Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक राजा था ।.. उसने एक सर्वे करनेका सोचा कि
मेरे राज्य के लोगों की घर गृहस्थि पति से चलती है या पत्नि से..।
उसने एक ईनाम रखा कि ” जिसके घर में पतिका हुकम चलता हो उसे मनपसंद घोडा़ ईनाम में मिलेगा और जिसके घर में पत्नि की सरकार हो वह एक सेब ले जाए.. ।
एक के बाद एक सभी नगरजन सेब उठाकर जाने लगे । राजाको चिंता होने लगी.. क्या मेरे राज्य में सभी सेब ही हैं ?
इतने में एक लम्बी लम्बी मुछों वाला, मोटा तगडा़ और लाल लाल आखोंवाला जवान आया और बोला
” राजा जी मेरे घर में मेरा ही हुकम चलता है .. ला ओ घोडा़ मुझे दिजीए ..”
राजा खुश हो गए और कहा जा अपना मनपसंद घोडा़ ले जा ..। जवान काला घोडा़ लेकर रवाना हो गया ।
घर गया और फिर थोडी़ देरमें दरबार में वापिस लौट आया।
राजा: ” क्या हुआ जवामर्द ? वापिस क्यों आया !
जवान : ” महाराज, घरवाली कहती है काला रंग अशुभ होता है, सफेद रंग शांति का प्रतिक होता है तो आप मुझे सफेद रंग का घोडा़ दिजिए
राजा: ” घोडा़ रख ..और सेब लेकर चलती पकड़ ।
इसी तरह रात हो गई .. दरबार खाली हो गया लोग सेब लेकर चले गए ।
आधी रात को महामंत्री ने दरवाजा खटखटाया..
राजा :
” बोलो महामंत्री कैसे आना हुआ ?

महामंत्री : ” महाराज आपने सेब और घोडा़ ईनाम में रखा ,इसकी जगह एक मण अनाज या सोना महोर रखा होता तो लोग लोग कुछ दिन खा सकते या जेवर बना सकते ।

राजा :” मुझे तो ईनाम में यही रखना था लेकिन महारानी ने कहा कि सेब और घोडा़ ही ठीक है इसलिए वही रखा ।

महामंत्री : ” महाराज आपके लिए सेब काट दुँ..!!

राजा को हँसी आ गई । और पुछा यह सवाल तुम दरबारमें या कल सुबह भी पुछ सकते थे । तो आधी रात को क्यों आये ??
महामंत्री : ” मेरी धर्मपत्नि ने कहा अभी जाओ और पुछ के आओ सच्ची घटना का पता चले ..।

राजा ( बात काटकर ) :
“महामंत्री जी , सेब आप खुद ले लोगे या घर भेज दिया जाए।”

Moral of the story..

समाज चाहे पुरुषप्रधान हो लेकिन संसार स्त्रीप्रधान है

दोस्तो आपका यह दोस्त भी अभी सेब खा रहा है।
😀😀

Posted in ज्योतिष - Astrology

वास्तु अनुसार गणपति स्थापन

देव शर्मा
〰️〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️〰️
कहां किस तरह के गणेश स्थापित करना चाहिए और गणेश जी कैसे आपके घर का वास्तु सुधार सकते हैं जानिए।

👉 सुख, शांति, समृद्धि की चाह रखने वालों को सफेद रंग के विनायक की मूर्ति लाना चाहिए।साथ ही, घर में इनका एक स्थाई चित्र भी लगाना चाहिए।

👉 सर्व मंगल की कामना करने वालों के लिए सिंदूरी रंग के गणपति की आराधना अनुकूल रहती है। – घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा में हो तो अधिक शुभ होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।

👉 घर में बैठे हुए और बाएं हाथ के गणेश जी विराजित करना चाहिए। दाएं हाथ की ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी हठी होते हैं और उनकी साधना-आराधना कठीन होती है। वे देर से भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

👉 कार्यस्थल पर गणेश जी की मूर्ति विराजित कर रहे हों तो खड़े हुए गणेश जी की मूर्ति लगाएं। इससे कार्यस्थल पर स्फूर्ति और काम करने की उमंग हमेशा बनी रहती है।

👉 कार्य क्षेत्र पर किसी भी भाग में वक्रतुण्ड की प्रतिमा या चित्र लगाए जा सकते हैं, लेकिन यह ध्यान जरूर रखना चाहिए कि किसी भी स्थिति में इनका मुंह दक्षिण दिशा या नैऋय कोण में नहीं होना चाहिए।

👉 मंगल मूर्ति को मोदक और उनका वाहन मूषक अतिप्रिय है। इसलिए मूर्ति स्थापित करने से पहले ध्यान रखें कि मूर्ति या चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा जरूर होना चाहिए।

👉 गणेश जी की मूर्ति स्थापना भवन या वर्किंग प्लेस के ब्रह्म स्थान यानी केंद्र में करें। ईशान कोण और पूर्व दिशा में सुखकर्ता की मूर्ति या चित्र लगाना शुभ रहता है।

👉 यदि घर के मुख्य द्वार पर एकदंत की प्रतिमा या चित्र लगाया गया हो तो उसके दूसरी तरफ ठीक उसी जगह पर दोनों गणेशजी की पीठ मिली रहे इस प्रकार से दूसरी प्रतिमा या चित्र लगाने से वास्तु दोषों का शमन होता है।

👉 यदि भवन में द्वारवेध हो यानी दरवाजे से जुड़ा किसी भी तरह का वास्तुदोष हो(भवन के द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि के होने पर द्वारवेध माना जाता है)। ऐसे में घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की बैठी हुई प्रतिमा लगानी चाहिए लेकिन उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।

👉 भवन के जिस भाग में वास्तु दोष हो उस स्थान पर घी मिश्रित सिन्दूर से स्वस्तिक दीवार पर बनाने से वास्तु दोष का प्रभाव कम होता है।

👉 स्वस्तिक को गणेश जी का रूप माना जाता है। वास्तु शास्त्र भी दोष निवारण के लिए स्वास्तिक को उपयोगी मानता है। स्वास्तिक वास्तु दोष दूर करने का महामंत्र है। यह ग्रह शान्ति में लाभदायक है। इसलिए घर में किसी भी तरह का वास्तुदोष होने पर अष्टधातु से बना पिरामिड यंत्र पूर्व की तरफ वाली दीवार पर लगाना चाहिए।

👉 रविवार को पुष्य नक्षत्र पड़े, तब श्वेतार्क या सफेद मंदार की जड़ के गणेश की स्थापना करनी चाहिए। इसे सर्वार्थ सिद्धिकारक कहा गया है। इससे पूर्व ही गणेश को अपने यहां रिद्धि-सिद्धि सहित पदार्पण के लिए निमंत्रण दे आना चाहिए और दूसरे दिन, रवि-पुष्य योग में लाकर घर के ईशान कोण में स्थापना करनी चाहिए।

👉 श्वेतार्क गणेश की प्रतिमा का मुख नैऋत्य में हो तो इष्टलाभ देती है। वायव्य मुखी होने पर संपदा का क्षरण, ईशान मुखी हो तो ध्यान भंग और आग्नेय मुखी होने पर आहार का संकट खड़ा कर सकती है।

👉 पूजा के लिए गणेश जी की एक ही प्रतिमा हो। गणेश प्रतिमा के पास अन्य कोई गणेश प्रतिमा नहीं रखें। एक साथ दो गणेश जी रखने पर रिद्धि और सिद्धि नाराज हो जाती हैं।

👉 गणेश को रोजाना दूर्वा दल अर्पित करने से इष्टलाभ की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाकर समृद्धि की कामना से ऊं गं गणपतये नम: का पाठ लाभकारी माना जाता है। वैसे भी गणपति विघ्ननाशक तो माने ही गए हैं।
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मैं आ गया मेरी बहन

अक्ष

ब्रजमंडल क्षेत्र में एक जंगल के पास एक गाँव बसा था। जंगल के किनारे ही एक टूटी-फूटी झोपड़ी में एक सात वर्षीया बालिका अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहा करती थी। जिसका नाम उसकी दादी ने बड़े प्रेम से चंदा रखा था।
.
चंदा का उसकी दादी के अतिरिक्त और कोई सहारा नहीं था, उसके माता पिता की मृत्यु एक महामारी में उस समय हो गई थी जब चंदा की आयु मात्र दो वर्ष ही थी, तब से उसकी दादी ने ही उसका पालन-पोषण किया था।
.
उस बूढ़ी स्त्री के पास भी कमाई का कोई साधन नहीं था इसलिए वह जंगल जाती और लकड़िया बीन कर उनको बेचती और उससे जो भी आय होती उससे ही उनका गुजारा चलता था।
.
क्योंकि घर में और कोई नहीं था इसलिए दादी चंदा को भी अपने साथ जंगल ले जाती थी। दोनों दादी-पोती दिन भर जंगल में भटकते और संध्या होने से पहले घर वापस लौट आते … यही उनका प्रति दिन का नियम था।
.
चंदा अपनी दादी के साथ बहुत प्रसन्न रहती थी, किन्तु उसको एक बात बहुत कचोटती थी कि उसका कोई भाई या बहन नहीं थे। गांव के बच्चे उसको इस बात के लिए बहुत चिढ़ाते थे तथा उसको अपने साथ भी नहीं खेलने देते थे, इससे वह बहुत दुःखी रहती थी।
.
अनेक बार वह अपनी दादी से पूछती की उसका कोई भाई क्यों नहीं है। तब उसकी दादी उसको प्रेम से समझाती.. कौन कहता है कि तेरा कोई भाई नहीं है, वह है ना कृष्ण कन्हैया वही तेरा भाई है, यह कह कर दादी लड्डू गोपाल की और संकेत कर देती।
.
चंदा की झोपडी में एक पुरानी किन्तु बहुत सुन्दर लड्डू गोपाल की प्रतिमा थी जो उसके दादा जी लाये थे। चंदा की दादी उनकी बड़े मन से सेवा किया करती थी। बहुत प्रेम से उनकी पूजा करती और उनको भोग लगाती।
.
निर्धन स्त्री पकवान मिष्ठान कहाँ से लाये जो उनके खाने के लिए रुखा सूखा होता वही पहले भगवान को भोग लगाती फिर चंदा के साथ बैठ कर खुद खाती। चंदा के प्रश्न सुनकर वह उस लड्डू गोपाल की ओर ही संकेत कर देती।
.
बालमन चंदा लड्डू गोपाल को ही अपना भाई मानने लगी। वह जब दुःखी होती तो लड्डू गोपाल के सम्मुख बैठ कर उनसे बात करने लगती और कहती कि भाई तुम मेरे साथ खेलने क्यों नहीं आते, सब बच्चे मुझ को चिढ़ाते है…
.
मेरा उपहास करते है, मुझको अपने साथ भी नहीं खिलाते, में अकेली रहती हूँ, तुम क्यों नहीं आते। क्या तुम मुझ से रूठ गए हो, जो एक बार भी घर नहीं आते, मैने तो तुम को कभी देखा भी नहीं।
.
अपनी बाल कल्पनाओं में खोई चंदा लड्डू गोपाल से अपने मन का सारा दुःख कह देती। चंदा का प्रेम निश्च्छल था, वह अपने भाई को पुकारती थी। उसके प्रेम के आगे भगवान भी नतमस्तक हो जाते थे, किन्तु उन्होंने कभी कोई उत्तर नहीं दिया।
.
एक दिन चंदा ने अपनी दादी से पूछा.. दादी मेरे भाई घर क्यों नहीं आते, वह कहाँ रहते हैं। तब दादी ने उसको टालने के उद्देश्य से कहा तेरा भाई जंगल में रहता है, एक दिन वह अवश्य आएगा।
.
चंदा ने पूछा क्या उसको जंगल में डर नहीं लगता, वह जंगल में क्यों रहता है। तब दादी ने उत्तर दिया नहीं वह किसी से नहीं डरता, उसको गांव में अच्छा नहीं लगता इसलिए वह जंगल में रहता है।
.
धीर-धीरे रक्षा बंधन का दिन निकट आने लगा, गाँव में सभी लड़कियों ने अपने भाइयों के लिए राखियां खरीदी, वह चंदा को चिढ़ाने लगी कि तेरा तो कोई भाई नहीं तू किसको राखी बंधेगी।
.
अब चंदा का सब्र टूट गया वह घर आकर जोर जोर से रोने लगी, दादी के पूछने पर उसने सारी बात बताई, तब उसकी दादी भी बहुत दुःखी हुई उसने चंदा को प्यार से समझाया कि मेरी बच्ची तू रो मत, तेरा भाई अवश्य आएगा,
.
किन्तु चंदा का रोना नहीं रुका वह लड्डू गोपाल की प्रतिमा के पास जाकर उससे लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी और बोली कि भाई तुम आते क्यों नहीं, सब भाई अपनी बहन से राखी बंधवाते हैं, फिर तुम क्यों नहीं आते।
.
उधर गोविन्द चंदा की समस्त चेष्टाओं के साक्षी बन रहे थे। रोते-रोते चंदा को याद आया कि दादी ने कहा था कि उसका भाई जंगल में रहता है, बस फिर क्या था वह दादी को बिना बताए नंगे पाँव ही जंगल की और दौड़ पड़ी, उसने मन में ठान लिया था कि वह आज अपने भाई को लेकर ही आएगी।
.
जंगल की काँटों भरी राह पर वह मासूम दौड़ी जा रही थी, श्री गोविन्द उसके साक्षी बन रहे थे। तभी श्री हरि गोविन्द पीड़ा से कराह उठे उनके पांव से रक्त बह निकला, आखिर हो भी क्यों ना श्री हरि का कोई भक्त पीड़ा में हो और भगवान को पीड़ा ना हो यह कैसे सम्भव है, जंगल में नन्ही चंदा के पाँव में काँटा लगा तो भगवान भी पीड़ा कराह उठे।
.
उधर चंदा के पैर में भी रक्त बह निकला वह वही बैठ कर रोने लगी, तभी भगवान ने अपने पाँव में उस स्थान पर हाथ फेरा जहाँ कांटा लगा था, पलक झपकते ही चंदा में पाँव से रक्त बहना बंद हो गया और दर्द भी ना रहा वह फिर से उठी और जंगल की ओर दौड़ चली।
.
इस बार उसका पाँव काँटों से छलनी हो गया किन्तु वह नन्ही सी जान बिना चिंता किये दौड़ती रही उसको अपने भाई के पास जाना था अंततः एक स्थान पर थक कर रुक गई और रो-रो कर पुकारने लगी भाई तुम कहाँ हों, तुम आते क्यों नहीं।
.
अब श्री गोविन्द के लिए एक पल भी रुकना कठिन था, वह तुरंत उठे और एक ग्यारह – बारहाँ वर्ष के सुन्दर से बालक का रूप धारण किया तथा पहुँच गए चंदा के पास।
.
उधर चंदा थक कर बैठ गई थी और सिर झुका कर रोये जा रही थी तभी उसके सिर पर किसी के हाथ का स्पर्श हुआ। और एक आवाज सुनाई दी, “मैं आ गया मेरी बहन, अब तू ना रो”
.
चंदा ने सर उठा कर उस बालक को देखा और पूछा क्या तुम मेरे भाई हो ? तब उत्तर मिला “हाँ चंदा, मैं ही तुम्हारा भाई हूँ” यह सुनते ही चंदा अपने भाई से लिपट गई और फूट फूट कर रोने लगी।
.
तभी भक्त और भगवान के मध्य भाव और भक्ति का एक अनूठा दृश्य उत्त्पन्न हुआ , भगवान वही धरती पर बैठ गए उन्होंने नन्ही चंदा के कोमल पैरो को अपने हाथो में लिया और उसको प्रेम से देखा।
.
वह छोटे-छोटे कोमल पांव पूर्ण रूप से काँटों से छलनी हो चुके थे उनमे से रक्त बह रहा था, यह देख कर भगवान की आँखों से आंसू बह निकले उन्होंने उन नन्हे पैरो को अपने माथे से लगाया और रो उठे,
.
अद्भुत दृश्य, बहन भाई को पाने की प्रसन्नता में रो रही थी और भगवान अपने भक्त के कष्ट को देख कर रो रहे थे। श्री हरि ने अपने हाथो से चंदा के पैरो में चुभे एक एक कांटे को बड़े प्रेम से निकाला फिर उसके पैरो पर अपने हाथ का स्पर्श किया, पलभर में सभी कष्ट दूर हो गये।
.
चंदा अपने भाई का हाथ पकड़ कर बोली भाई तुम घर चलो, कल रक्षा बंधन है, मैं भी रक्षा बंधन करुँगी। भगवान बोले अब तू घर जा दादी प्रतीक्षा कर रही होगी, मैं कल प्रातः घर अवश्य आऊंगा। ऐसा कहकर उसको विश्वास दिलाया और जंगल के बाहर तक छोड़ने आऐ।
.
अब चंदा बहुत प्रसन्न थी उसकी सारी चिंता मिट गई थी, घर पहुंची तो देखा कि दादी का रो रो कर बुरा हाल था। चंदा को देखते ही उसको छाती से लगा लिया। चंदा बहुत पुलकित थी बोली दादी अब तू रो मत कल मेरा भाई आएगा, मैं भी रक्षा बंधन करुँगी।
.
दादी ने अपने आंसू पोंछे उसने सोंचा कि जंगल में कोई बालक मिल गया होगा जिसको यह अपना भाई समझ रही है, चंदा ने दादी से जिद्द करी और एक सुन्दर सी राखी अपने भाई के लिए खरीदी।
.
अगले दिन प्रातः ही वह नहा-धो कर अपने भाई की प्रतीक्षा में द्वार पर बैठ गई, उसको अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थोड़ी देर में ही वह बालक सामने से आते दिखाई दिया, उसको देखते ही चंदा प्रसन्नता से चीख उठी “दादी ! भाई आ गया” और वह दौड़ कर अपने भाई के पास पहुँच गई, उसका हाथ पकड़ कर घर में ले आई।
.
अपनी टूटी-फूटी चारपाई पर बैठाया बड़े प्रेम से भाई का तिलक किया आरती उतारी और रक्षा बंधन किया। सुन्दर राखी देख कर भाई बहुत प्रसन्न था, भाई के रूप में भगवान उसके प्रेम को देख कर विभोर हो उठे थे, अब बारी उनकी थी।
.
भाई ने अपने साथ लाए झोले को खोला तो खुशीओं का अम्बार था, सुन्दर कपड़े, मिठाई, खिलौने, और भी बहुत कुछ। चंदा को मानो पंख लग गए थे। उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था।
.
कुछ समय साथ रहने के बाद वह बालक बोला अब मुझको जंगल में वापस जाना है। चंदा उदास हो गई, तब वह बोला तू उदास ना हो, आज से प्रतिदिन में तुमसे मिलने अवश्य आऊंगा। अब वह प्रसन्न थी। बालक जंगल लौट गया।
.
उधर दादी असमंजस में थी कौन है यह बालक, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु हरि के मन की हरि ही जानें।
.
भाई के जाने के बाद जब चंदा घर में वापस लौटी तो एकदम ठिठक गई उसकी दृष्टि लड्डू गोपाल की प्रतिमा पर पड़ी तो उसने देखा कि उनके हाथ में वही राखी बंधी थी जो उसने अपने भाई के हाथ में बांधी थी।
.
उसने दादी को तुरंत बुलाया यह देख कर दादी भी अचम्भित रह गई, किन्तु उसने बचपन से कृष्ण की भक्ति करी थी वह तुरंत जान गई कि वह बालक और कोई नहीं स्वयं श्री हरि ही थे, वह उनके चरणो में गिर पड़ी और बोली, है छलिया, जीवन भर तो छला जीवन का अंत आया तो अब भी छल कर चले गए।
.
वह चंदा से बोली अरी वह बालक और कोई नहीं तेरा यही भाई था। यह सुन कर चंदा भगवान की प्रतिमा से लिपट कर रोने लगी रो रो कर बोली “कहो ना भाई, क्या वह तुम ही थे, मैं जानती हूँ वह तुम ही थे, फिर सामने क्यों नहीं आते, छुपते क्यों हो।
.
दादी पोती का निर्मल प्रेम ऐसा था कि भगवान भी विवश हो गए। लीला धारी तुरंत ही विग्रह से प्रकट हो गए और बोले हां चंदा में ही तुम्हारा वह भाई हूँ, तुमने मुझको पुकारा तो मुझको आना पड़ा। और मैं कैसे नहीं आता, जो भी लोग ढोंग, दिखावा, पाखंड रचते है उनसे में बहुत दूर रहता हूँ, किन्तु जब मेरा कोई सच्चा भक्त प्रेम भक्ति से मुझको पुकारता है तो मुझको आना ही पड़ता है।
.
भक्त और भगवान की प्रेममय लीला चल रही थी, और दादी वह तो भगवान में लीन हो चुकी थी रह गई, चंदा तो उस दिन के बाद से गाँव में उनको किसी ने नहीं देखा, कोई नहीं जान पाया की आखिर दादी-पोती कहा चले गए। प्रभु की लीला प्रभु ही जाने…
🌹(संकलन:- इधर-उधर से : सौजन्य:- अक्स ãks ਅਕੱਸ )🌹
#Aks #अक्स #ãks #ਅਕੱਸ #EkKahaani #एककहानी #ਇਕਕਹਾਣੀ #Story #कहानी #ਕਹਾਣੀ #🔰

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

संजय गुप्ता

मित्रोआज गणेश चतुर्थी है, आपको आपके परिवार को इस पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!!

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

भावार्थ :विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है , हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गयें, उनके जाने के पश्चात माता पार्वतीजी ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम गणेश रखा, पार्वतीजी ने अपने पुत्र से कहा कि तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ, मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ, जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान् शिवजी आये तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया, इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गयें, पार्वतीजी ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं।

इसलिये उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया, तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा देवी! यह दूसरा थाल किसके लिये है? पार्वतीजी बोलीं पुत्र गणेश के लिये है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है, यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुयें, तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं?

शिवजी ने कहाँ- देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया, यह सुन पार्वतीजी बहुत दुःखी हुईं और वे विलाप करने लगीं, तब पार्वतीजी को प्रसन्न करने के लिये भगवान् शिवजी ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया, पार्वतीजी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई।

उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया, यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी, इसीलिये यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है, सज्जनों! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है, जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है।

ऐसा शास्त्रों का निर्देश है, यह अनुभूत भी है, इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत होते हैं इसमें संशय नहीं है, यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाये तो इस मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिये।

सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः।।

भगवान् श्री गणेशजी हिन्दुओं के आदि आराध्य देव है, हिन्दू धर्म में गणेशजी को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है, कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो इसलिये शुभ के रूप में गणेशजी की पूजा सबसे पहले की जाती है, यह मनुष्यों के लिये ही नहीं, बल्कि देवताओं के लिये भी जरूरी है।

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्न कुरुमेदेव सर्वकार्य सर्वदा।।

भाई-बहनों! श्री गणपति बप्पा आज आप सभी के लिए ढेरों खुशीया लेकर आवे, पूरा वर्ष आपका खुशीयों भरा एवम् आनन्दमय हो, श्री गणेश चतुर्थी पर्व एवम् गणेश उत्सव के पावन अवसर पर आप सभी को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें, .विध्न विनाशक गौरीनंदन प्रथमपूज्य श्री गणेशजी रिद्दी-सिद्दी, लाभ-शुभ सहित आपके घर आँगन पधारें और आपके जीवन में आनंद की वृद्धि करें, गणेश उत्सव की आपको और आपके समस्त परिवार को हार्दिक सुभकामनाये।

ॐ गं गणपतये नमः
जय श्री गणेश!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भगवान गणेश जी के जन्म की कथा

देव शर्मा
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
करुणासिन्धु, बन्धु जन-जनके, सिद्धि-सदन, सेवक-सुखदायक।।
कृष्णस्वरूप, अनूप-रूप अति, विघ्न-बिदारण, बोध-विधायक।
सिद्धि-बुद्धि-सेवित, सुषमानिधि, नीति-प्रीति-पालक, वरदायक।।

मंगलमूर्ति श्रीगणेश की पूजा केवल पंचदेवों में ही सबसे पहले नहीं होती बल्कि तैतीसकोटि देवों के अर्चन में भी श्रीगणेश अग्रपूज्य हैं। श्रीगणेश की अग्रपूजा हो भी क्यों नहीं; माता पार्वती के ‘पुण्यक व्रत’ के कारण साक्षात् गोलोकनाथ भगवान श्रीकृष्ण ही पार्वती के पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए थे। अत: श्रीकृष्ण और गणेश–दोनों एक ही तत्त्व हैं। परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के अतिरिक्त संसार में किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। भगवान ने स्वयं कहा है–‘मेरे सिवा जगत में किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है। सूत में गुंथी हुई माला के मणियों की तरह सभी वस्तुएं मुझमें गुंथी हुईं है।’ गीता (७।७)

‘मनुष्य अपनी श्रद्धा के अनुसार मेरे जिस-जिस स्वरूप की उपासना करता है, उसी-उसी स्वरूप में उसकी श्रद्धा को मैं बढ़ा देता हूँ और वह अपनी श्रद्धा के अनुसार मेरे द्वारा विहित फल को प्राप्त करता है।’ (गीता ७।२१-२२)

भगवान श्रीकृष्ण ही गणेश के रूप में आविर्भूत हुए हैं, इस सम्बन्ध में ब्रह्मवैवर्तपुराण के गणपतिखण्ड में एक सुन्दर कथा है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण अनादि हैं; वैसे ही जगन्माता दुर्गा प्रकृतिस्वरूपा है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में प्रकट होने के कारण इनका नाम ‘पार्वती’ हुआ। पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुत्री का दाम्पत्य-सम्बन्ध परब्रह्म के अंशरूप भगवान शंकर के साथ स्थापित किया। विवाह के बहुत दिन बीत जाने पर भी पार्वतीजी को जब कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने भगवान शंकर को अपना दु:ख बतलाया।

भगवान शंकर द्वारा पार्वतीजी को ‘पुण्यक-व्रत’ के लिए प्रेरित करना

भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा– ‘मैं तुमको एक उपाय बतलाता हूँ क्योंकि तीनों लोकों में उपाय से ही कार्य में सफलता प्राप्त होती है। भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करके ‘पुण्यक’ नामक व्रत का एक वर्ष तक पालन करो। यद्यपि भगवान गोपांगनेश्वर श्रीकृष्ण सब प्राणियों के अधीश्वर हैं, फिर भी वे इस व्रत से प्रसन्न होकर तुमको पुत्ररूप में प्राप्त होंगे।’

शंकरजी की बात मानकर पार्वतीजी ने विधिपूर्वक ‘पुण्यक व्रत’ किया। व्रत की समाप्ति पर उत्सव मनाया गया। इस महोत्सव में ब्रह्मा, लक्ष्मीजी सहित विष्णु, समस्त देवता, ऋषि-मुनि, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर व सभी पर्वतराज पधारे। भगवान शशांकशेखर और सर्वदारिद्रदमनी जगज्जननी के सुप्रबन्ध का क्या कहना ! जहां शचीपति इन्द्र दानाध्यक्ष, कुबेर कोषाध्यक्ष, भगवान सूर्य सबको आदेश देने वाले और वरुण परोसने का कार्य कर रहे थे।

भगवान विष्णु का व्रत के माहात्म्य तथा गणेश की उत्पत्ति का वर्णन करना

भगवान विष्णु ने शंकरजी से कहा–’आपकी पत्नी ने संतान-प्राप्ति के लिए जिस पुण्यक-व्रत को किया है, वह सभी व्रतों का साररूप है। सूर्य, शिव, नारायण आदि की दीर्घकाल तक उपासना करने के बाद ही मनुष्य कृष्णभक्ति को पाता है। कृष्णव्रत और कृष्णमन्त्र सम्पूर्ण कामनाओं के फल के प्रदाता हैं। चिरकाल तक श्रीकृष्ण की सेवा करने से भक्त श्रीकृष्ण-तुल्य हो जाता है। पुण्यक-व्रत के प्रभाव से स्वयं परब्रह्म गोलोकनाथ श्रीकृष्ण पार्वती के अंक में क्रीड़ा करेंगे। वे स्वयं समस्त देवगणों के ईश्वर हैं, इसलिए त्रिलोकी में ‘गणेश’ नाम से जाने जाएंगे। चूंकि पुण्यक-व्रत में उन्हें तरह-तरह के पकवान समर्पित किए जायेंगे, जिन्हें खाकर उनका उदर लम्बा हो जाएगा; अत: वे ‘लम्बोदर’ कहलायेंगे। इनके स्मरणमात्र से जगत के विघ्नों का नाश हो जाता है, इस कारण इनका नाम ‘विघ्ननिघ्न’ भी होगा। शनि की दृष्टि पड़ने से सिर कट जाने से पुन: हाथी का सिर जोड़ा जायेगा, इस कारण उन्हें ‘गजानन’ कहा जायेगा। परशुराम के फरसे से जब इनका एक दांत टूट जायेगा, तब ये ‘एकदन्त’ कहलायेंगे। ये जगत के पूज्य होंगे और मेरे वरदान से उनकी सबसे पहले पूजा होगी।’

अस्वाभाविक दक्षिणा

भगवान विष्णु की बात सुनकर पार्वतीजी ने पूरे विधान के साथ उस व्रत को पूर्ण किया और ब्राह्मणों को खूब दक्षिणा दी। अंत में पार्वतीजी ने पुरोहित सनत्कुमारजी से कहा–’मैं आपको मुंहमांगी दक्षिणा दूंगी।’ सनत्कुमार ने पार्वतीजी से कहा–’मैं दक्षिणा में भगवान शंकर को चाहता हूँ, कृपया आप मुझे उन्हें दीजिए। अन्य विनाशी पदार्थों को लेकर मैं क्या करुंगा।’ भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया से पार्वतीजी की बुद्धि मोहित हो गयी और यह ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर वह मूर्च्छित होकर गिर गईं।

दक्षिणा का महत्व

भगवान विष्णु ने पार्वतीजी को समझाते हुए कहा–दक्षिणा देने से धर्म-कर्म का फल और यश मिलता है। दक्षिणा रहित देवकार्य, पितृकार्य व नित्य-नियम आदि निष्फल हो जाते हैं। ब्राह्मणों को संकल्प की हुई दक्षिणा उसी समय नहीं देने से वह बढ़कर कई गुनी हो जाती है। अत: तुम पुरोहित की मांगी हुई दक्षिणा दे दो।हम लोगों के यहां रहते तुम्हारा अकल्याण संभव नहीं।

पार्वतीजी ने कहा–‘जिस कर्म में पति की ही दक्षिणा दी जाती है, उस कर्म से मुझे क्या लाभ? पतिव्रताओं के लिए पति सौ पुत्रों के समान होता है। यदि व्रत में पति को ही दे देना है, तो उस व्रत के फलस्वरूप पुत्र से क्या सिद्ध होगा? मानाकि पुत्र पति का वंश होता है, किन्तु उसका एकमात्र मूल तो पति ही है। यदि मूलधन ही नष्ट हो जाए तो सारा व्यापार ही निष्फल हो जाएगा।’

भगवान विष्णु ने कहा–’शिवे ! तुम शिव को दक्षिणारूप में देकर अपना व्रत पूर्ण करो। फिर उचित मूल्य देकर अपने पति को वापस कर लेना।’

पार्वतीजी ने हवन की पूर्णाहुति करके अपने जीवनधन भगवान शिव को दक्षिणारूप में सनत्कुमार को दे दिया। पुरोहित सनत्कुमार जैसे ही महादेवजी को लेकर चलने लगे, पार्वतीजी को बहुत दु:ख हुआ।

भगवान नारायण के समझाने पर पार्वतीजी ने सनत्कुमार से कहा–’एक गौ का मूल्य मेरे स्वामी के समान है। मैं आपको एक लाख गौएं देती हूँ। कृपया मेरे पति को लौटाकर आप एक लाख गायों को ग्रहण कीजिए।’ परन्तु पुरोहित सनत्कुमार ने कहा–’आपने मुझे अमूल्य रत्न दक्षिणा में दिया है, फिर मैं उसके बदले एक लाख गौ कैसे ले सकता हूँ? इन गायों को लेकर तो मैं और भी झंझट में फंस जाऊंगा।’

पार्वतीजी की व्याकुलता

पार्वतीजी सोचने लगीं–‘मैंने यह कैसी मूर्खता की, पुत्र के लिए एक वर्ष तक पुण्यक व्रत करने में इतना कष्ट भोगा पर फल क्या मिला? पुत्र तो मिला ही नहीं, पति को भी खो बैठी। अब पति के बिना पुत्र कैसे होगा?’

इसी बीच सभी देवताओं व पार्वतीजी ने आकाश से उतरते हुए एक तेज:पुंज को देखा। उस तेज:पुंज को देखकर सभी की आंखें मुंद गयीं। किन्तु पार्वतीजी ने उस तेज:पुंज में पीताम्बरधारी भगवान श्रीकृष्ण को देखा।

प्रेमविह्वल होकर पार्वतीजी उनकी स्तुति करने लगीं–

’हे कृष्ण ! आप तो मुझको जानते हैं; परन्तु मैं आपको जानने में समर्थ नहीं हूँ। केवल मैं ही नहीं, बल्कि वेद को जानने वाले, अथवा स्वयं वेद भी अथवा वेद के निर्माता भी आपको जानने में समर्थ नहीं हैं। मैं पुत्र के अभाव से दु:खी हूँ, अत: आपके समान ही पुत्र चाहती हूँ। इस व्रत में अपने ही पति की दक्षिणा दी जाती है, अत: यह सब समझकर आप मुझ पर दया करें।’

परमात्मा श्रीकृष्ण का पार्वतीजी को वर प्रदान करना

पार्वतीजी की स्तुति सुनकर श्रीकृष्ण ने उनको अपने स्वरूप के दर्शन कराए। नवीन मेघ के समान श्याम शरीर पर अद्भुत पीताम्बर, रत्नाभूषणों से अलंकृत, करकमलों में मुरली, ललाट पर चंदन की खौर और मस्तक पर मन को मोहित करने वाला सुन्दर मयूरपिच्छ। इस अनुपम सौन्दर्य की कहीं तुलना नहीं थी।

द्विभुजं कमनीयं च किशोरं श्यामसुन्दरम्।
शान्तं गोपांगनाकान्तं रत्नभूषणभूषितम्।।
एवं तेजस्विनं भक्ता: सेवन्ते सततं मुदा।
ध्यायन्ति योगिनो यत् यत् कुतस्तेजस्विनं विना।।

भगवान श्रीकृष्ण पार्वतीजी को अभीष्ट सिद्धि का वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गए।

श्रीगणेश विशाल तोंद वाले कैसे हो गए?

भगवान शंकर और पार्वतीजी अपने आश्रम पर विश्राम कर रहे थे, उसी समय किसी ने उनका द्वार खटखटाया और पुकारा–’जगत्पिता महादेव ! जगन्माता पार्वती ! उठिए, मैंने सात रात्रि का उपवास किया है, इसलिए मैं बहुत भूखा हूँ। मुझे भोजन देकर मेरी रक्षा कीजिए।’ पार्वतीजी ने देखा एक अत्यन्त वृद्ध, दुर्बल ब्राह्मण, फटे व मैले कपड़े पहने उनसे कह रहा है–

’मैं सात रात तक चलने वाले व्रत के कारण भूख से व्याकुल हूँ। आपने पुण्यक-व्रत के महोत्सव में बहुत तरह के दुर्लभ पकवान ब्राह्मणों को खिलाए हैं; मुझे आप दूध, रबड़ी, तिल-गुड़ के लड्डू, पूड़ी-पुआ मेवा मिष्ठान्न, अगहनी का भात व खूब सारे ऋतु अनुकूल फल व ताम्बूल–इतना खिलाओ जिससे यह पीठ से सटा मेरा पेट बाहर निकल आए, मेरी सुन्दर तोंद हो जाए, और मैं लम्बोदर हो जाऊं। समस्त कर्मों का फल प्रदान करने वाली माता! आप नित्यस्वरूपा होकर भी लोकशिक्षा के लिए पूजा और तप करती हैं। प्रत्येक कल्प में गोलोकवासी श्रीकृष्ण गणेश के रूप में आपकी गोद में क्रीड़ा करेंगे।’

परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण का बालरूप में उनकी शय्या पर खेलना

ऐसा कहकर वह ब्राह्मण अन्तर्ध्यान हो गये और आकाशवाणी हुई–’हे पार्वति ! जिसको तुम खोज रही हो, वह तुम्हारे घर में आ गया है। गणेशरूप में श्रीकृष्ण प्रत्येक कल्प में आपके पुत्र बनकर आते हैं। आप शीघ्र अन्दर जाकर देखिए।’ भगवान श्रीकृष्ण इतना कहकर बालकरूप में आश्रम के अंदर बिछी शय्या पर जाकर लेट गए और शय्या पर पड़े हुए शिवजी के तेज में लिप्त हो गए और जन्मे हुए बालक की भांति घर की छत को देखने लगे।

पार्वतीजी ने अत्यन्त सुन्दर बालक को शय्या पर हाथ-पैर पटककर खेलते हुए देखा और भूख से ‘उमा’ ऐसा शब्द करके रोते देखा, तो प्रेम से उसे गोद में उठा लिया और बोली–

’जैसे दरिद्र का मन उत्तम धन पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह तुझ सनातन अमूल्य रत्न की प्राप्ति से मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया।’

मायारूपा पार्वती का यह व्रत लोकशिक्षा के लिए है, क्योंकि त्रिलोकी में व्रतों और तपस्याओं का फल देने वाली तो ये स्वयं ही है। इस कथानक का यही संदेश है कि कठिन लक्ष्य को भी मनुष्य अपनी अथक साधना और निष्ठा से प्राप्त कर सकता है।
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ज्योति अग्रवाल

मित्रोआज गणेश चतुर्थी है, आपको आपके परिवार को इस पावन पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं!!!!!!

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

भावार्थ : विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है , हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गयें, उनके जाने के पश्चात माता पार्वतीजी ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम गणेश रखा, पार्वतीजी ने अपने पुत्र से कहा कि तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ, मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ, जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान् शिवजी आये तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया, इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गयें, पार्वतीजी ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं।

इसलिये उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया, तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा देवी! यह दूसरा थाल किसके लिये है? पार्वतीजी बोलीं पुत्र गणेश के लिये है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है, यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुयें, तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं?

शिवजी ने कहाँ- देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया, यह सुन पार्वतीजी बहुत दुःखी हुईं और वे विलाप करने लगीं, तब पार्वतीजी को प्रसन्न करने के लिये भगवान् शिवजी ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया, पार्वतीजी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई।

उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया, यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी, इसीलिये यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है, सज्जनों! भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है, जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है।

ऐसा शास्त्रों का निर्देश है, यह अनुभूत भी है, इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत होते हैं इसमें संशय नहीं है, यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाये तो इस मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिये।

सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः।।

भगवान् श्री गणेशजी हिन्दुओं के आदि आराध्य देव है, हिन्दू धर्म में गणेशजी को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है, कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो इसलिये शुभ के रूप में गणेशजी की पूजा सबसे पहले की जाती है, यह मनुष्यों के लिये ही नहीं, बल्कि देवताओं के लिये भी जरूरी है।

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्न कुरुमेदेव सर्वकार्य सर्वदा।।

भाई-बहनों! श्री गणपति बप्पा आज आप सभी के लिए ढेरों खुशीया लेकर आवे, पूरा वर्ष आपका खुशीयों भरा एवम् आनन्दमय हो, श्री गणेश चतुर्थी पर्व एवम् गणेश उत्सव के पावन अवसर पर आप सभी को बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें, .विध्न विनाशक गौरीनंदन प्रथमपूज्य श्री गणेशजी रिद्दी-सिद्दी, लाभ-शुभ सहित आपके घर आँगन पधारें और आपके जीवन में आनंद की वृद्धि करें, गणेश उत्सव की आपको और आपके समस्त परिवार को हार्दिक सुभकामनाये।

ॐ गं गणपतये नमः
जय श्री गणेश!

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत

ज्योति अग्रवाल
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।
विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है.

हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।

हरितालिका तीज भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. यह आमतौर पर अगस्त – सितम्बर के महीने में ही आती है. इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है. इस वर्ष कल 12 सितम्बर 2018, दिन बुधवार को मनाई जाएगी।

महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।
अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।

हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰️〰️
हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।
विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।

उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।

भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए 👇

ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:

भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए 👇

ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शम्भवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।

हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
1 फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।

2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।

3- केले का पत्ता।

4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।

5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।

6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।

7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।

8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।

9- पञ्चामृत – घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।

हरतालिका तीज व्रत कथा
〰〰〰〰〰〰〰〰
भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया – मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं ‘तथास्तु’ कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

हरितालका तीज पूजा मुहूर्त
〰〰〰〰〰〰〰〰
11 सितम्बर की शाम 6 बजकर 4 मिनट से तीज लग जाएगी इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं और लड़कियां इससे पहले ही सरगी कर लें। यह निर्जला उपवास रखा जाता है।

तृतीया तिथि प्रारंभ: 11 सितंबर 2018 को शाम 6 बजकर 4 मिनट.

तृतीया तिथि समाप्‍त: 12 सितंबर 2018 को शाम 4 बजकर 7 मिनट.

प्रात: काल हरतालिका पूजा मुहूर्त: 12
सितंबर 2018 की सुबह 6 बजकर 15 मिनट से सुबह 8 बजकर 42 मिनट तक।

वैसे तो हरितालिका पूजन प्रदोष काल मे किया जाता है लेकिन इस वर्ष तृतीया तिथि प्रदोषकाल में व्याप्त ना होने और पूजा आदि का महत्त्व व्याप्त तिथि में ही होने के कारण पूजन प्रातःकाल में ही किया जाएगा। प्रात काल मे सुविधा ना होने पर सायं 4 बजकर 7 मिनट से पहले ही समाप्त कर लें पारण अगले दिन प्रातः काल ही होगा।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला”

संजय गुप्ता

भगवान श्रीरामचन्द्रजी युद्ध के दौरान जब नागपाश में बँध गये तो नारदजी ‘नारायण-नारायण’ करते हुए वैकुण्ठ में गरूड़जी के पास पहुँचे और कहाः “तुम कैसे सेवक हो ? स्वामी तो नागपाश में बँधे हुए हैं और तुम इधर घूम रहे हो !

जाओ, प्रभु की सेवा करो।”

जिनके पंखों की आवाज से सामवेद की ऋचाएँ निकलती हैं,ऐसे गरूड़ देवता पंख फड़फड़ाते हुए आये तो कई नाग तो उनकी ऋचाओं के आन्दोलनों से डरकर भाग गये। शेष रहे नागों को गरूड़ जी ने अपनी चोंच से रवाना कर दिया। प्रभु बँधनमुक्त हुए।

प्रभु तो लीला कर रहे थे लेकिन सेवक के भीतर अहंकार घुस गया कि अगर मैं नहीं आता तो श्रीरामजी को नागपाश से कौन छुड़ाता ? अपने इष्ट, अपने उद्धारक के प्रति अहोभाव होता है तो उन्नति होती है लेकिन तर्क-वितर्क से अहोभाव यदि घटता है अथवा दोष-दर्शन होता है तो पतन होता है, फिर चाहे गरूड़जी भी क्यों न हों।

वैकुण्ठाधिपति के नित्य दर्शन करने वाले गरूड़जी भी मोहग्रस्त होकर अशांति का शिकार हुए हैं और अशांति का उपचार किसी वैद्य, हकीम या डॉक्टर के पास नहीं होता।

स्वर्ग के राजा इन्द्र भी अशांत होने पर आत्मशांति की तलाश में ब्रह्मवेत्ताओं के चरणों में जाते हैं। गरूड़जी ब्रह्मवेत्ताओं के शिरोमणि भगवान शंकर के चरणों पहुँचे हैं- “प्रभु ! मुझे बड़ी अशांति हो रही है।”

शिवजी पूछते हैं- “अशांति का कारण क्या है ? यह कब से हुई ?”

गरूड़जीः “जबसे राम जी को नागपाश से छुड़ाया तब से। मुझे संदेह हुआ कि ये साक्षात् नारायण कैसे हो सकते हैं ? मैं न आता तो उन्हें कौन छुड़ाता ?”

शिवजीः “आपकी अशांति की दवा मैं नहीं दूँगा। तूमने अपने इष्ट के प्रति, अपने उद्धारक के प्रति अश्रद्धा की है। आखिर तुम पक्षी जो ठहरे ! तुमपक्षपात करते हो, अपने अहं की तरफ आते हो।

अरे ! तुम्हारे भीतर जो समतत्त्व काम कर रहा है उस पर तुम्हारी नजर नहीं गई ?

तुम सोचते हो ‘मैंने अपनी चोंचों से काम किया।” अरे…. तुम्हारी चोंच किसकी सत्ता से चलती है ! तुम्हे पता नहीं ?

तुम्हारे पंख किसकी सत्ता से फड़फड़ाते हैं ? उसे तुम नहीं जानते ?

रमन्ते योगिनः यस्मिन् सः रामः।

रोम रोम में रमने वाले जिस चैतन्य आत्मा में योगी लोग रमण करते हैं, वह राम है। ……और उनका नागपाश तुमने तोड़ा ? राम की सत्ता से तुम्हारे पंख चल रहे हैं और तुमने राम की मदद की ?”

हम लोग भी तो यही कर रहे हैं। “हमने भगवान की सेवा की…. हमने बेटे की सेवा की।” किसकी सत्ता से की यह सेवा ? “हमने गुरू की सेवा की…. हमने साधकों की सेवा की…. हमने भक्तों की सेवा की….।”

साधक बोलेंगेः “हमने फलानों की सेवा की…..”

लेकिन तुम जिसकी निरन्तर सेवा ले रहे हो उसका तो ख्याल करो, भाई !

जब हम विराट स्वरूप को नहीं देखते हैं तो क्षुद्र अहंकार आ जाता है। जब उसकी करूणा और कृपा की तरफ नजर नहीं होती तो अपनी वासना और अहंकार में हम बँध जाते हैं।

फिर चाहे वह धन का अहंकार हो, कुर्सी का हो, सौन्दर्य का हो चाहे बल का अहंकार हो।

लेकिन उस विराट के आगे यह गौण है।

कई लोग शराब का सेवन करते हैं जिसमें निहित अल्कोहल से मनुष्यों की मति इतनी आक्रान्त हो जाती है कि वे कह उठते हैं-

“भगवान-वगवान को हम नहीं मानते। भगवान होते तो संसारी इतने दुःखी क्यों होते ?”

अरे नादानों ! दुःख भगवान के कारण नहीं, तुम्हारी वासना और स्वार्थ के कारण बना है। जिसने वासना और स्वार्थ को जितने अंशों में मिटाया है उतना ही भगवान का प्रसाद और आनन्द उसने पाया है। तुम भी पा सकते हो।

आज के नास्तिकवाद ने, अहंकारवाद ने, वासनावाद ने, मनुष्य को इतना उलझा दिया है कि वह भगवान की सत्ता को अस्वीकार कर अपनी सत्ता थोप रहा है क्योंकि वह यह भूल चुका है कि पानी की एक बूँद से उसके शरीर का निर्माण हुआ है और राख की मुट्ठी भर ढेर में उसकी लीला समाप्त हो जाती है।

इसका आदि देखो और अन्त में देखो, बीच का तुम कब सम्हालोगे, भैया !

किसी धनवान ने कहीं दान किया तो वह ढिंढोरा पीटेगा कि मैंने इतना दिया है। अरे भैया ! तू यह सब लाया कहाँ से है ? जरा विचार तो कर ! यह तो उसकी कृपा है कि तेरे माध्यम से वह यह सत्कर्म करवा रहा है।

फिर क्यों तू अहंकार सजा रहा है ? भगवान की इस कृपा को भी तू अहंकार पोसने के उपयोग में ला रहा है ? अहंकार मिटाने की बात कर और ईमानदारी से खोज…. कल्याण हो जायेगा।

हम वाह-वाही व विकारी सुखों को जितना कम महत्त्व देंगे उतना अधिक हम भगवान की अनन्त कृपा का, अनन्त प्रसाद का, अनन्त सुख का, अनन्त जीवन का दर्शन करने के अधिकारी हो जाएँगे।

सुन्दर नाक बनाई है, सुन्दर चेहरा मिला है तो बार-बार देखते रहते हैं काँच में कि मैं कैसा लग रहा हूँ ! उस समय मन में कह दो किः

“पानी की एक बूँद का ही रूपान्तर है यह शरीर। अब सोचः तू कैसा लग रहा है ? श्मशान की संपत्ति है यह शरीर। अब सोचः तू कैसा लग रहा है ?”

मनुष्य अगर थोड़ा-सा भी विवेक से सोच ले तो फिर न तो सौन्दर्य का अहंकार टिक सकता है न सत्ता का, न धन का अहंकार टिक सकता है और न ही बुद्धिमत्ता का।

इस अहंकार ने हमको विराट से अलग कर दिया है। जैसे कि गंगा की धारा से अलग हुआ पानी किसी गड्डे में पड़ा रहे तो कुछ दिन बाद वह बदबू मारने लगता है।

जिस पर मच्छर भी मंडराते रहते हैं। भले ही वह गंगाजल हो लेकिन वैदिक कर्मकांड के उपयुक्त नहीं माना जाता। ऐसे ही उस विराट परमेश्वर की धारा से छूटकर अंतःकरण में, शरीर में व क्रियाओं में आबद्ध होकर मनुष्य इच्छा-वासना का गुलाम बनकर तुच्छ हो गया है। तुम जहाँ से स्फुरे हो उधर का अनुसंधान कर लो तो तुम अभी ही महान् हो जाओगे।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या? तू ब्रह्म का ही अंश है।

।। जय सिया राम ।।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

श्री कृष्ण के द्वारा राजा नृग का उद्धार


श्री कृष्ण के द्वारा राजा नृग का उद्धार =====

संजय गुप्त

‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ के अनुसार- श्रीशुकदेवजी कहते हैं- “प्रिय परीक्षित! एक दिन साम्ब, प्रद्युम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घूमने के लिये उपवन में गये।

वहाँ बहुत देर तक खेल खेलते हुए उन्हें प्यास लग आयी। अब वे इधर-उधर जल की खोज करने लगे। वे एक कुएँ के पास गये; उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा। वह जीव पर्वत के समान आकार का एक गिरगिट था। उसे देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही।

उनका हृदय करुणा से भर आया और वे उसे बाहर निकालने का प्रयत्न करने लगे। परन्तु जब वे राजकुमार उस गिरे हुए गिरगिट को चमड़े और सूत की रस्सियों से बाँधकर बाहर न निकाल सके, तब कुतूहलवश उन्होंने यह आश्चर्यमय वृत्तान्त भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर निवेदन किया। जगत के जीवनदाता कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये।

उसे देखकर उन्होंने बायें हाथ से खेल-खेल में-अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया। भगवान श्रीकृष्ण के करकमलों का स्पर्श होते ही उसका गिरगिट-रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणत हो गया। अब उसके शरीर का रंग तपाये हुए सोने के समान चमक रहा था और उसके शरीर पर अद्भुत वस्त्र, आभूषण और पुष्पों के हार शोभा पा रहे थे।

यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि इस दिव्य पुरुष को गिरगिट-योनि क्यों मिली थी, फिर भी वह कारण सर्वसाधारण को मालूम हो जाय, इसलिये उन्होंने उस दिव्य पुरुष से पूछा- “महाभाग! तुम्हारा यह रूप तो बहुत ही सुन्दर है। तुम हो कौन? मैं तो ऐसा समझता हूँ कि तुम अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हो।

कल्याणमूर्ते! किस कर्म के फल से तुम्हें इस योनि में आना पड़ा था? वास्तव में तुम इसके योग्य नहीं हो। हम लोग तुम्हारा वृत्तान्त जानना चाहते हैं। यदि तुम हम लोगों को वह बतलाना उचित समझो तो अपना परिचय अवश्य दो।”

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- “परीक्षित! जब अनन्तमूर्ति भगवान श्रीकृष्ण ने राजा नृग से इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने अपना सूर्य के समान जाज्वल्यमान मुकुट झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और वे इस प्रकार कहने लगे।

राजा नृग ने कहा- “प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। जब कभी किसी ने आपके सामने दानियों की गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानों में पड़ा होगा। प्रभो! आप समस्त प्राणियों की एक-एक वृत्ति के साक्षी हैं।

भूत और भविष्य का व्यवधान भी आपके अखण्ड ज्ञान में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता। अतः आपसे छिपा ही क्या है? फिर भी मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये कहता हूँ।

भगवन! पृथ्वी में जितने धूलिकण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जल की धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं। वे सभी गौएँ दुधार, नौजवान, सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा और कपिला थीं। उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था। सबके साथ बछड़े थे। उनके सींगों में सोना मढ़ दिया गया था और खुरों में चाँदी। उन्हें वस्त्र, हार और गहनों से सजा दिया जाता था।

ऐसी गौएँ मैने दी थीं। भगवन! मैं युवावस्था से सम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मणकुमारों को-जो सद्गुणी, शीलसम्पन्न, कष्ट में पड़े हुए कुटुम्ब वाले, दम्भरहित तपस्वी, वेदपाठी, शिष्यों को विद्यादान करने वाले तथा सच्चरित्र होते-वस्त्राभूषण से अलंकृत करता और उन गौओं का दान करता।

इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दासियों के सहित कन्याएँ, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न, गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कुएँ, बावली आदि बनवाये।

एक दिन किसी अप्रतिग्रही,तपस्वी ब्राह्मण की एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजान में उसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया। जब उस गाय को वे ब्राह्मण ले चले, तब उस गाय के असली स्वामी ने कहा- “यह गौ मेरी है।

” दान ले जाने वाले ब्राह्मण ने कहा- “यह तो मेरी है, क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसका दान किया है।” वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास आये। एक ने कहा- “यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है” और दूसरे ने कहा कि “यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।

” भगवन! उन दोनों ब्राह्मणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया। मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि- “मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आप लोग मुझे यह गाय दे दीजिये। मैं आप लोगों का सेवक हूँ। मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है। मुझ पर आप लोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्ट से तथा घोर नरक में गिरने से बचा लीजिये।”

“राजन! मैं इसके बदले मैं कुछ नहीं लूँगा।” यह कहकर गाय का स्वामी चला गया। “तुम इसके बदले में एक लाख ही नहीं, दस हज़ार गाएँ और दो तो भी मैं लेने का नहीं।” इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया। देवाधिदेव जगदीश्वर! इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज के दूत आये और मुझे यमपुरी ले गये।

वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा- “राजन! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है।” भगवन! तब मैंने यमराज से कहा- “देव! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ।

” और उसी क्षण यमराज ने कहा- “तुम गिर जाओ।” उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ। प्रभो! मैं ब्राह्मणों का सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था। मुझे इस बात की उत्कट अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ। इस प्रकार आपकी कृपा से मेरे पूर्वजन्मों की स्मृति नष्ट न हुई। भगवन! आप परमात्मा हैं।

बड़े-बड़े शुद्ध-हृदय योगीश्वर उपनिषदों की दृष्टि से अपने हृदय में आपका ध्यान करते हैं। इन्द्रियातीत परमात्मन! साक्षात आप मेरे नेत्रों के सामने कैसे आ गये। क्योंकि मैं तो अनेक प्रकार के व्यसनों, दुःखद कर्मों में फँसकर अंधा हो रहा था। आपका दर्शन तो तब होता है, जब संसार के चक्कर से छुटकारा मिलने का समय आता है।

देवताओं के भी आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत तथा जीवों के स्वामी हैं। अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है। अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियों के स्वामी हैं। प्रभो! श्रीकृष्ण! मैं अब देवताओं के लोक में जा रहा हूँ। आप मुझे आज्ञा दीजिये।

आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलों में ही लगा रहे। आप समस्त कार्यों और कारणों के रूप में विद्यमान हैं। आपकी शक्ति अनन्त हैं और आप स्वयं ब्रह्म हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ।

सच्चिंदानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।”

राजा नृग ने इस प्रकार कहकर भगवान की परिक्रमा की और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श करके प्रणाम किया। फिर उनसे आज्ञा लेकर सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमान पर सवार हो गये।

राजा नृग के चले जाने पर ब्राह्मणों के परम प्रेमी, धर्म के आधार देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों को शिक्षा देने के लिये वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्ब के लोगों से कहा- “जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राह्मणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। फिर जो अभिमानवश झूठ-मूठ अपने को लोगों का स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं? मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है।

वस्तुतः ब्राह्मणों का धन ही परम विष है, उसको पचा लेने के लिये पृथ्वी में कोई औषध, कोई उपाय नहीं है। हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है और आग भी जल के द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मण के धन रूप अरणि से जो आग पैदा होती है, वह सारे कुल को समूल जला डालती है।

ब्राह्मण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय, तब तो वह भोगने वाले, उसके लड़के और पौत्र-इन तीन पीढ़ियों को ही चौपट करता है। परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषों की दस पीढ़ियाँ और आगे की भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं।

जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मी के घमंड से अंधे होकर ब्राह्मणों का धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरक में जाने का रास्ता साफ कर रहे हैं। वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतन के कैसे गहरे गड्ढ़े में गिरना पड़ेगा।

जिन उदारहृदय और बहु-कुटुम्बी ब्राह्मणों की वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोने पर उनके आँसू की बूँदों से धरती के जितने धूलकण भीगते हैं, उतने वर्षों तक ब्राह्मण के स्वत्व को छीनने वाले उस उच्छ्रंखल राजा और उसके वंशजों को कुम्भी पाक नरक में दुःख भोगना पड़ता है। जो मनुष्य अपनी या दूसरों की दी हुई ब्राह्मणों की वृत्ति, उनकी जीविका के साधन छीन लेते हैं, वे साठ हज़ार वर्ष तक विष्ठा के कीड़े होते हैं।

इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राह्मणों का धन कभी भूल से भी मेरे कोष में न आये, क्योंकि जो लोग ब्राह्मणों के धन की इच्छा भी करते हैं, उसे छीनने की बात तो अलग रही, वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओं से पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद भी दूसरों को कष्ट देने वाले साँप ही होते हैं।

इसलिये मेरे आत्मीयो! यदि ब्राह्मण अपराध करे, तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुम लोग सदा नमस्कार ही करो। जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानी से तीनों समय ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी किया करो। जो मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा।

यदि ब्राह्मण के धन का अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करने वाले को-अनजान में उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी-अधःपतन के गड्ढ़े में डाल देता है। जैसे ब्राह्मण की गाय ने अनजान में उसे लेने वाले राजा नृग को नरक में डाल दिया था।”

परीक्षित! समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारकावासियों को इस प्रकार उपदेश देकर अपने महल में चले गये।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ज्योति अग्रवाल

एक राजा था ।.. उसने एक सर्वे करनेका सोचा कि
मेरे राज्य के लोगों की घर गृहस्थि पति से चलती है या पत्नि से..।
उसने एक ईनाम रखा कि ” जिसके घर में पतिका हुकम चलता हो उसे मनपसंद घोडा़ ईनाम में मिलेगा और जिसके घर में पत्नि की सरकार हो वह एक सेब ले जाए.. ।
एक के बाद एक सभी नगरजन सेब उठाकर जाने लगे । राजाको चिंता होने लगी.. क्या मेरे राज्य में सभी सेब ही हैं ?
इतने में एक लम्बी लम्बी मुछों वाला, मोटा तगडा़ और लाल लाल आखोंवाला जवान आया और बोला
” राजा जी मेरे घर में मेरा ही हुकम चलता है .. ला ओ घोडा़ मुझे दिजीए ..”
राजा खुश हो गए और कहा जा अपना मनपसंद घोडा़ ले जा ..। जवान काला घोडा़ लेकर रवाना हो गया ।
घर गया और फिर थोडी़ देरमें दरबार में वापिस लौट आया।
राजा: ” क्या हुआ जवामर्द ? वापिस क्यों आया !
जवान : ” महाराज, घरवाली कहती है काला रंग अशुभ होता है, सफेद रंग शांति का प्रतिक होता है तो आप मुझे सफेद रंग का घोडा़ दिजिए
राजा: ” घोडा़ रख ..और सेब लेकर चलती पकड़ ।
इसी तरह रात हो गई .. दरबार खाली हो गया लोग सेब लेकर चले गए ।
आधी रात को महामंत्री ने दरवाजा खटखटाया..
राजा : ” बोलो महामंत्री कैसे आना हुआ ?
महामंत्री : ” महाराज आपने सेब और घोडा़ ईनाम में रखा ,इसकी जगह एक मण अनाज या सोना महोर रखा होता तो लोग लोग कुछ दिन खा सकते या जेवर बना सकते ।
राजा :” मुझे तो ईनाम में यही रखना था लेकिन महारानी ने कहा कि सेब और घोडा़ ही ठीक है इसलिए वही रखा ।
महामंत्री : ” महाराज आपके लिए सेब काट दुँ..!!
राजा को हँसी आ गई । और पुछा यह सवाल तुम दरबारमें या कल सुबह भी पुछ सकते थे । तो आधी रात को क्यों आये ??
महामंत्री : ” मेरी धर्मपत्नि ने कहा अभी जाओ और पुछ के आओ सच्ची घटना का पता चले ..।
राजा ( बात काटकर ) : ” महामंत्री जी , सेब आप खुद ले लोगे या घर भेज दिया जाए ।”
Moral of the story..
समाज चाहे पुरुषप्रधान हो लेकिन संसार स्त्रीप्रधान है

दोस्तो आपका यह दोस्त भी अभी सेब खा रहा है।
😀😀