Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

नीरज आर्य

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” जम्मू में एक वृद्ध सन्यासी जी एक योगाश्रम में रहते थे । मैं उनके पास 10 महीने रहा । वे आर्य सन्यासी न थे मगर उनके पास सारी पुस्तकें आर्य समाज की थी । वे राजनेता टाइप सन्यासी थे । वे सन्ध्या रोज करते थे । कई बार वे रात को 11 बजे आते मगर सन्ध्या जरूर करते थे । वे अपना भोजन खुद बनाते थे । भोजन बनाते रहते और सन्ध्या करते रहते जोर जोर से बोलकर । सुबह कई बार 10-11 बजे भी सन्ध्या करते थे । उनका एक ही तरीका था कि भोजन से पहले सन्ध्या करनी ही करनी ।

उनके पांच पुत्र थे , सभी अरब पति थे । जम्मू के सबसे बड़े रधुनाथ बाजार में उनके शोरूम थे । पांचों बेटों के अपना अपना करोड़ों का कारोबार था । उनका एक बेटा जम्मू में ही जज था । एक दिन ।।।।।

एक दिन वे दौड़ते दौड़ते मेरे पास आए और बोले – ओ ईश्वरा ! देख मेरे बेटे का नाम अखबार में आया है । खबर का हैडिंग पढा तो लिखा था – (यदि सारे जज ऐसे हो जाएं तो यह देश स्वर्ग बन जाए )

अखबार में उनके बेटे की ईमानदारी पर बड़ा लेख छपा था । स्वामी जी ने बताया कि मैंने अपने जज बेटे को बोल रखा है कि जिस दिन मुझे किसी ने झूठ से भी कह दिया कि तेरे जज बेटे ने रिश्वत ली है तो मैं जीते जी मर जाऊंगा । फिर कभी मुझे पिता जी न कहना और मुझसे मिलने भी न आना ।

स्वामी जी बोले – जब यह छोटे वाला लड़का नया नया जज बना तो एक दिन अपनी पत्नी के साथ सरकारी गाड़ी में मुझे मिलने आया तो मैंने मिलने से , बात करने से मना कर दिया । मैं बोला – मुझसे मिलना है तो अपनी गाड़ी में आया करो , अब जाओ । उस दिन के बाद अपनी गाड़ी में आता है ।

स्वामी जी बोले – जवानी में मैं गरीब था , मैं भगवान से केवल धन मांगता था । आज उस बात पर हंसी आती है । लगभग 40 साल की उम्र में मैंने सन्ध्या करनी शुरू की । आज तक एक भी दिन ऐसा नहीं आया कि मैंने सन्ध्या न की हो । सन्ध्या करने वाले का भगवान बड़ा ध्यान रखते हैं , प्रभु उसे संसार के सर्वोत्तम सुख के साधन प्रदान करते हैं । जिस प्रकार किसी आदमी की देश के प्रधानमंत्री से दोस्ती हो जाए तो वह आदमी अपने को भाग्यवान समझता है , भगवान तो सारी दुनिया के प्रधानमंत्रियों के भी बाप हैं , उनसे दोस्ती का स्वाद लेना है तो सन्ध्या करनी चाहिए । ”

________✍🏻वैदिक ।

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एक खूबसूरत दास्तां👌🏻
व्यवस्था पर एक कटाक्ष

आज इमरजेंसी में ड्यूटी थी,रात का समय था एक आदमी को उसके घर वाले ले कर के आये,शायद दो पक्षों के विवाद में उसको चोटे आई थी जांच करने पर पता चला उसके पैर की हड्डी में फ्रैक्चर था ।
मरीज को भर्ती किया गया और आगे का उपचार शुरू हुआ।
चूँकि फ्रैक्चर इतना गंभीर नहीं था तो कुछ दिनों बाद उसे छुट्टी दे दी गयी और घर पर ही रहने की सलाह दी गयी हालांकि वो अभी भी बिना सहारे के चल पाने में असमर्थ था तो डॉक्टरों ने उसके इस समस्या के हल के रूप में उसे बैसाखी दे दी जो सरकारी अस्पताल में मुफ़्त में मिलती थी और बैसाखी देते वक़्त बोला गया कि ये सरकार की तरफ से है इसलिए इसकी उपलब्धता की संख्या और सीमा निर्धारित है तो जब आप खुद से चलने में समर्थ हो जाना तो इस बैसाखी को लौटा देंना ताकि ये भविष्य में आने वाले आप जैसे लोगों के भी काम आ सके
फिर उसको कुछ जरुरी दवाये लिख के छुट्टी दे दी गयी।
दवा लेने सरकारी दवाखाने पंहुचा तो वहाँ लम्बी लाइन लगी थी तो वो भी लाइन में लग गया,लाइन में लगे बाकि लोगो ने जब उसके पैर में प्लास्टर बंधा और बैसाखी के सहारे खड़े देखा तो मानवता के चलते उसे आगे जाने दिया और उसे दवा जल्दी ही मिल गयी .
बाहर निकला स्टेशन जाना था तो ऑटो पकड़ने पंहुचा,ऑटो रुकी तो ऑटो वाले ने भी उसकी लाचारी को देखते हुए उसके सामान को उठा के रख दिया और उसको भी चढ़ने में मदद कि और स्टेशन तक छोड़ा.
ट्रेन पकड़ने पहुंचा तो ट्रेन में बहुत भीड़ थी किसी तरह ट्रेन में चढ़ा तो बैठने की जगह ना होने से खड़ा रहना पड़ा फिर लोगो ने देखा कि बेचारा बैसाखी के सहारे एक आदमी खड़ा है तो एक आदमी ने उठ कर उसे अपनी सीट दे दी और वो घर आराम से पहुच गया .
रात बीती, मेडिकल लीव भी ख़त्म हो चुकी थी तो ऑफिस जाना था,सुबह तैयार हो के बाहर निकला और बस का वेट करने लगा। पड़ोसी ने देखा कि बेचारा बैसाखी के सहारे चल रहा है तो उसे ऑफिस तक अपने स्कूटर पर छोड़ आये.
इतने दिन बाद ऑफिस पंहुचा था तो काम बहुत था लेकिन ऑफिस कलीग्स ने भी उसके लाचारी पर सहानभूति दिखाई और उसके ज्यादातर काम उन्होंने करके उसका हाथ बटाया मतलब ऑफिस में भी आराम रहा आज तो .
घर लौटा तो साथ वाले कर्मचारी ने घर तक छोड़ दिया .
दिन बड़ा आराम से बीता उसका,ना बस से आने जाने की किच किच हुई ना ही ऑफिस में काम के लिए कुछ कहा गया .खाना खा के सोने गया तो नींद नहीं आ रही थी शायद दिमाग में कुछ चल रहा था…

अगर मैं ठीक ना होने का नाटक करूं तो ऐसे ही लोगों की सहानभूति मिलती रहेगी

या फिर ये बैसाखी ही ना छोड़ूं तो ?? इसके साथ होता हूं तो सारे काम आसानी से हो जाते है

और फिर ये बैसाखी अपने बच्चे को दे दूं तो..??वो भी मेरी तरह फायदा उठा पायेगा

और फिर उसने अस्पताल में बैसाखी वापस नहीं की .

ऐसे ही कई मरीजो ने किया और कुछ दिनों में ही सरकारी बैसाखियां जो लोगो के मदद के लिए थी ख़त्म हो गयी और हर बैसाखी कुछ चंद लोगो की व्यक्तिगत बन चुकी थी जिसे वो अपने बच्चों को थमाने का प्लान बना चुके थे…

और उसके जैसे दूसरे मरीज़ बैसाखियों के आस में बैठे है..

आखिर कब तक लोग उसके झूठ को सहते और अनदेखा करते,एक दिन विरोध तो होना ही था…

फिर आगे क्या हुआ वो हम सब देख और महसूस कर रहे हैं……

Posted in सुभाषित - Subhasit

हिन्दी दिवस पर थोडा़ आनंद लीजिये
मुस्कराइये

हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे हैं
खाने पीने की चीजों से भरे हैं
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें हैं
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं
चलो, फलों से ही शुरू कर लेते हैं
एक एक कर सबके मजे लेते हैं

आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं,
कभी अंगूर खट्टे हैं
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं
कहीं दाल में काला है
तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती है

कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कोई लोहे के चने चबाता है
कोई घर बैठा रोटियां तोड़ता है
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है

सफलता के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते है
आटे में नमक तो चल जाता है
पर गेंहू के साथ, घुन भी पिस जाता है
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है

गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं,
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है
कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं
तो कई दूध के धुले हैं

कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है

शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए
और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं
पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं

कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है
कभी कोई चाय-पानी करवाता है
कोई मख्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है
तो सभी के मुंह में पानी आ जाता है

भाई साहब अब कुछ भी हो
घी तो खिचड़ी में ही जाता है, जितने मुंह है उतनी बातें हैं
सब अपनी-अपनी बीन बजाते हैं
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है
बावरें है ये सब हिंदी के मुहावरें हैं

ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान है
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं