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संजय गुप्ता

मैं ही राम,मैं ही रावण !

“मैं सिटी हॉस्पिटल से बोल रही हूँ ।आप मि.मुदित की माँ बोल रही हैं?”……फोन पर ये चंद शब्द सुनते ही मीरा की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा और ऐसा लगा जैसे वो अभी चक्कर खाकर गिर जाएगी। पर अगले ही पल दिल को मजबूत कर ,गला खँखारते हुए उसने पूछा ,”जी कहिए, मैं मुदित की माँ हूँ। क्या बात हुई ? “” घबराने की बात नहीं है। सुबह मि.मुदित एक एक्सीडेंट विक्टिम को लेकर अस्पताल आए थे। उन्हें मामूूूली चोटें आईं हैं पर अत्यधिक खून बह जाने के कारण विक्टिम की हालत बेहद नाजुक है।मि. मुदित ने रक्तदान किया है। वो ठीक हैंं, आप चाहें तो उन्हें आकर ले जा सकती हैंं।” मीरा का माथा ठनका।आज सुबह ही तो उसने दही चीनी खिलाकर बेटे को स्नातक परीक्षा के अंतिम पेपर के लिए विदा किया था और अभी ये अस्पताल कैसे पहुँच गया?पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसने बड़ी कठिनाइयों से जूझते हुए अपने इकलौते बेटे मुदित को पाल पोस कर बड़ा किया है। ईश्वर की असीम अनुकंपा रही कि बेटा शुरू से मेधावी छात्र रहा और साल दर साल अच्छे अंकों से इम्तिहान पास करते हुए आज यहाँ तक पहुँचा। कितनी मुश्किलोंं का सामना करते हुए उसने बेटे की ट्यूशन और परीक्षा फीस तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का इंतजाम किया था। पर , ना जाने जब सब कुछ सुलझता हुआ सा दिख रहा था तो कहाँ से ये घना कोहरा आ गया। अपनी फूटी किस्मत को कोसती और बेटे पर गुस्साते हुए मीरा ने वार्ड में प्रवेश किया। “ये क्या किया तुमने ? परीक्षा छूट गई तुम्हारी ? साल बर्बाद हो गया ? क्या पड़ी थी समाज सेवा करने की ?” मीरा ने भर्राए गले से बेटे सेे पूछा।”माँ, माँ, माँ ….. तुम कैसी बातें कर रही हो ? मैंने जीवन भर तुम्हें उस एक एक्सीडेंट की आग में झुलसते देखा है। काश , पापा को किसी भलेमानस ने सही समय पर अस्पताल पहुँचा दिया होता ! और तुम ऐसा बोल रही हो ?” The New Johnson’s ” पुरानी बातों को छोड़ो। वो हमारे भाग्य का दोष था। पर आज तुमने अपने सुनहरे भविष्य के बारे में और मेरे बारे में एक बार भी नहीं सोचा ?””क्या बोल रही हो माँ ? तुमने ही तो सिखाया है जेंटलमैन बनो, पढ़े लिखे विद्वान से भी ज्यादा जरूरी है सज्जन पुरूष बनो और अब तुम ही……. !” तभी कमरे में उस बच्ची के माता-पिता ने हाथ जोड़े प्रवेश किया। विगत एक घंटे ने ही उन्हें मानो सालों का वृद्ध ,बेसहारा और असहाय बना दिया था। लेकिन अभी उनकी आँखों में आशा की चमक थी। उन्होंने विनम्र शब्दों में कहा, “बिटिया खतरे से बाहर है। बेटे हम जन्म जन्मांतर के लिए तुम्हारे ऋणी हो गए। तुमने हमारे ऊपर बहुत बड़ा एहसान किया। धन्य है वो माँ जिसने ऐसे सपूत को पैदा किया। “और फिर उन दोनों ने आशीर्वादों और दुआओं की झड़ी लगा दी माँ-बेटे के लिए।मीरा निःशब्द होकर उन्हें नीहार रही थी। सहृदया और उदार मीरा को खुद अपने अस्तित्व पर क्षोभ हो रहा था। आज उसके बेटे ने माँ के दूध की सच्ची कीमत देकर “अपनी माँ” के ओहदे को गर्वान्वित कर दिया था, किसी को जीवनदान देकर। पर स्वार्थ की मारी मीरा, उसे यह पुण्य कार्य नहीं दिख रहा था। उसका मन अंदर अंदर ही अंदर आत्ममंथन कर रहा था और नेत्रों से अनवरत आँसू बह रहे थे और वह बुदबुदा रही थी ……….मैं ही ‘राम’और मैं ही ‘रावण !’……

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