Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

शुक्रवार विशेष,,,,

संजय गुप्ता

भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है- “यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:” अर्थात्, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं, किंतु वर्तमान में जो हालात दिखायी देते हैं, उसमें नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है, उसे भोग की वस्तु समझकर आदमी अपने तरीके से इस्तेमाल कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है।

लेकिन हमारी संस्कृति को बनाए रखते हुए नारी का सम्मान कैसे किय जाये? इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है, माँ अर्थात माता के रूप में नारी, धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में हैं, माता यानी जननी, माँ को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है, माँ देवकीजी (कृष्ण) तथा माँ पार्वतीजी (गणपति, कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं।

किन्तु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी माँ को महत्व देना कम कर दिया है, यह चिंताजनक पहलू है, सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं, परंतु जन्म देने वाली माता के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य रूप से होना चाहिये जो वर्तमान में कम हो गया है, यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुं ओर पांव पसारता जा रहा है, इस बारे में नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिये।

अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ये लड़कियां आजकल हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है, विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, किसी समय इन्हें कमजोर समझा जाता था, किंतु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली है, इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिये।

नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है, पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है, पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है, साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है, उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है, उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है।

जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है, कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है, इस नजरिये से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधि‍क जिम्मेदारियों का निर्वाहन भी करती हैं, नारी इस तरह से भी सम्माननीय है।

विवाह पश्चात तो महिलाओं पर और भी भारी जिम्मेदारि‍यां आ जाती है, पति, सास-ससुर, देवर-ननद की सेवा के पश्चात उनके पास अपने लिए समय ही नहीं बचता, वे कोल्हू के बैल की मानिंद घर-परिवार में ही खटती रहती हैं, संतान के जन्म के बाद तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। घर-परिवार, चौके-चूल्हे में खटने में ही एक आम महिला का जीवन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।

कई बार वे अपने अरमानों का भी गला घोंट देती हैं अपने घर-परिवार की खातिर, उन्हें इतना समय भी नहीं मिल पाता कि वे अपने लिए भी जियें, परिवार की खातिर अपना जीवन होम करने में भारतीय महिलाएं सबसे आगे हैं, परिवार के प्रति उनका यह त्याग उन्हें सम्मान का अधि‍कारी बनाता है।

बच्चों में संस्कार का काम माँ के रूप में नारी द्वारा ही किया जाता है, हम सभी बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि बच्चों की प्रथम गुरु माँ ही होती है, माँ के व्यक्तित्व-कृतित्व का बच्चों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का असर पड़ता है, इतिहास उठाकर देखें तो माँ जीजाबाई ने शिवाजी महाराज में श्रेष्ठ संस्कारों का बीजारोपण किया था।

जिसका ही परिणाम है कि शिवाजी महाराज को हम आज भी उनके श्रेष्ठ कर्मों के कारण जानते हैं, इनका व्यक्तित्व विराट व अनुपम है, बेहतर संस्कार देकर बच्चे को समाज में उदाहरण बनाना, नारी ही कर सकती है, अत: नारी सम्माननीय है, आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा हो रही है।

हम रोज ही अखबारों और न्यूज चैनलों में पढ़ते व देखते हैं, कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई या सामूहिक बलात्कार किया गया, इसे नैतिक पतन ही कहा जाएगा, शायद ही कोई दिन जाता हो, जब महिलाओं के साथ की गई अभद्रता पर समाचार न हो, क्या कारण है? प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिन पर- दिन अश्लीलता बढ़ती‍ जा रही है।

इसका नवयुवकों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही खराब असर पड़ता है, वे इसके क्रियान्वयन पर विचार करने लगते हैं, परिणाम होता है दिल्ली गैंगरेप जैसा जघन्य व घृणित अपराध, नारी के सम्मान और उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए इस पर विचार करना बेहद जरूरी है, साथ ही उसके सम्मान और अस्मिता की रक्षा करना भी जरूरी है।

कतिपय आधुनिक’ महिलाओं का पहनावा भी शालीन नहीं हुआ करता है, इन वस्त्रों के कारण भी यौन-अपराध बढ़ते जा रहे हैं, इन महिलाओं का सोचना कुछ अलग ढंग का हुआ करता हैं, वे सोचती हैं कि हम आधुनिक हैं, यह विचार उचित नहीं कहा जा सकता है, अपराध होने पर यह बात उभरकर सामने नहीं आ पाती है कि उनके वस्त्रों के कारण ही यह अपराध प्रेरित हुआ है।

इतिहास गवाह है, जब कभी अपने बच्चों को तकलीफ आयीं तो नारी ने माँ के धर्म को निभाया, पति पर तकलीफ आयी तो एक भार्या का धर्म निभाया, देश पर तकलीफ आयी तो एक जिम्मेदार नारी ने अपने वतन परस्ती का परिचय दिया, नारी ने अपने दृढ़ संकल्प और मन-वचन व कर्म से सभी क्षैत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करायीं, वे दृढ़ चट्टान की तरह अपने कर्मक्षेत्र में कार्यरत रहीं, और सफल भी हुयीं।

सज्जनों! अंत में यही कहना ठीक रहेगा कि हम हर महिला का सम्मान करें, अवहेलना, भ्रूण हत्या ना करें, अपनी बेटीयों को पढ़ायें, नारी की अहमियत समझें, नारी की अहमियत न समझने के परिणाम स्वरूप महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले लगभग आधी ही बची है, इंसान को यह नहीं भूलना चाहिये, कि नारी द्वारा जन्म दिए जाने पर ही वह दुनिया में अस्तित्व बना पाया है, और यहां तक पहुंचा है।

नारी का अपमान करना भगवान् का अपमान करना हैं, भारतीय संस्कृति में नारी को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है, अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिये, आज विश्व महिला दिवस पर आप सभी भाई-बहनों से आव्हान करता हूँ कि हम नारी शक्ति को कभी तकलीफ नहीं देंगे, भले वो माँ हो, बहन हो, बेटी हो या अपनी अर्धांगिनी हो, या समाज की कोई नारी शक्ति, हमेशा प्रोत्साहित करेंगे व उनकी रक्षा करेंगे, आप सभी को आज के दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

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