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संजय गुप्ता

मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई!!!!!!!

मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात में श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष भगवती महाशक्ति प्रकट हो गईं। देवी उस समय सिंह पर बैठी हुईं थीं।…

श्रीराम ने किष्किंधा पर्वत पर किया था शारदीय नवरात्र व्रत। उनके व्रत-अनुष्ठान का क्या था प्रयोजन? मान्यता है कि शारदीय नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई और रावण पर विजय भी। इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है।

मार्कंडेयपुराण के अनुसार, ‘दुर्गासप्तशतीÓ में स्वयं भगवती ने इस समय शक्ति-पूजा को महापूजा बताया है। अन्य धर्मग्रंथों में भी शारदीय नवरात्र की महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी अजेय रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए इस व्रत का विधिवत अनुष्ठान किया था।

रावण ने सीता का हरण कर लिया, जिससे श्रीराम दुखी और चिंतित थे। किष्किंधा पर्वत पर वे लक्ष्मण के साथ रावण को पराजित करने की योजना बना रहे थे। उनकी सहायता के लिए उसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे।

उन्हें आया देखकर श्रीराम उठ खड़े हुए। उन्होंने नारद को आसन पर बैठाकर उनका स्वागत किया। श्रीराम को दुखी देखकर देवर्षि बोले, ‘राघव! आप साधारण लोगों की भांति दुखी क्यों हैं? दुष्ट रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है- यह बात मुझे मालूम है। अपने सिर पर मंडराती हुई मृत्यु को न जानने के कारण ही उसने यह कुकर्म किया है। रावण का वध ही आपके अवतार का प्रयोजन है, इसीलिए सीता का हरण हुआ है।

रावण के वध का उपाय बताते हुए देवर्षि नारद ने श्रीराम को यह परामर्श दिया, ‘आश्विन मास के नवरात्र-व्रत का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करें। नवरात्र में उपवास, भगवती-पूजन, मंत्र का जप और हवन मनोवांछित सिद्धि प्रदान करता है। पूर्वकाल में ब्रह्म, विष्णु, महेश और देवराज इंद्र भी इसका अनुष्ठान कर चुके हैं। किसी विपत्ति या कठिन समस्या में घिर जाने पर मनुष्य को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। भृगु, वसिष्ठ, कश्यप और विश्वमित्र जैसे ऋषि भी इस व्रत का अनुष्ठान कर चुके हैं।

नारद ने संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाली उस महाशक्ति का परिचय राम को देते हुए बताया कि वे सभी जगह विराजमान रहती हैं। उनकी कृपा से ही समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं। आराधना किए जाने पर भक्तों के दुखों को दूर करना उनका स्वाभाविक गुण है। त्रिदेव-ब्रह्म,विष्णु, महेश उनकी दी गई शक्ति से सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार करते हैं।

श्रीराम ने देवर्षि नारद से नवरात्र के व्रत और देवी की उपासना की विधि पूछी। इस पर वे बोले- ‘राम! समतल भूमि पर एक सिंहासन रखकर उस पर भगवती जगदंबा को विराजमान कर दें। नौ दिनों तक उपवास रखते हुए उनकी आराधना करें। पूजा विधिपूर्वक होनी चाहिए। आप के इस अनुष्ठान का मैं आचार्य बनूंगा। आपका प्रयोजन शीघ्र सिद्ध हो, इसके लिए मेरे मन में प्रबल उत्साह उत्पन्न हो रहा है।

राम ने नारद के निर्देश पर एक उत्तम सिंहासन बनवाया और उस पर कल्याणमयी भगवती जगदंबा की मूर्ति विराजमान की। नवरात्र में व्रत रखकर श्रीराम ने विधि-विधान के साथ देवी-पूजन किया। श्रीराम ने नौ दिनों तक उपवास करते हुए सभी नियमों का पालन भी किया। उनके साथ लक्ष्मण ने भी यह नवरात्र-व्रत किया।

मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात में श्रीराम और लक्ष्मण के समक्ष भगवती महाशक्ति प्रकट हो गईं। देवी उस समय सिंह पर बैठी हुईं थीं। पर्वत के ऊंचे शिखर पर विराजमान होकर भगवती ने प्रसन्न-मुद्रा में कहा- ‘श्रीराम! मैं आपके व्रत से संतुष्टï हूं।

जो आपके मन में है, वह मुझसे मांग लें। सभी जानते हैं कि रावण-वध के लिए ही आपने पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। आप भगवान विष्णु के अंश से प्रकट हुए हैं और लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं। सभी वानर देवताओं के ही अंश हैं, जो युद्ध में आपके सहायक होंगे। इन सबमें मेरी शक्ति निहित है। आप अवश्य रावण का वध कर सकेंगे। अवतार का प्रयोजन पूर्ण हो जाने के बाद आप अपने परमधाम चले जाएंगे।

इस प्रकार श्रीराम के शारदीय नवरात्र-व्रत से प्रसन्न भगवती उन्हें मनोवांछित वर देकर अंतर्धान हो गईं। महाशक्ति से वरदान पाकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और युद्ध में असत्य के प्रतीक रावण का वध किया।

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