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🔴मूर्तियों से प्रेम करना, पूजा नहीं

मुर्तियो से प्रेम करना, पूजा नहीं।
क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है। पूजा यह कहती है कि इस पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड्ने से मुझे मुक्ति मिल सकती है।

यह बेवकूफी की शुरुआत हो गई। किसी मूर्ति के और किसी चित्र के सामने बैठने से मुक्ति नहीं मिल सकती। और कोई मूर्ति और कोई चित्र भगवान तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकता। कोई मूर्ति भगवान नहीं है।

मूर्ति और चित्र उन प्यारे लोगों की स्मृतियां हैं जो जमीन पर हो चुके हैं। और उनकी स्मृति न रखी जाए,
यह मैंने कभी भी नहीं कहा है।

मैं मूर्तियों के मंदिर बनाने के खिलाफ हूं।
लेकिन घर—घर में मूर्तियां हों,
इसके पक्ष में हूं। एक—एक घर में मूर्तियां हों। लेकिन मूर्तियां भगवान की तरह नहीं, एक पवित्र स्मरण की तरह, एक सिक्रेड रिमेंबरिंग की तरह।

जमीन पर कुछ फूल हुए हैं मनुष्य के जीवन में, कुछ मनुष्य हुए हैं जो खिल गए हैं पूरे, उनकी याद अगर आदमी रखे तो मैं कैसे उसके खिलाफ हो सकता हूं?

एक अदभुत घटना सुनाता हूं।
सुन कर बहुत हैरानी होगी।
रामकृष्ण परमहंस का किसी ने एक चित्र उतारा। और चित्र उतार कर जब वह चित्र बना कर लाया, तो रामकृष्ण ने उस चित्र के पैर पड़े और सिर से चरण लगाए उस चित्र के। उनका ही चित्र था, रामकृष्ण का ही। पास में बैठे लोग तो बड़े हैरान हो गए कि यह क्या पागलपन है?

अपने ही चित्र को रामकृष्ण हाथ जोड़ कर पैर छूते हैं, सिर से लगाते हैं। यह क्या पागलपन है! सहने के बाहर हो गई यह बात! और किसी बैठे हुए संन्यासी ने पूछा कि परमहंसदेव, यह क्या करते हैं आप? अपने ही चित्र को!

रामकृष्ण ने कहा, यह मुझे खयाल ही नहीं रहा कि चित्र मेरा है। चित्र देख कर मुझे खयाल आया कि किसी समाधिस्थ आदमी का चित्र है। और समाधि को नमस्कार करने का मन हो गया, मैंने नमस्कार कर लिया। तुम याद दिलाते हो तो मुझे खयाल आया कि चित्र मेरा है। अरे लोग हंसेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि मैंने अपने ही चित्र के पैर छू लिए, लेकिन मैंने सिर्फ समाधिस्थ भाव के पैर छुए हैं।

🌼 जीवन रहस्य 🌼

🌹ओशो प्रेम…… ♣️

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