Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजय गुप्ता

भीम को यह अभिमान हो गया था कि संसार में मुझसे अधिक बलवान कोई और नहीं है| सौ हाथियों का बल है उसमें, उसे कोई परास्त नहीं कर सकता… और भगवान अपने सेवक में किसी भी प्रकार का अभिमान रहने नहीं देते| इसलिए श्रीकृष्ण ने भीम के कल्याण के लिए एक लीला रच दी|
द्रौपदी ने भीम से कहा, “आप श्रेष्ठ गदाधारी हैं, बलवान हैं, आप गंधमादन पर्वत से दिव्य वृक्ष के दिव्य पुष्प लाकर दें… मैंने अपनी वेणी में सजाने हैं, आप समर्थ हैं, ला सकते हैं| लाकर देंगे न दिव्य कमल पुष्प|”

भीम द्रौपदी के आग्रह को टाल नहीं सके| गदा उठाई और गंधमादन पर्वत की ओर चल पड़े मदमस्त हाथी की तरह| किसी तनाव से मुक्त, निडर… भीम कभी गदा को एक कंधे पर रखते, कभी दूसरे पर रखते| बेफिक्री से गंधमादन पर्वत की ओर जा रहे थे… सोच रहे थे, अब पहुंचा कि तब पहुंचा, दिव्य पुष्प लाकर द्रौपदी को दूंगा, वह प्रसन्न हो जाएगी|

लेकिन अचानक उनके बढ़ते कदम रुक गए… देखा, एक वृद्ध लाचार और कमजोर वानर मार्ग के एक बड़े पत्थर पर बैठा है| उसने अपनी पूंछ आगे के उस पत्थर तक बिछा रखी है जिससे रास्ता रुक गया है| पूंछ हटाए बिना, आगे नहीं बढ़ा जा सकता… अर्थात उस वानर से अपनी पूंछ से मार्ग रोक रखा था और कोई भी बलवान व्यक्ति किसी को उलांघकर मार्ग नहीं बनाता, बल्कि मार्ग की बाधा को हटाकर आगे बढ़ता है| बलवान व्यक्ति बाधा सहन नहीं कर सकता… या तो व बाधा स्वयं हटाता है, या उस बाधा को ही मिटा देता है| इसलिए भीम भी रुक गए|

जब मद, अहंकार और शक्ति बढ़ जाती है तो आदमी अपने आपको आकाश को छूता हुआ समझता है| वह किसी को खातिर में नहीं लाता… और अत्यधिक निरंकुश शक्ति ही व्यक्ति के विनाश का कारण बनती है… लेकिन श्रीकृष्ण तो भीम का कल्याण करना चाहते थे… भीम का विनाश नहीं सुधार चाहते थे|

भीम ने कहा, “ऐ वानर ! अपने पूंछ को हटाओ, मैंने आगे बढ़ना है|”

वानर ने देखा एक बलिष्ठ व्यक्ति गदा उठाए, राजसी वस्त्र पहने, मुकुट धारण किए बड़े रोब के साथ उसे पूंछ हटाने को कह रहा है| हैरान हुआ, पहचान भी गया.. लेकिन चूंकि वह श्रीकृष्ण की लीला थी, इसलिए चुप हो गया| भीम के सवाल का जवाब नहीं दिया|

भीम ने फिर कहा, “वानर, मैंने कहा न कि पूंछ हटाओ, मैंने आगे जाना है, तुम वृद्ध हो, इसलिए कुछ नहीं कह रहा|”

वानर गंभीर हो गया| मन ही मन हंस दिया| कहा, “तुम देख रहे हो, मैं वृद्ध हूं, कमजोर हूं… उठ नहीं सकता| मुझमें इतनी ताकत नहीं कि मैं स्वयं ही अपनी पूंछ हटा लूं… तुम ही कष्ट करो, मेरी पूंछ थोड़ी इधर सरका दो, और आगे निकल जाओ|”

भीम के तेवर कसे… गदा कंधे से हटाई… नीचे रखी| इस वानर ने मेरे बल को ललकारा है, आखिर है तो एक पूंछ ही, वह भी वृद्ध वानर की| कहा, “यह मामूली सी पूंछ हटाना भी कोई मुश्किल है, यह तुमने क्या कह दिया? मैंने बहुत बलवानों को परास्त किया है, धूल चटाई है, सौ हाथियों का बल है मुझमें…|”

इतना कह कर भीम ने अपने बाएं हाथ से पूंछ को यों पकड़ा, जैसे एक तिनके को पकड़ रहा है कि उठाया, हवा में उड़ा दिया… लेकिन भीम से वह पूंछ हिल भी नहीं सकी| हैरान हुआ… फिर उसने दाएं हाथ से पूंछ को हटाना चाहा… लेकिन दाएं हाथ से भी पूंछ तिलमात्र नहीं हिली… भीम ने वानर की तरफ देखा… वानर मुस्करा रहा था|

भीम को गुस्सा आ गया| भीम ने दोनों हाथों से भरपूर जोर लगाया… एक पांव को पत्थर पर रखकर, आसरा लेकर फिर जोर लगाया… दो-तीन बार… लेकिन हर बार भीम हताश हुआ… जिस पूंछ को भीम ने मामूली और कमजोर वानर की पूंछ समझा था… उसने उसके पसीने छुड़वा दिए थे…

और भीम थककर, निढाल होकर एक तरफ खड़ा हो गया| सोचने लगा… यह कोई मामूली वृद्ध वानर नहीं है… यह दिव्य व्यक्ति है और इसकी असीम शक्ति का मैं सामना नहीं कर पाऊंगा… विनम्र और झुका हुआ व्यक्ति ही कुछ पाता है, अकड़ उसे ले डूबती है, ताकत काफूर हो जाती है और भीम वाकई वृद्ध वानर के सामने कमजोर लगने लगा… मद और अहंकार काफूर हो गया… और जब मद और अहंकार मिटता है… तभी भगवान की कृपा होती है|

भीम ने कहा, “मैं आपको पहचान नहीं सका… जिसकी पूंछ को मैं उठा नहीं सका वह कोई मामूली वानर नहीं हो सकता… मुझे क्षमा करें, कृपया अपना परिचय दें|”

वानर उठ खड़ा हुआ… आगे बढ़ा और भीम को गले लगा लिया, कहा, “भीम, मैं तुम्हें पहचान गया था| तुम वायु पुत्र हो… मैं पवन पुत्र हनुमान हूं, श्रीराम का सेवक… श्रीराम का सेवक होने के सिवा मेरी कोई पहचान नहीं और उन्हीं के आदेश पर मैं इस मार्ग पर लेटा हूं… ताकि तुम्हें, तुम्हारी असलियत बता दूं… रिश्ते से मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं और इसीलिए बड़े भाई का कर्तव्य निभाते हुए प्रभु के आशीर्वाद से तुम्हें याद दिला रहा हूं… शक्ति का, ताकत का अभिमान न करो… क्योंकि यह ताकत और बल तुम्हारा नहीं| भगवान ने ही इसे दिया है… यह शरीर भी तो परमात्मा ने दिया है… और जो चीज परमात्मा की है, वह किसी और की कैसे हो सकती है| इसलिए जो जिसने दिया है, उसके लिए उसी का धन्यवाद करना चाहिए| परमात्मा की शक्ति के अलावा किसी की क्या शक्ति हो सकती ई|”

भीम की आंखें खुलीं… त्रेता युग की श्रीराम और हनुमान जी की वीर गाथाएं याद आ गईं… प्रेम से, श्रद्धा से भीम की आंखें भी खुल गईं और भावों के इसी प्रवाह में, भीम ने हनुमान जी को समुद्र लांघने के समय पर धारण किए गए विशाल रूप का दर्शन कराने का अनुरोध कर दिया|

और हुनमान जी ने श्रीराम की कृपा से अपना आकार, वैसा ही बढ़ाया जैसा उन्होंने सौ योजन समुद्र लांघने के समय धारण किया था| यह देख भीम हैरान रह गया| वह कभी हनुमान जी के चरणों में देखता और कभी उनके आकाश छूते मस्तक को… जिसे वह देख ही नहीं पा रहा था|

हनुमान जी ने कहा, “भीम, मेरे इस रूप को तुम देख नहीं पा रहे… लेकिन मैं श्रीराम की कृपा से, इससे भी बड़ा रूप धारण कर सकता हूं|”

भीम ने हाथ जोड़कर सिर झटक दिया और हनुमान जी के चरणों में गिर पड़ा|

भौतिक पद, प्रतिष्ठा और धन का अभिमान कैसा? ये तो कभी भी नष्ट हो सकते हैं| भौतिक पदार्थ, भौतिक सुख ही देते हैं… लेकिन परमात्मा की कृपा तो शाश्वत होती है… जिसे कोई छीन नहीं सकता| चोर चुरा नहीं सकता| आदमी को उसी दायरे में रहना चाहिए, जिसमें परमात्मा रखे… परमात्मा की इच्छा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिल सकता| इंसान की जिंदगी का क्या भरोसा… किसी भी मोड़ पर, चार कदम की दूरी पर, खत्म हो सकती है|

~ हनुमान जी और भीम – पौराणिक कथाएं

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बिहारी जी की कृपा…..

संजय गुप्ता

नाम था गोवर्धन! “गोवर्धन” एक ग्वाला था, बचपन से दूसरों पर आश्रित, क्योंकि उसका कोई नहीं था और जिस गाँव में रहता, वहां के लोगो की गायें beआदि चरा कर जो मिलता, उसी से अपना जीवन चलाता, पर गाँव के सभी लोग उस से बहुत प्यार करते थे!

एक दिन गाँव की एक महिला, जिसे वह काकी कहता था, के साथ उसे वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ!
उसने वृन्दावन के ठाकुर श्री बांके बिहारी जी के बारे बहुत कुछ सुना था, सो दर्शन की इच्छा तो मन में पहले से थी!

वृन्दावन पहुँच कर जब उसने बिहारी जी के दर्शन किये, तो वो उन्हे देखता ही रह गया, और उनकी छवि में खो गया!

एकाएक उसे लगा के जैसे ठाकुर जी उसको कह रहे है..”आ गए मेरे गोवर्धन! मैं कब से प्रतीक्षा कर रहा था, मैं गायें चराते थक गया हूँ, अब तू ही मेरी गायें चराने जाया कर!”

गोवर्धन ने मन ही मन “हाँ” कही!

इतनी में गोस्वामी जी ने पर्दा दाल दिया, तो गोवर्धन का ध्यान टूटा! जब मंदिर बंद होने लगा, तो एक सफाई कर्मचारी ने उसे बाहर जाने को कहा! गोवर्धन ने सोचा, ठीक ही तो कह रहे है, सारा दिन गायें चराते हुए ठाकुर जी थक जाते होंगे, सो अब आराम करेंगे।

तो उसने सेवक से कहा… “ठीक है, पर तुम बिहारी जी से कहना कि कल से उनकी गायें चराने मैं ले जाऊंगा!”

इतना कह वो चल दिया! सेवक ने उसकी भोली सी बात गोस्वामी जी को बताई। गोस्वामी जी ने सोचा, कोई बिहारी जी के लिए अनन्य भक्ति ले कर आया है, चलो यहाँ रह कर गायें भी चरा लेगा, और उसके खाने पीने, रहने का इंतजाम मैं कर दूंगा!

गोवर्धन गोस्वामी जी के मार्ग दर्शन में गायें चराने लगा!
सारा सामान और दोपहर का भोजन इत्यादि उसे वहीं भेज दिया जाता!

एक दिन मंदिर में भव्य उत्सव था, गोस्वामी जी व्यस्त होने के कारण गोवर्धन को भोजन भेजना भूल गए!
पर भगवान् को तो अपने भक्त का ध्यान नहीं भूलता!
उन्होने अपने एक वस्त्र में कुछ मिष्ठान इत्यादि बांधे और पहुँच गए यमुना पर गोवर्धन के पास।

गोवर्धन ने कहा, आज बड़ी देर कर दी, बहुत भूख लगी हैं! गोवर्धन ने जल्दी से सेवक के हाथ से पोटली लेकर भर पेट भोजन पाया! इतने में सेवक जाने कहाँ चला गया, अपना वस्त्र वहीँ छोड़कर!

शाम को जब गोस्वामी जी को भूल का एहसास हुआ, तो उन्होने गोवर्धन से क्षमा मांगी, तो गोवर्धन ने कहा,

“अरे आप क्या कह रहे है, आपने ही तो आज नए सेवक को भेजा था, प्रसाद देकर, ये देखो वस्त्र, जो वो जल्दी में मेरे पास छोड़ गया!”

गोस्वामी जी ने वस्त्र देखा तो आश्चर्यचकित हो गए और गोवर्धन पर बिहारी जी की कृपा देख आनंदित हो उठे!
ये वस्त्र स्वयं बिहारी जी का पटका (गले में पहनने वाला वस्त्र) था, जो उन्होने खुद सुबह बिहारी जी को पहनाया था!

ऐसे है हमारे बिहारी जी जो भक्तों के लिए पल में दौड़े आते हैैं!

श्री बाँके बिहारी लाल की जय…..

जय जय श्री राधे…..
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रामरक्षेची उत्पत्ती –
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रामरक्षेची कथा अशी सांगितली जाते की, "एकदा माता पार्वतीने शंकारांस विचारले जसे विष्णुसहस्त्र नामावली आहे तसेच रामाचे एखादे स्तोत्र नाही का ? "तेव्हा भगवान शंकरांनी माता पार्वतीस या 'रामरक्षा' स्तोत्रविषयी सांगितले. पण मुळात रामरक्षेची निर्मिती कशी झाली त्याला एक कथा आहे.

ती अशी की, आद्यकवी वाल्मिकींनी रामायणाची निर्मिती केली. १०० कोटी श्लोक असलेले हे रामायण सर्वांनाच मिळवावेसे वाटू लागले. देव, मानव आणि दानव भगवान शंकरांकडे ते प्राप्त करण्यासाठी गेले. ते कुणाला मिळावे यासाठी त्याच्यामध्ये खूप वाद झाले.

शेवटी श्ंकरांनी रामायणाची सर्वांमध्ये समान वाटणी करण्याचे ठरवले. १०० ही सम संख्या असल्याने कितीही वाटणी केली तरी एक श्लोक राहिलाच. हा अनुष्टुप छंदातील असल्याने एका श्लोकात ३२ अक्षरे होते. त्याचीही वाटणी केली. शेवटी दोन अक्षरे शंकरांनी स्वत:कडे ठेवली.

ते म्हणाले," ही दोन अक्षरे मी माझ्याकडेच ठेवतो " असे सांगून त्यांनी सर्वांना जाण्यास संगितले व ध्यानासाठी बसले. पण देव, दानव, मानव यांचे मन काही भरेना. शंकरांनी ती अक्षरे स्वत:जवळ ठेवून घेतली याचाच अर्थ त्यात काहीतरी महत्वाचे असणार म्हणून सर्व जण वाट पाहू लागले. काही काळाने कंटाळून एकामागे एक सगळे जावू लागले. एक ऋषि मात्र शेवटपर्यंत थांबले.

त्यांना काहीतरी अजून मिळावे याची प्रचंड इच्छा होती. त्यांनी बराच वेळ वाट पाहिल्यानंतर त्यांना डुलका लागला आणि नेमके त्याचवेळी शंकर ध्यानातून बाहेर आले. त्यांनी त्या ऋषींकडे बघितले. त्यांना त्यांचे कौतुक वाटले. मग त्यांनी एक आशीर्वाद म्हणून त्या ऋषींच्या स्वप्नात जावून 'रामरक्षा' सांगितली.

काही काळाने ऋषींना जाग आली. आणि जे स्वप्नात सांगितले आहे त्यावरून त्यांनी सुरेख अशा 'रामरक्षेची ' निर्मिती केली. त्या ऋषींचे नाव होते 'बुधकौशिक' ऋषी. याचे वर्णन रामरक्षेच्या पंधराव्या श्लोकात केलेले आहे ___
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः || तथा लिखितवान्प्रात:प्रबुद्धो बुधकौशिकः ||

शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी ———-शतकोटीचे बीज म्हणजे राम हि ती दोन अक्षरे.

‘श्रीरामरक्षा’ ह्या स्तोत्राचे महत्व काय?

परमपूज्य गुरुदेवांनी मार्गदर्शन करताना सांगितले की, श्रीरामरक्षा या शब्दाचा अर्थ रक्षणकर्ता राम असा आहे. प्रभु रामचंद्रांना ‘मर्यादा पुरुषोत्तम‘ असे म्हणतात. प्रभु रामचंद्रांचे चरित्र अवलोकन केल्यास आपल्या असे लक्षात येईल की, प्रभु रामचंद्रांनी राजा, पिता, बंधू, पति या सर्व नात्यांनी मर्यादा सांभाळून एक फार मोठा आदर्श घालून दिला आहे.
बुधकौशिक ऋषिंच्या स्वप्नात जाऊन प्रत्यक्ष प्रभु रामचंद्रांनीच रामरक्षा हे स्तोत्र सांगितले आहे. त्यामुळे रामरक्षा स्तोत्रातील प्रत्येक अक्षर हे मंत्रमय व तारक असे आहे.
हातपाय धुवून, शुचिर्भूत होऊन रामरक्षा म्हणण्यास हरकत नाही. कुमार वयातील मुलांनी तर रामरक्षा नित्याने अवश्य म्हणावी. त्यामुळे वाणीवर पण योग्य संस्कार होतात व नित्य रामरक्षा पठणाने शक्ति उत्पन्न होते व ती आपले सदा सर्वकाळ रक्षण करते. आबालवृद्धांनी पण नित्य रामरक्षा म्हणावी. त्याच्यापासून निश्चित फायदा आहेच.
रामरक्षेचे अनुपालन करण्याची पण पद्धत आहे. कोणत्याही महिन्याच्या शुद्ध प्रतिपदेपासून सुरुवात करून शुद्ध नवमीपर्यंत हे अनुष्ठान करतात. प्रतिपदेला एकदा, द्वितीयेला दोनदा याप्रमाणे चढत्या क्रमाने वाचून नवमीच्या दिवशी नऊवेळा रामरक्षेचा पाठ म्हणावा. अनुष्ठान म्हटले की त्याच्या यमनियमांचे पालन करणे झालेच. याचा अनुभव आल्याशिवाय राहात नाही.
रामरक्षा हे स्तोत्र अत्यंत प्रभावी असे आहे.
राम राम!
आपण कधी विचार केला आहे का , की आपण "राम-राम" दोन वेळेस का म्हणतो.कारण~~~~~|-
र = २७ वा शब्द. ( क ख ग घ ड……….)
आ = २ रा शब्द. (अ आ..)
म = २५ वा शब्द शब्द.(अ आ…………)
एकूण = ५४.
राम + राम.
५४+५४ = १०८.
आपण जी गळ्यात माळ घालता तिचे मणि सुद्धा १०८ असतात.
ह्याचा अर्थ = आपण एका व्यक्तीला जर दोनदा “राम-राम” म्हटले तर आपण एक माळ जप केला असा होतो…..तर मग म्हणा की मंडळी ….
राम राम ….
🙏🙏🙏🙏
~~~~🙏🙏~~~~
रामनाम घेत असतांना लक्ष नामावर स्थिर झाले की मन लक्ष+मन= लक्ष्मण होते
नामस्मरण करताकरता मन उन्मन होते म्हणजेच हनुमान होते.
हनुमान झालेले हे मन भक्तीमध्ये रत झाले की भरत होते.
असे मन सततच्या नामस्मरणामुळे तृप्त होते, त्यातील विकार नाहीसे होतात ,शत्रुंचे हे मन हनन करते म्हणून ते शत्रुघ्न होते.

अशा नामस्मरणाने मन शांत होते शीतलता प्राप्त करते म्हणजेच सीता होते.
सीता झालेल्या या मनात दुसरा कोणाचा विचार येऊ न शकल्याने ते राम स्वरूप होते.

रामरक्षेच्या एका श्लोकाबद्दल- कदाचित माहिती असेलही सगळ्यांना….

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रामेशं भजे ।
रामेणाभिहतो निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासो$सम्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ।।

या श्लोकात राम या नामाच्या सगळ्या विभक्ती आल्या आहेत. रामो=रामः(प्रथमा) रामं(द्वितीया), रामेण(तृतीया), रामाय(चतुर्थी), रामान्नास्ति=रामात् (पंचमी)रामस्य(षष्ठी), रामे(सप्तमी),भो राम(संबोधन).
ह्या श्लोकात रकाराची पुनरावृत्ती असल्याने गर्भारपणात हा श्लोक म्हणल्याने जन्माला येणारे बाळ बोबडे (किंवा जीभ जड असलेले) होत नाही.
रामरक्षा: आरोग्यरक्षक कवच!!!

एक वेगळा पैलू तुमच्यासमोर मांडत आहे. श्रीरामरक्षा स्तोत्र हे आजही कित्येक घरांमध्ये तिन्हीसांजेला आवर्जून म्हटले जाते. आजारी व्यक्ती वा शस्त्रक्रिया झाल्यानंतर त्या रुग्णाला रामरक्षा ऐकवली जाते. रामरक्षाच का? असे काय रहस्य या मंत्रात दडले आहे?

रामनामकवच:

शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः ।
स्कंधौ दिव्यायुधः पातुभुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥६॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्‌ ॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥९॥

असे कवच या स्तोत्रात आलेले आहे. कवच म्हणजे आपल्या प्रत्येक अवयवाचे रक्षण करण्यासाठी मंत्र धारण करणे!! थोडक्यात; आपले संपूर्ण शरीरच रामनामाने अभिमंत्रित करणे. या कवचाची फलश्रुती नीट पहा….

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ ११ ॥

म्हणजे, पाताळ, भूमी आणि आकाश या तिन्ही लोकांत संचार करणारे, छद्मचारिणः म्हणजे खोटे सोंग घेणारे असे (राक्षस) रामनामाने रक्षिलेल्या लोकांकडे नजर वर उचलून पण पाहू शकत नाहीत!!

आता, थोडं थांबा….’छद्मचारिणः’ हा शब्द पुन्हा वाचा. काही आठवलं? विज्ञान शिकत असताना ‘pseudopodium’ हा शब्द आपण शिकलेला असतो. अमिबासारखे जीव हे pseudopodium म्हणजे छद्मपाद म्हणून ओळखले जातात!! थोडक्यात; इथे ‘राक्षस’ हे अलिफ-लैला सारखे शिंगं वगैरे असलेले राक्षस नसून सूक्ष्मजीव आहेत. आयुर्वेदात विशेषतः सुश्रुत संहितेत कृमी, राक्षस असे शब्द अनेक ठिकाणी सूक्ष्मजीवांसाठी वापरण्यात आलेले आहेत.

आजवर आयुर्वेदिक डाॅक्टरांना वैद्यकीय उपचार करत असताना; अनेक वेळेला रामरक्षेचा लाभ झालेला आहे. यामागील कारण शोधता-शोधता ही गोष्ट हाती लागली. आजच्या मुहूर्तावरच ती लिहावीशी वाटली ही त्या रामचंद्राचीच कृपा. आपलेही असे काही अनुभव असतील तर जरूर सांगा.

रामरक्षा सिद्ध कशी करावी?
१२१ रोज एकदा ठराविक ठिकाणी ठरावीक वेळी म्हटल्याने रामरक्षा सिद्ध होते किंवा
गुढीपाडवा ते रामनवमी ह्या काळात दररोज १३ वेळा…किंवा
अश्विन प्रतिपदा ते नवमी म्हणजे शारदीय नवरात्रात दररोज १३ वेळा पठण केल्याने रामरक्षा सिद्ध होते.
इतर फायदे:
आपदामपहर्तारम…..हा श्लोक 1 लक्ष वेळा म्हणल्याचे ऋणमुक्ती हे फळ आहे.
संपूर्ण रामरक्षेचे १५००० पाठ केल्याने रामरक्षा सिद्ध होते.

प्रत्येक अवयवाचे स्वतन्त्र पाठ केल्याने त्याचे स्वतंत्र फलित मिळते.
उदा:
कौसल्याये दृशो पातु:…. हा श्लोक सतत म्हटल्याने…
डोळ्यांचे विकार बरे होतात…

जय श्रीराम!!

॥जय श्रीराम॥

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===== हरिचरणों का आश्रय =========

संजय गुप्ता
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एक गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु बाबा छोटी से कुटिया बना कर रहते थे। वह ठाकुर जी के परम भक्त थे।
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स्वाभाव बहुत ही शांत और सरल। दिन-रात बस एक ही कार्य था, बस ठाकुर जी के ध्यान-भजन में खोए रहना।
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ना खाने की चिंता ना पीने की, चिंता रहती थी तो बस एक कि ठाकुर जी की सेवा कमी ना रह जाए।
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भोर से पूर्व ही जाग जाते, स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होते लग जाते ठाकुर जी की सेवा में।
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उनको स्नान कराते, धुले वस्त्र पहनाते, चंदन से तिलक करते, पुष्पों की माला पहनाते फिर उनका पूजन भजन आदि करते..
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जंगल से लाये गए फलों से ठाकुर जी को भोग लगाते। बिल्कुल वैरागी थे, किसी से विशेष कुछ लेना देना नहीं था।
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फक्कड़ थे किन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे। यदि कोई कुछ दे गया तो स्वीकार कर लिया नहीं तो राधे-राधे।
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फक्कड़ होने पर भी एक विशेष गुण उनमे समाहित था, उनके द्वार पर यदि कोई भूखा व्यक्ति आ जाए तो वह उसको बिना कुछ खिलाए नहीं जाने देते थे।
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कुछ नहीं होता था तो जंगल से फल लाकर ही दे देते थे किन्तु कभी किसी को भूखा नहीं जाने दिया।
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यही स्तिथि ठाकुर जी के प्रति भी थी। उनको इस बात की सदैव चिंता सताती रहती थी कि कही ठाकुर जी किसी दिन भूखे ना रह जाएं।
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उनके पास कुछ होता तो था नहीं कही कोई कुछ दे जाता था तो भोजन बना लेते थे, अन्यथा वह अपने पास थोड़ा गुड अवश्य रखा करते थे।
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यदि भोजन बनाते थे तो पहले भोजन ठाकुर जी को अर्पित करते फिर स्वयं ग्रहण करते, किन्तु यदि कभी भोजन नहीं होता था तो गुड से ही काम चला लेते थे।
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थोड़ा गुड ठाकुर जी को अर्पित करते और फिर थोड़ा खुद खा कर पानी पी लेते थे।
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एक बार वर्षा ऋतु में कई दिन तक लगातार वर्षा होती रही, जंगल में हर और पानी ही पानी भर गया,
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जंगल से फल ला पान संभव नहीं रहा, उनके पास रखा गुड़ भी समाप्त होने वाला था।
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अब बाबा जी को बड़ी चिंता हुई, सोंचने लगे यदि वर्षा इसी प्रकार होती रही तो में जंगल से फल कैसे ला पाउँगा,
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ठाकुर जी को भोग कैसे लगाऊंगा, गुड भी समाप्त होने वाला है, ठाकुर जी तो भूखे ही रह जायेंगे,
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और यदि द्वार पर कोई भूखा व्यक्ति आ गया तो उसको क्या खिलाऊंगा। यह सोंचकर वह गहरी चिंता में डूब गए,
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उन्होंने एक निश्चय किया कि अब से में कुछ नहीं खाऊंगा, जो भी मेरे पास है वह ठाकुर जी और आने वालो के लिए रख लेता हूँ।
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ऐसा विचार करके उन्होंने कुछ भी खाना बंद कर दिया और मात्र जल पीकर ही गुजरा करने लगे, किन्तु ठाकुर जी को नियमित रूप से भोग देते रहे।
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बाबा जी की भक्ति देखकर ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए, किन्तु उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया।
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दो दिन बाद ठाकुर जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उनकी कुटिया में उस समय पहुंचे जब तेज वर्षा हो रही थी।
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वृद्ध ब्राह्मण को कुटिया पर आया देख साधु बाबा बहुत प्रसन्न हुए और उनको प्रेम पूर्वक कुटिया के अंदर ले गए।
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उनको प्रेम से बैठाया कुशल क्षेम पूँछी, तब वह ब्राहमण बड़ी ही दीन वाणी में बोला कि तीन दिन भूखा है, शरीर बहुत कमजोर हो गया है, यदि कुछ खाने का प्रबन्ध हो जाये तो बहुत कृपा होगी।
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तब साधु बाबा ने ठाकुर जी को मन ही मन धन्यवाद दिया कि उनकी प्रेरणा से ही वह कुछ गुड़ बचा पाने में सफल हुए।
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वह स्वयं भी तीन दिन से भूखे थे किन्तु उन्होंने यथा संभव गुड और जल उस ब्राह्मण को अर्पित करते हुए कहा कि..
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श्रीमान जी इस समय तो इस कंगले के पास मात्र यही साधन उपलब्ध है, कृपया इसको ग्रहण करें।
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बाबा की निष्ठा देख ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु उन्होंने अभी और परीक्षा लेने की ठानी,
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वह बोले इसके मेरी भूख भला कैसे मिटेगी, यदि कुछ फल आदि का प्रबंध हो तो ठीक रहेगा।
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अब बाबा जी बहुत चिंतित हुए, उनके द्वार से कोई भूखा लोटे यह उनको स्वीकार नही था, वह स्वयं वृद्ध थे, तीन दिन से भूखे थे,
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शरीर भूख निढाल था, किन्तु सामने विकट समस्या थी। उन्होंने उन ब्राह्मण से कहा ठीक है श्रीमान जी आप थोड़ा विश्राम कीजिये में फलों का प्रबन्ध करता हूँ।
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बाबा जी ने ठाकुर जी को प्रणाम किया और चल पड़े भीषण वर्षा में जंगल की और फल लाने।
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जंगल में भरा पानी था, पानी में अनेको विषैले जीव इधर-उधर बहते जा रहे थे, किन्तु किसी भी बात की चिन्ता किये बिना साधु बाबा, कृष्णा कृष्णा का जाप करते चलते रहे,
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उनको तो मात्र एक ही चिंता थी की द्वार पर आए ब्राह्मण देव भूखे ना लोट जाएं।
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जंगल पहुंच कर उन्होंने फल एकत्र किये और वापस चल दिए।
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कुटिया पर पहुंचे तो देखा कि ब्राह्मण देव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, बाबा जी ने वर्षा और भरे हुए पानी के कारण हुए विलम्ब के कारण उनसे क्षमा मांगी और फल उनको अर्पित किए।
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वह वृद्ध ब्राह्मण बोला बाबा जी आप भी तो ग्रहण कीजिये किन्तु वह बाबा जी बोले क्षमा करें श्रीमान जी, में अपने ठाकुर जी को अर्पित किए बिना कुछ भी ग्रहण नहीं करता,
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यह फल में आपके लिए लाया हूँ मेने इनका भोग ठाकुर जी को नही लगाया है।
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तब वह ब्राह्मण बोला ऐसा क्यों कह रह हैं आप ठाकुर जी को तो आपने अभी ही फल अर्पित किये हैं।
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बाबा बोले अरे ब्राह्मण देव क्यों परिहास कर रहे हैं, मेने कब अर्पित किये ठाकुर जी को फल।
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तब ब्राह्मण देव बोले अरे यदि मुझे पर विश्वाश नहीं तो जा कर देख लो अपने ठाकुर जी को, वह तो तुम्हारे द्वारा दिए फलों को प्रेम पूर्वक खा रहे हैं।
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ब्राह्मण देव की बात सुनकर बाबा जी ने जा कर देखा तो वह सभी फल ठाकुर जी के सम्मुख रखे थे जो उन्होंने ब्राह्मण देव को अर्पित किये थे।
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वह तुरंत बाहर आए और आकर ब्राह्मण देव के पेरो में पड़ गए और बोले कृपया बताएं आप कोन है।
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यह सुनकर श्री हरी वहां प्रत्यक्ष प्रकट हो गए, ठाकुर जी को देख वह वृद्ध बाबा अपनी सुध-बुध खो बैठे बस ठाकुर जी के चरणों से ऐसे लिपटे मानो प्रेम का झरना बह निकला हो,
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आँखों से अश्रुओं की धारा ऐसे बहे जा रही थी जैसे कुटिया में ही वर्षा होने लगी हो।
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ठाकुर जी ने उनको प्रेम पूर्वक उठाया और बोले तुम मेरे सच्चे भक्त हो, में तुम्हारी भक्ति तुम्हारी निष्ठा और प्रेम से अभिभूत हूँ,
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में तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा, कहो क्या चाहते हो।
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किन्तु साधु बाबा की तो मानो वाणी ही मारी गई हो, बस अश्रु ही बहे जा रहे थे, वाणी मौन थी, बहुत कठिनता से स्वयं को संयत करके बोले..
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है नाथ जिसने आपको पा लिया हो उसको भला और क्या चाहिए। अब तो बस इन चरणों में आश्रय दे दीजिये, ऐसा कह कर वह पुनः ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़े।
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तब ठाकुर जी बोले मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, मांगो क्या चाहते हो, कहो तो तुमको मुक्ति प्रदान करता हूँ ,
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यह सुनते ही बाबा विचलित हो उठे तब बाबा बोले है हरी, है नाथ, मुझको यूं ना छलिये , में मुक्ति नहीं चाहता, यदि आप देना ही चाहते है, तो जन्मों-जन्मों तक इन चरणों का आश्रय दीजिए,
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है नाथ बस यही वरदान दीजिए कि में बार-बार इस धरती पर जन्म लूँ और हर जन्म में आपके श्री चरणों के ध्यान में लगा रहूँ, हर जन्म में इसी प्रकार आपको प्राप्त करता रहूँ।
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तब श्री हरी बोले तथास्तु, भगवान् के ऐसा कहते ही साधु बाबा के प्राण श्री हरी में विलीन हो गए

जय श्री राधे कृष्णा
जय श्री हरि

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इस गणेश मंत्र से मिलेगी मनचाही नौकरी::-
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नौकरी अगर मनचाही मिल जाए तो फिर क्या कहने। यदि आप भी चाहते हैं कि मनचाही जगह पर आपकी नौकरी लग जाए तो आपकी यह इच्छा पूरी हो सकती है। आपको सिर्फ नीचे लिखे गणेश मंत्र का जप विधि-विधान से करना है।

मंत्र

ऊँ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा।

जप विधि:-


  • बुधवार के दिन सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें।

  • इसके बाद गणेशजी की पूजा करें और उन्हें दुर्वा चढ़ाएं साथ ही लड्डूओं का भोग भी लगाएं।

  • इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें।

  • तत्पश्चात हरे पन्ने की माला से ऊपर लिखे मंत्र का जप करें।

  • इस मंत्र का प्रभाव आपको कुछ ही समय में दिखने लगेगा।

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बोया और काटा का सिद्धान्त

संतोष चतुर्वेदी

एक बार एक आदमी रेगिस्तान में कहीं भटक गया। उसके पास खाने-पीने की जो थोड़ी-बहुत चीजें थीं वो जल्द ही ख़त्म हो गयीं और पिछले दो दिनों से वो पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था।

वह मन ही मन जान चुका था कि अगले कुछ घंटों में अगर उसे कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मौत पक्की है पर कहीं न कहें उसे ईश्वर पर यकीन था कि कुछ चमत्कार होगा और उसे पानी मिल जाएगा तभी उसे एक झोपड़ी दिखाई दी! उसे अपनी आँखों यकीन नहीं हुआ पहले भी वह मृगतृष्णा और भ्रम के कारण धोखा खा चुका था पर बेचारे के पास यकीन करने के आलावा को चारा भी तो न था आखिर ये उसकी आखिरी उम्मीद जो थी।

वह अपनी बची-खुची ताकत से झोपडी की तरफ रेंगने लगा जैसे-जैसे करीब पहुँचता उसकी उम्मीद बढती जाती और इस बार भाग्य भी उसके साथ था, सचमुच वहां एक झोपड़ी थी! पर ये क्या? झोपडी तो वीरान पड़ी थी! मानो सालों से कोई वहां भटका न हो। फिर भी पानी की उम्मीद में आदमी झोपड़ी के अन्दर घुसा अन्दर का नजारा देख उसे अपनी आँखों पे यकीन नहीं हुआ…

वहां एक हैण्ड पंप लगा था, आदमी एक नयी उर्जा से भर गया पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता वह तेजी से हैण्ड पंप चलाने लगा। लेकिंग हैण्ड पंप तो कब का सूख चुका था आदमी निराश हो गया उसे लगा कि अब उसे मरने से कोई नहीं बचा सकता…वह निढाल हो कर गिर पड़ा!

तभी उसे झोपड़ी के छत से बंधी पानी से भरी एक बोतल दिखी! वह किसी तरह उसकी तरफ लपका! वह उसे खोल कर पीने ही वाला था कि तभी उसे बोतल से चिपका एक कागज़ दिखा उस पर लिखा था- इस पानी का प्रयोग हैण्ड पंप चलाने के लिए करो और वापस बोतल भर कर रखना नहीं भूलना।

ये एक अजीब सी स्थिति थी, आदमी को समझ नहीं आ रहा था कि वो पानी पिए या उसे हैण्ड पंप में डालकर उसे चालू करे!

उसके मन में तमाम सवाल उठने लगे अगर पानी डालने पे भी पंप नहीं चला अगर यहाँ लिखी बात झूठी हुई और क्या पता जमीन के नीचे का पानी भी सूख चुका हो लेकिन क्या पता पंप चल ही पड़े क्या पता यहाँ लिखी बात सच हो वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे!

फिर कुछ सोचने के बाद उसने बोतल खोली और कांपते हाथों से पानी पंप में डालने लगा। पानी डालकर उसने भगवान् से प्रार्थना की और पंप चलाने लगा एक-दो-तीन और हैण्ड पंप से ठंडा-ठंडा पानी निकलने लगा!

वो पानी किसी अमृत से कम नहीं था… आदमी ने जी भर के पानी पिया, उसकी जान में जान आ गयी, दिमाग काम करने लगा। उसने बोतल में फिर से पानी भर दिया और उसे छत से बांध दिया। जब वो ऐसा कर रहा था तभी उसे अपने सामने एक और शीशे की बोतल दिखी। खोला तो उसमे एक पेंसिल और एक नक्शा पड़ा हुआ था जिसमे रेगिस्तान से निकलने का रास्ता था।

आदमी ने रास्ता याद कर लिया और नक़्शे वाली बोतल को वापस वहीँ रख दया। इसके बाद वो अपनी बोतलों में पानी भर कर वहां से जाने लगा कुछ आगे बढ़ कर उसने एक बार पीछे मुड़ कर देखा फिर कुछ सोच कर वापस उस झोपडी में गया और पानी से भरी बोतल पे चिपके कागज़ को उतार कर उस पर कुछ लिखने लगा। उसने लिखा- मेरा यकीन करिए ये काम करता है!

दोस्तों, ये कहानी संपूर्ण जीवन के बारे में है। ये हमे सिखाती है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अपनी उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए और इस कहानी से ये भी शिक्षा मिलती है कि कुछ बहुत बड़ा पाने से पहले हमें अपनी ओर से भी कुछ देना होता है। जैसे उस आदमी ने नल चलाने के लिए मौजूद पूरा पानी उसमे डाल दिया।

देखा जाए तो इस कहानी में पानी जीवन में मौजूद अच्छी चीजों को दर्शाता है, कुछ ऐसी चीजें जिसकी हमारी नजर में कीमत है। किसी के लिए ये ज्ञान हो सकता है तो किसी के लिए प्रेम तो किसी और के लिए पैसा! ये जो कुछ भी है उसे पाने के लिए पहले हमें अपनी तरफ से उसे कर्म रुपी हैण्ड पंप में डालना होता है और फिर बदले में आप अपने योगदान से कहीं अधिक मात्रा में उसे वापस पाते हैं।

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🔴मूर्तियों से प्रेम करना, पूजा नहीं

मुर्तियो से प्रेम करना, पूजा नहीं।
क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है। पूजा यह कहती है कि इस पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड्ने से मुझे मुक्ति मिल सकती है।

यह बेवकूफी की शुरुआत हो गई। किसी मूर्ति के और किसी चित्र के सामने बैठने से मुक्ति नहीं मिल सकती। और कोई मूर्ति और कोई चित्र भगवान तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकता। कोई मूर्ति भगवान नहीं है।

मूर्ति और चित्र उन प्यारे लोगों की स्मृतियां हैं जो जमीन पर हो चुके हैं। और उनकी स्मृति न रखी जाए,
यह मैंने कभी भी नहीं कहा है।

मैं मूर्तियों के मंदिर बनाने के खिलाफ हूं।
लेकिन घर—घर में मूर्तियां हों,
इसके पक्ष में हूं। एक—एक घर में मूर्तियां हों। लेकिन मूर्तियां भगवान की तरह नहीं, एक पवित्र स्मरण की तरह, एक सिक्रेड रिमेंबरिंग की तरह।

जमीन पर कुछ फूल हुए हैं मनुष्य के जीवन में, कुछ मनुष्य हुए हैं जो खिल गए हैं पूरे, उनकी याद अगर आदमी रखे तो मैं कैसे उसके खिलाफ हो सकता हूं?

एक अदभुत घटना सुनाता हूं।
सुन कर बहुत हैरानी होगी।
रामकृष्ण परमहंस का किसी ने एक चित्र उतारा। और चित्र उतार कर जब वह चित्र बना कर लाया, तो रामकृष्ण ने उस चित्र के पैर पड़े और सिर से चरण लगाए उस चित्र के। उनका ही चित्र था, रामकृष्ण का ही। पास में बैठे लोग तो बड़े हैरान हो गए कि यह क्या पागलपन है?

अपने ही चित्र को रामकृष्ण हाथ जोड़ कर पैर छूते हैं, सिर से लगाते हैं। यह क्या पागलपन है! सहने के बाहर हो गई यह बात! और किसी बैठे हुए संन्यासी ने पूछा कि परमहंसदेव, यह क्या करते हैं आप? अपने ही चित्र को!

रामकृष्ण ने कहा, यह मुझे खयाल ही नहीं रहा कि चित्र मेरा है। चित्र देख कर मुझे खयाल आया कि किसी समाधिस्थ आदमी का चित्र है। और समाधि को नमस्कार करने का मन हो गया, मैंने नमस्कार कर लिया। तुम याद दिलाते हो तो मुझे खयाल आया कि चित्र मेरा है। अरे लोग हंसेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि मैंने अपने ही चित्र के पैर छू लिए, लेकिन मैंने सिर्फ समाधिस्थ भाव के पैर छुए हैं।

🌼 जीवन रहस्य 🌼

🌹ओशो प्रेम…… ♣️

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

करणी माता मंदिर एक अद्भुत रहस्यमय स्थान?

संजय गुप्ता

यदि आपके घर में आपको एक भी चूहा नज़र आ जाए तो आप बेचैन हो उठेंगे। आप उसको अपने घर से भगाने की तमाम तरकीबे लगाएंगे क्योकि चूहों को प्लेग जैसी कई भयानक बीमारियों का कारण माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है की हमारे देश भारत में माता का एक ऐसा मंदिर भी है जहाँ पर 20000 चूहे रहते है और मंदिर में आने वालो भक्तो को चूहों का झूठा किया हुआ प्रसाद ही मिलता है।

आश्चर्य की बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी मंदिर में बिल्कुल भी बदबू नहीं है, आज तक कोई भी बीमारी नहीं फैली है यहाँ तक की चूहों का झूठा प्रसाद खाने से कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ है। इतना ही नहीं जब आज से कुछ दशको पूर्व पुरे भारत में प्लेग फैला था तब भी इस मंदिर में भक्तो का मेला लगा रहता था और वो चूहों का झूठा किया हुआ प्रसाद ही खाते थे। यह है राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलो मीटर दूर देशनोक में स्तिथ करणी माता का मंदिर जिसे चूहों वाली माता, चूहों वाला मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

माना जाता है माँ जगदम्बा का साक्षात अवतार

करणी माता, जिन्हे की भक्त माँ जगदम्बा का अवतार मानते है, का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था। रिघुबाई की शादी साठिका गाँव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया।

जनकल्याण, अलौकिक कार्य और चमत्कारिक शक्तियों के कारण रिघु बाई को करणी माता के नाम से स्थानीय लोग पूजने लगे। वर्तमान में जहाँ यह मंदिर स्तिथ है वहां पर एक गुफा में करणी माता अपनी इष्ट देवी की पूजा किया करती थी।

यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्तिथ है। कहते है करनी माता 151 वर्ष जिन्दा रहकर 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिन हुई थी। उनके ज्योतिर्लिं होने के पश्चात भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना कर के उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से अब तक निरंतर जारी है।

राजा गंगा सिंह ने करवाया था मंदिर का निर्माण

करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी है। कहते है की उनके ही आशीर्वाद से बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी। करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवी शताब्दी के शुरुआत में करवाया था। इस मंदिर में चूहों के अलावा, संगमरमर के मुख्य द्वार पर की गई उत्कृष्ट कारीगरी, मुख्य द्वार पर लगे चांदी के बड़े बड़े किवाड़, माता के सोने के छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए रखी चांदी की बहुत बड़ी परात भी मुख्य आकर्षण है।

यदि हम चूहों की बात करे तो मंदिर के अंदर चूहों का एक छत्र राज है। मदिर के अंदर प्रवेश करते ही हर जगह चूहे ही चूहे नज़र आते है। चूहों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की मंदिर के अंदर मुख्य प्रतिमा तक पहुंचने के लिए आपको अपने पैर घसीटते हुए जाना पड़ता है। क्योकि यदि आप पैर उठाकर रखते है तो उसके नीचे आकर चूहे घायल हो सकते है जो की अशुभ माना जाता है। इस मंदिर में करीब बीस हज़ार काले चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहते है। इस चूहों को ज्यादा पवित्र माना जाता है। मान्यता है की यदि आपको सफ़ेद चूहा दिखाई दे गया तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

इस मंदिरो के चूहों की एक विशेषता और है की मंदिर में सुबह 5 बजे होने वाली मंगला आरती और शाम को 7 बजे होने वाली संध्या आरती के वक़्त अधिकांश चूहे अपने बिलो से बाहर आ जाते है। इन दो वक़्त चूहों की सबसे ज्यादा धामा चौकड़ी होती है। यहां पर रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता कहां जाता है। माँ को चढ़ाये जाने वाले प्रसाद को पहले चूहे खाते है फिर उसे बाटा जाता है। चील, गिद्ध और दूसरे जानवरो से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानो पर बारीक जाली लगी हुई है।

करणी माता के बेटे माने जाते है चूहे, करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहे माँ की संतान माने जाते है करनी माता की कथा के अनुसार एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र ( उसकी बहन गुलाब और उसके पति का पुत्र ) लक्ष्मण, कोलायत में स्तिथ कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया। जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता याम को उसे पुनः जीवित करने की प्राथना की। पहले तो यम राज़ ने मन किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुनर्जीवित कर दिया।

हालॉकि बीकानेर के लोक गीतों में इन चूहों की एक अलग कहानी भी बताई जाती है जिसके अनुसार एक बार 20000 सैनिकों की एक सेना देशनोक पर आकर्मण करने आई जिन्हे माता ने अपने प्रताप से चूहे बना दिया और अपनी सेवा में रख लिया।

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आनंद पर शर्त:-

लष्मीकांत

एक दिन एक उदास पति-पत्नी संत फरीद के पास पहुंचे। उन्होंने विनय के स्वर में कहा,’बाबा, दुनिया के कोने-कोने से लोग आपके पास आते हैं, वे आपसे खुशियां लेकर लौटते हैं। आप किसी को भी निराश नहीं करते। मेरे जीवन में भी बहुत दुख हैं। मुझे उनसे मुक्त कीजिए।’ फरीद ने देखा, सोचा और झटके से झोपड़े के सामने वाले खंभे के पास जा पहुंचे। फिर खंभे को दोनों हाथों से पकड़कर ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगे। शोर सुनकर सारा गांव इकट्ठा हो गया। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ तो बाबा ने कहा-‘इस खंभे ने मुझे पकड़ लिया है, छोड़ नहीं रहा है।’ लोग हैरानी से देखने लगे।

एक बुजुर्ग ने हिम्मत कर कहा- ‘बाबा, सारी दुनिया आपसे समझ लेने आती है और आप हैं कि खुद ऐसी नासमझी कर रहे हैं। बुजुर्ग ने कहां, आपने खंभे को पकड़ रखा है।’ फरीद खंभे को छोड़ते हुए बोले, ‘यही बात तो तुम सब को समझाना चाहता हूं कि दुख ने तुम्हें नहीं, तुमने ही दुखों को पकड़ रखा है। तुम छोड़ दो तो ये अपने आप छूट जाएंगे।’

उनकी इस बात पर गंभीरता से सोचें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हमारे दुख-तकलीफ इसलिए हैं क्योंकि हमने वैसी सोच बना रखी है। ऐसा न हुआ तो क्या होगा और वैसा न हुआ तो क्या हो सकता है। सब दुख हमारी नासमझी और गलत सोच के कारण मौजूद हैं। इसलिए सिर्फ अपनी सोच बदल दीजिए, सारे दुख उसी वक्त खत्म हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि जितने संबुद्ध हुए हैं, उनके जीवन में सब कुछ अच्छा-अच्छा हुआ हो, लेकिन वे 24 घंटे मस्ती में रहते थे। कबीर आज कपड़ा बुन कर बेचते, तब कल उनके खाने का जुगाड़ होता था। लेकिन वह कहते थे कि आनंद झरता रहता है नानक आनंदित होकर एकतारे की तान पर गीत गाते चलते थे। एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सुख और दुख सिर्फ आदतें हैं। दुखी रहने की आदत तो हमने डाल रखी है । सुखी रहने की आदत भी डाल सकते हैं।

एक प्रयोग कीजिए और तुरंत उसका परिणाम भी देख लीजिए। सुबह सोकर उठते ही खुद को आनंद के भाव से भर लीजिए। इसे स्वभाव बनाइए और आदत में शामिल कर लीजिए। यह गलत सोच है कि इतना धन, पद या प्रतिष्ठा मिल जाए तो आनंदित हो जाएंगे। दरअसल, यह एक शर्त है। जिसने भी अपने आनंद पर शर्त लगाई वह आज तक आनंदित नहीं हो सका। अगर आपने बेशर्त आनंदित जीवन जीने का अभ्यास शुरू कर दिया तो ब्रहमांड की सारी शक्तियां आपकी ओर आकर्षित होने लगेंगी।

‘पहले आप प्रभु के राज्य में प्रवेश कीजिये यानी आप पहले आनंदित हो जाइये, बाकी सभी चीजें आपको अपने आप मिलती चली जाएंगी।

Posted in रामायण - Ramayan

अयोध्या की कहानी जिसे समय निकालकर पढे केवल भाजपा या काग्रेस की दृष्टि से ना पढे हिन्दुओ का इतिहास के आधार पर जिसे
पढ़कर आप रो पड़ेंगे।
कृपया इस
लेख को पढ़ें, तथा प्रतेक
हिन्दूँ मिञों को अधिक से
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जब बाबर
दिल्ली की गद्दी पर
आसीन हुआ उस समय
जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के
अधिकार क्षेत्र में थी। महात्मा श्यामनन्द
की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास
मूसा आशिकान
अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बनकर
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त
कर ली और उनका नाम
भी महात्मा श्यामनन्द के
ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा।

ये सुनकर
जलालशाह नाम का एक फकीर भी
महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर
सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा।
जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक
ही सनक थी,
हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना । अत:
जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ
में छुरा घोंपकर
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार
किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद
बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में
स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे
जलालशाह और
ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने
की तैयारियों में जुट गए ।

सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के
विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द
मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास
की जमीनों में
बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया॥ और
मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर
को उकसाकर मंदिर के
विध्वंस का कार्यक्रम बनाया। बाबा श्यामनन्द
जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख
के बहुत दुखी हुए
और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ।

दुखी मन से
बाबा श्यामनन्द जी ने
रामलला की मूर्तियाँ सरयू में
प्रवाहित किया और खुद हिमालय की और
तपस्या करने
चले गए। मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान
आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर
रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाह
की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट
लिए गए. जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने
की घोषणा हुई उस समय
भीटी के राजा महताब सिंह
बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए
निकले
थे,अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर
मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर
दी और
अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल
कर १ लाख
चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४
लाख
५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।

रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त
की आखिरी बूंद तक
लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने
देंगे।
रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम
होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत
सभी १
लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए। श्रीराम
जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस
भीषण
कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने
तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से
ही मस्जिद का निर्माण हुआ
पानी की जगह मरे हुए
हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में
लखौरी इंटों के साथ ।

इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के
पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार
हिंदुओं
की लाशें गिर जाने के पश्चात
मीरबाँकी अपने मंदिर
ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद
जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर
दिया गया..
इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज
बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की ”
जलालशाह ने
हिन्दुओं के खून का गारा बना के
लखौरी ईटों की नीव
मस्जिद बनवाने के लिए
दी गयी थी।
उस समय अयोध्या से ६ मील
की दूरी पर सनेथू नाम
का एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने
वहां के आस
पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय
क्षत्रियों को एकत्रित किया॥ देवीदीन
पाण्डेय ने
सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे
अपना राजपुरोहित मानते हैं ..अप के पूर्वज
श्री राम थे
और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी। आज
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम
की जन्मभूमि को मुसलमान
आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस
परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने
की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध
करते करते
वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥

देवीदीन पाण्डेय
की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९०
हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग
समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन
पाण्डेय के नेतृत्व में
जन्मभूमि पर
जबरदस्त धावा बोल दिया । शाही सेना से लगातार ५
दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन
मीरबाँकी का सामना देवीदीन
पाण्डेय से हुआ उसी समय
धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक
लखौरी ईंट से पाण्डेय
जी की खोपड़ी पर वार कर
दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर
बुरी तरह फट
गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से
खोपड़ी से बाँधा और
तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया।
इसी बीच
मीरबाँकी ने छिपकर
गोली चलायी जो पहले
ही से घायल देवीदीन पाण्डेय
जी को लगी और
वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर
गति को प्राप्त
हुए..जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल
हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के
वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक
जगह
पर अब भी मौजूद हैं॥
पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद
हंसवर के महाराज
रणविजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ
मीरबाँकी की विशाल और
शस्त्रों से सुसज्जित सेना से
रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10
दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ
वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार
हिन्दुओं का रक्त फिर बहा।
रानी जयराज कुमारी हंसवर के
स्वर्गीय महाराज
रणविजय सिंह की पत्नी थी।

जन्मभूमि की रक्षा में
महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद
महारानी ने
उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और
तीन
हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर
हमला बोल
दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध
जारी रखा। रानी के गुरु
स्वामी महेश्वरानंद जी ने
रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज
कुमारी की सहायता की। साथ
ही स्वामी महेश्वरानंद
जी ने
सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने
२४
हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज
कुमारी के साथ , हुमायूँ के समय में कुल १० हमले
जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। १०वें हमले में
शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और
जन्मभूमि पर
रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।

लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने
पूरी ताकत से
शाही सेना फिर भेजी ,इस युद्ध में
स्वामी महेश्वरानंद
और रानी कुमारी जयराज
कुमारी लड़ते हुए
अपनी बची हुई
सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर
पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीराम
जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3
हजार वीर नारियों के रक्त से लाल
हो गयी।
रानी जयराज कुमारी और
स्वामी महेश्वरानंद जी के
बाद यद्ध का नेतृत्व
स्वामी बलरामचारी जी ने
अपने
हाथ में ले लिया।
स्वामी बलरामचारी जी ने गांव
गांव
में घूम कर
रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक
मजबूत
सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के
उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में काम
से
काम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने
जन्मभूमि पर
अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के
लिए रहता था थोड़े दिन बाद
बड़ी शाही फ़ौज
आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के
अधीन
हो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दू
बलिदान होते
रहे।
उस समय का मुग़ल शासक अकबर था।

शाही सेना हर दिन
के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी..
अतः अकबर ने
बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस
की टाट से उस
चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया.
लगातार युद्ध करते रहने के कारण
स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य
गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर
त्रिवेणी तट पर
स्वामी बलरामचारी की मृत्यु
हो गयी ..
इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के
रोष एवं हिन्दुस्थान पर
मुगलों की ढीली होती पकड़
से
बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर
की इस
कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त
नहीं बहा।

यही क्रम शाहजहाँ के समय
भी चलता रहा। फिर
औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और
उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये
का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे
मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के
सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़
डाला।

औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और
उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये
का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे
मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के
सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़
डाला।
औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास
जी महाराज
जी के शिष्य श्री वैष्णवदास
जी ने जन्मभूमि के
उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे
अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय
क्षत्रियों ने
पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार
गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह
तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे
वीर ये जानते हुए
भी की उनकी सेना और
हथियार
बादशाही सेना के सामने कुछ
भी नहीं है अपने जीवन के
आखिरी समय तक शाही सेना से
लोहा लेते रहे। लम्बे समय
तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए
हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और
अयोध्या की धरती पर उनका रक्त
बहता रहा।
ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के
वंशज
आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज
भी फैजाबाद जिले के आस पास के
सूर्यवंशीय क्षत्रिय
सिर पर
पगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते,
छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये
प्रतिज्ञा ली थी की जब
तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार
नहीं कर लेंगे तब तक
जूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे,
पगड़ी नहीं पहनेंगे। 1640
ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर
को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक
जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव
दास के साथ
साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे
निपुण थी इसे
चिमटाधारी साधुओं
की सेना भी कहते थे । जब
जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के
साथ चिमटाधारी साधुओं
की सेना की सेना मिल
गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर
जाबाज़
खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध
किया ।
चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से
मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस
प्रकार चबूतरे पर
स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़
खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत
क्रोधित
हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य
सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार
सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ
अयोध्या की ओर
भेजा और साथ मे ये आदेश
दिया की अबकी बार
जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है ,यह समय सन्
1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के
गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के
माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह
सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर
अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह
जहां आजकल
गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे
सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास
एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु
एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।इन वीरों कें सुनियोजित
हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद
हसन
अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब
हिंदुओं की इस
प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद
4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने
की हिम्मत
नहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मे
एक बार फिर
श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस
भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग
10 हजार से
ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर
दी नागरिकों तक
को नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल
हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प
कूप नाम
का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं
की लाशें मुगलों ने उसमे
फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर
उसे घेर दिया।
आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के
नाम से प्रसिद्ध है,और
जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।
शाही सेना ने
जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह
चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर
अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस
गड्ढे पर
ही श्री रामनवमी के दिन
भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और
जल चढाती रहती थी. नबाब
सहादत अली के समय 1763
ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के
राजा गुरुदत्त
सिंह और पिपरपुर के
राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच
आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं
की लाशें
अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर
मे कर्नल हंट
लिखता है की
“ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और
मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने
की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान
होने के नाते उसने
काफिरों को जमीन नहीं सौंपी।
“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ
62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे
मकरही के राजा के
नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए
हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें
बड़ी संख्या में हिन्दू
मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर
नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं
की शक्ति क्षीण होने
लगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं
और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम
मे भीती,हंसवर,,मकर
ही,खजुरहट,दीयरा
अमेठी के
राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई
हिन्दू
सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं
की सेना आ
मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के
चिथड़े उड गये और उसे
रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।
मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल
शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर
लिया और
हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में
हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नावाब
वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने
जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद
गजेटियर में कनिंघम ने लिखा
“इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ
।दो दिन
और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के
मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर
कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़
ने कब्रें तोड़
फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने
लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर
अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ ने
मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई
हानि नहीं पहुचाई।
अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।
इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये
अयोध्या का सबसे
बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।
हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब
द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस
बनाया । चबूतरे पर तीन फीट
ऊँची खस की टाट से एक
छोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमे
पुनः रामलला की स्थापना की गयी।
कुछ
जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार
नहीं हुई और
कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल
गयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुर
शाह जफर के समय
में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर
अली के साथ
जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन
1858 को कुबेर टीला स्थित एक
इमली के पेड़ मे
दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया ।
जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं
रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित
हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस
आखिरी निशानी को भी मिटा दिया…
इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के
कारण
रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल
हो गया … अन्तिम बलिदान …
३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के
लालची मुलायम सिंह यादव के
द्वारा खड़ी की गईं अनेक
बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और
विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन
२ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव
ने
कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें
सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन
की आहुतियां दीं।
सरकार ने
मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट
रामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१
को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन
मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने
इस्तीफा दिया।
लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु
अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के
सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक
मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया। परन्तु हिन्दू
समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवं
नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े
आराध्य
भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं।
जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने
अपना रक्त पानी की तरह बहाया। आज
वही हिन्दू
बेशर्मी से इसे “एक विवादित स्थल” कहता है।
सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज
भी जन्मभूमि पर
अपना दावा नहीं छोड़ा है।
वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर
नहीं बनने देना चाहते
हैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें
नीचा दिखाया जा सके।
जिस कौम ने अपने
ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते
हैं
हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तक
किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के
उद्धार के लिए
आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन
नहीं किया और सरकार
पर दबाव नहीं बनाया आज भी वे
बाबरी-विध्वंस
की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते
हैं। और
मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम
जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण
उलझा हुआ
है।
ये लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्म
नहीं आयी वो कृपया अपने घरों में राम
का नाम
ना लें…अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनके मरने के बाद
कोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं।
विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता एक दिन श्रीराम
जन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे।इस भारत को अखण्ड बनाकर एक बार फिर से रामराज्य लाएंगे
चाहे अभी और कितना ही बलिदान
क्यों ना देना पडे।

कृपया आगे फॉरवर्ड करे
आपका बहुत आभारी रहूँगा