Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🔴लोभ को समझ लें

मुल्ला नसरुद्दी एक नुमाइश में गया था लखनऊ में। बूढ़ा हो गया है। पहन रखा है चूड़ीदार पाजामा, अचकन। शाल डाल रखी है। गांधीवादी टोपी लगा रखी है। बिलकुल नेता मालूम हो रहा है। बुढ़ापे में लोग चूड़ीदार पाजामा इसीलिए पहनते हैं, उससे जवानी की चुस्ती मालूम पड़ती है, उससे जवानी को धोखा मालूम पड़ता है। अब जोर से कस लोगे पैरों को तो खाल कितनी ही ढीली पड़ गयी हो, कम से कम बाहर से तो चुस्ती दिखाई पड़ेगी। और इतने कसे रहोगे तो खुद भी थोड़ी तेजी से चलोगे कि जल्दी घर पहुंच जाएं, कि कब इस चूड़ीदार पाजामे से छुटकारा हो।
बड़ी तेजी से चला जा रहा था। एक भीड़ में एक सुंदर युवती को देखकर जी नहीं माना। यूं तो अपने को बहुत रोका, फिर भी एक धक्का मार ही दिया। युवती ने लौट कर देखा-शुद्ध खादीधारी नेता है! सब बाल सफेद हो गये हैं। कहा: ‘शर्म नहीं आती? बाल सफेद हो गये और अभी भी यह ढ़ंग!’
नसरूद्दीन ने कहा: ‘बाल सफेद हो गये हों, मगर दिल तो अभी भी काला है। दिल की तरफ देखो।’
दिल काला ही बना रहता है; वह सफेद होता ही नहीं। न सफेद खादी से होता है, न सफेद बालों से होता है। दिल तो काला ही बना होता है। जब तक कि भीतर का दीया न जले तब तक काला ही बना रहता है। तब तक तो वहां काजल ही काजल है। तब तक तो वहां धुआं ही धुआं है।
प्रज्ञा, तू तो अभी युवा है। यही घड़ी है। अगर कोई जाग आए तो अभी समय है। जो श्रम बाहर की यात्रा में लगे, वही श्रम भीतर की यात्रा में लग सकता है। बाहर तो धन नहीं मिलता, लेकिन भीतर मिल सकता है। धन तो नहीं, ध्यान मिलेगा। मगर ध्यान ही धन है। पद तो नहीं लेकिन परमात्मा मिलेगा। पर परमात्मा ही तो परमपद है! कमी मिट जाएगी।
लेकिन भीतर की यात्रा के कुछ सूत्र समझ लेने चाहिए। पहला तो सूत्र यह है कि भीतर की यात्रा पर किसी लोभ के कारण नहीं जाना चाहिए, क्योंकि लोभ तो बाहर की यात्रा का हिस्सा है। लोभ अगर है तो तुम भीतर जा ही नहीं रहे। तुम चाहे लोभ के कारण ध्यान करने बैठे हो, तो भी तुम्हारी बहिर्यात्रा चल रही है। क्योंकि लोभ बहिर्यात्रा में ही ले जा सकता है। वह गाड़ी बाहर की तरफ ही जाती है। महत्त्वाकांक्षा अगर सिर पर सवार है तो तुम चाहे ध्यान करो, चाहे पूजा, चाहे प्रार्थना-कुछ न होगा, क्योंकि महत्त्वाकांक्षा का जहर इन सबकी गर्दन घोंट देगा, इनको मार ड़ालेगा, महत्त्वाकांक्षा तो दिल्ली की तरफ जाती है-दिल की तरफ नहीं। वह यात्रा बहिर्मुखी है, अंतर्मुखी नहीं।
लोभ से संन्यास? लोभ से ध्यान? यह मोक्ष भी फिर मोक्ष न रहा। यह परमात्मा भी फिर परमात्मा न रहा। यह सब दुकानदारी ही हो गयी। यह बहिर्यात्रा ही रही फिर। ये तो मौज की बातें हैं, ये तो मस्ती की बातें हैं। और जब छोड़ने की बात पहले से ही तय है तो क्या तुम पूरे उतरे पाओगे? तुम चैबीस घंटे हिसाब लगाते रहोगे कि अभी तक नहीं हुआ, अभी तक नहीं हुआ, चार दिन निकल गये, पांच दिन निकल गये, सात दिन निकल गये, यह एक सप्ताह हुआ, यह चार सप्ताह हुए, यह एक महीना गया, अब ग्यारह महीने ही बचे! अभी तक कुछ तो मिल जाना चाहिए था!न मिलता पूरा-पूरा, तोला भर मिलता, दो तोला मिलता, कुछ तो मिलता! रत्ती मासा कुछ तो मिलता! कुछ आसार तो नजर आते! न मिलता, कम से कम पैरों की आवाज तो सुनाई पड़ती! एक महीना यूं ही गया! और ग्यारह महीने ही बचे!
ये बचकानी बातें हैं। ये छोटे-छोटे बच्चों जैसी बातें है। परमात्मा कोई खिलौना हैं? तुम्हारी आकांक्षाओं और तुम्हारे लोभ और तुम्हारी महत्त्वाकांक्षा की दौड़ से तुम उसे पा लोगे? पागल हो गये हो!
संन्यास अलोभ है। संन्यास महत्त्वकांक्षा-मुक्ति है। संन्यास वासना का अतिक्रमण है। संन्यास इच्छा की व्यर्थता को समझ लेने में है। और तब अपने-आप चेतना ऐसे भीतर सरकने लगती है। कुछ करना नहीं होता; प्रयास नहीं करना होता, सहज!
और चोंटे तो बहुत लगेंगी। मेरे पास रहने का अर्थ ही यह है कि चोट पर चोट पड़ेंगी, क्योंकि तुमने जो भी बनाया है अब तक, उसे मैं तोड़ूंगा सब रेत के घर तोड़ दूंगा। और तुम्हारे ताश के महल गिरा दूंगा।♣️

संजीव सुक्ला

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