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जानिये और समझिये कि सबरीमला मंदिर क्यों सबकी आंखों में खटक रहा है।

केरल में सबरीमला के मशहूर स्वामी अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे विवाद के बीच लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट भी कम से कम एक बार यहां घुसने को बेताब हैं।
इस बात को समझने के लिये हमें केरल के इतिहास और यहां इस्लामी और राज्य में बीते 4-5 दशक से चल रही ईसाई धर्मांतरण की कोशिशों को भी समझना होगा।
मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था को तोड़ना है, ताकि इस पूरे इलाके में बसे लाखों हिंदुओं को ईसाई और इस्लाम जैसे अब्राहमिक धर्मों में लाया जा सके।
केरल में चल रहे धर्मांतरण अभियानों में सबरीमला मंदिर बहुत बड़ी रुकावट बनकर खड़ा है।
पिछले कुछ समय से इसकी पवित्रता और इसे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा था।
लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी।
लेकिन आखिरकार महिलाओं के मुद्दे पर ईसाई मिशनरियों ने न सिर्फ सबरीमला के अयप्पा मंदिर बल्कि पूरे केरल में हिंदू धर्म के खात्मे के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है।

सबरीमला के इतिहास को समझिये…

1980 से पहले तक सबरीमला के स्वामी अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा लोगों को नहीं पता था। केरल और कुछ आसपास के इलाकों में बसने वाले लोग यहां के भक्त थे।
70 और 80 के दशक का यही वो समय था जब केरल में ईसाई मिशनरियों ने सबसे मजबूती के साथ पैर जमाने शुरू कर दिये थे।
उन्होंने सबसे पहला निशाना गरीबों और अनुसूचित जाति के लोगों को बनाया।
इस दौरान बड़े पैमाने पर यहां लोगों को ईसाई बनाया गया। इसके बावजूद लोगों की मंदिर में आस्था बनी रही।
इसका बड़ा कारण यह था कि मंदिर में पूजा की एक तय विधि थी जिसके तहत दीक्षा आधारित व्रत रखना जरूरी था।
सबरीमला उन मंदिरों में से है जहां पूजा पर किसी जाति का विशेषाधिकार नहीं है किसी भी जाति का हिंदू पूरे विधि-विधान के साथ व्रत का पालन करके मंदिर में प्रवेश पा सकता है।
सबरीमला में स्वामी अयप्पा को जागृत देवता माना जाता है।
यहां पूजा में जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है।
मान्यता है कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं जो लोग व्रत को ठीक ढंग से नहीं पूरा करते उन्हें यह दर्शन नहीं होते।
जिसे एक बार इस चंद्रमा के दर्शन हो गए माना जाता है कि उसके पिछले सभी पाप धुल जाते हैं।

सबरीमला से आया सामाजिक बदलाव…

सबरीमला मंदिर की पूजा विधि देश के बाकी मंदिरों से काफी अलग और कठिन है।
यहां दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा दी जाती है इस दौरान रुद्राक्ष जैसी एक माला पहननी होती है।
साधक को रोज मंत्रों का जाप करना होता है।
इस दौरान वो काले कपड़े पहनता है और जमीन पर सोता है।
जिस किसी को यह दीक्षा दी जाती है उसे स्वामी कहा जाता है।
यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा इसके बजाय वो स्वामी कहलायेगा।
इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया।
मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाये।
ऐसे लोगों का समाज में बहुत ऊंचा स्थान माना जाता है।
यानी यह मंदिर एक तरह से जाति-पाति को तोड़कर भगवान के हर साधक को वो उच्च स्थान देने का काम कर रहा था जो कोई दूसरी संवैधानिक व्यवस्था कभी नहीं कर सकती है।

ईसाई मिशनरियों के लिये मुश्किल

सबरीमला मंदिर में समाज के कमजोर तबकों की एंट्री और वहां से हो रहे सामाजिक बदलाव ने ईसाई मिशनरियों के कान खड़े कर दिये उन्होंने पाया कि जिन लोगों को उन्होंने धर्मांतरित करके ईसाई बना लिया वो भी स्वामी अयप्पा में आस्था रखते हैं और कई ने ईसाई धर्म को त्यागकर वापस सबरीमला मंदिर में ‘स्वामी’ के तौर पर दीक्षा ले ली।
यही कारण है कि ये मंदिर ईसाई मिशनरियों की आंखों में लंबे समय से खटक रहा था।
अमिताभ बच्चन, येशुदास जैसे कई बड़े लोगों ने भी स्वामी अयप्पा की दीक्षा ली हझ।
इन सभी ने भी मंदिर में रहकर दो मुट्ठी चावल के साथ दीक्षा ली है इस दौरान उन्होंने चप्पल पहनना मना होता था और उन्हें भी उन्हीं रास्तों से गुजरना होता था जहां उनके साथ कोई रिक्शेवाला, कोई जूते-चप्पल बनाने वाला स्वामी चल रहा होता था।
नतीजा यह हुआ कि ईसाई संगठनों ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे।
ईसाई धर्म के इस फर्जीवाड़े के बावजूद सबरीमला मंदिर की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रही थी।
नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को मुद्दा बनाकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी।
यह याचिका कोर्ट में एक हिंदू नाम वाले कुछ ईसाइयों और एक मुसलमान की तरफ से डलवाई गई।

1980 में सबरीमला मंदिर के बागीचे में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था।
फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये।
उस वक्त आरएसएस के नेता जे शिशुपालन ने इस क्रॉस को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था और वो इसमें सफल भी हुये थे।
इस आंदोलन के बदले में राज्य सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया था।

केरल में हिंदुओं पर सबसे बड़ा हमला

केरल के हिंदुओं के लिए यह इतना बड़ा मसला इसलिये है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है।
राज्य में हिंदू धर्म को बचाने का उनके लिये यह आखिरी मौका है।
केरल में गैर-हिंदू आबादी तेज़ी के साथ बढ़ते हुए 35 फीसदी से भी अधिक हो चुकी है।
अगर सबरीमला की पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो ईसाई मिशनरियां प्रचार करेंगी कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं।
ऐसे में ‘चंद्र दर्शन’ कराने वाली उनकी नकली दुकानों में भीड़ बढ़ेगी।
नतीजा धर्मांतरण के रूप में सामने आएगा।
यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि जिन तथाकथित महिला एक्टिविस्टों ने अब तक मंदिर में प्रवेश की कोशिश की है वो सभी ईसाई मिशनरियों की करीबी मानी जाती हैं।
जबकि जिन हिंदू महिलाओं की बराबरी के नाम पर यह अभियान चलाया जा रहा है वो खुद ही उन्हें रोकने के लिये मंदिर के बाहर दीवार बनकर खड़ी हैं।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक व्यापारी अकबर के समय मे बिजनेस करता था।
महाराणा प्रताप से लडाई की वजह से अकबर कंगाल हो गया और व्यापारी से कुछ सहायता मांगी।
व्यापारी ने अपना सब धन अकबर को दे दिया।
तब अकबर ने उससे पुछा कि तुमने इतना धन कैसे कमाया, सच सच बताओ नहीं तो फांसी दे दुंगा।

व्यापारी बोला-जहांपनाह मैंने यह सारा धन कर चोरी और मिलावट से कमाया है।
यह सुनकर अकबर ने बीरबल से सलाह करके व्यापारी को घोडो के अस्तबल मे लीद साफ करने की सजा सुनाई।
व्यापारी वहां काम करने लगा।

दो साल बाद फिर अकबर लडाई मे कं
गाल हो गया तो बीरबल से पूछा अब धन की व्यवस्था कौन करेगा?
बीरबल ने कहा बादशाह उस व्यापारी से बात करने से समस्या का समाधान हो सकता है। तब अकबर ने फिर व्यापारी को बुलाकर अपनी परेशानी बताई तो व्यापारी ने फिर बहुत सारा धन अकबर को दे दिया।

अकबर ने पुछा तुम तो अस्तबल मे काम करते हो फिर तुम्हारे पास इतना धन कहां से आया सच सच बताओ नहीं तो सजा मिलेगी।

व्यापारी ने कहा यह धन मैने आप के आदमी जो घोडों की देखभाल करते है उन से यह कहकर रिश्वत लिया है कि घोडे आजकल लीद कम कर रहे है। मैं इसकी शिकायत बादशाह को करुगां क्योंकि तुम घोडो को पुरी खुराक नहीं देते हौ ओर पैसा खजाने से पूरा उठाते हो।

अकबर फिर नाराज हुआ और व्यापारी से कहा कि तुम कल से अस्तबल में काम नही करोगे। कल से तुम समुन्दर् के किनारे उसकी लहरे गिनो और मुझे बताऔ।

दो साल बाद

अकबर फिर लडाई में कंगाल।
चारो तरफ धन का अभाव।
किसी के पास धन नहीं।

बीरबल और अकबर का माथा काम करना बंद। अचानक बीरबल को व्यापारी की याद आई। बादशाह को कहा आखरी उम्मीद व्यापारी दिखता है आप की इजाजत हो तो बात करू।

बादशाह का गरूर काफुर बोला किस मुंह से बात करें दो बार सजा दे चुकें हैं।

दोस्तो व्यापारी ने फिर बादशाह को इतना धन दिया कि खजाना पूरा भर दिया।
बादशाह ने डरते हुऐ धन कमाने का तरीका पूछा तो व्यापारी ने बादशाह को धन्यवाद दिया और कहा इस बार धन विदेश से आया है क्योकि मैने उन सब को जो विदेश से आतें हैं आप का फरमान दिखाया कि जो कोई मेरे लहरे गिनने के काम में अपने नाव से बाधा करेगा बादशाह उसे सजा देंगें।
सब डर से धन देकर गये और जमा हो गया।

कहानी का सार
सरकार व्यापारी से ही चलती है
चाहे अकबर के जमाने की हो या आज की

इसलिये प्लीज

व्यापारियों को तंग ना करे

😊😊

Posted in रामायण - Ramayan

हनुमानजीकीउड़नेकी_गती….

बचपन में जब हमारे बड़े हमें रामायण की कहानियां सुनाया करते थे तब हमें लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर हनुमान जी का संजीवनी बूटी लेने जाना व जाने का किस्सा सुनाया जाता था जिसमे संजीवनी बूटी ना मिलने पर पूरा का पूरा पर्वत उठाकर लाने वाला किस्सा रोचक लगता था। क्या कभी आपने यह सोचा कि उनके उड़ने की गति क्या होगी ? जिस तरह से हनुमान जी एक ही रात में श्रीलंका से हिमालय के पर्वतों पर पहुंचे ? और पहाड़ उठाकर वापस भी आ गए तो निश्चित ही उनके उड़ने की क्षमता बेहद तेज रही होगी। लेकिन कितनी तेज ? इस बात का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन फिर भी आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब खोजने के लिए हमने कुछ तथ्यों का सहारा लिया और गुणा भाग करके हनुमान जी की रफ्तार जानने की कोशिश की है।

अगर इसमे कोई गलती या चुक होने कि संभावना भी हो सकती है। जहां तक हमारी जानकारी है जिस वक्त लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध होने वाला था उससे ठीक पहले मेघनाथ ने अपनी कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी और वह तपस्या मेघनाथ ने पूरा दिन की थी। इस पूजा की खबर जब श्रीराम व उनकी सेना को लगी तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा उसके बाद तीनों लोकों में मेघनाथ को कोई नहीं मार सकेगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या किसी तरीके से भंग कर के उसे अभी युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी सहित कई वानर मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मेघनाथ की तपस्या भंग करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तब तक रात हो चुकी थी।

लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा, रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था। दोस्तों रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। यानी चार पहर होते हैं। इसका मतलब प्रत्येक पहर 3 घंटे का हुआ अब अगर आधुनिक काल की घड़ी के हिसाब से देखें तो लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध रात के करीब 9:00 बजे शुरू हुआ होगा। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण जी और मेघनाथ के बीच बेहद घनघोर युद्ध हुआ था जो लगभग 1 पहर यानी 3 घंटे तक चला था उसके बाद मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने का समय लगभग 12:00 बजे के आसपास का रहा होगा।

लक्ष्मण जी के मूर्छित होने से समस्त वानर सेना में हड़कंप मच गया मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण को उठाने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता था उसी शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ कैसे व क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को ना उठा पाने पर मेघनाथ वापस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए, उसके बाद विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका में से लंका के राज्य वैद्य को जबरदस्ती उठा लाए। लक्ष्मण जी अगर 12:00 बजे मूर्छित हुए तो जाहिर है उसके बाद श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य लाने के लिया कहना और हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य को उठा लाना इन सब में कम से कम 1 घंटा तो लग ही गया होगा। यानी रात्रि के करीब 1:00 बज चुके होंगे | इसके बाद वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान करने में भी कम से कम आधा घंटा जरूर लगा होगा।

तो हम ये मान सकते हैं कि बजरंगबली हनुमान आज के समय के अनुसार करीब रात्रि में 1:30 पर संजीवनी बूटी लाने के लिए रावण की नगरी से उड़े होंगे। जहां तक सवाल उनके वापस आने का है तो निश्चित ही वह सूर्य उदय होने से पहले वापस आ गए होंगे। यानि की बजरंगबली के वापस आने का समय लगभग 5:00 बजे का रहा होगा। 1:30 बजे लक्ष्मण जी की जान बचाने के लिए हनुमान जी उड़े और 5:00 बजे तक वापस आ गये इसका मतलब हनुमान जी 3:30 घंटे में द्रोणागिरी पर्वत उठाकर वापस आ गए। लेकिन मित्रों इन 3:30 घंटों में से भी हमें कुछ समय कम करना होगा क्योंकि जैसे ही लंका से निकलकर पवन पुत्र भारत आए तो रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला।

कालनेमि निरंतर श्री राम नाम का जप कर रहा था लेकिन वास्तव में उसकी मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। हनुमान जी ने जब जंगल से रामनाम का जाप सुना तो जिज्ञासावश नीचे उतर आए कालनेमि ने खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी बताया और हनुमान जी से कहा कि पहले आप स्नान करके आओ उसके बाद मैं आपको रावण के साथ चल रहे युद्ध का नतीजा बताऊंगा। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ गए और स्नान करने चले गए | स्नान करते समय उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ जिसे हनुमान जी ने मार डाला।

उस मगर की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि की वास्तविकता बताई तो बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। लेकिन इन सब में भी हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी होगी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे लेकिन हनुमान जी कोई वैद्य तो नहीं थे इसीलिए संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके और संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। बूटी को ना पहचान पाने की वजह से हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और वापस लंका की ओर जाने लगे। लेकिन हनुमान जी के लिए एक और मुसीबत आ गई।

हुआ यह की जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तो श्री राम के भाई भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के ऊपर से जा रहा है और उन्होंने बिना सोचे समझे महावीर बजरंगबली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए और उन्होंने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने (हनुमान जी) ने उन्हें राम रावण युद्ध के बारे में बताया। लक्ष्मण के मूर्छित होने का पूरा किस्सा सुनाया तब सुनकर वह भी रोने लग गए और उनसे माफी मांगी| फिर हनुमानजी का उपचार किया गया और हनुमान जी वापस लंका की ओर ओर चलें। लेकिन इन सभी घटनाओं में भी बजरंगबली के कीमती समय का आधा घंटा फिर से खराब हो गया। अब हनुमान जी के सिर्फ उड़ने के समय की बात करें तो सिर्फ दो घंटे थे और इन्हीं दो घंटों में वह लंका से द्रोणागिरी पर्वत आए और वापस गए।

अब अगर हम उनके द्वारा तय की गई दूरी को देखें तो श्रीलंका और द्रोणागिरी पर्वत तक की दूरी लगभग “ 2500 किलोमीटर” की है यानी कि यह दूरी आने जाने दोनों तरफ की मिलाकर 5000 किलोमीटर बैठती है और बजरंगबली ने यही 5000 किलोमीटर की दूरी 2 घंटे में तय की। इस हिसाब से हनुमान जी के उड़ने की रफ्तार लगभग 2500 किलोमीटर प्रति घंटा की दर से निकलती है. तो इसकी तुलना अगर ध्वनी की रफ्तार से करें तो उसकी तुलना में हनुमानजी की गति लगभग 2 गुना ज्यादा बैठती है।

आधुनिक भारत के पास मौजूद रसिया से मंगवाए गए लड़ाकू विमान मिग 29 की रफ्तार 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है. अगर इसकी तुलना हनुमान जी की रफ्तार से करें तो यहां पर भी हनुमान जी की रफ्तार ज्यादा निकलती है यानी हनुमान जी आधुनिक भारत के पास मौजूद सबसे तेज लड़ाकू विमान से भी तेज उड़ते थे।

!!जय जय सियाराम!!
!!जय जय श्री सद्गुरु महावीर बजरंगबली!!.

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मनुष्य गौरव दिन


19 ऑक्टोबर! प. पू. पांडुरंगशास्त्रींचा तथा पू. दादाजींचा जन्मदिवस. लक्ष्मीपूजनाचा आजचा दिवस ही त्यांची पुण्यतिथी सुद्धा. पू. दादा म्हणजे वैदिक आणि औपनिषदिक तत्त्वज्ञानाचे केवळ अभ्यासकच नव्हे; तर भाष्यकार. वसिष्ठ-याज्ञवल्क्यांसह सर्व ऋषींचं जीवनतीर्थ भावपूर्ण अंतःकरणाने सेवन करणारा आधुनिक ऋषी, वेदोपनिषद, दर्शनशास्त्रं, प्रस्थानत्रयी, न्याय-व्याकरण-मीमांसा इत्यादी शास्त्रग्रंथांचे गाढे अभ्यासक, स्वप्रज्ञा असलेले तत्वचिंतक, शंकराचार्य, मध्वाचार्य यांसह सर्व आचार्य, संत तुकाराम-ज्ञानेश्वर-एकनाथ-नरसी मेहता, तुलसीदास यांच्याप्रमाणेच सेंट निकोलस-सेंट मार्टिन वगैरे जगातील अनेक संत आणि संत साहित्याचे भाष्यकार, कालिदास-शेक्सपीअरसह अनेक देशीविदेशी नाटककारांचे रसग्राहक, भारतीय तत्वज्ञांबरोबरच साॅक्रेटिस, हेगेल, मार्क्स, व्हाइटहेड, रसेल, कांट, ड्यूरंड, देकार्त यांसह जगातील अनेक तत्त्वज्ञ-विचारवंताचे गाढे अभ्यासक आणि भाष्यकार, मार्क्स, एंगल्स, लेनिन इत्यादी साम्यवादी विचारवंतांच्या साहित्याचा-विचारांचा प्रगल्भ भाष्यकार, टेनिसन, मिल्टन, खलील जिब्रान, एच. वेल्स इत्यादी जगातील अनेक कवी-विचारवंत=साहित्यिक यांच्या साहित्याचा रसास्वाद घेणारा रसग्राही, इतिहास-तत्त्वज्ञानाचे राॅयल एशियाटिक लायब्ररीतील सर्व ग्रंथ वाचलेला एकमेव शास्त्री-पंडित-अभ्यासक, जगातील सर्व धर्मग्रंथांचा भाष्यकार, व्हॅटिकन सिटी आणि मध्य आशियातील अनेक चर्च-मशिदींमधून प्रवचन केलेले महापंडित, अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष, होली पोप, मध्य आशियातील शेख, इस्रायलचे राष्ट्राध्यक्ष-धर्मगुरू, जर्मनी, जपान, इंग्लंड आदी अनेक राष्ट्रांनी गौरवलेला महापंडित, साम्यवादी-समाजवादी विचारवंतांनी स्वीकारलेला हिंदू शास्त्री, विवेकानंदांप्रमाणे जपानची तत्त्वज्ञान परिषद गाजवलेला एकमेव भारतीय तत्त्वज्ञ, मॅगॅसेसे, टेम्पल्टन, लो.टिळक, गांधी, पद्मभूषण-पद्मविभूषण इत्यादी 100वर राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिळालेलं एकमेव भारतीय व्यक्तिमत्व, हाउस आॅफ लाॅर्ड्सनं खास जाहीर सन्मान केलेला एकमेव शास्त्री-पंडित… गतानुगतिक कर्मकांडात आणि ज्ञानकांडात अमूलाग्र परिवर्तन घडवून आणणारा, ऋषिप्रणित मूळ गंगोत्रीचं हजारो तासांच्या प्रवचनांमधून दर्शन घडविणारा दार्शनिक. याशिवाय सर्व धर्माच्या haves and have nots अशा दोन्ही घटकांना निरपेक्ष भावाने एकत्र आणणारा आणि त्यातून एक आचार-एक विचार-एक उपासना पद्धती देऊन सुमारे 3 कोटी स्वाध्यायींचा विशाल परिवार निर्माण करणारा आधुनिक महर्षी! भावभक्तीला कृतिभक्तीची यथार्थ जोड देऊन मूर्तिपूजेचं रहस्य पटवून देणारा महान योगी, सविकल्प आणि निर्विकल्प समाधीचा ऋषिप्रणित शास्त्रोक्त मार्ग दाखविणारे महान गुरू, शंकराचार्यांपासून शंकर अभ्यंकरांपर्यंत आणि पु.ल. देशपांडे यांच्यापासून शिरवाडकरांपर्यंत अनेक अभ्यासक आणि लेखक-विचारवंत ज्यांची आवर्जून भेट घ्यायचे असे आमचे पू. दादाजी! सुमारे दोन लाख गावांमधून स्वाध्याय क्रांती, 10000 वर योगेश्वर कृषी आणि कृतिभक्तीतून उभे राहिलेले हजारो ठिकाणचे इतर प्रयोग, brotherhood under the fatherhood of God हा विचार रुजवून शेवटच्या माणसाला ‘तत्तवमसि’ची अनुभूती देणारा सद्गुरु!

दादा, तुमच्या दैवी कार्याशी आम्ही जोडले गेलो हे आमचं महद्भाग्य! सर्व स्वाध्यायींना पू. दादाजींच्या जन्मदिनाबद्दल अर्थात मनुष्य गौरव दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा आणि जय योगेश्वर. – राजेन्द्र खेर/ सौ. सीमंतिनी खेर

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भगवती कालिया

एक गरीब एक दिन एक व्यक्ति के पास अपनी जमीन बेचने गया, बोला मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो.

व्यक्ति बोला, क्या कीमत है ?

गरीब बोला, 50 हजार रुपये.

व्यक्ति थोड़ी देर सोच कर बोला, वो ही खेत जिसमें ट्यूबवेल लगा है ?

गरीब: जी. आप मुझे 50 हजार से कुछ कम भी देंगे, तो जमीन आपको दे दूँगा.

व्यक्ति ने आँखें बंद कीं, 5 मिनट सोच कर बोला: नहीं, मैं उसकी कीमत 2 लाख रुपये दूँगा.

गरीब: पर मैं तो 50 हजार मांग रहा हूँ, आप 2 लाख क्यों देना चाहते हैं ?

व्यक्ति बोला, तुम जमीन क्यों बेच रहे हो ?

गरीब बोला, बेटी की शादी करना है इसीलिए मज़बूरी में बेचना है. पर आप 2 लाख क्यों दे रहे हैं ?

व्यक्ति बोला, मुझे जमीन खरीदनी है, किसी की मजबूरी नहीं. अगर आपकी जमीन की कीमत मुझे मालूम है तो मुझे आपकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना, मेरा वाहेगुरू कभी खुश नहीं होगा.

ऐसी जमीन या कोई भी साधन, जो किसी की मजबूरियों को देख के खरीदा जाये वो जिंदगी में सुख नहीं देता, आने वाली पीढ़ी मिट जाती है.

व्यक्ति ने कहा: मेरे मित्र, तुम खुशी खुशी, अपनी बेटी की शादी की तैयारी करो, 50 हजार की व्यवस्था हम गांव वाले मिलकर कर लेंगे, तेरी जमीन भी तेरी ही रहेगी.

मेरे भगवान ने भी अपनी बानी में यही हुक्म दिया है.

गरीब हाथ जोड़कर नीर भरी आँखों के साथ दुआयें देता चला गया।

ऐसा जीवन हम भी बना सकते हैं.

बस किसी की मजबूरी न खरीदें, किसी के दर्द, मजबूरी को समझ कर, सहयोग करना ही सच्चा तीर्थ है, एक यज्ञ है. सच्चा कर्म और बन्दगी है.

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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‘दशहरा’

‘दशहरा’ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “दस को हरने वाली [तिथि]”। “दश हरति इति दशहरा”। ‘दश’ कर्म उपपद होने पर ‘हृञ् हरणे’ धातु से “हरतेरनुद्यमनेऽच्” (३.२.९) सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय होकर ‘दश + हृ + अच्’ हुआ, अनुबन्धलोप होकर ‘दश + हृ + अ’, “सार्वधातुकार्धधातुकयोः” (७.३.८४) से गुण और ‘उरण् रपरः’ (१.१.५१) से रपरत्व होकर ‘दश + हर् + अ’ से ‘दशहर’ शब्द बना और स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘अजाद्यतष्टाप्‌’ से ‘टाप्’ (आ) प्रत्यय होकर ‘दशहर + आ’ = ‘दशहरा’ शब्द बना।

संस्कृत में यह शब्द गङ्गादशहरा के लिये और हिन्दी और अन्य भाषाओं में विजयादशमी के लिये प्रयुक्त होता है। दोनों उत्सव दशमी तिथि पर मनाए जाते हैं।

‘स्कन्द पुराण’ की ‘गङ्गास्तुति’ के अनुसार ‘दशहरा’ का अर्थ है “दस पापों का हरण करने वाली”। पुराण के अनुसार ये दस पाप हैं
१) “अदत्तानामुपादानम्” अर्थात् जो वस्तु न दी गयी हो उसे अपने लिये ले लेना
२) “हिंसा चैवाविधानतः” अर्थात् ऐसी अनुचित हिंसा करना जिसका विधान न हो
३) “परदारोपसेवा च” अर्थात् परस्त्रीगमन (उपलक्षण से परपुरुषगमन भी)
ये तीन “कायिकं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन शरीर-संबन्धी पाप हैं।

४) “पारुष्यम्” अर्थात् कठोर शब्द या दुर्वचन कहना
५) “अनृतम् चैव” अर्थात् असत्य कहना
६) “पैशुन्यं चापि सर्वशः” अर्थात् सब-ओर कान भरना (किसी की चुगली करना)
७) “असम्बद्धप्रलापश्च” अर्थात् ऐसा प्रलाप करना (बहुत बोलना) जिसका विषय से कोई संबन्ध न हो
ये चार “वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम्” अर्थात् चार वाणी-संबन्धी पाप हैं।

८) “परद्रव्येष्वभिध्यानम्” अर्थात् दूसरे के धन का [उसे पाने की इच्छा से] एकटक चिन्तन करना
९) “मनसानिष्टचिन्तनम्” अर्थात् मन के द्वारा किसी के अनिष्ट का चिन्तन करना
१०) “वितथाभिनिवेशश्च” अर्थात् असत्य का निश्चय करना, झूठ में मन को लगाए रखना
ये तीन “मानसं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन मन-संबन्धी पाप हैं।

जो तिथि इन दस पापों का हरण करती है वह ‘दशहरा’ है। यद्वा ‘दश रावणशिरांसि रामबाणैः हारयति इति दशहरा’ जो तिथि रावण के दस सिरों का श्रीराम के बाणों द्वारा हरण कराती है वह दशहरा है। रावण के दस सिरों को पूर्वोक्त दस शरीर, वाणी, और मन संबन्धी पापों का प्रतीक भी समझा जा सकता है।

अस्तु, आपको दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

#Nidhi Tiwari

Posted in रामायण - Ramayan

रघुनंरघु नन्दन मिश्र जी के सौजन्य से
राम कथा के दर्शन थाई लैंड से
भारत के बाहर थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है l वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट “भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम कहा जाता है l*

भगवान राम का संक्षिप्त इतिहास
वाल्मीकि रामायण एक धार्मिक ग्रन्थ होने के साथ एक ऐतिहासिक ग्रन्थ भी है , क्योंकि महर्षि वाल्मीकि राम के समकालीन थे, रामायण के बालकाण्ड के सर्ग, 70 / 71 और 73 में राम और उनके तीनों भाइयों के विवाह का वर्णन है, जिसका सारांश है।

मिथिला के राजा सीरध्वज थे, जिन्हें लोग विदेह भी कहते थे उनकी पत्नी का नाम सुनेत्रा ( सुनयना ) था, जिनकी पुत्री सीता जी थीं, जिनका विवाह राम से हुआ था l राजा जनक के कुशध्वज नामके भाई थे l इनकी राजधानी सांकाश्य नगर थी जो इक्षुमती नदी के किनारे थी l इन्होंने अपनी बेटी उर्मिला लक्षमण से, मांडवी भरत से, और श्रुतिकीति का विवाह शत्रुघ्न से करा दी थी l केशव दास रचित ”रामचन्द्रिका“ पृष्ठ 354 (प्रकाशन संवत 1715) के अनुसार, राम और सीता के पुत्र लव और कुश, लक्ष्मण और उर्मिला के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु , भरत और मांडवी के पुत्र पुष्कर और तक्ष, शत्रुघ्न और श्रुतिकीर्ति के पुत्र सुबाहु और शत्रुघात हुए थे l

भगवान राम के समय ही राज्यों बँटवारा
पश्चिम में लव को लवपुर (लाहौर ), पूर्व में कुश को कुशावती, तक्ष को तक्षशिला, अंगद को अंगद नगर, चन्द्रकेतु को चंद्रावतीl कुश ने अपना राज्य पूर्व की तरफ फैलाया और एक नाग वंशी कन्या से विवाह किया था l थाईलैंड के राजा उसी कुश के वंशज हैंl इस वंश को “चक्री वंश कहा जाता है l चूँकि राम को विष्णु का अवतार माना जाता है, और विष्णु का आयुध चक्र है इसी लिए थाईलेंड के लॉग चक्री वंश के हर राजा को “राम” की उपाधि देकर नाम के साथ संख्या दे देते हैं l जैसे अभी राम (9 th ) राजा हैं जिनका नाम “भूमिबल अतुल्य तेज ” है।

थाईलैंड की अयोध्या
लोग थाईलैंड की राजधानी को अंग्रेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं, क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है , इसका नाम संस्कृत शब्दों से मिल कर बना है, देवनागरी लिपि में पूरा नाम इस प्रकार है “क्रुंग देव महानगर अमर रत्न कोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महा तिलक भव नवरत्न रजधानी पुरी रम्य उत्तम राज निवेशन महास्थान अमर विमान अवतार स्थित शक्रदत्तिय विष्णु कर्म प्रसिद्धि ”

थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों का प्रयोग किया गया हैl इस नाम की एक और विशेषता ह l इसे बोला नहीं बल्कि गा कर कहा जाता हैl कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l

असली राम राज्य थाईलैंड में है
बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं, इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहां के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है, थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई।

भगवान राम के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाई शाही परिवार के सदस्यों के सम्मुख थाई जनता उनके सम्मानार्थ सीधे खड़ी नहीं हो सकती है बल्कि उन्हें झुक कर खडे़ होना पड़ता है. उनकी तीन पुत्रियों में से एक हिन्दू धर्म की मर्मज्ञ मानी जाती हैं।

थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है
यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं, फिर भी वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है l जिसे थाई भाषा में ”राम कियेन” कहते हैं l जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है l इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी, जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था l थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रिय ग्रन्थ घोषित करना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि वहां भारत की तरह दोगले हिन्दू नहीं है, जो नाम के हिन्दू हैं, हिन्दुओं के दुश्मन यही लोग हैं l

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है l राम कियेन के मुख्य पात्रों के नाम इस प्रकार हैं-
1. राम (राम)
2. लक (लक्ष्मण)
3. पाली (बाली)
4. सुक्रीप (सुग्रीव)
5. ओन्कोट (अंगद)
6. खोम्पून ( जाम्बवन्त )
7. बिपेक ( विभीषण )
8. तोतस कन (दशकण्ठ) रावण
9. सदायु ( जटायु )
10. सुपन मच्छा (शूर्पणखा)
11. मारित ( मारीच )
12. इन्द्रचित (इंद्रजीत) मेघनाद

थाईलैंड में हिन्दू देवी देवता
थाईलैंड में बौद्ध बहुसंख्यक और हिन्दू अल्प संख्यक हैं l वहां कभी सम्प्रदायवादी दंगे नहीं हुए l थाई लैंड में बौद्ध भी जिन हिन्दू देवताओं की पूजा करते है, उनके नाम इस प्रकार हैं
1. ईसुअन (ईश्वन) ईश्वर शिव
2. नाराइ (नारायण) विष्णु
3. फ्रॉम (ब्रह्म) ब्रह्मा
4. इन ( इंद्र )
5. आथित (आदित्य) सूर्य
6 . पाय ( पवन ) वायु

थाईलैंड का राष्ट्रीय चिन्ह गरुड़
गरुड़ एक बड़े आकार का पक्षी है, जो लगभग लुप्त हो गया है l अंगरेजी में इसे ब्राह्मणी पक्षी (The Brahminy Kite ) कहा जाता है, इसका वैज्ञानिक नाम “Haliastur Indus” है l फ्रैंच पक्षी विशेषज्ञ मथुरिन जैक्स ब्रिसन ने इसे सन 1760 में पहली बार देखा था, और इसका नाम Falco Indus रख दिया था, इसने दक्षिण भारत के पाण्डिचेरी शहर के पहाड़ों में गरुड़ देखा था l इस से सिद्ध होता है कि गरुड़ काल्पनिक पक्षी नहीं है l इसीलिए भारतीय पौराणिक ग्रंथों में गरुड़ को विष्णु का वाहन माना गया है l चूँकि राम विष्णु के अवतार हैं, और थाईलैंड के राजा राम के वंशज है, और बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं, इसलिए उन्होंने ”गरुड़” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है l यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है।

सुवर्णभूमि हवाई अड्डा
हम इसे हिन्दुओं की कमजोरी समझें या दुर्भाग्य, क्योंकि हिन्दू बहुल देश होने पर भी देश के कई शहरों के नाम मुस्लिम हमलावरों या बादशाहों के नामों पर हैं l यहाँ ताकि राजधानी दिल्ली के मुख्य मार्गों के नाम तक मुग़ल शाशकों के नाम पर हैं l जैसे हुमायूँ रोड, अकबर रोड, औरंगजेब रोड इत्यादि, इसके विपरीत थाईलैंड की राजधानी के हवाई अड्डे का नाम सुवर्ण भूमि हैl यह आकार के मुताबिक दुनिया का दूसरे नंबर का एयर पोर्ट है l इसका क्षेत्रफल 563,000 स्क्वेअर मीटर है। इसके स्वागत हाल के अंदर समुद्र मंथन का दृश्य बना हुआ हैl पौराणिक कथा के अनुसार देवोँ और ससुरों ने अमृत निकालने के लिए समुद्र का मंथन किया था l इसके लिए रस्सी के लिए वासुकि नाग, मथानी के लिए मेरु पर्वत का प्रयोग किया था l नाग के फन की तरफ असुर और पुंछ की तरफ देवता थेl मथानी को स्थिर रखने के लिए कच्छप के रूप में विष्णु थेl जो भी व्यक्ति इस ऐयर पोर्ट के हॉल जाता है वह यह दृश्य देख कर मन्त्र मुग्ध हो जाता है।

इस लेख का उदेश्य लोगों को यह बताना है कि असली सेकुलरज्म क्या होता है, यह थाईलैंड से सीखो l अपनी संस्कृति की उपेक्षा कर के कोई भी समाज अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकती।
आजकल सेकुलर गिरोह के मरीच सनातन संस्कृति की उपेक्षा और उपहास एक सोची समझी साजिश के तहत कर रहे हैं और अपनी संस्कृति से अनजान नवीन पीढ़ी अन्धो की तरह उनका अनुकरण कर रही है।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बाप के दो बेटे थे। बडा तो बड़ा योग्य था,
कुशल था, साधुचरित्र था, आचरणवान था,
पिता का बड़ा आदर करता था,

छोटा एकदम लंपट था, जुआरी था, शराबी था,
पिता के प्रति कोई आदर का भाव भी नहीं था,
सुनता भी नहीं था, किसीकी मानता भी नहीं था,
बगावती था, उपद्रवी भी था। अंतत:

एक दिन छोटे बेटे ने कहा कि हमें अलग—अलग
कर दें क्योंकि मैं यह बकवास रोज—रोज नहीं
सुनना चाहता कि तुम क्या करो और क्या न करो!

मुझे जो करना है वही मैं करूँगा।
मुझे जो होना है वही मैं होऊँगा।
हमारा बँटवारा कर दें।

बाप ने भी सोचा कि झगड़ा होगा मेरे जाने के बाद,
इन दोनों बेटों में बहुत उपद्रव मचेगा,
क्योंकि दोनों बिल्कुल दो अलग दिशाओं की
तरफ यात्रा कर रहे हैं, उसने बँटवारा कर दिया।

छोटा बेटा तो धन लेकर शहर चला गया।
क्योंकि धन गाँव में अगर हो भी तो क्या करो?
छोटे—मोटे गाँव में धन का करोगे क्या?
गाँव का धनी और गाँव के गरीब में
कोई बहुत फर्क नहीं होता। हो ही नहीं सकता,
क्योंकि वहाँ उपाय नहीं है।
धन का फर्क तो शहर में होता है, वहाँ उपाय है।

जैसे ही उसे धन हाथ लगा,
वह तो शहर की तरफ चला गया,
दस साल फिर लौटा ही नहीं।
खबरें आती रहीं कि सब बरबाद
कर दिया उसने जुए में, शराब में,
वेश्यालयों में। फिर खबरें आने लगीं
कि अब तो वह भीख माँगने लगा।

फिर खबरें आने लगीं कि अब तो रुग्ण हो गया है,
देह जर्जर हो गयी है, अब मरा तब मरा की हालत है।
बाप बड़ा चिंतित है। रात उसे नींद नहीं आती।
सोचता ही रहता है।

एक दिन खबर आयी कि बेटा वापिस आ रहा है।
बेटे ने सोचा एक दिन—भीख माँगने खड़ा था
एक द्वार पर और इन्कार कर दिया गया;

बड़ा महल था, महल देख कर उसे
अपने घर की याद आयी,
उसके पास भी बड़ा महल था,
ऐसे ही नौकर—चाकर उसके पास भी थे,
और आज यह दशा हो गयी उसकी
कि भीख माँगने खड़ा है और
नौकर—चाकर भगा दिये हैं—

उसने सोचा लौट जाऊँ।
क्षमा माँग लूंगा और पिता से कहूँगा,
तुम्हारा बेटा होने के तो मैं योग्य नहीं हूँ,
इसलिए बेटे की तरह वापिस नहीं आया हूँ,
एक नौकर की तरह मुझे भी रख लो;
इतने नौकर हैं तुम्हारे घर में,
एक मैं भी नौकर की तरह पड़ा रहूँगा।
ऐसा सोच घर की तरफ वापिस चला।

बाप को पता चला तो बाप ने
बड़े सुस्वादु भोजन बनवाए
और सारे गाँव को भोज पर
आमंत्रित किया—बेटा वापिस लौट रहा है।
बैडंबाजे बजवाए, संगीत का आयोजन किया,

जो भी श्रेष्ठतम संभव हो सकता था—
गाँव में दीये जलवा दिये, फूलों से द्वार सजाया।
बड़ा बेटा तो खेत पर काम करने गया है,
वह जब साँझ को लौट रहा था उसे
गाँव में बड़ा शोरगुल और बड़ा उत्सव मालूम पड़ा,

उसने लोगों से पूछा—बात क्या है?
किसी ने कहा—बात क्या है, अन्याय है,
बात क्या है!

तुम्हें जिंदगी हो गयी इस बूढ़े का
पैर दबाते—दबाते, इसकी ही सेवा में रत रहे,
तुम्हारा कभी स्वागत नहीं किया गया—
न बंदनवार बाँधे गये, न बाजे बजे,
न तुम्हारे लिए भोजन बनाये गये,
न तुम्हारे लिए भोज दिये गये,
आज सुपुत्र घर आ रहा है!
तुम्हारे छोटे भाई वापिस लौट रहे हैं।
राजकुमार वापिस लौट रहे हैं! —
सब बर्बाद करके। और यह अन्याय है।
यह उसके स्‍वागत में इंतजाम किया जा रहा है।

बडे भाई को भी चोट लगी।
बात सीधी—साफ थी, गणित की थी
कि यह अन्याय है। गुस्से में आया घर,
बाप से जाकर कहा कि मैं कभी
आपसे मुँह उठा कर नहीं बोला,
लेकिन आज सीमा के बाहर बात हो गयी,
आज मुझे कहना ही होगा,
आज मेरी शिकायत सुननी ही होगी,
यह मेरे साथ अन्याय हो रहा है।

बाप ने कहा— तू नाहक गरम हो रहा है।
तू तो मेरा है, तू तो मेरे साथ एक है।
तेरी मैने कभी चिंता नहीं की।
चिंता का कोई कारण तूने नहीं दिया।
इसलिए तेरा कभी स्वागत भी नहीं किया—
स्वागत की कोई जरूरत न थी।
तेरा तो स्वागत है ही।

लेकिन जो भटक गया था,
वह वापिस लौट रहा है। तू अन्याय मत समझ।
जो भटक गया था उसका वापिस
लौटना स्वागत के योग्य है।
वह इस घर में ऐसा आए भिखमंगे की तरह,
तो शुभ न होगा। अपना सारा मान,
अपनी सारी मर्यादा खोकर लौट रहा है,
उसे मान वापिस देना है, मर्यादा वापिस देनी है।
उसका सम्मान उसे वापिस देना है,
उसका आत्मगौरव उसे वापिस देना है।
अन्यथा वह इस घर में गौरवहीन होकर आएगा।

सब बर्बाद कर के आ रहा है,
मुझे मालूम है। उचित तू जो कहता है वही था,
गाँव भी यही कह रहा है कि उचित यही था
कि उसके साथ यह सद्व्यवहार न किया जाए,
लेकिन मैं कुछ और देखता हूँ।

यह सद्व्यवहार उसकी आत्म—प्रतिष्ठा बन जाएगा,
वह फिर अपने गौरव को पा लेगा।
वह फिर अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा।
और एक बात का उसे भरोसा आ जाएगा
कि बुरे हो कि भले, इसका बाप को फर्क नहीं पड़ता।

प्रेम बुरे और भले का फर्क नहीं करता। प्रेम बेशर्त है।

ओशो : संतो मगन भया मन मेरा–(प्रवचन–17)

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नया मन्दिर बन रहा था, उस गाँव में वैसे ही बहुत मन्दिर थे! आदमियों को रहने की जगह नहीं है, भगवान के लिए मन्दिर बनते चले जाते हैं! और भगवान का कोई पता नहीं है कि वो रहने को कब आएँगे कि नहीं आएँगे, आएँगे भी कि नहीं आएँगे, उनका कुछ पता नहीं है.

नया मन्दिर बनने लगा तो मैंने उस मन्दिर को बनाने वाले कारीगरों से पूछा कि, “बात क्या है? बहुत मन्दिर हैं गाँव में, भगवान का कहीं पता नहीं चलता, और एक किसलिए बना रहे हो?”

बूढ़ा था कारीगर, अस्सी साल उसकी उम्र रही होगी, बामुश्किल मूर्ति खोद रहा था. उसने कहा कि, “आपको शायद पता नहीं कि मन्दिर भगवान के लिए नहीं बनाए जाते.”

मैंने कहा, “बड़े नास्तिक मालूम होते हो. मन्दिर भगवान के लिए नहीं बनाए जाते तो और किसके लिए बनाए जाते हैं?”

उस बूढ़े ने कहा, “पहले मैं भी यही सोचता था. लेकिन ज़िन्दगी भर मन्दिर बनाने के बाद इस नतीजे पे पहुँचा हूँ कि भगवान के लिए इस ज़मीन पर एक भी मन्दिर कभी नहीं बनाया गया.”

मैंने कहा, “मतलब क्या है तुम्हारा?”

उस बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा कि, “भीतर आओ.”

और बहुत कारीगर काम करते थे. लाख़ों रुपए का काम था. क्योंकि कोई साधारण आदमी मन्दिर नहीं बना रहा था. सबसे पीछे, जहाँ पत्थरों को खोदते कारीगर थे, उस बूढ़े ने ले जाके मुझे खड़ा कर दिया एक पत्थर के सामने और कहा कि, “इसलिए मन्दिर बन रहा है!”

उस पत्थर पर मन्दिर को बनाने वाले का नाम स्वर्ण-अक्षरों में खोदा जा रहा है.

उस बूढ़े ने कहा, ‘सब मन्दिर इस पत्थर के लिए बनते हैं. असली चीज़ ये पत्थर है, जिसपे नाम लिखा रहता है कि किसने बनवाया. मन्दिर तो बहाना है इस पत्थर को लगाने का. ये पत्थर असली चीज़ है, इसकी वजह से मन्दिर भी बनाना पड़ता है. मन्दिर तो बहुत महँगा पड़ता है, लेकिन इस पत्थर को लगाना है तो क्या करें, मन्दिर बनाना पड़ता है.”

मन्दिर पत्थर लगाने के लिए बनते हैं जिनपे खुदा है कि किसने बनाया! लेकिन मन्दिर बनाने वाले को शायद होश नहीं होगा कि ये मन्दिर भीड़ के चरणों में बनाया जा रहा है, भगवान के चरणों में नहीं. इसीलिए तो मन्दिर हिन्दू का होता है, मुसलमान का होता है, जैन का होता है. मन्दिर भगवान का कहाँ होता है?’

ओशो

(संभोग से समाधि की ओर)♣️

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દીકરી મારી લાડકવાઇ♥️*

*👩‍💼દીકરી👩‍💼*

એક નગરમાં રાજા એ
ફરમાન કરેલું કે
આ નગર ના કોઈ પુરુષે
કદી ખોંખારો ખાવો નહીં,
ખોંખારો ખાવો એ
મર્દનું કામ છે અને
આપણા નગર માં
મર્દ એકમાત્ર રાજા છે ?
બીજો કોઈ પણ
ખોંખારો ખાશે તો
તેણે એક સોના ની
ગીનિ નો દંડ ભરવો પડશે.
નગર માં સૌએ ખોંખારો
ખાવાનું બંધ કરી દીધું,
પણ એક મર્દ બોલ્યો
“ખોંખારો ખાવો એ તો
મર્દનો જન્મસિદ્ધ હક છે,
હું ખોંખારો ખાઈશ.”
તે મર્દ દરરોજ
રાજમહેલ પાસે થી
પસાર થાય, ખોંખારો ખાય
અને એક ગીનિનો દંડ
ચૂકવીને આગળ ચાલે,
બે-ત્રણ વરસ વીત્યાં,,
એક વખત તે મર્દ ત્યાંથી
ખોંખારો ખાધા વગર જ
ચૂપચાપ ચાલવા માંડ્યો,,
કોઈએ પૂછ્યું,
‘ભાઈ, શું થયું?
રૂપિયા ખૂટી પડ્યા કે
મર્દાનગી ઊતરી ગઈ?
આજે તમારો ખોંખારો
કેમ શાંત થઈ ગયો?’
પેલો મર્દ બોલ્યો,
‘આજે મારે ઘેર
દીકરી નો જન્મ થયો છે,
આપણા સમાજ માં
દીકરીના બાપને
*મર્દાનગી*
બતાવવાનું નથી શોભતું,
*દુનિયાના વહેવારો માં “*
*દીકરીના બાપે ખોંખારા નહીં,”*
*ખામોશી ખાવાની હોય છે,,*
મારી પાસે રૂપિયાય નથી ખૂટયા કે
મારી મર્દાનગી પણ
નથી ઊતરી ગઈ, પણ
*દીકરી ના બાપ ને “*
*ખોંખારા ન શોભે,”*
*ખાનદાની શોભે,*
મારે ઘેર દીકરી એ જન્મ લઈ ને
મારી ખુમારી ના માથે
ખાનદાનીનો મુગટ મૂક્યો છે !!
દીકરી ના બાપ થવા નું
સદભાગ્ય
*ભગવાન શંકર, “*
*રામ અને કૃષ્ણનેય નથી મળ્યું”*
કદાચ એટલે જ એમણે
*ત્રિશૂલ, ધનુષ્ય અને સુદર્શન ચક્ર “*
જેવાં હથિયારો
હાથમાં લેવાં પડ્યાં હશે,
શસ્ત્ર પણ શક્તિ છે,,
*શક્તિ સ્ત્રીલિંગ છે,*
દીકરી ની શક્તિ ન મળી હોય
તેણે શસ્ત્રથી ચલાવી લેવું પડે છે,
ભગવાન *મહાવીર* “ને
દીકરી હતી,,
એનું નામ *પ્રિયદર્શના “*
મહાવીરે શસ્ત્ર હાથ માં ન લીધું,
તેમણે જગતને
*કરુણા* નું
શાસ્ત્ર આપ્યું,,
સંસારને કાં તો
*શસ્ત્ર* જોઈએ કાં તો
*શાસ્ત્ર* જોઈએ.
*દીકરી હોય ત્યાં “*
*શસ્ત્ર ની ગરજ ટળી જાય,,,,,!!*
*🙋‍♂🌹👌🏼દીકરી મારી લાડકવાઇ♥️* આપણા પરીવારની દરેક દીકરીઓને સમર્પિત 👆🏼👑💐👏🏼