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संजय गुप्ता

(((( श्री श्वपच वाल्मीकि जी ))))
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श्वपच वाल्मीकि नामक एक भगवान् के बड़े भारी भक्त थे, वे अपनी भक्ति को गुप्त ही रखते थे।
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एक बार की बात है, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमें इतने ऋषि-महर्षि पधारे कि सम्पूर्ण यज्ञ स्थल भर गया
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भगवान् श्रीकृष्ण ने वहां एक शंख स्थापित किया और कहा कि यज्ञ के सांगोपांग पूर्ण हो जाने पर यह शंख बिना बजाये ही बजेगा।
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यदि नहीं बजे तो समझिये कि यज्ञ में अभी कुछ त्रुटि है, यज्ञ पूरा नही हुआ। वही बात हुई।
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पूर्णाहुति, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणादि सभी कर्म विधिसमेत सम्पन्न हो गये, परंतु वह शंख नहीं बजा।
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तब सबको बड़ी चिन्ता हुई कि इतने श्रम के बाद भी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। सभी लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कहा कि
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प्रभो ! आप कृपा करके बताइये कि यज्ञ में कौन-सी कमी रह गयी है। भगवान् श्री कृष्ण बोले-शंख न बजने का रहस्य सुनिये
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यद्यपि ऋषियों के समूह से चारों दिशाएँ, सम्पूर्ण भूमि भर गयी है और सभी ने भोजन किया है, परंतु किसी रसिक वैष्णव सन्त ने भोजन नहीं किया है,
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यदि आप लोग यह कहें कि इन ऋषियों में क्या कोई भक्त नहीं है तो मैं ‘नही ’ कैसे कहूँ, अवश्य इन ऋषियों में बहुत उत्तम-उत्तम भक्त हैं,
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फिर भी मेरे हृदय की एक गुप्त बात यह है कि मैं सर्वश्रेष्ठ रसिक वैष्णव भक्त उसे मानता हूँ, जिसे अपनी जाति, विद्या, ज्ञान आदि का अहंकार बिल्कुल न हो और अपने जो दासों का दास मानता हो,
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यदि यज्ञ पूर्ण करने की इच्छा है तो ऐसे भक्त को लाकर जिमाइये।
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भगवान् की यह बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा – प्रभो ! सत्य है, पर ऐसा भगवद्भक्त हमारे नगर के आस-पास कहीं भी दिखायी नहीं देता है।
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जिसमें अहंकार की गन्ध न हो-ऐसा भक्त तो किसी दूसरे लोक में भले ही मिले।
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भगवान् ने कहा – नहीं, तुम्हारे नगर में ही रहता है। दिन-रात, प्रातः-सायं तुम्हारे यहाँ आता-जाता भी है, पर उस कोई जानता नहीं है और वह स्वयं अपने को प्रकट भी नहीं करता है।
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यह सुनकर सभी आश्चर्य से चौंक उठे और बोले-प्रभो ! कृपया शीघ्र ही बताइये, उनका क्या नाम है और कहाँ स्थान है ? जहाँ जाकर हम उनका दर्शन करके अपने को सौभाग्यशाली बनाये।
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भगवान् ने कहा – श्वपच भक्त वाल्मीकि के घर को चले जाओ, वे सर्वविकार रहित सच्चे साधु हैं।
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अर्जुन और भीमसेन दोनों ही भक्त वाल्मीकि जी को निमन्त्रण देने के लिये उनके घर जाने को तैयार हुए।
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जब भगवान् ने उन्हें सतर्क करते हुए हृदय की बात खोलकर कही- जाते तो हो पर सावधान रहना, भक्तों की भक्ति का भाव अत्यन्त दुर्लभ और गम्भीर है,
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उनको देखकर मन में किसी प्रकार का विकार न लाना, अन्यथा तुम्हारी भक्ति में दोष आ जायगा।
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दोनों ने भक्त वाल्मीकि के घर पहुँचकर उसके चारों ओर घूमकर उसकी प्रदक्षिणा की। आनन्द से झूमते हुए पृथ्वी पर पड़कर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया ।
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भीतर जाकर देखा तो उनका उपासना गृह बड़ा सुन्दर था। वाल्मीकिजी ने जब दोनों राज-राजाओं को आया देख तो उन्होंने सब काम छोड़ दिये।
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लज्जा एवं संकोच वश काँपने लगे, उनका मन विह्नल हो गया।
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अर्जुन और भीमसेन ने सविनय निवेदन किया – भक्तवर ! कल आप हमारे घर पर पधारिये और वहाँ अपनी जूठन गिराकर हमारे पापग्रहों को दूर कीजिये। हम सबको परम भाग्यशाली बनाइये।
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दोनों को निमन्त्रण देते तथा अपनी बड़ाई करते हुए सुनकर वाल्मीकि जी कहने लगे
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अजी ! हम तो सदा से आपकी जूठन उठाते हैं और आपके द्वार पर झाडू लगाते हैं। मेरा निमन्त्रण कैसा ?
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पहले आप भोग भोजन कीजियेगा, फिर पीछे से हमें अपनी जूठन दीजियेगा।
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अर्जुन-भीमसेन ने कहा – आप यह क्या कह रहे हैं ? पहले आप भोजन कीजियेगा, फिर पीछे से हमें कराइयेगा।
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बिना आपको खिलाये हम लोग नहीं खायेंगे। दूसरी बात भूलकर भी मन में न सोचिये। वाल्मीकि जी ने कहा-बहुत अच्छी बात, यदि आपके मन में ऐसा है तो ऐसा ही होगा।
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अर्जुन और भीमसेन ने लौटकर राजा युधिष्ठिर से वाल्मीकि की सब बात कही, सुनकर युधिष्ठिर को श्वपच भक्त के प्रति बड़ा प्रेम हुआ।
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भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अच्छी प्रकार से सिखाया कि तुम सभी प्रकार के षट्रस व्यंजनों को अच्छी प्रकार से बनाओ।
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तुम्हारे हाथों की सफलता आज इसी में है कि भक्त के लिये सुन्दर रसोई तैयार करो।
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रसोई तैयार हो चुकने पर राजा युधिष्ठिर जाकर वाल्मीकि को लिवा लाये। उन्होंने कहा कि हमें बाहर ही बैठाकर भोजन करा दो।
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श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा – हे युधिष्ठिर ! ये तो तुम्हारे भाई हैं, इन्हें सादर गोद में उठाकर स्वयं ले आओ।
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इस प्रकार उन्हें पाकशाला में लाकर बैठाया गया और उनके सामने सभी प्रकार के व्यंजन परोसे गये।
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रसमय प्रसाद का कौर लेते ही शंख बज उठा, परंतु थोड़ी देर बजकर फिर बन्द हो गया, तब भगवान् ने शंख को एक छड़ी लगायी।
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भगवान् ने शंख से पूछा – तुम भक्त के भोजन करने पर ठीक से क्यों नहीं बज रहे हो ?
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घबड़ाकर शंख बोला – आप द्रौपदी के पास जाकर उनसे पूछिये, आप मन से यह मान लीजिये कि मेरा कुछ भी दोष नहीं है।
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जब द्रौपदी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि शंख का कथन सत्य है। भक्त जी खट्टे-मीठे आदि रसों के सभी व्यंजनों को एक में मिलाकर खा रहे हैं, इससे मेरी रसोई करने की चतुरता धूल में मिल गयी।
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अपनी पाकविद्या का निरादर देखकर मेरे मन में यह भाव आया कि आखिर हैं तो ये श्वपच जाति के ही, ये भला व्यंजनों का स्वाद लेना क्या जाने ?
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तब भगवान् ने सब पदार्थों को एक में मिलाकर खाने का कारण पूछा।
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भक्त श्वपच वाल्मीकि ने कहा कि इनका भोग तो आप पहले ही लगा चुके है, अतः पदार्थ बुद्धि से अलग-अलग स्वाद कैसे लूँ ?
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पदार्थ तो एक के बाद दूसरे रुचिकर और अरुचिकर लगेंगे। फिर इसमें प्रसाद बुद्धि कहां रहेगी ?
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मै तो प्रसाद का सेवन कर रहा हूँ, व्यंजनों को नहीं खा रहा हूँ। यह सुनकर भक्त वाल्मीकि में द्रौपदी का अपार सद्भाव हुआ।
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शंख जोरों से बजने लगा। लोग भक्त की जय-जयकार करने लगे।
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इस प्रकार यज्ञ पूर्ण हुआ और भक्त वाल्मीकि जी की महिमा का सबको पता चल गया।

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