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भिखारी

वह बहुत दिनों से बेरोजगार था, उसे एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ो सी लग रही थी, बस इसी उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए. आज उसका एक इंटरव्यू था, पर था दूसरे शहर में और जाने के लिए उसकी जेब में सिर्फ दस रूपये थे. उसे कम से कम पांच सौ रुपयों की जरूरत थी. अपने एकलौते इन्टरव्यू वाले कपड़े रात में धो, पड़ोसी की प्रेस मांग के, तैयार कर पहन वह अपनी योग्ताओं की मोटी फाइल बगल में दबा दो बिस्कुट खा के निकला, लिफ्ट ले, पैदल जैसे तैसे चिलचिलाती धूप में पसीने से तरबतर वह बस स्टैंड पहुंचा कि शायद कोई पहचान वाला मिल जाए. परन्तु काफी देर खड़े रहने के बाद भी कोई न दिखा.
उसके मन में घबराहट और बहुत मायूसी थी,
क्या करूंगा…? अब कैसे पहुंचूगा..?
दुःखी मन से वह पास के मंदिर पर जा पहुंचा, दर्शन कर सीढ़ियों पर बैठ गया. उसके पास में ही एक फकीर बैठा था, फकीर के कटोरे में उसकी जेब और बैंक एकाउंट से भी ज्यादा पैसे पड़े थे, उसकी नजरे और हालत समझ के वह फकीर बोला
“कुछ मदद कर सकता हूं क्या..?”

वह मुस्कुराता बोला कि, “आप क्या मदद करोगे भाई…!! ”

“चाहो तो मेरे पूरे पैसे रख लो”, मुस्कुराता हुआ वह फकीर बोला.

वह तो चौंक गया कि फकीर को कैसे पता चला उसकी जरूरत का, फिर उसने फकीर से कहा “क्यों मदद करना चाहते हो भाई…?”

“शायद आप को जरूरत है” फकीर गंभीरता से बोला.

“हां है तो पर तुम्हारा क्या तुम तो दिन भर मांग के कमाते हो.” उसने फकीर का ही पक्ष रखते हुए बोला.
इस पर फकीर हँसते हुए बोला “मैं नहीं मांगता साहब लोग डाल जाते है मेरे कटोरे में पुण्य कमाने के लिए, मैं तो फकीर हूं, मुझे इनका कोई मोह नहीं, मुझे सिर्फ भूख लगती है, वो भी एक टाईम और कुछ दवाईंया बस, मैं तो खुद ये सारे पैसे मंदिर की पेटी में डाल देता हूं.”
फकीर बहुत सहज था, यह कहते कहते.

वह हैरान था उसने फकीर से पूछ ही लिया “फिर यहां बैठते क्यों हो.. .?”

“आप जैसों की मदद करने” फिर फकीर यह कह कर मंद मंद मुस्कुरा रहा था.
वह तो फकीर का मुंह ही देखता रह गया, फकीर ने पांच सौ रुपये उसके हाथ पर रख दिए और बोला कि
“जब हो तो लौटा देना.”
वह शुक्रिया जताता, वहां से अपने गंतव्य तक पहुंचा, उसका इंटरव्यू हुआ, और सलैक्शन भी.
वह खुशी खुशी वापस आया सोचा उस फकीर को धन्यवाद दूं,
मंदिर पहुंचा तो देखा बाहर की सीढ़़ियों पर भीड़ जमा थी, वह घुस कर अंदर पहुंचा और देखा कि वहां तो वही फकीर मरा हुआ पड़ा था,
उसके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी, उसने दूसरों से पूछा कि यह सब कैसे हुआ…?? पता चला “वो किसी बीमारी से परेशान था, सिर्फ दवाईयों पर जिन्दा था आज उसके पास न दवाईंया नहीं थी और न उन्हैं खरीदने या अस्पताल जाने के पैसे.”
वह आवाक सा उस मृत फकीर को देख रहा था.
इतने में भीड़ में से कोई बोला, “अच्छा हुआ मर गया, ये भिखारी भी साले बोझ होते है, कोई काम के नहीं”

OSHO

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🔴विक्रम-बेताल” – ओशो

बेताल पच्चीसी से एक कहानी है , पहली कहानी ,

“पहले विक्रम बेताल का थोडा परिचय दे दू , विक्रमादित्य राजा एक तांत्रिक फ़कीर के कहने पर एक प्रेतात्मा बेताल को मरघट से पकड़ने के लिए रात को जाता है , लेकिन उस प्रेतात्मा को लाने की एक शर्त थी ध्यान रखना , सजग रहना , और शांत रहना , जरा सा भी बोले तो प्रेतात्मा उड़कर दोबारा पेड़ पर लटक जायेगी |

विक्रमादित्य साहस से पेड़ पर चढ़कर उस मुर्दे को काटकर गिराता है और कंधे पर रखता है , मुर्दे ने कहा कि सुनो राह लम्बी है , रात अँधेरी है , और तुम्हारा बोझ हल्का करने के लिए एक कहानी सुनाता हूँ ऐसी पहली कहानी |

उसने कहा कि तीन युवक थे ब्राह्मण

यह विक्रमादित्य सुनना भी नहीं चाहता था , पड़ना भी नहीं चाहता था चक्कर में | लेकिन नहीं भी नहीं कह सकता था क्योंकि नहीं कहते ही लाश उड़ जायेगी और फिर वृक्ष पर चढना पड़ेगा |
फिर मुरदा कहानी कहने लगा
उसने कहा , एक गुरु के आश्रम में तीन युवक थे | तीनो ही लड़की के प्रेम में पड गए ..|

कहानी में रस आने लगा | प्रेम की कहानी में किसे रस नहीं आता ? विक्रमादित्य थोडा बेहोश होने लगा | सम्हाल रहा है , लेकिन उत्सुकता जग गयी , जिज्ञासा कि फिर क्या हुआ ?

तीनो एक से थे , योग्य थे , अप्रतिम थे , प्रतिभाशाली थे | गुरु मुश्किल में था कि किसको चुने | युवती भी मुश्किल में थी कि किस को चुने | कोई उपाय न देखकर युवती ने आत्महत्या कर ली | कोई रास्ता ही न मिला | और इन तीन के बीच में वह बहुत द्वंद्व में घिर गयी | और तीनो चुनने योग्य थे और मुश्किल था किसको छोड़े | और जानती थी जिसको छोड़ेगी , वही जीवन भर पछतावे का कारण रहेगा | दो को छोड़ना ही पड़ेगा | तीन से तो विवाह हो नहीं सकता |

बड़ी अड़चन थी हल कोई न था | हल न देखकर आत्महत्या कर ली | लाश जलाई गयी |

एक युवक उन तीनो में से मरघट पर ही उसी राख के पास रहने लगा | उसी राख की धूनी रमा लेता और वहीँ बैठा रहता |

दूसरा युवक इतने दुःख से भर गया कि यात्रा पर निकल गया , अपना दुःख भुलाने को | घूमता रहेगा संसार में | अब बसना नहीं है ; क्योंकि जिसके साथ बसना था वही न रही | अब घर नहीं बसाना है | वह परिव्राजक हो गया , एक फ़कीर , भटकता हुआ आवारा |

और तीसरा युवक किसी आशा से भरा हुआ , क्योंकि उसने सुन रखा था ऐसे मन्त्र है कि अस्थिपंजर को भी पुनर्जीवित कर दे , तो उसने सारी अस्थिय इकठी कर ली | रोज उनको गंगा ले जाता , धोकर साफ़ करता | फिर ले आकर रख लेता | उनकी रक्षा करता कि कभी कोई मन्त्र का जान्ने वाला मिल जाए |

वर्षो बीत गए | जो घूमने निकल गया था यात्रा पर , उसे एक आदमी मिल गया था , जो मन्त्र जानता था | उसने मन्त्र सीख लिया | मन्त्र का शास्त्र ले लिया | भागा | अब डरा वह घबडाया , कि पता नहीं अस्थि[पंजर बचे भी होगे कि नहीं | क्योंकि वे कभी के फेंक दिए गए होगे | लेकिन आकर आश्वस्त हुआ | अस्थिपंजर बचाए गए थे | उनको संजोकर रखा था उसके साथी ने |

उसने मन्त्र पढ़ा युवती पुन्रुजीवित हो गयी | पहले से भी ज्यादा सुन्दर , मन्त्र सिक्त | उसकी देह स्वर्ण जैसी ताज़ी , जैसे कमल का फूल अभी अभी खिला हो | फिर कलह शुरू हो गयी कि अब वह किसकी ?

अब तक सम्राट विक्रम भी भूल चूका था कि वह क्या कर रहा है यह सुनने में लग गया , जैसा तुम सुनने में लग गए हो |

उस मुरदे ने पूछा कि सम्राट गौर से सुनो | क्योंकि फिर झगडा खड़ा हो गया | अब सवाल यह है कि इन तीन में से युवती किसकी ? तुम्हारा क्या ख्याल है ? और अगर तुम्हारे भीतर उत्तर आ जाए और तुमने उत्तर न दिया , तो तुम इसी क्षण मर जाओगे | हाँ उत्तर न आये तो कोई हर्जा नहीं |

बड़ा मुश्किल है उत्तर का न आना | आदमी का इतना वश थोड़े ही है अपने मन पर | कोई बुद्ध पुरुष हो , तो न आये | ठीक है प्रशन सुन लिया ; उत्तर न आया कोई हर्जा नहीं |

विक्रमादित्य बड़ी मुश्किल में पड़ा | उत्तर तो आ रहा है | बुद्धिमान आदमी था , तर्कनिष्ठ था , समझदार था , शास्त्र पढ़े थे , तर्क साफ़ था | अब वह बड़ी मुश्किल में पड गया | मुरदे ने कहा कि बोल अगर उत्तर आ रहा है , तो बोल अन्यथा इसी वक्त मर जाएगा |

तो उसने कहा उत्तर तो आ रहा है , इसीलिए बोलना ही पड़ेगा | उत्तर मुझे यह आ रहा है कि जिसने मन्त्र पढ़कर युवती को जगाया वह पिता तुल्य है उसने जन्म दिया | इसलिए वह विवाह नहीं कर सकता | वह तो कट गया |

जिसने अस्थिया सम्हाली और रोज गंगा में स्नान कराया , वह पुत्रतुल्य है , कर्तव्य , सेवा , उससे भी शादी नहीं हो सकती |
प्रेमी तो वही है , जो धूनी रमाये , राख लपेटे , भूखा प्यासा मरघट पर ही बैठा रहा , न कहीं गया , न कहीं आया | विवाह तो उसी से ….|
बेताल उड़ गया क्योंकि विक्रम बोल गया |

ऐसे ही पच्चीस कहनिया चलती है |”

जीवन में तुम चूकते हो , जब भी मूर्छा पकड़ लेती है | जब भी तुम होश खो बैठते हो , जब भी तुम जागे हुए नहीं होते जीवन का सूत्र हाथ से छूट जाता है | विचार की तरंग आयी और तुम वर्तमान से च्युत |

वह विक्रमादित्य हार गया ऐसे ही पच्चीस कहानी चलती है पूरी रात | और हर बार वह चूकता जाता है | पच्चीसवी कहानी पर सम्हाल पाटा है | हर कहानी में ज्यादा हिम्मत बढती है , साहस बढ़ता है ; ज्यादा देर तक रोकता है ; ज्यादा देर तक विचार की तरंगे अनुकंपित नहीं करती | पच्चीसवी कहानी बार बात रूकती है और उसमे विक्रम बिना विचार की तरंगो के गुजर जाता है |

जीवन एक तैयारी है | यहाँ बहुत कुछ तुम्हे उलझा देने को | बाजार है पूरा , मीना बाजार ! वहां सब तरफ बुलावा है – उत्सुकता को जिज्ञासा को , मनोरंजन को , | प्रशन है , विचार की सुविधा है , सोच विचार का उपाय है , चिंता का कारण है सब तरह के उलझाव है |

अगर तुम सारे संसार से ऐसे गुजर जाओ , जैसे विक्रमादित्य उस मरघट से बिना बोले , चुप और जागा हुआ पच्चीसवी कहानी पर गुजर सका , तो ही तुम वर्तमान क्षण की अनुभूति को उपलब्ध होओगे | अन्यथा तुमने वर्तमान जाना ही नहीं है |

– ओशो♣️

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ईश्वर का शुक्रिया…. ☺👏🏼

एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था. उसमें तरह-तरह के फल होते थे और उस बगीचा की सारी देखरेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था. वह किसान हर दिन बगीचे के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था

एक दिन किसान ने पेड़ों पे देखा नारियल अमरुद, बेर, और अंगूर पक कर तैयार हो रहे हैं, किसान सोचने लगा आज कौन सा फल महाराज को अर्पित करूँ, फिर उसे लगा अँगूर करने चाहिये क्योंकि वो तैयार हैं इसलिये उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा!

किसान राजमहल में पहुचा, राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और नाराज भी लग रहा था किसान रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोड़े दूर बेठ गया, अब राजा उसी खयालों-खयालों में टोकरी में से अंगूर उठाता एक खाता और एक खींच कर किसान के माथे पे निशाना साधकर फेंक देता।

राजा का अंगूर जब भी किसान के माथे या शरीर पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’

राजा फिर और जोर सेअंगूर फेकता था किसान फिर वही कहता था ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’

थोड़ी देर बाद राजा को एहसास हुआ की वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है वो सम्भल कर बैठा , उसने किसान से कहा, मै तुझे बार-बार अंगूर मार रहा हूँ , और ये अंगूर तुंम्हे लग भी रहे हैं, फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’

किसान ने नम्रता से बोला, महाराज, बागान में आज नारियल, बेर और अमरुद भी तैयार थे पर मुझे भान हुआ क्यों न आज आपके लिये अंगूर् ले चलूं लाने को मैं अमरुद और बेर भी ला सकता था पर मैं अंगूर लाया।

यदि अंगूर की जगह नारियल, बेर या बड़े बड़े अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ‘ ईश्वर बड़ा दयालु है ….👏🏼’

सारांश…. ☝🏼☺
इसी प्रकार ईश्वर भी हमारी कई मुसीबतों को बहुत हल्का कर के हमें उबार लेता है पर ये तो हम ही नाशुकरे हैं जो शुकर न करते हुए उसे ही गुनहगार ठहरा देते हैं, मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ , मेरा क्या कसूर,

आज जो भी फसल हम काट रहे हैं ये दरअसल हमारी ही बोई हुई है, बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होये।। और बबुल से अगर आम न मिला तो गुनहगार भी हम नहीं हैं , इसका भी दोष हम किसी और पर मढेंगे ,, कोई और न मिला तो ईश्वर तो है ही ।

जय श्रीराधे….🙌🏼🌸💐

राजेश यादव

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Radhe Radhe G
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*एक राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था लेकिन पुत्र नहीं हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग लेने को कहा***

*सुझाव मिला कि किसी बच्चे की बलि दे दी जाए तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी***

*राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो अपना बच्चा देगा,उसे बहुत सारा धन दिया जाएगा***

*एक परिवार में कई बच्चें थे,गरीबी भी थी।एक ऐसा बच्चा भी था,जो ईश्वर पर आस्था रखता था तथा सन्तों के सत्संग में अधिक समय देता था***

*परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाए क्योंकि ये कुछ काम भी नहीं करता है,हमारे किसी काम का भी नहीं है***

इसे देने पर राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा
*ऐसा ही किया गया। बच्चा राजा को दे दिया गया***

*राजा के तांत्रिकों द्वारा बच्चे की बलि की तैयारी हो गई***

*राजा को भी बुलाया गया। बच्चे से पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है ?***

*बच्चे ने कहा कि ठीक है ! मेरे लिए रेत मँगा दिया जाए रेत आ गया***

*बच्चे ने रेत से चार ढेर बनाए। एक-एक करके तीन रेत के ढेरों को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गया उसने कहा कि अब जो करना है करें***

यह सब देखकर तांत्रिक डर गए उन्होंने पूछा कि ये तुमने क्या किया है?

पहले यह बताओ। राजा ने भी पूछा तो बच्चे ने कहा कि
पहली ढेरी मेरे माता पिता की है मेरी रक्षा करना उनका कर्त्तव्य था परंतु उन्होंने पैसे के लिए मुझे बेच दिया

*इसलिए मैंने ये ढेरी तोड़ी दूसरी मेरे सगे-सम्बन्धियों की थी। उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नहीं समझाया***

*तीसरी आपकी है राजा क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना राजा का ही धर्म होता है परन्तु राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढेरी भी मैंने तोड़ दी***

*अब सिर्फ अपने सद् गुरु और ईश्वर पर ही मुझे भरोसा है इसलिए यह एक ढेरी मैंने छोड़ दी है***

*राजा ने सोचा कि पता नहीं बच्चे की बलि देने के पश्चात भी पुत्र प्राप्त हो या न हो,तो क्यों न इस बच्चे को ही अपना पुत्र बना ले***

*इतना समझदार और ईश्वर-भक्त बच्चा है।इससे अच्छा बच्चा कहाँ मिलेगा ?***

*राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया***

**जो ईश्वर और सद् गुरु पर विश्वास रखते हैं,उनका बाल भी बाँका नहीं होता है***

हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते हैं,उनका कहीं से किसी प्रकार का कोई अहित नहीं होता है.
सभी रिस्ते झूठे है एक सहारा प्रभू का ही सत्य है
Radhe Radhe G

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अरुण पांडे

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सत्य घटना–ईश्वर है, जरूर है.
यह सच्ची कहानी या सत्य घटना मैंने अपने दादा जी स्वर्गीय पं. रामलाल शुक्ला के मुँह से सुनी थी। उन्होंने स्वयं यह घटना अपने पिता (यानी मेरे परबाबा या प्रपितामह) स्व. पं. जगेश्वर शुक्ला से सुनी थी। घटना मेरे पूर्वजों के ग्राम तुलसी, जिला जाँजगीर, छत्तीसगढ़, भारत की है। सन् 1880 के अक्टूबर-नवम्बर (दीपावाली के आसपास) की बात है। तब ग्राम तुलसी जिला बिलासपुर में आता था।

बनारस की एक रामलीला मण्डली लीला खेलने तुलसी आई हुई थी। लीला में 20-22 कलाकार थे जो मेरे परबाबा जगेश्वर शुक्ला के घर पर ही ठहरे हुए थे, एक बड़े हालनुमा कमरे में। वहीं वे लोग अपना भोजन बनाते-खाते और रिहर्सल वगैरह करते थे। लीला-मण्डली के स्वामी और निर्देशक थे 45-46 वर्षीय पं. कृपाराम दुबे। मण्डली में एक 35-36 वर्षीय फौजदार शर्मा नाम का भी आदमी था, वह पं. कृपाराम दुबे के सहायक व लीला-मण्डली के सहायक निर्देशक भी थे। फौजदार बेहद उग्र स्वभाव का, मन का मैला प्रकृति वाला व्यक्ति था। रामलीला में प्रयुक्त तथा उपयोग में लाए जाने वाले सभी सामग्रियों का भी फौजदार शर्मा ही प्रबंध करता था।

एक दिन दोपहर के भोजन के बाद रामलीला के कलाकारों का रिहर्सल चल रहा था। लीला-मण्डली के स्वामी-निर्देशक कृपाराम दुबे ने फौजदार को सलाह और निर्देश दिया कि राम जिस ‘शिव-धनुष’ को तोड़ते हैं वह धनुष पहले की लीलाओं की अपेक्षा नरम होना चाहिए ताकि राम की भूमिका कर रहा 17 वर्षीय किशोर उसे आसानी से तोड़ सके। शायद कृपाराम ने पूर्व की लीलाओं में यह महसूस किया था कि राम को धनुष भंग करने में कुछ कठिनाई हुई या देर लग गई। बस इस छोटी-सी बात का फौजदार ने ‘बतंगड़’ बना दिया।

फलस्वरूप कृपाराम और फौजदार में काफी कहा-सुनी हो गई। कृपाराम ने उसे जो खरी-खोटी सुनाई। उससे फौजदार ने अपना सार्वजानिक अपमान महसूस किया और अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए मन ही मन उसने एक योजना बनाई। फौजदार ने न केवल कृपाराम का बल्कि उसकी रामलीला के भी मखौल उड़ाने की एक तरकीब सोच ली।

अगले दिन की बात है। उस रात लीला में राम के द्वारा धनुष-भंग और फिर सीता-स्वयंवर का ही दृश्य खेला जाना था। लीला में राम जिस शिव-धनुष को तोड़ते थे उस धनुष का निर्माण और प्रबंध फौजदार ही करता था। वह इस धनुष का निर्माण करता था- एक अत्यंत लचीले बाँस (कमचिल) को मोड़कर तथा उस पर पैरा (धान के सूखे पत्ते) व फिर रंगीन कागज लपेट कर। ताकि राम की भूमिका कर रहा 17 वर्षीय किशोर आसानी से वह शिव-धनुष उठा भी सके और तोड़ भी सकें। लेकिन आज की रात तो वह अपने ‘बॉस’ कृपाराम को मजा चखाना और उसकी लीला-मण्डली का सार्वजानिक अपमान भी कराना चाहता था। इसलिए उसने एक चाल चली जिसकी उसने कानोकान किसी को खबर भी नहीं होने दी।

फौजदार ने अपने मेजबान जगेश्वर शुक्ला से किसी काम का बहाना लेकर लोहे का एक छड़ (रॉड) माँग लिया। फिर वह पड़ोस के ‘मिसदा’ नामक गाँव चला गया। वहाँ के एक लोहार से उसने वह लोहे का रॉड धनुषाकार में मुड़वाँ लिया। फिर किसी एकांत स्थान में जाकर उस धनुषाकार लोहे के ऊपर रंगीन कागज लपेट कर उसने आज रात की लीला के लिए ‘शिव-धनुष’ तैयार कर लिया।

फौजदार अपने डेरे में वापस लौटा और उसने वह शिव-धनुष कहीं छिपा कर रख लिया। जब रात को लीला शुरू हुई तो फौजदार ने वहीं (रंगीन कागजों से लिपटा) लोहे की रॉड से बना शिव-धनुष चुपचाप रंगमंच में ले जाकर टेबल पर रख दिया। पं. कृपाराम दुबे रंगमंच के बगल से ही हारमोनियम पर बैठे हुए थे और दृश्य के अनुरूप रामायण की चौपाई, दोहा, सोरठे गा-बजा रहे थे। फौजदार नेपथ्य में छिपा तमाशा देखने के लिए उत्सुक था।

समय आने पर विश्वामित्र की आज्ञा पाकर राम धनुष उठाने के लिए खड़े हुए। आगे बढ़कर राम ने धनुष तो उठा लिया पर यह क्या!!! पहले की लीला में तो वह इतना कठोर या भारी नहीं हुआ करता था। फिर वह उसे मध्य से तोड़े कैसे? अभी कुछ देर पहले रावण तथा अन्य दिग्गजों का यहाँ जो अपमान हुआ था क्या वहीं राम का भी होने जा रहा है?

राम ने कातर नेत्रों से हारमोनियम बजा रहे कृपाराम की ओर देखा। राम से आँखें चार होते ही दुबे भी समझ गए कि दाल में कुछ काला है और राम बड़े संकट में हैं। राम धनुष उठा चुके हैं। सामने बैठे अपार दर्शक समूह उत्सुकता से राम के द्वारा धनुष भंग की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय में पर्दा गिरना भी बड़ा ही अशोभनीय होता यानी राम की कमजोरी को ही स्पष्ट रूप से परदे से ढाँकना।

पं. कृपाराम दुबे ने सच्चे ह्रदय से भगवान राम से प्रार्थना की- ‘हे प्रभु आज लाज रख ले। कभी कृष्ण के रूप में तुमने द्रौपदी की लाज राखी थी। आज मेरी और तेरी लीला दोनों की लाज रख लें। आज तुम्हारी परीक्षा है भगवान राम। यदि इस परीक्षा में तुम असफल हो गए तो मनुष्य कैसे सफल हो सकता है? हे राम! लाज रख ले! लाज रख ले! लाज रख ले!

पं. दुबे के हाथ अद्भुत-रूप से लगातार हारमोनियम पर थिरक रहे थे। और तबला वादक भी वैसा ही उनका साथ दे रहा था। वैसा ही मजीरा वादक भी। हारमोनियम, तबले और मंजीरे की संगति में दर्शक भावविभोर होकर खो गए थे और पं. कृपाराम दुबे भी खो गए थे सच्चे ह्रदय से राम की भक्ति में। उनके मन और मस्तिष्क राम के चरणों में लीन हो चुके थे। उन्होंने रंगमंच के राम को नेत्रों से ही निर्देश दिया- ‘धनुष खींचो’ और भावविभोर होकर गाने लगे-

लेत चढ़ावत खैंचत गाढें, काहूँ न लखा देख सबु ठाढेंII
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा, भरे भुवन धुनी घोर कठोराII

तभी रंगमंच पर बिजली कड़कने की सी एक टँकार हुई और अगले ही क्षण राम के हाथों में शिव-धनुष टूट कर झूल रहा था। दर्शकों के मध्य चारों ओर करतल-ध्वनी होने लगी और तालियों की गड़गड़ाहट से लीला-स्थल गूँज उठा। मानो आज यथार्थ का शिव-धनुष ही राम ने भंग कर दिया हो। पं. कृपाराम का नाम आज सचमुच ही चरितार्थ हो गया था यानी राम ने सचमुच ही आज उन पर कृपा कर दी थी।

दूसरे दिन पं. कृपाराम दुबे और उनके मेजबान पं. जगेश्वर शुक्ला एक-दूसरे के सामने फूट-फूट कर रो रहे थे। पं. दुबे रो-रो कर अपने प्रभु राम की कृपा और महिमा का बखान कर रहे थे। तो शुक्ला जी इसलिए रो रहे थे कि वे भी अनजाने में ही सही लेकिन फौजदार के साथ पाप के भागीदार बने जिसका पश्चाताप उन्हें जीवन-पर्यन्त (सन् 1905 ) तक बना रहा और अपने इस ‘पाप’ के प्रायश्चित-स्वरूप शुक्ला ने न जाने कितने ही नवधा-रामायण व धार्मिक अनुष्ठान किए। फौजदार को उस रात के बाद किसी ने कहीं नहीं देखा।

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એનીવર્સરી


લગ્નની વર્ષગાંઠે કોઈને પણ ગીફ્ટ કરી શકાય એવી કવિતા.. – એષા દાદાવાળા

એનીવર્સરી

વસંત જેવી છે
સાથે જીવાય ગયેલા
સહેજ લીલા સહેજ પીળા થયેલા વર્ષોને
એ આખેઆખા લીલા કરી જાય છે
જોકે
વસંતના આગમનની સાબિતી તો
શહેરમાં હારબંધ ઉભા કરેલા વૃક્ષો લીલો યુનિફોર્મ પહેરી લે
ત્યારે જ મળે,
બાકી
સાથે જીવાયેલા વર્ષોના સહેજ
ઝાંખા થયેલા ખૂણે
એકાદું ફૂલ ઉગી નીકળે
એ પ્રત્યેક પળ વસંત જેવી જ હોય છે.
લગ્નની વર્ષગાંઠ તો
વસંતને આવકારવાનું બહાનું છે
બાકી
સાથે જીવવાનું નક્કી કરીને બેઠેલા
બે જણ સાથે હોય
એ પ્રત્યેક પળે
શરીરની ડાબી બાજુએ
એકાદું ફૂલ ઉગતું જ હોય છે
અને ત્યારે વસંતના આગમનની સાબિતીની જરૂર પડતી નથી..!

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જાણવા જેવું : લગ્ન વિધી અને તેના અર્થ
પૂછવા જેવું : સ્ત્રી ના ભાગે સપ્તપદી ની સાત પ્રતિજ્ઞાઓ છે તો પુરુષ ના ભાગે કેટલી ?
💑💑 લગ્ન વિધી … લગ્ન વિધી 💑💑

✍… લગ્નની મોસમ પૂરબહારમાં ખીલી છે. આવા સમયે લગ્નમાં થતી વિધિ બધા જ જોતા હોય છે.
પણ આજના ઝડપી યુગમાં કઈ વિધિનું શું મહત્વ છે તે સમજવું જોઈએ.
આ લેખ દ્વારા લગ્નની વિવિધ વિધિઓ પર પ્રકાશ પાડ્યો છે.

લગ્ન પ્રસંગે થતી વિવિધ વિધિઓ આપણે નિહાળીયે છીએ પણ તે બધાનો શું અર્થ હોય છે તે જાણવું ૫ણ જરૂરી છે.
વરરાજા જ્યારે પરણવા આવે ત્યારે તેમને પોંખવામાં આવે છે. આ વખતે લાકડાના બનાવેલો નાનો રવઈયો, મુશળ ધુંસરી, તરાક વરરાજાના માથેથી ઉતારે છે અને પગથી કોડિયું ભંગાવી પ્રવેશ કરાવે છે આનો શું હેતુ છે ? શું રહસ્ય છે ?
તેમજ બીજી વિધિઓનો શું અર્થ હોય છે ?
તે વિશે વિચાર કરીએ.

લગ્ન : બે વિજાતીય દેહનું જોડાણ તેનું નામ લગ્ન પણ તેનો ખરો અર્થ તો એવો છે કે બે દેહ દ્વારા બે મન એક કરવા, એનાથી પ્રેમ પ્રગટે, આત્મીયતા વધે અને અંદરના આંતરિક સૌંદર્યને જોઈ સુખનો અનુભવ થાય એ જ ખરું લગ્ન છે.

વરઘોડો : ઈન્દ્રિયોના ઘોડાને અંકુશમાં રાખવા માટેની ચેતવણીનું આ પ્રથમ પગલું છે.

પોંખણું : વરરાજા પરણવા આવે ત્યારે તેમને લાકડાના બનાવેલા નાના રવઈયો, મુશળ, ધુંસરી અને તરાકથી સાસુ પોંખેં છે તેનો અર્થ જોઇએ..

રવઈયો : માખણ કાઢવા માટે જેમ દહીંને રવૈયાથી વલોવવામાં આવે તેમ જીવનને પ્રેમમય બનાવવા માટે મનના તરંગોનું મંથન કરીને પ્રેમનું દોહન કરવા જણાવે છે.

મુશળ : અતિ વાસનાઓને મુશળ (સાંબેલા)થી ખાંડી નાખી પ્રેમ પ્રગટાવવાનો છે.

ઘુંસરી : સંસાર રૂપી રથના પતિ પત્ની રૂપી બે ચાલકો છે, આ બંને ચાલકો શીલ અને સંયમના ચીલામાં સમાંતર રૂપે ચાલીને જીવન રથને સહકાર અને પ્રેમથી ખેંચે તો જ સુખી થવાય છે તેમ કહેવા માગે છે.

તરાક : લગ્ન જીવન રેટિંયા જેવું છે.પતિ પત્ની રૂપી બે ચક્રને પ્રેમની દોરી વડે આ તરાક (ચાક)ને બંધાયેલા અને ફરતા રાખે તો જ સ્નેહરૂપી સુતર નીકળે એમ કહેવાનો ભાવ છે. આમ પોંખવા આવનાર સાસુ વરને માંયરામાં આવતા પહેલા સાવધાન કરે છે એનો જવાબ વર સંપુટ તોડીને આપે છે.

સંપુટ : વરને પોંખી લીધા પછી બે કોડિયાના સંપુટને પગ તળે ભાંગીને વર માંયરામાં પ્રવેશે છે. આનાથી વર એમ કહેવા માંગે છે કે તમારી ચેતવણી હું સમજ્યો છું પણ મારા એકલાની આશા, ઈચ્છા, અરમાનો પર હું હવે નહિ ચાલું. એનો અહીં ભાંગીને ભુક્કો કરું છું હવેથી અમારા બંનેની આશા, ઈચ્છા અને અરમાનો એક હશે તે પ્રમાણે જ જીવન યાત્રા કરીશું.

વરમાળા : ફૂલના હારથી વરકન્યા અરસ પરસનું સ્વાગત કરે છે પણ ગોરબાપા સુતરની એક આંટી બંનેના ગળામાં પહેરાવે છે. આમ એક જ હારથી બંનેના હૈયા એક કરવાનો પ્રયાસ છે.

હસ્તમેળાપ : લગ્ન વિધિનું આ મુખ્ય અંગ છે. પોતાની પુત્રીનો હાથ મા-બાપ વરરાજાને સોંપે છે અને વરરાજા તેનો સ્વીકાર (ગ્રહણ) કરે છે. આ વિધિને પાણિગ્રહણ ૫ણ કહે છે અને એથી થતો હસ્તમેળાપ હૈયા મેળાપ બની જાય છે. આ વિધિથી વરઘોડિયાના દેહમાં ઝણઝણાટી જાગે છે અને હૈયામાં આત્મીયતા પ્રગટે છે. સાથો સાથ જાનૈયા માંડવિયાના મન પણ આનંદ અને ઉલ્લાસથી નાચી ઉઠે છે.

મંગળ ફેરા : લગ્નના ચાર ફેરા એ ચાર પુરૂષાર્થના ફેરા છે : ધર્મ, અર્થ કામ અને મોક્ષ.. એ ધર્મ શાસ્ત્રોનું પણ ચિંતન છે. ચાર ફેરા ફરવામાં પ્રથમના ત્રણ ફેરામાં પુરૂષ આગળ હોય છે અને ચોથા ફેરામાં સ્ત્રી આગળ હોય છે. આમ કેમ ? પ્રથમ ત્રણ ફેરાના ત્રણ પુરૂષાર્થ
(૧) ધર્મ-ધર્મ પાળવો અને પળાવવો.
(૨) અર્થ-ગૃહસ્થ જીવન ચલાવવા ધન કમાવું.
(૩) કામ-લગ્ન જીવનના સંયમપૂર્વકના હક્કો. આ ત્રણેમાં પુરૂષ આગળ હોય છે અને તેને પત્ની અનુસરે છે. થોડાં વિસ્તારથી સમજીએ તો

(૧) ધર્મ : સ્ત્રીના પિયરમાં ગમે તે ધર્મ પળાતો હોય પણ પરણ્યા પછી પતિ જે ધર્મ પાળતો હોય તેને જ સ્ત્રી અનુસરે છે અને બીજા ધર્મો, પતિ પ્રત્યેના ધર્મો, કુટુંબ પ્રત્યેના ધર્મો, ઘરના વડીલો પ્રત્યેના ધર્મો, સંતાનો પ્રત્યેના ધર્મો, સગાં સબંધી અને સમાજ પ્રત્યેના ધર્મો… વગેરે ધર્મો પણ પતિની મરજી અનુસાર પાળવાના છે.
(૨) અર્થ :પતિ કમાઈને પૈસા લાવે તેનાથી ઘરનું, કુટુંબનું પોષણ કરે છે. સ્ત્રી લક્ષ્મી કહેવાય છે. ઘરની લક્ષ્મી પણ આપણે કહીએ છીએ.
(૩) કામ : સ્ત્રી એ લજ્જાનું પ્રતીક છે. લગ્ન જીવન માટે વંશવૃદ્ધિ માટે એ હંમેશા પતિની પાછળ જ રહે છે. આ ત્રણેય… ધર્મ, અર્થ અને કામ એ પતિ પત્નીની ઈચ્છાનુસાર થઈ શક્તા પુરૂષાર્થો છે. જ્યારે ચોથો ફેરો
(૪) મોક્ષ… એ કોઈની ઈચ્છાનુસાર મળતો નથી. એ તો ધર્મોના નિયમ પાલન અને સેવા શુશ્રૂષાથી જ મળે છે અને એમાં સ્ત્રી હંમેશા આગળ હોય છે. સહનશક્તિ, સદાચાર, શીલ વગેરે ગુણો સ્ત્રીઓમાં સ્વાભાવિક હોય છે. પતિ, સાસુ, સસરા, વડીલો પ્રત્યેનો આદર, સેવા, સમભાવ, નોકરો, ગરીબો પ્રત્યે કરૂણા તથા સંતાનો પ્રત્યે સમતા, મમતા – આ બધા ગુણોનો સમન્વય એટલે સ્ત્રી અને એથી જ એના આવા ગુણોને લીધે જ તે મોક્ષના માર્ગ પર પુરૂષ કરતા આગળ છે અને એટલે જ લગ્નના ચોથા ફેરામાં સ્ત્રી આગળ હોય છે.

મંગલાષ્ટક : લગ્નવિધિ પૂરી થતાં બ્રાહ્મણ નવદંપતીને આશીર્વાદ આપતા શ્લોકો બોલે છે અને આઠ અષ્ટકો દ્વારા તેમનું દાંપત્ય જીવન સરળ, સફળ અને પ્રસન્ન નીવડે એવી મંગળ કામનાઓનો આશીર્વાદ આપે છે.

રામ દીવડો : કન્યા વિદાય વખતે કન્યાની માતા પ્રગટાવેલ દીવડો હાથમાં લઈને વિદાય આપવા આવે છે આનાથી એ એમ કહેવા માંગે છે કે હે દીકરી ! તેં તારી સેવા, શુશ્રૂષા અને સદ્‍ગુણોથી જેમ તારા પિતાનું ઘર અજવાળ્યું છે તેમ જ તું તે સંસ્કારોથી તારા પતિના ઘરને પણ અજવાળજે.

મા માટલું : માતાનો પ્રેમ, માતાની મમતા, માતાનો જીવ અજોડ છે. તેના સાગર જેવડા પ્રેમ અને શુભેચ્છાઓના પ્રતીકરૂપે ધન, ધાન્ય, ફળ, મેવા, મીઠાઈને માટલામાં ભરે છે. આમાં ધન એટલે લક્ષ્મી સ્વરૂપે સવા રૂપિયો, ધાન્યના પ્રતીકરૂપે મગ, ફળના પ્રતીકરૂપે સોપારી, મેવાના પ્રતીકરૂપે ખારેક અને મીઠાઈના પ્રતીકરૂપે સુખડી અને તે સિવાય ઘણી મીઠાઈઓ વગેરે પણ મુકાય છે. રિદ્ધિ સિદ્ધિના પ્રતીકરૂપે નાની મોટી શુકનવંતી ચીજો શુભ ચોઘડિયે ભરવામાં આવે છે અને દીકરીને ઘેર સદાય લીલા લહેર રહે તેવી શુભ કામનાના પ્રતીકરૂપે મા માટલાનું મોઢું ઢાંકવાનું વસ્ત્ર લીલા રંગનું હોય છે અને સગાંના સંબંધો કાચા સુતરના તાંતણા જેવા હોય છે તે સહનશીલતાથી, સજ્જનતાથી અને સુવ્યવહારથી અતૂટ રહે અને વ્યવહારના કામો સાંગોપાંગ પાર ઉતરે એના પ્રતીકરૂપે કાચા સુતરનો દડો મા માટલા ઉપર મૂકવામાં આવે છે.

સપ્તપદી : આ શ્લોકો બ્રાહ્મણ બોલતા હોય છે, એના દ્વારા વર કન્યા અરસપરસ સાત પ્રતિજ્ઞાઓ લે છે અને એક બીજાને વફાદાર તેમજ સહાયભૂત થવાના વચન અપાય છે.

સપ્તપદીના સાત વચનો
લગ્ન તો જીવનભર સાથ નિભાવવા માટેનું વ્રત છે અને તે માટેની સંપૂર્ણ કટિબદ્ધતા કે પ્રતિજ્ઞાઓનું પ્રતીક છે… સપ્‍તપદી
જેમાં કન્‍યા દ્વારા વિવિધ પ્રતિજ્ઞાઓ
પ્રથમ પ્રતિજ્ઞા માં વધુ આભારવશ ભાવે તેના પતિને જણાવે છે કે ગત જન્મમાં પોતે કરેલા અસંખ્‍ય પુણ્યોને કારણે તેને તેઓ પતિના રૂપમાં પ્રાપ્‍ત થયા છે. આ પ્રતિજ્ઞા દ્વારા વધુ પોતાના પતિને સર્વસ્‍વ ગણે છે અને આ સૌભાગ્‍યના પ્રતીક પોતાના કપાળે ચાંલ્‍લો કરવાનું શરૂ કરે છે.

બીજી પ્રતિજ્ઞા માં વધુ પોતાના પતિના બાળકથી માંડીને અબાલવૃદ્ધ સહિત સંપૂર્ણ પરિવારના લાલનપાલનની ખાત્રી આપે છે, તેમજ ઉપલબ્‍ધ સાધન સંપન્‍નતાથી સંતોષ રાખવાનું વચન આપે છે. અહી પરિવારના દરેક સભ્‍યોને પ્રેમ, લાગણી અને સેવાભાવથી પોતાના બનાવવાની વાત કરી છે. તદ્ઉપરાંત તેને જે સુખ મળે તેનાથી સંતોષ પામશે એટલે કે તે ખોટો અસંતોષ નહિ રાખે, જેનાથી વધુ આર્થિક ઉપાર્જન માટે તેનો પતિ ખોટા માર્ગો અપનાવે જે સરવાળે સમગ્ર પરિવારને નુકશાનકર્તા નીવડે.

ત્રીજી પ્રતિજ્ઞા માં કન્‍યા તેના પતિની આમન્‍યા જાળવવાની તેમજ તેમના માટે ભોજન તૈયાર કરી આપવાનું વચન આપે છે. ભોજન તો હોટલમાં પણ જમી શકાય છે અથવા તો ત્‍યાંથી ઘરે લાવીને પણ જમી શકાય છે, પરંતુ ઘેર પત્ની દ્વારા પ્રેમપૂર્વક તૈયાર કરવામાં આવેલ ભોજનની મજા કંઇક જુદી જ હોય છે.

ચોથી પ્રતિજ્ઞા માં વધુ સારા શણગાર-શૃંગાર સજી મન, ભાવ, વિચારવાણી, શરીર તેમજ કાર્યથી પોતાના પતિને સહકાર આપવાની વાત કરે છે. શરીરની સ્‍વચ્‍છતા શણગાર-શૃંગાર વગેરે સ્‍ત્રીના વ્‍યક્તિત્‍વને ભવ્‍યતા બક્ષે છે. આથી સ્‍ત્રી તેના પતિનું આકર્ષણનું કેન્‍દ્બ પણ બની રહે છે. અહીં પત્ની બનવાથી તેણે પ્રિયતમા તરીકેની ભૂમિકા ભૂલી નહિ જાય તેમ તેના પતિને ખાત્રી આપે છે.

પાંચમી પ્રતિજ્ઞા માં કન્‍યા પોતાના પતિને વચન આપે છે કે તે સુખના સમયે આનંદમાં તો રહેશે પરંતુ દુઃખના સમયમાં પોતાની ધીરજ કે સહનશીલતા ગુમાવશે નહિ તેમજ પોતાના પતિના સુખ અને દુઃખમાં ભાગીદાર બનશે તેમજ કયારેય પણ પરાયા પુરૂષનો સાથ નિભાવશે નહિ તેવી પણ ખાત્રી આપે છે.

છઠ્ઠી પ્રતિજ્ઞા મા વચનમાં વધુ તેના પતિને કહે છે કે તે પોતાના પતિના ઘરના તમામ કાર્યો આનંદપૂર્વક કરશે તેમજ પતિના માતા-પિતાની સેવા કરશે તેમજ અન્‍ય સગાં સબંધીઓને આદર સત્કાર કરશે. પતિ જયાં રહેશે તેની સાથે પોતે પણ ત્યાં રહેશે તેમજ પતિને કોઈપણ પ્રકારે ન છેતરવાની તેમજ પોતે પણ તેનાથી નહિ છેતરાય તેવું વચન આપે છે. આ પ્રતિજ્ઞામાં માત્ર તેના પતિ પ્રત્‍યેની જ નહી, પરંતુ તેના સાસુ-સસરા તેમજ સમગ્ર સગાં વહાલાં પ્રત્‍યેની ફરજની કટિબધ્ધતા દર્શાવવામાં આવી છે.

સાતમી પ્રતિજ્ઞાઅને છેલ્‍લી પ્રતિજ્ઞામાં કન્‍યા તેના પતિને તમામ પ્રકારના યજ્ઞ વિષયક કાર્યોમાં સહાય તદ્ઉપરાંત ધા‍ર્મિક, આર્થિક તેમજ કામ વિષયક કર્મોમાં પણ પતિ કહે તેમ વર્તવાની ખાત્રી આપે છે.
અગાઉની પ્રતિજ્ઞાઓમાં પત્ની દરેક રીતે પતિનો સાથ નિભાવવાનું વચન આપે છે,
પરંતુ અહીં ધાર્મિક કાર્યોમાં પણ જોડાજોડ રહેલાની ખાત્રી આપે છે.

આમ,સપ્‍તપદીમાં કન્‍યા દ્વારા લેવાતી પ્રતિજ્ઞા સાંસારીક જીવનને અલૌકિક જીવનમાં પરિવર્તિત કરવાની ખાત્રી આપે છે.

શાસ્ત્રોક્ત રીતે સપ્તપદીની વિધિ દ્વારા કન્યા દુલ્હારાજાનો પોતાના પતિ તરીકે સ્વીકાર કરે છે.
બીજી રીતે જ્યાં સુધી સપ્તપદીની વિધિ પાર પાડવામાં ન આવે ત્યાં સુધી કન્યાને પરણેતર નહીં પણ કુંવારી જ માનવામાં આવે છે.
લગ્નપ્રસંગ સામાજિક રીતે પરસ્પર એકબીજા સાથે સંબંધ બાંધતા બે પરિવારો માટે એક ઉત્સવ હોય છે.

વર પક્ષ અને કન્યા પક્ષ એમ બે પરિવારો વચ્ચેના આ નવ સંબંધ દ્વારા એક નવું સામાજિક ઘુ્વીકરણ રચાય છે.
વર-વધૂને માટે તો આ પ્રસંગ મહાઉત્સવ અને નવજીવનના મહાયજ્ઞ સમાન હોય છે. બીજા શબ્દોમાં કહીએ તો સ્ત્રી અને પુરુષ માટે લગ્ન સંબંધનું જોડાણ એ તેમનો બીજો જન્મ હોય છે.
જેમાં પુરુષે અને સ્ત્રીએ એકબીજાના વ્યક્તિત્વને સમજી જાણીને પરસ્પર પ્રેમ દ્વારા એકમેક પ્રત્યેની ફરજો અને જવાબદારીઓ પાર પાડવાની હોય છે.
આ જવાબદારીઓને આપણા હિન્દુ ધર્મ શાસ્ત્રોમાં સપ્તપદીની સાત શરતોમાં આવરી લેવાઈ છે. લગ્ન પ્રસંગે હસ્તમેળાપ બાદ વર અને વધૂ પવિત્ર અગ્નિ સમક્ષ સાત ડગલા ચાલીને પરસ્પર પ્રેમ દ્વારા એકબીજા પ્રત્યેની જવાબદારીઓ નિભાવવાના શપથ ગ્રહણ કરે છે.
આ શાસ્ત્રોક્ત વિધિને સપ્તપદી એવું સુંદર નામ આપણા શાસ્ત્રોએ આપ્યું છે. પ્રત્યેક સ્ત્રી અને પુરુષ માટે લગ્ન જોડાણ બાદ સુમેળભર્યા જીવન નિર્વાહ માટે આ વિધિ અત્યંત આવશ્યક છે.

વિવાહ સંસ્કારથી પવિત્ર વર-વધૂ પોતાના ગૃહસ્થજીવનમાં કામ, ક્રોધ, લોભ, મોહ, મદ અને મદત્સર એ ષડ્ રિપુઓને વ્રતાચરણો દ્વારા મહાત કરીને બદલામાં પ્રેમ અને સંતોષ પ્રાપ્ત કરે છે એટલે જ લગ્ન દ્વારા મનુષ્યને ઋણમુક્ત થવાનું ધર્મશાસ્ત્ર સૂચવે છે. આ સંસ્કારનો હેતુ જીવને શુદ્ધ અને પવિત્ર બનાવવાનો છે. સદાચરણ અને સમ્યક્ ચારિત્ર્યથી સંસારને માણીને પુરુષે પોતાની પત્ની સાથે પરમપદને પંથે સંચરવાનું છે

🙏🏻🌹 શ્રી ગણેશાય નમઃ 🌹🙏🏻

(વ્હોટ્સ એપ પર થી સાભાર)