Posted in PM Narendra Modi

केदारनाथ मंदिर से पहले एक स्थान है गरुण चट्टी। केदारनाथ मंदिर से इसकी दूरी सम्भवतः 2 या 2.5 किमी है। 2013 की त्रासदी के बाद हुए नवनिर्माण के पश्चात अब यह मार्ग काफी सुविधजनक हो गया है और सम्भवतः दूरी भी कुछ कम हो गयी हो। लेकिन आज से 35-40 साल पहले गरुण चट्टी से केदारनाथ मंदिर तक का पैदल मार्ग बहुत कठिन हुआ करता था। तीर्थयात्रियों को वह दूरी को तय करने में काफी कष्ट उठाने पड़ते थे। इसी दीपावली को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केदारनाथ धाम पहुंचे तो लगभग सभी न्यूजचैनलों की टीम वहां मौजूद थी। उन्हीं में से एक टीम (शायद ABP की) ने वहां उपस्थित एक ऐसे पुजारी को खोज लिया था जो पिछले कई दशकों से मूलतः गरुण चट्टी में ही रह रहे हैं। न्यूजचैनल की उस टीम से अपनी बातचीत में उन पुजारी ने बताया कि 1980 के पहले से 1990 तक नरेन्द्र मोदी प्रतिवर्ष केदारनाथ आते थे और गरुण चट्टी स्थित एक धार्मिक संस्था के भवन में कमरा लेकर लगभग डेढ़ माह तक रहते थे। संयोग से वो जिस कमरे में रहते थे वो कमरा मेरे कमरे के बगल में ही था। उन्हीं पुजारी ने बताया था कि उन डेढ़ महीने की अवधि के दौरान मोदी की दिनचर्या यह होती थी कि वह रोजाना भगवान केदारनाथ जी के दर्शन पूजन करने मन्दिर आते थे। और मन्दिर से वापस आने के पश्चात हमलोगों के साथ उनकी बातचीत/चर्चा का केंद्र केवल धर्म एवं अध्यात्म ही होता था। उन 10-12 वर्षों की अवधि में गरुण चट्टी में रहते हुए उनको कभी राजनीति पर बात करते हुए मैंने या किसी ने कभी नहीं देखा सुना था। सच तो यह है कि यह है कि उस दौरान हमने स्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि वो कभी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनेंगे।
उन पुजारी की बात सुनकर मैं सोच रहा था कि केदारनाथ धाम जाने वाले तीर्थयात्रियों को जिस सीधी ऊंची चढ़ाई वाले रास्ते पर केवल एकबार चलने में हुई कठिनाई बरसों तक याद रहती थी। उस रास्ते पर डेढ़ महीने तक प्रतिदिन चलकर भगवान केदारनाथ के दर्शन पूजन करने जाने वाले व्यक्ति की धार्मिक आस्था, श्रध्दा, हिंदुत्व के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर आजकल कैसे कैसे लोग उंगली उठा रहे हैं.? मोदी के हिन्दू विरोधी होने का सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं।
हिन्दू धर्म के इन न्यूजचैनली और फेसबुकिया ठेकेदारों की उन उठी हुई उंगलियों को देखकर, उनकी बातों को सुनकर मुझे एक कविता की यह पंक्तियां याद आ जाती है…
एड़ियां उठाये पंजों पर खड़े हैं,
बौने यह समझते हैं कि वो सबसे बड़े हैं।

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पुर्तगाल में वास्को डिगामा का राजा ने असाधारण सम्मान किया और उसके सम्मान में एक भोज दिया। डिगामा से ईर्ष्या कुंठित लोगों ने भुनभुनाना शुरू कर दिया।

“इन्होंने कौन सा तीर मारा। जहाज़ में बैठे और संयोग से पहुँच गए इंडिया।एसा तो हम भी कर सकते थे।”

वास्को डिगामा मुस्कुराया और एक उबले अंडे को उठाकर बोला ,”आप सज्जनों में से कोई इसे सीधा खड़ा कर सकता है?”

कई लोगों ने कोशिश की पर अंडा ना तो सीधा खड़ा होना था, ना हुआ।

अब लोगों ने चिढ़कर कहा,”तुम ही करके दिखाओ।”

वास्को डिगामा फिर मुस्कुराया, अंडा हाथ में लिया, उसके तल को थोड़ा दबाकर उसे चपटा किया और अंडे को सीधा खड़ा कर दिया।

कुंठित लोग बौखला गये, “ये तो हम भी कर सकते थे।”

अब बारी वास्कोडिगामा की थी, “करसकतेथेपरकियातोनहीं!”


भारत में भी कांग्रेसी, वामपंथी, सैक्यूलर परेशान हैं।

पहले प्रयागराज में दलित सफ़ाईकर्मी महिला-पुरुषों के पैरप्रक्षालन।

अब केदारनाथ की गुफा में ध्यान।

बेचारे बिलबिला रहे हैं।

“ये कैमरों के सामने की नौटंकी है।ये तो हम भी कर सकते थे।”

और दूर अतीत से वास्कोडिगामा मुस्कुरा रहा है, “ पर किया तो नहीं?”

और मोदी??

मोदी मंद मंद मुस्कुरा कर चिढ़ा रहे हैं, “तुम रहने दो बेटा, तुमसे ना हो पायेगा।”

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था लेकिन पुत्र नहीं हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग लेने को कहा***

सुझाव मिला कि किसी बच्चे की बलि दे दी जाए तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी***

राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो अपना बच्चा देगा,उसे बहुत सारा धन दिया जाएगा***

एक परिवार में कई बच्चें थे,गरीबी भी थी।एक ऐसा बच्चा भी था,जो ईश्वर पर आस्था रखता था तथा सन्तों के सत्संग में अधिक समय देता था***

परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाए क्योंकि ये कुछ काम भी नहीं करता है,हमारे किसी काम का भी नहीं है***

*इसे देने पर राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा
ऐसा ही किया गया। बच्चा राजा को दे दिया गया***

राजा के तांत्रिकों द्वारा बच्चे की बलि की तैयारी हो गई***

राजा को भी बुलाया गया। बच्चे से पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है ?***

बच्चे ने कहा कि ठीक है ! मेरे लिए रेत मँगा दिया जाए रेत आ गया***

बच्चे ने रेत से चार ढेर बनाए। एक-एक करके तीन रेत के ढेरों को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गया उसने कहा कि अब जो करना है करें***

यह सब देखकर तांत्रिक डर गए उन्होंने पूछा कि ये तुमने क्या किया है?

पहले यह बताओ। राजा ने भी पूछा तो बच्चे ने कहा कि
पहली ढेरी मेरे माता पिता की है मेरी रक्षा करना उनका कर्त्तव्य था परंतु उन्होंने पैसे के लिए मुझे बेच दिया***

*इसलिए मैंने ये ढेरी तोड़ी दूसरी मेरे सगे-सम्बन्धियों की थी। उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नहीं समझाया***

तीसरी आपकी है राजा क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना राजा का ही धर्म होता है परन्तु राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढेरी भी मैंने तोड़ दी***

अब सिर्फ अपने सद् गुरु और ईश्वर पर ही मुझे भरोसा है इसलिए यह एक ढेरी मैंने छोड़ दी है***

राजा ने सोचा कि पता नहीं बच्चे की बलि देने के पश्चात भी पुत्र प्राप्त हो या न हो,तो क्यों न इस बच्चे को ही अपना पुत्र बना ले***

इतना समझदार और ईश्वर-भक्त बच्चा है।इससे अच्छा बच्चा कहाँ मिलेगा ?***

राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया***

जो ईश्वर और सद् गुरु पर विश्वास रखते हैं,उनका बाल भी बाँका नहीं होता है

***हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते हैं,उनका कहीं से किसी प्रकार का कोई अहित नहीं होता है…🙏

जय जय श्री राधे