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मदालसा की कथा


भारद्वाज

मदालसा की कथा
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आज विश्व में जिस तरह की संतान का निर्माण हो रहा है, यह तो सर्वविदित ही है । आज संसार भौतिकता के चरम उत्कर्ष की ओर अँधा होकर बिना सोच विचार कर दोड़ता ही जा रहा है । मानव को सुख पहुँचाने के लिए नित्य नये आविष्कार हो रहे हैं ।

यह सत्य है की भौतिक उन्नति कर मानव ने आज अपने लिए सब प्रकार के अत्याधुनिक सुख साधनों का संग्रह कर लिया है । आज धरती तो क्या चन्द्र और मंगल तक की दूरी को कुछ घंटों में ही तय कर लिया गया है । जिन साधनों की व सुख सुविधओं की कल्पना हम पहले केवल स्वपनों में ही करते थे, वो सब सुख सुविधाएँ व साधन और उससे भी अधिक बहुत कुछ हमारे लिए सुगमता से उपलब्ध है ।

परन्तु यह भी सत्य है की इतनी सुख सुविधाओं के होते हुए भी आज मानव जाति सर्वत्र दुखी और अशांत ही नजर आती है । आज जिसके पास जो नहीं है उसी को पाने के लिए मानव जूझ रहा है । किसी के पास तो सुख सुविधाओं के सभी साधन उपलब्ध हैं , किसी के पास कुछ सीमित मात्रा में हैं और कोई तो आभाव ग्रस्त जीवन ही व्यतीत कर रहा है ।

आज मानव आधुनिकता और भौतिकता के इस युग में, समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन मानवीय मूल्यों की आवश्यकता होती है, उन मूल्यों को, नैतिकता को, मानवता को, बंधुत्व को सर्वथा भूल ही गया है। जिसके फलस्वरूप संसार में समानता के स्थान पर असमानता के युग का आरम्भ हो गया है और संसार में फैली इन असमानताओं के कारण ही समाज में अत्याचार, लूट-खसोट, चोरी-जारी, अपहरण , भ्रष्टाचार व बलात्कार की घटनाएँ दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है और यह सब भौतिकता के अन्धानुकरण के कारण ही हो रहा है।

मानव जीवन का एक अटूट सत्य यह भी है कि किसी भी राष्ट्र का, समाज का और स्वयं मानव का भी निर्माण एक माता के गर्भ में ही होता है, और यह भी एक माता पर ही निर्भर करता है कि उसे किस तरह की संतान को उत्पन्न करके उसे समाज के अर्पित करना है । परन्तु आज जिस तरह के मानव का निर्माण समाज में हो रहा है, उसको देख कर तो लगता है कि आज की माताओं को उनके कर्तव्य का ही बोध नहीं रहा । वह अनजाने में ही अपनी संतानों को एक अनिश्चित अंधकारपूर्ण भविष्य की ओर धकेलती जा रही है, जो आज प्रत्यक्ष ही दृष्टिगोचर हो रहा है ।

माँ तो कभी ऐसी नहीं होती, जो जान बूझ कर अपनी संतानों को अन्धकार में धकेल दे, वह तो ममता की मूर्त होती है । माँ तो वह होती है जो एक क्या हजारों जन्म भी अपनी संतानों पर न्योछावर कर दे । आज जो कुछ भी अनहोनी समाज में हो रही है उसका कारण एक मात्र अज्ञान और अज्ञान ही है। आज आप के सामने एक माँ की सच्ची कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो भारतीय इतिहास में कहीं दबी पड़ी लुप्त प्राय ही थी ।

जिसे शायद हम कभी देख ना पाये, कभी सुन ना पाये, कभी समझ ना पाये । एक ऐसी माँ की कहानी जिसने अपनी संतानों को अपनी मीठीं – मीठीं लोरियां सुना सुना कर ब्रह्मज्ञानी बना दिया। उसने ब्रह्मज्ञान का उपदेश लोरियों के रूप में अपनी संतानों को दिया और जैसा चाहा अपनी संतान को बना दिया। वह माँ थी माँ मदालसा। आयें मर्गदर्शन हेतु इस कहानी पर दृष्टिपात कर विचार करें और एक उन्नत, सुसंस्कारी , सुखी , शांत व आनंदित संसार के निर्माण के सूत्रधार बनें ।

” हे पुत्र, तू शुद्ध आत्मा है। तेरा कोई नाम नहीं है। इस शरीर के लिए कल्पित नाम तो तुझे अभी इसी जीवन में मिला है। यह शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना हुआ है। कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है तो कोई पुत्र कहलाता है। कोई स्त्री माता है तो कोई प्राणप्रिया पत्नी।” कोई “यह मेरा है” ऎसा कहकर अपनाया जाता है तो कोई “यह मेरा नहीं है” ऎसा कहकर ठुकराया जाता है। सांसारिक पदार्थ नाना रूपों को धारण करते हैं, जिन्हें तुम पहचान लो। ”

यह प्रवचन किसी गुरू का अपने शिष्य को नहीं बल्कि बेटे के लिए उसकी माता का है। ऎसी सच्ची माता थी मदालसा। मदालसा महाराज ऋतुध्वज की पटरानी थी। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार मदालसा गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री थी।

माता मदालसा के तीन पुत्र हुए। ऋतुध्वज ने उनके नाम विक्रांत, सुबाहु और अरिमर्दन रखे। मदालसा इन नामों को सुनकर हंसती थी और ऋतुध्वज से कहती थी कि आवश्यक नहीं कि नाम के गुण व्यक्ति में आए ही। भला इस तरह के नाम रखकर आप इन्हें सांसारिक क्यों बनाना चाहते हैं ? मदालसा ने तीनों पुत्रों को ज्ञान-वैराग्य-भक्ति का प्रवचन कर संन्यासी बना दिया। वे तीनों भाई राज्य छोड़कर कठोर साधना करने लगे।

ऋतुध्वज ने मदालसा से कहा कि एक पुत्र राज्य को संभालने के लिए होना चाहिए। मदालसा ने कहा कि उसका नाम मैं रखूंगी। मदालसा के चौथा पुत्र हुआ। उसने इस पुत्र का नाम “अलर्क” रखा। ऋतुध्वज ने इसका अर्थ मदालसा से पूछा तो मदालसा ने कहा कि अलर्क नाम का अर्थ मदोन्मत्त व्यक्ति और पागल कुत्ता होता है। यह राज्य करेगा इसलिए यह राज के मद में उन्मत्त होगा व प्रजाजनों के कर से प्राप्त होने वाले संसाधनों को भोगेगा इससे पागल कुत्ते की तरह भोगी होगा।

मदालसा का यही पुत्र अलर्क ने एक भोगी व अत्याचारी राजा के रूप में वर्षों अपनी प्रजा का शोषण करके राज्य की और परिणाम स्वरूप अंत में एक शत्रु राजा से पराजित हो दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हुआ। इस तरह माता मदालसा अपने पुत्रों को वैराग्य मार्ग पर ले जाने वाली अनुपम माता हुई।

उसी महान माता मदालसा का महान उपदेश ज्यो का त्यों नीचे लिखी पंक्तियों में दिया जा रहा है । हम सभी को इससे शिक्षा ले कर एक ऐसी संतान का निर्माण करना चाहिए ।

मदालसा का अपने पुत्रों को ब्रह्मज्ञान का उपदेश !!!!!

पुत्र यह संसार परिवर्तनशील और स्वप्न के सामान है इसलिये मॊहनिद्रा का त्याग कर क्योकि तू शुद्ध ,बुद्ध और निरंजन है।

हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?

अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमार के पास पहुँचकर अपने आप ही प्रकट होता है। तेरी संपूर्ण इन्द्रियों में जो भाँति भाँति के गुण-अवगुणों की कल्पना होती है, वे भी पाञ्चभौतिक ही है?

जैसे इस जगत में अत्यंत दुर्बल भूत, अन्य भूतों के सहयोग से वृद्धि को प्राप्त होते है, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थों को देने से पुरुष के पाञ्चभौतिक शरीर की ही पुष्टि होती है । इससे तुझ शुद्ध आत्मा को न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।

तू अपने उस चोले तथा इस देहरुपि चोले के जीर्ण शीर्ण होने पर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मो के अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला मद आदि से बंधा हुआ है, तू तो सर्वथा इससे मुक्त है ।

कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसी को माता और किसी को प्यारी स्त्री कहते है, कोई “यह मेरा है” कहकर अपनाया जाता है और कोई “मेरा नहीं है”, इस भाव से पराया माना जाता है। इस प्रकार ये भूतसमुदाय के ही नाना रूप है, ऐसा तुझे मानना चाहिये ।

यद्यपि समस्त भोग दु:खरूप है तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हे दु:ख दूर करने वाला तथा सुख की प्राप्ति करानेवाला समझता है, किन्तु जो विद्वान है, जिनका चित्त मोह से आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखों को भी दु:ख ही मानते है।

स्त्रियों की हँसी क्या है, हड्डियों का प्रदर्शन । जिसे हम अत्यंत सुंदर नेत्र कहते है, वह मज्जा की कलुषता है और मोटे मोटे कुच आदि घने मांस की ग्रंथियाँ है, अतः पुरुष जिस पर अनुराग करता है, वह युवती स्त्री क्या नरक की जीती जागती मूर्ति नहीं है?

पृथ्वी पर सवारी चलती है, सवारी पर यह शरीर रहता है और इस शरीर में भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है, किन्तु पृथ्वी और सवारी में वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देह में दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है ।

बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकाल तक इस पृथ्वी का पालन करता रहेगा। पृथ्वी के पालन से तुझे सुखभोगकी प्राप्ति हो और धर्म के फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वों के दिन ब्राह्मणों को भोजन द्वारा तृप्त करना, बंधु-बांधवों की इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदय में दूसरों की भलाई का ध्यान रखना और परायी स्त्रियों की ओर कभी मन को न जाने देना ।

अपने मन में सदा भगवान का चिंतन करना, उनके ध्यान से अंतःकरण के काम-क्रोध आदि छहों शत्रुओं को जीतना, ज्ञान के द्वारा माया का निवारण करना और जगत की अनित्यता का विचार करते रहना । धन की आय के लिए राजाओं पर विजय प्राप्त करना, यश के लिए धन का सद्व्यय करना, परायी निंदा सुनने से डरते रहना तथा विपत्ति के समुद्र में पड़े हुए लोगों का उद्धार करना।
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