से कन्हैया आज तूने मुझे यहाँ भेज दिया और अब क्या तू यहाँ नहीं आएगा मुझे अकेला ही छोड़ देगा ?
सूरदास जी ने कान्हा को याद किया तो आज प्रभु भी उनकी पुकार सुने बिना नहीं रह पाए। और उसी समय एक बाल गोपाल के रूप में वहाँ प्रकट हो गए, और प्रभु के पांव की नन्ही-नन्ही सी पैजनियाँ जब छन-छन करती हुई सूरदास जी के पास आई तो सूरदास जी को समझते देर न लगी। कान्हा उनके समीप आये और बोले अरे बाबा नीचे क्या कर रहे हो, लो मेरा हाथ पकड़ो और जल्दी से ऊपर चले आओ। जैसे ही सूरदास जी ने इतनी प्यारी सी मिश्री सी घुली हुई वाणी सुनी तो जान गए की मेरा कान्हा आ गया, और बहुत प्रसन्न हो गए, तथा कहने लगे की अच्छा कान्हा, बाल गोपाल के रूप में आए हो। बाल गोपाल कहने लगे अरे कौन कान्हा ? किसका नाम लेते जा रहे हो, जल्दी से हाथ पकड़ो और ऊपर आ जाओ, ज्यादा बातें न बनाओ।
सूरदास जी मुस्कुरा पड़े और कहने लगे- सच में कान्हा तेरी बांसुरी के भीतर भी वो मधुरता नहीं, मानता हूँ की तेरी बांसुरी सारे संसार को नचा दिया करती है लेकिन कान्हा तेरे भक्तो का दुःख तुझे नचा दिया करता है। क्यों कान्हा सच है न ? तभी तो तू दौड़ा चला आया।
बाल गोपाल कहने लगे- अरे बहुत हुआ, पता नहीं क्या कान्हा-कन्हा किये जा रहा है। मैं तो एक साधारण सा बाल ग्वाल हूँ, मदद लेनी है तो लो नहीं तो मैं तो चला, फिर पड़े रहना इसी गढ्ढे में।
जैसे ही उन्होंने इतना कहा सूरदास जी ने झट से कान्हा का हाथ पकड़ लिया और कहा- कान्हा तेरा ये दिव्य स्पर्श, तेरा ये सान्निध्य, ये सुर अच्छी तरह जानता हूँ। मेरा दिल कह रहा है की तु मेरा श्याम ही है।
इतना सुन कर, जैसे ही आज चोरी पकडे जाने के डर से कान्हा भागने लगे तो सुरदास जी ने कह दिया-

बाँह छुडाये जात हो, निबल जान जो मोहे।
ह्रदय से जो जाओगे, सबल समझूंगा मैं तोहे।।

अर्थात- मुझे दुर्बल समझ यहाँ से तो भाग जाओगे लेकिन मेरे दिल की कैद से कभी नहीं निकल पाओगे।
ऐसे थे महान कृष्ण भक्त सूरदास जी।
🌷आचार्य विनीत जी🌷
“जय जय श्री राधे”