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सुभाषित सूक्ति ~ श्रीमत् परमहंस पाठशाला


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1. अलसस्य कुतो विद्या कुतो वित्तं कुतो यशः ।- आलसी मानव को विद्या, धन, यश कहाँ से प्राप्त हो ?
2. अलक्ष्मीराविशत्येनं शयानमलसं नरम् । -सदैव (सोते रहनेवाले) आलसी को दरिद्रता अपना निवास स्थान बनाती है ।
3. अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता । अच्छी तरह बोली गई वाणी अलग अलग प्रकार से मानव का कल्याण करती है ।
4. आलस्योपहता विद्या । आलस से विद्या नष्ट होती है ।
5.
6. आलस्यं मित्रवद् रिपुः । आलस मित्र जैसा सुखद लगता है लेकिन वह शत्रु है ।
7. आलस्यंहि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः । आलस मानव के शरीर में रहनेवाला बडा शत्रु है ।
8. आपदापदमनुधावति । आपत्ति के पीछे (दूसरी) आपत्ति आती है ।
9. आपदि मित्रपरीक्षा । आपत्ति में मित्र की परीक्षा होती है ।
10. आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुध्दयः । परिपक्व बुद्धिवाले मानव आपत्ति में भी मोहित नहीं होते ।
11. आपदामापतन्तीनां हितोऽप्यायाति विक्रियाम् । आपत्ति आनेवाली हो तब हितकारी लोगों में भी विकार खडे होते हैं ।
12. आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे । विद्वान के समागम में विपत्ति भी संपत्ति जैसी लगती है ।
13. शरीर कायः कस्य न वल्लभः । अपना शरीर किसको प्रिय नहीं है ?
14. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । शरीर धर्म पालन का पहला साधन है ।
15. शरीर त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।
16. शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले तीन स्तंभ हैं; आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग) ।
17. शरीर सर्वार्थसम्भवो देहः । देह सभी अर्थ की प्राप्र्ति का साधन है ।
18. श्रोतव्यं खलु वृध्दानामिति शास्त्रनिदर्शनम् । वृद्धों की बात सुननी चाहिए एसा शास्त्रों का कथन है ।
19. वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम् । जो धर्म की बात नहीं करते वे वृद्ध नहीं हैं ।
20. न तेनवृध्दो भवति येनाऽस्य पलितं शिरः । बाल श्वेत होने से हि मानव वृद्ध नहीं कहलाता ।
21. सत्यानृतं तु वाणिज्यम् । सच और जूठ एसे दो प्रकार के वाणिज्य हैं ।
22. वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः । वाणिज्य में लक्ष्मी निवास करती है ।
23. धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते । जिसका दान न किया जाय और जो भुगता न जाय उस धन का क्या उपयोग ?
24. यावत् वित्तोपार्जनसक्तः तावत् निजपरिवरो रक्तः । जब तक आदमी धन कमाने में समर्थ हो तब तक हि उसके परिवारवाले उस से प्रसन्न रहते हैं ।
25. धनं यस्य कुलं तस्य बुध्दिस्तस्य स पण्डितः । जिसके पास धन है वही कुलवान, बिद्धिमान और पंडित माना जाता है ।
26. मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः । जिसके पास धन नहीं है उसके मित्र भी अमित्र बनते है ।
27. सुखस्य मूलं धर्मः । ध्रर्मस्य मूलमर्थः । सुख का मूल धर्म है । धर्म का मूल अर्थ है ।
28. नाधनस्यास्त्ययं लोको न परस्य कथंचन । धनहीन व्यक्ति के लिए नतो इस लोक न तो परलोक सुखकारक होता है ।
29. अर्थस्यावयवावेत्तौ धर्मकामाविति श्रुतिः । वेद कहते हैं कि धर्म और काम यह अर्थ के अवयव है ।
30. यस्यार्थास्त्स्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । जिसके पास पैसा है उसी के मित्र और सगे संबंधी होते हैं ।
31. संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते । सम्मानित व्यक्ति को अपयश मरण से भी ज़ादा कष्टदायक लगता है ।
32. गुर्वपि विरहदुःखमाशाबन्ध साहयति। पुनः मिलने की आशा भारी विरह को झेलने की शक्ति देती है ।
33. जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति । आदमी वृद्ध होता है लेकिन उसकी जीने की और धन की आशा वृद्ध नहीं होती ।
34. आशवधिं को गतः । आशा का पार कौन कर पाया है ?
35. धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा । प्राणीयों को धन की, और जीने की बहुत आशा होती है ।
36. आशया ये कृता दासास्ते दासाः सर्वदेहिनाम् । आशा ने जिस को दास बनाया है वह सर्व लोगों को दास बनाता है ।
37. आशा बलवती ह्येषा न जहाति नरं कचित् । बलवान आशा मानव को कभी छोडकर नहीं जाती
38. आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधमः । जो मानव दूसरे को आशा देकर उसका भंग करता है वह दुनिया में अधम पुरुष है ।
39. अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते। शत्रु भी घर आये तो उसका उचित आतिथ्य करना चाहिए ।
40. सर्वस्याभ्यागतो गुरुः । अभ्यागत व्यक्ति सब के लिए श्रेष्ठ होती है ।
41. जीवितं याति साफ़ल्यं स्वमभ्यागतपूजया । अभ्यागतका पूजन करने से मानव का खुद का जीवन सफ़ल बनता है ।
42. देवादप्यधिकं पूज्यः सतामभ्यागतो जनः । अभ्यागत व्यक्ति सज्जन पुरुषों के लिए देव से भी अधिक पूज्य होती है ।
43. धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च अतिथिपूजनम् । अतिथि का पूजन (सत्कार) धनवर्धक,यशवर्धक, आयुवर्धक और स्वर्गदेनेवाला होता है ।
44. अतिथिदेवो भव । अतिथि देवता की तरह होता है ।
45. मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना । इन्सान इन्सान की मति भिन्न होती है ।
46. मतिरेव बलाद् गरीयसी । बल से अधिक बुद्धि हि श्रेष्ठ है ।
47. चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्यन्येन बुद्धिमान । बुद्धिमान एक पैर से चलता है और दूसरे पैर से खडा रहता है अर्थात सोचकर कदम बढाता है ।
48. बुद्धेर्फलमनाग्रहः । आग्रह न रखना यह बुद्धि का फ़ल है ।
49. बुद्धिर्यस्य बलं तस्य । जिसके पास बुद्धि है उसके पास बल है ।
50. विवेकानुसारेण हि बुध्दयो मधु निस्यन्दंते । बुद्धि विवेकानुसार मध (फ़ल) देती है ।
51. बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति । बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है ।
52. यतो बुद्धिः ततः शान्तिः । जहाँ बुद्धि है वहाँ शांति है ।
53. दैन्यान्मरणमुत्तमम् । दिन गिनकर जीने से मरना अच्छा ।
54. अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता । दरिद्रता सब से बडा दुःख है ।
55. दरिद्रयमेकं गुणराशिनाशि । एक दरिद्रता गुणों की राशि का नाश करती है ।
56. सर्वशून्या दरिद्रता ।दरिद्रता सर्वशून्य है याने कि दरिद्रता आये तब मानव का सर्वस्व चला जाता है ।
57. सर्वं शून्यं दरिद्रता । दरिद्र के लिए सब शून्य है ।
58. उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्राणां मनोरथाः ।दरिद्र मानव की इच्छाएँ मन में उठती हैं और मनमें हि विलीन हो जाती हैं (यानी कि पूरी नहीं होती) ।
59. मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः । जिसके पास धन न हो उसके मित्र भी अमित्र बन जाते हैं ।
60. धनहीनः स्वपत्न्यापि त्यज्यते किं पुनः परेः । धनहीन मानव का उसकी पत्नी भी त्याग करती है तो फ़िर दूसरों की क्या बात ?
61. मृतो दरिद्रः पुरुषः । दरिद्र मानव मुर्दे जैसा होता है ।
62. विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च । पतित और दरिद्र में कोई भेद नहीं है एसा मैं समझता हूँ ।
63. खलानां चरित्रे खला एव विज्ञाः । दुष्ट के चरित्र को दुष्ट ही समझता है ।
64. खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फ़लति साधुषु । दुर्जन पाप करता है और उसका फ़ल अच्छे लोगों को भुगतना पडता है ।
65. खलः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति । दुष्ट मानव दूसरे के राई जितने दुर्गुण को भी देखता है ।
66. प्रारम्भते न खलु विध्नभयेन नीचैः । विध्न-बाधा के भय से नीच मानव कार्य हि आरंभ नहीं करते ।
67. नीचाः कलहमिच्छन्ति । नीच मानव झगडे चाहता है ।
68. दुर्जनः परिहर्तव्यः विद्ययाऽलंकृतोऽपि सन् । विद्या से अलंकृत हो फ़िर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए ।
69. सर्पो दशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे । सर्प तो समय आने पर डँसता है पर दुर्जन तो कदम कदम पर काटता है ।
70. सर्वांगे दुर्जनो विषम् । दुर्जन के हर एक अंग में विष होता है ।
71. दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्र्वासकारणम् ! दुर्जन मानव का प्रियवादी होना यह उस पर विश्वास रखने का कारण नहीं है ।
72. मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कार्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् । दुष्ट लोगों के मन में एक, वाणी में दूसरा और कर्म तीसरा हि होता है ।
73. गुणी च गुणरागी च विरलः सरलो जनः । गुणवान हो, गुणानुरागी भी हो और सरल स्वभाव का भी हो एसा मानव मिलना दुर्लभ है ।
74. नमन्ति गुणिनो जनाः । गुणी लोग विनम्र होते हैं ।
75. गुणवज्जनसंसर्गात् याति स्वल्पोऽपि गौरवम् । गुणवान मानव के संसर्ग में आनेसे छोटा मानव भी गौरव प्राप्त करता है ।
76. गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः । गुणवान मानव गुण को समजता है, गुणहीन नहीं ।
77. गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति । मनुष्य के गुण का गुणीजन में ही आदर होता है ।
78. गुणं पृच्छ्स्व मा रूपम् । गुण को पूछो रुप को नहीं ।
79. गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः । गुण की ही सब जगह पूजा होती है, पितृवंश तो निरर्थक है ।
80. गुणैरुत्तुड्गतां याति नोच्चैरासनसंस्थितः । गुण की वजह से, नहीं कि उँचे आसन पर बैठकर आदमी उँचा बनता है ।
81. शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः । शरीर एक क्षण में नष्ट होता है, लेकिन गुण कल्पान्त तक स्थायी रहते है ।
82. वसन्ति हि प्रेम्णि गुणाः न वस्तुनि । गुण प्रेम में रहता है वस्तु में नहीं ।
83. ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः । ज्ञान बिना मुक्ति नहीं है ।
84. यस्यागमः केवलजीविकायै । तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति । जिसका शास्त्राध्ययन केवल जीविका के लिए है वह विद्वान को ज्ञान बेचनेवाला व्यापारी कहते है ।
85. ज्ञानमार्गे ह्यहंकारः परिधो दुरतिक्रमः । ज्ञान के मार्ग में अहंकार जबरदस्त रुकावट है ।
86. श्रध्दावान् लभते ज्ञानम् । श्रध्दावान मानव ज्ञान प्राप्त करता है ।
87. न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । इस दुनिया में ज्ञान से अधिक पवित्र कोई चीज़ नहीं है ।
88. तद्विध्दि प्रणीपातेन परेप्रश्र्नेन सेवया । विनम्रता, प्रश्र्न और सेवा करके उस ज्ञान को प्राप्त करो
89. श्रेयान् द्रव्यमयात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः परंतपः । हे परंतप ! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है ।
90. ज्ञाने तिष्ठन्न बिभेतीह मृत्योः । ज्ञान में अवस्थित होने से मानव मृत्यु से नहीं डरता ।
91. ज्ञानस्यान्तो न विद्यते । ज्ञान का अंत नहीं है ।
92. विषमां हि गतिं प्राप्य दैवं गर्हयते नरः । विषम गति को प्राप्त होते मानव अपने “नसीब” की निंदा करते हैं ।
93. ज्ञात्वापि दोषमेव करोति लोकः । दोष को जानकर भी लोग दोष हि करते हैं ।
94. सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं निरूपद्रवम् । सभी लोग अपने आप को अच्छे समझते हैं ।
95. गतानुगतिको लोकः न लोक़ः पारमार्थिकः । लोग देख-देखकर काम करते हैं, वास्तविकता की जाँच नहीं करते ।
96. को लोकमाराधयितुं समर्थः । सभी को कौन खुश कर सकता है ?
97. चिरनिरूपणीयो हि व्यक्तिस्वभावः । व्यक्ति का स्वभाव बहुत समय के बाद पहचाना जाता है ।
98. अनपेक्ष्य गुणागुणौ जनः स्वरूचिं निश्र्चयतोऽनुधावति। लोग गुण और अवगुण को ध्यान में लिए बिना अपनी रुचि से काम करतते हैं ।
99. किं पाण्डित्यं परिच्छेदः । पांडित्य क्या है ? भले-बुरे का विवेक ।
100. विद्वानेव विजानाति विद्वज्जन परिश्रमम् । विद्वान के परिश्रम को विद्वान ही जानता है ।
101. विद्वान सर्वत्र पूज्यते । विद्वान सब जगह सन्मान पाता है ।
102. यः क्रियावान् स पण्डितः । विद्वत्ता के साथ साथ जो क्रियावान है वही पंडित है । निरीहो नाऽश्नुते महत् । आलसी मानव महान वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता ।
103. सुखं दुःखान्तमालस्यम् । आलस एक एसा सुख है जिसका परिणाम दुःख है ।
104.
105. सकृत् जल्पन्ति पण्डिताः । पंडित कोई भी बात एक हि बार बोलता है ।
106. सारं गृहणन्ति पण्डिताः । पंडित (वस्तु नहीं पर) वस्तु का सार ग्रहण करते हैं ।
107. आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः । जो सब प्राणी को स्वयं की भाँति (आत्मवत्) देखता है वही पंडित है ।
108. विदुषां किमशोभनम् । पण्डित को कोई बात अशोभनीय नहीं होती ।
109. पण्डितो बन्धमोक्षवित् । जो बंधन और मोक्ष को समझता है वही पंडित है।
110. दिष्टे न व्यधते बुधः । अवश्यंभावी मुसीबत में पंडित व्यथित नहीं होते ।
111. मिन्नश्र्लिष्टा तु या प्रीतिः न सा स्नेहेन वर्धते । जो प्रीति एक बार टूटने के बाद जुड़ती है वह स्नेह से नहीं बढती ।
112.दुःखं त्यक्तुं बद्धमूलोऽनुरागः । बंधन का मूल – ऐसे प्रेम को छोडना बहुत कठिन है ।
113.किमशकनीयं प्रेम्णः । प्रेम को क्या अशक्य है ?
114.प्रेम पश्यति भयान्यपदेऽपि । प्रेम को भयरहित स्थान पर भी भय लगता है ।
115.बन्धनानि किल सन्ति बहूनि । प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत् ।।
116.बंधन कई प्रकार के होते हैं लेकिन प्रेम्ररुपी धागे से जो बंधन होता है वह तो कोई विशेष प्रकार का है ।
117.वसन्ति हि प्रेम्णि गुणाः न वस्तुषु । प्रेम में गुण निवास करते हैं, वस्तु में नहीं ।
118.न खलु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते । बाह्य उपाधि के ज़रीये प्रेम नहीं होता ।
119.अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपं मूकास्वादनवत् । गुंगे मानव के आस्वाद की तरह प्रेम का स्वरुप अनिर्वचनीय है ।
120. अकृत्रिमसुखं प्रेम । प्रेम अकृत्रिम सुख है ।
121.उद्योगसम्पन्नं समुपैति लक्ष्मीः । उद्योग-संपन्न मानव के पास लक्ष्मी आती है ।
122. पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यसि । पुरुषार्थ बिना दैव सिद्ध नहीं होता ।
123. यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः । यत्न करने के बावजुद यदि कार्य सिद्ध न हो तो उसमें मानव का क्या दोष ?
124. यत्नवान् सुखमेधते । प्रयत्नशील मानव सुख पाता है ।
125. धिग् जन्म यत्नरहितम् । प्रयत्नरहित जन्म को धिक्कार है ।
126. दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या । दैव का विचार किये बगैर अपनी शक्ति अनुसार प्रयत्न करो ।
127. पुरुषकारमनुवर्तते दैवम् । दैव पौरुषका अनुसरण करता है ।
128. कृतं मे दक्षिणे हस्ते नयो मे सव्य आहितः ।
129. सुपुत्रः कुल्दीपकः । उत्तम पुत्र कुल को दीप की भाँति प्रकाशित करता है ।
130. पुत्र्अगात्रस्य संस्पर्शः चन्दनादतिरिच्यते । पुत्रके शरीर का स्पर्श चंदन के स्पर्श से भी ज्यादा सुखकारक है ।
131.अपुत्रता मनुष्याणां श्रेयसे न कुपुत्रता । कुपुत्रता से अपुत्रता ज्यादा अच्छी है ।
132. ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः । जो पितृभक्त हो वही पुत्र है ।
133. कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान न धार्मिकः । जो विद्वान और धार्मिक न हो एसे पुत्र के उत्पन्न होने से क्या अर्थ ?
134. प्रीणाति यः सुचरितैः पितरौ स पुत्रः । जो अच्छे कृत्यों से मातापिता को खुश करता है वही पुत्र है ।
135. पुत्रस्नेहस्तु बलवान् । पुत्रस्नेह बलवान होता है ।
136. पुत्रस्पर्शात् सुखतरः स्पर्शो लोके न विद्यते । पुत्र के स्पर्श से ज़ादा सुखकारक अन्य कोई स्पर्श दुनिया में नहीं है ।
137. अनपत्यता एकपुत्रत्वं इत्याहुर्धर्मवादिनः । एक पुत्रवाला मानव अनपत्य अर्थात् निःसंतान समान होता है एसा धर्मवादि कहते हैं ।
138. अंगीकृतं सुकृतिनो न परित्यजन्ति । अच्छे लोग स्वीकार किये कार्य का त्याग नहीं करते ।
139. ब्रुवते हि फ़लेन साधवो न तु कण्ठेन निजोपयोगिताम् । अच्छे लोग अपनी उपयुक्तता,किये हुए कर्म से बताते हैं, नहीं कि बोलकर ।
140. संभवितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते । संभावित मानव को अकीर्ति मरण से ज़ादा दुःखदायक होती है ।
141.गतं न शोचन्ति महानुभावाः । सज्जन बीते हुए का शोक नहीं करते ।
142. सतां सद्भिः संगः कथमपि हि पुण्येन भवति । सज्जन का सज्जन से सहवास बडे पुण्य से प्राप्त होता है ।
143. गुणायन्ते दोषाः सुजनवदने । सज्जन के मुख में दोष भी गुण बनते हैं ।
144. प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति । उत्तम लोग संकट आये तो भी शुरु किया हुआ काम नहीं छोडते ।
145. निर्गुणेष्वपि सत्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । सज्जन गुणहीन प्राणी पर भी दया करते हैं ।
146. न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः । सज्जन न्याय के मार्ग में से एक कदम भी पीछे नहीं हटते ।
147. न हि कृतमुपकारं साधवो वोस्मरन्ति । अपने पर किये उपकार को सज्जन नहीं भूलते ।
148. न वै सुखं प्राप्नुवन्तीह भिन्नाः । कुसंग से मानवको सुख प्राप्त नहीं होता ।
149. लोभं हित्वा सुखी भवेत् । लोभ त्यागने से मानव सुखी बनता है ।
150. दुःखितस्य निशा कल्पः सुखितस्यैव च क्षणः । दुःखी मानव को रात्रि, ब्रह्मदेवके कल्प जितनी लंबी लगती है; लेकिन सुखी मानव को क्षण जितनी छोटी लगती है ।
151.न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् । किसी को सदैव दुःख नहीं मिलता या सदैव सुख भी लाभ नहीं होता ।
152. हान् भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानन्त्यमश्नुते । सतत उद्योग करनेवाला मानव हि महान बनता है और अक्षय सुख प्राप्त करता है ।
153. आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे सुखदुखे जनाः । सब को अपने कर्मानुसार सुख-दुख भुगतने पड़ते हैं ।
154. दुःखादुद्विजते जन्तुः सुखं सर्वाय रुच्यते । दुःख से मानव थक जाता है, सुख सबको भाता है ।
155. अनर्थाः संघचारिणः । मुश्किलें समुह में ही आती है ।
156. कुतो विद्यार्थिनः सुखम् । विद्यार्थीको सुख कहाँ ?
157. विद्यारत्नं महधनम् । विद्यारूपी रत्न सब से बडा धन है ।
158. विद्या ददाति विनयम् । विद्या से मानव विनयी बनता है ।
159. सद्विद्या यदि का चिन्ता वराकोदरपूरणे । यदि सद्विद्या पास हो तो बेचारे उदर के भरण-पोषण की चिंता कहाँ से हो ?
160. विद्या रूपं कुरूपाणाम् । कुरूप मानव के लिए विद्या हि रूप है ।
161.विद्या मित्रं प्रवासेषु । प्रवास में विद्या मित्र की कमी पूरी करती है ।
162. किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या । कल्पलता की तरह विद्या कौन सा काम नहीं सिध्ध कर देती ?
163. सा विद्या या विमुक्तये । जो मनुष्य को मुक्ति दिलाती है वही विद्या है ।
164. विद्या योगेन रक्ष्यते । विद्या का रक्षण अभ्यास से होता है ।
165. अशुश्रूषा त्वरा श्र्लाधा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः । गुरुकी शुश्रूषा न करना, पढ़ने में शीघ्र न होना और खुद की प्रशंसा करना – ये तीन विद्या के शत्रु है ।
166. ब्राह्मणस्य अश्रुतं मलम् । श्रुति का ज्ञान न होना ब्राह्मण का दोष है ।
167. मन्त्रज्येष्ठा द्विजातयः । वेदमंत्र के ज्ञान की वजह से ब्राह्मण श्रेष्ठ है ।
168. यस्यागनः केवलजीविकायै । तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति ।
169. जो विद्वान का ज्ञान केवल उपजीविका के लिए हो उसे ज्ञान बेचनेवाला व्यापारी कहते है ।
170. गुरुशुश्रूषया ज्ञानम् । गुरु की शुश्रूषा करनेसे ज्ञान प्राप्त होता है ।
171.आज्ञा गुरुणां ह्यविचारणीया । गुरु की आज्ञा अविचारणीय होती है ।
172. ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत । स्नेहपात्र शिष्य को गुरु गोपनीय ज्ञान भी बताते हैं ।
173. तीर्थानां गुरवस्तीर्थम् । गुरु तीर्थों का भी तीर्थ होता है ।
174. आचार्य देवो भव । आचार्य को देव समान होता है ।
175 आचार्यवान् पुरुषो वेद । जिसका आचार्य श्रेष्ठ है वह मानव हि ज्ञान प्राप्त करता है ।
आचार्यः कस्माद् , आचारं ग्राह्यति । आचार्य को आचार्य किस लिए कहा जाता है ? क्यों कि वे अपने आचरण द्वारा आचार का शिक्षण देते हैं ।
176. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता रमते हैं।
175. शठे शाठ्यं समाचरेत् । दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना उचित है।
176. आचार्य देवो भव। आचार्य को देवता मानो।
177. सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम् .। सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ धन है।
178. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी- जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है ।
179. सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ते। सभी गुण धन का आश्रय लेते हैं।
180. संघे शक्तिः कलौयुगे। कलियुग में संघ में ही शक्ति होती है।
181. शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्। शरीर को स्वस्थ रखो क्यों कि यही धर्म का साधन है।
182. परोपकाराय सतां विभूतयः। सज्जनों के सभी कार्य परोपकार के लिये ही होते हैं।
183. उद्योगिनं पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्मीः। लक्ष्मी सिंह के समान उद्योगी पुरुष के पास जाती है।
184. सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्य की ही जीत होती है । झूट की नहीं।
185. विद्या विहीनः पशुः। विद्याहीन व्यक्ति पशु है।
186. आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः। आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
187. पुराणमित्येव न साधु सर्वम्। सब पुराना ही अच्छा नहीं होता।
188. बुभूक्षितः किं न करोति पापम्। भूखा व्यक्ति कौन सा पाप नहीं करता।
189. अतिपरिचयादवज्ञा । ( अधिक परिचय से अवज्ञा होने लगती है।)
190. अतिलोभो विनाशाय । ( अधिक लालच विनाश को प्राप्त कराता है। )
191.अतितृष्णा न कर्तव्या
192. अति सर्वत्र वर्जयेत् । ( अति करने से सर्वत्र बचना चाहिए। )
193. अधिकस्याधिकं फलम् । (अधिक का फल भी अधिक होता है। )
194. अनतिक्रमणीया हि नियतिः
195. अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः । जीवन में ) समय कम है और विघ्न बहुत से हैं । )
196. अलभ्यो लाभः
197. अव्यापारेषु व्यापारः ।
198. अहिंसा परमो धर्मः ।
199. अभद्रं भद्रं वा विधिलिखितमुन्मूलयति कः ।
200. अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः ।( धन ही इस संसार में आदमी का बन्धु है। )
201. आकृतिर्बकस्य दृष्टिस्तु काकस्य ।( बगुले की आकृति और कौए की दृष्टि )
202. आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः । ( कष्टो के आश्रय धन को धिक्कार है, जिसके आने से भी धुख मिलता है और जाने से भी )
203. इक्षुः मधुरोऽपि समूलं न भक्ष्यः ।
204. इतः कूपः ततस्तटी । ( इधर कुँवा, उधर खाई )
205. इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः। ( इधर जाने से भ्रष्ट होंगे और उधर जाने से नष्ट )
206. ईश्वरेच्छा बलीयसी ।( ईश्वर की इच्छा बलवान होती है। )
207. उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्राणां मनोरथाः । ( दरिद्र लोगों के मनोरथ (इच्छाएँ) उत्पन्न होती रहती हैं और नष्ट होती रहती हैं। )
208. उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः । ( मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं। )
209. कण्टकेनैव कण्टकमुद्धरेत् । ( कांटे से कांटा निकालना चाहिये। )
210. कर्तव्यो महदाश्रयः ।
211.कवयः किं न पश्यन्ति ? ( कवि क्या नहीं देख सकते? अर्थात सब कुछ देख सकते हैं। )
212. काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । ( बुद्धिमान लोगों का समय काव्यशास्त्र के विनोद (अध्ययन) में बीतता है।
213. कालाय तस्मै नमः ।( उस समय को नमस्कार है। )
214. किमिव हि दुष्करमकरुणानाम् । ( जिनको दया नहीं आती, उनके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है। )
215. किं मिष्टमन्नं खरसूकराणाम् \?
216. क्षमया किं न सिद्ध्यति । (क्षमा करने से क्या सिद्ध नहीं होता? )
217. क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते ।
218. गतं न शोच्यम् । ( जोबीत गया उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। )
219. गतानुगतिको लोकः न कश्चित् पारमार्थिकः । ( संसार लकीर का फकीर है। कोई भी परम अर्थ की खोज में नहीं लगना चाहता। )
220. गहना कर्मणो गतिः । ( कर्म की गति गहन है। )
221. गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते । ( सर्वत्र गुणों की पूजा होती है। )
222. चक्रवत्परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ।( दु:ख और सुख क्रम से (चक्रवत) आते-जाते रहते हैं।
223. जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।( माता और मातृभूमि दोनो स्वर्ग से भी महान हैं )
224. जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।( बूंद-बूंद से घडा भर जाता है। )
225. जीवो जीवस्य जीवनम् ।( जीव ही जीव का जीवन है। )
226. दुर्लभं भारते जन्म मानुष्यं तत्र दुर्लभम् । पहले तो भारत में जन्म लेना दुर्लभ है; उससे भी दुर्लभ वहाँ मनुष्य रूप में जन्म लेना है )

227.दूरतः पर्वताः रम्याः । दूर से पर्वत रम्य दिखते हैं। दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

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