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लीलावती-गणित क्या है?

संजय गुप्ता
जानिए गणितज्ञ लीलावती की कथा!!!!!!!!!!!! @@@@

लीलावती गणित का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने सुना है। आज की पीढ़ी उन्हें बहुत अधिक नहीं जानती।
आइए जानते हैं महान गणितज्ञ लीलावती के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था। लीलावती गणित विद्या की आचार्या थीं; जिस समय विदेशी क-ख-ग भी नहीं जानते थे, उस समय उसने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत सोच डाले, जिन पर आधुनिक गणितज्ञों की भी बुद्धि चकरा जाती है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’ उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था। एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी। विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला। विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा; लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया!
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटीगणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है। पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।
मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। लीलावती ने गणित के आश्चर्यजनक और नवीन, नवीनतर तथा नवीनतम सिद्धांत स्थिर कर विश्वमात्र का उपकार किया है।

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संजय गुप्ता

📿 एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका।

📿 यमराज ने पीने के लिए पानी मांगा उस व्यक्ति ने उन्हें पानी पिलाया।

📿 पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

📿 यह कहकर यमराज ने उसे एक डायरी देकर कहा तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है इसमें तुम जो भी लिखोगे वही होगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट।

📿 उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लाॅटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है। उसने वहाँ लिख दिया कि पड़ोसी की लाॅटरी ना निकले।

📿 अगले पेज पर लिखा था उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है उसने लिख दिया कि वह चुनाव हार जाये।

📿 इसी तरह वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया। जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पैन उठाया यमराज ने उसके हाथों से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा 5 मिनट का समय पूरा हुआ अब कुछ नहीं हो सकता।

📿 तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में निकाल दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया अतः तुम्हारा अन्त निश्चित है।

📿 यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा समय निकल चुका था।

📿 यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचो न करो।

📿 दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है।

📿 प्रण लें आज से हम किसी का बुरा नहीं करेंगे।

    🙏🏻 "विचार कर के देखें" 🙏🏻
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सबसे बड़ी चीज

संजय गुप्ता

एक दिन बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं थे। ऐसे में बीरबल से जलने वाले सभी सभासद बीरबल के खिलाफ बादशाह अकबर के कान भर रहे थे।
अक्सर ऐसा ही होता था, जब भी बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं होते थे, तभी दरबारियों को मौका मिल जाता था। आज भी ऐसा ही मौका था।

बादशाह के साले मुल्ला दो प्याजा की शह पाए कुछ सभासदों ने कहा ‘जहांपनाह!
आप वास्तव में बीरबल को आवश्यकता से अधिक मान देते हैं, हम लोगों से ज्यादा उन्हें चाहते हैं। आपने उन्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है। जबकि जो काम वे करते हैं, वह हम भी कर सकते हैं। मगर आप हमें मौका ही नहीं देते।’

बादशाह को बीरबल की बुराई अच्छी नहीं लगती थी, अतः उन्होंने उन चारों की परीक्षा ली ‘देखो, आज बीरबल तो यहां हैं नहीं और मुझे अपने एक सवाल का जवाब चाहिए।
यदि तुम लोगों ने मेरे प्रश्न का सही-सही जवाब नहीं दिया तो मैं तुम चारों को फांसी पर चढ़वा दूंगा।’ बादशाह की बात सुनकर वे चारों घबरा गए।

उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा- ‘प्रश्न बताइए बादशाह सलामत ?’
‘संसार में सबसे बड़ी चीज क्या है?
….और अच्छी तरह सोच-समझ कर जवाब देना वरना मैं कह चुका हूं कि तुम लोगों को फांसी पर चढ़वा दिया जाएगा।’
बादशाह अकबर ने कहा- ‘अटपटे जवाब हरगिज नहीं चलेंगे। जवाब एक हो और बिलकुल सही हो।’
‘बादशाह सलामत? हमें कुछ दिनों की मोहलत दी जाए।’ उन्होंने सलाह करके कहा।

‘ठीक है, तुम लोगों को एक सप्ताह का समय देता हूं।’ बादशाह ने कहा।

चारों दरबारी चले गए और दरबार से बाहर आकर सोचने लगे कि सबसे बड़ी चीज क्या हो सकती है?

एक दरबारी बोला- ‘मेरी राय में तो अल्लाह से बड़ा कोई नहीं।’

‘अल्लाह कोई चीज नहीं है। कोई दूसरा उत्तर सोचो।’ – दूसरा बोला।

‘सबसे बड़ी चीज है भूख जो आदमी से कुछ भी करवा देती है।’ – तीसरे ने कहा।

‘नहीं…नहीं, भूख भी बर्दाश्त की जा सकती है।’

‘फिर क्या है सबसे बड़ी चीज?’ छः दिन बीत गए लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझा।

हार कर वे चारों बीरबल के पास पहुंचे और उसे पूरी घटना कह सुनाई, साथ ही हाथ जोड़कर विनती की कि प्रश्न का उत्तर बता दें।

बीरबल ने मुस्कराकर कहा- ‘मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है।’

‘हमें आपकी हजार शर्तें मंजूर हैं।’ चारों ने एक स्वर में कहा- ‘बस आप हमें इस प्रश्न का उत्तर बताकर हमारी जान बख्शी करवाएं।

‘बताइए आपकी क्या शर्त है?’ ‘तुममें से दो अपने कंधों पर मेरी चारपाई रखकर दरबार तक ले चलोगे। एक मेरा हुक्का पकड़ेगा, एक मेरे जूते लेकर चलेगा।’ बीरबल ने अपनी शर्त बताते हुए कहा।

यह सुनते ही वे चारों सन्नाटे में आ गए। उन्हें लगा मानो बीरबल ने उनके गाल पर कस कर तमाचा मार दिया हो। मगर वे कुछ बोले नहीं। अगर मौत का खौफ न होता तो वे बीरबल को मुंहतोड़ जवाब देते, मगर इस समय मजबूर थे, अतः तुरंत राजी हो गए।

दो ने अपने कंधों पर बीरबल की चारपाई उठाई, तीसरे ने उनका हुक्का और चौथा जूते लेकर चल दिया। रास्ते में लोग आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे। दरबार में बादशाह ने भी यह मंजर देखा और वह मौजूद दरबारियों ने भी। कोई कुछ न समझ सका।

तभी बीरबल बोले- ‘महाराज? दुनिया में सबसे बड़ी चीज है- गरज। अपनी गरज से यह पालकी यहां तक उठाकर लाए हैं।’

बादशाह मुस्कराकर रह गए। वे चारों सिर झुकाकर एक ओर खड़े हो गए।

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सुप्रभात्

सुकराण्यसाधूनि आत्मनोऽहितानि च ।
यद्वै हितं च साधु च वद्वै परमदुष्करम् ।।

‘‘अपने लिये हानिप्रद और बुरे काम कर डालना बहुत सरल है किन्तु अपने लिए हितकर और अच्छे काम करना अतिशय कठिन है ।‘‘

जय श्री कृष्ण

Posted in ज्योतिष - Astrology

हनुमान जी को खुश करने के लिए करिए ये दस उपाय?

देव शर्मा
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हनुमान जी अपने भक्‍तों का हर कष्ट दूर करते हैं। हनुमान जी कृपा के लिए कुछ उपाय है जिहें करने से उनकी कृपा बनी रहेगी। जानिए ये उपाय जो आप पर हनुमान जी की कृपा बरसाएंगे।

-धन और समृद्धि प्राप्ति के लिए प्रतिदिन रात्रि में सोने से पूर्व हनुमान जी के सम्मुख सरसों के तेल का मिट्टी का दीपक जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें।

-धन आगमन मार्ग को बाधारहित करने के लिए रामायण या श्रीरामचरित मानस का पाठ करें या रोजाना इनके दोहे पढ़ें। साथ ही रोजाना हनुमान जी को धूप-अगरबत्ती और फूल अर्पित करें।

-हनुमानजी का फोटो घर में पवित्र स्थान पर इस प्रकार से लगाएं कि हनुमान जी दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए दिखाई दें। यह उपाय आपके विरोधियों को शान्त कर, धन देगा।

-मनोवांछित कामना पूर्ण करने के लिए अपनी सामर्थ्य अनुसार किसी विशेष पर्व या तिथि पर हनुमान जी का विशेष श्रृंगार करें।

-मंगलवार या शनिवार को 11 पीपल के पत्ते लेकर साफ जल से धो लें। इन पत्तों पर चंदन से या कुमकुम से श्रीराम का नाम लिखें। इसके बाद हनुमानजी के मन्दिर जाएं और उन्हें ये पत्ते अर्पित कर दें। ऐसा करने से जीवन के सारे दुख दूर होंगे।

-प्रत्येक मंगलवार या शनिवार को सिंदूर एवं चमेली का तेल हनुमानजी को अर्पित करें। इस उपाय से भक्त की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

-हर मंगलवार और शनिवार को किसी भी हनुमान मंदिर में ११ काले उड़द के दाने, सिंदूर, चमेली का तेल, फूल, प्रसाद अर्पित करें। साथ ही सुन्दरकांड का पाठ या हनुमान चालीसा का पाठ करें।

-मंगलवार-शनिवार को हनुमानजी का विधिवत पूजन करने से सभी प्रकार के कष्ट और क्लेश नष्ट हो जाते हैं।

-कच्ची घानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें, संकट दूर होगा और धन प्राप्त होगा।

-धन लाभ प्राप्ति के लिए मंगलवार या हनुमान जयंती के दिन चंदन के नौ पैकेट लेकर केले के वृक्ष पर टांग दें। स्मरण रहे यह चंदन पीले धागे से ही बांधना है।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।
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😠फिर एक ओर बंद😠

राज कुमार

     व्यापारी तो बहुत सालो से परेशान हो रहा है कहीं बलात्कार हो रहा है तो दुकान बंद करो...

कही दंगा हो रहा है तो दुकान बंद करो..
जिसको आरक्षण चाहिए उसके लिये दुकान बंद करो..
जिसको आरक्षण नहीं चाहिए उसके लिए बंद करो…
दुकानदार दुकानदार नहीं रह गया वो होली का नंगाडा बंन गया है हर कोई बजा के निकाल लेता है !
व्यापारियों को भी कोर्ट जा कर नियम बनवाना चाहिए की अगर बंद करना है तो सरकारी दफ्तरों को बंद कराओ क्योंकि तुमको परेशानी सरकार से है व्यापारी से नहीं !

व्यापारी दोस्तों सोचो कोई तो आगे आए॥

दुकानदार को तो पार्टियों ने घण्टा समझा है
जब देखो
जहां भी तकलीफ़ हुई उस दिन बंद
अरे किसी दुकानदार का दर्द तो वहीं जाने
एक धंदे मन्दे है
ऊपर से आये दिन बंद
अगर बंद करना है तो सांसद,विद्यायक और मंत्रियों को उनके घरों में बंद करें,सरकारी कार्यालय बंद करें
तो समझ मे आएं

लेकिन व्यापारियों ने कसम ही खाई है
बस चुपचाप सहते जाओ

चोर की नजर में व्यापारी चोर,

नेता की नजर में व्यापारी चोर,

सेल टेक्स,इनकम टैक्स की नजरों में व्यापारी चोर,

और तो और अपने घरवालों की नजर में हम उनके टाईम-चोर क्योंकि हम उनके लिये समय नही निकाल पातें।
आखिर व्यापारियों ने ऐसा क्या जुर्म किया है??

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हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत

देव शर्मा
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हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं। खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।
विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है.

हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।

हरितालिका तीज भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है. यह आमतौर पर अगस्त – सितम्बर के महीने में ही आती है. इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है. इस वर्ष कल 12 सितम्बर 2018, दिन बुधवार को मनाई जाएगी।

महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत
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हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।
अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।

हरतालिका तीज व्रत विधि और नियम
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हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।
विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।

उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।

भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए 👇

ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:

भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए 👇

ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शम्भवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:

निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।

हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री
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1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।

2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।

3- केले का पत्ता।

4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।

5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।

6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।

7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।

8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।

9- पञ्चामृत – घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।

हरतालिका तीज व्रत कथा
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भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया – मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं ‘तथास्तु’ कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

हरितालका तीज पूजा मुहूर्त
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11 सितम्बर की शाम 6 बजकर 4 मिनट से तीज लग जाएगी इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं और लड़कियां इससे पहले ही सरगी कर लें। यह निर्जला उपवास रखा जाता है।

तृतीया तिथि प्रारंभ: 11 सितंबर 2018 को शाम 6 बजकर 4 मिनट.

तृतीया तिथि समाप्‍त: 12 सितंबर 2018 को शाम 4 बजकर 7 मिनट.

प्रात: काल हरतालिका पूजा मुहूर्त: 12
सितंबर 2018 की सुबह 6 बजकर 15 मिनट से सुबह 8 बजकर 42 मिनट तक।

वैसे तो हरितालिका पूजन प्रदोष काल मे किया जाता है लेकिन इस वर्ष तृतीया तिथि प्रदोषकाल में व्याप्त ना होने और पूजा आदि का महत्त्व व्याप्त तिथि में ही होने के कारण पूजन प्रातःकाल में ही किया जाएगा। प्रात काल मे सुविधा ना होने पर सायं 4 बजकर 7 मिनट से पहले ही समाप्त कर लें पारण अगले दिन प्रातः काल ही होगा।

पन देवशर्मा
9411185552
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श्री गणेशपूजन में दूर्वा का विशेष महत्त्व

ज्योति अग्रवाल

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१. व्युत्पत्ति एवं अर्थ

दुः + अवम्, इन शब्दों से दूर्वा शब्द बना है । ‘दुः’ अर्थात दूरस्थ एवं ‘अवम्’ अर्थात वह जो पास लाता है । दूर्वा वह है, जो श्री गणेश के दूरस्थ पवित्रकों को पास लाती है ।

२. श्री गणपति को दूर्वा अर्पित किए जाने के कारण

अ. पौराणिक कारण : गणपति से विवाह करने की कामना से एक अप्सराने ध्यानमग्न गणपति का ध्यानभंग किया । जब गणपति विवाह के लिए तैयार नहीं हुए, तब अप्सराने गणपति को श्राप दिया । इससे गणपति के मस्तक में दाह होने लगा, जिसे न्यून (कम) करने के लिए गणपतिने मस्तक पर दूब धारण की; इसलिए श्री गणपति को दूब चढाते हैं ।

आ. आयुर्वेद के अनुसार कारण : आयुर्वेद भी बताता है कि, ‘दूब की रस से शरीर का दाह न्यून होता है ।’

इ. आध्यात्मिक कारण : पूजा का एक उद्देश्य ऐसा भी होता है कि, जिस मूर्ति की हम पूजा करते हैं, उसके देवत्त्व में वृद्धि हो एवं चैतन्य के स्तर पर हमें उसका लाभ हो । इसलिए उस देवता को उनका तत्त्व अधिक से अधिक आकर्षित करनेवाली वस्तुएं चढाना उपयुक्त होता है । दूर्वा में गणेशतत्त्व आकर्षित करने की क्षमता सर्वाधिक होती है, अतः श्री गणेश को दूर्वा चढाते हैं ।

३. दूर्वा कैसी हो ?

गणपति को चढाई जानेवाली दूर्वा कोमल हो । इसे ‘बालतृणम्’ कहते हैं । जीर्ण होने पर वे एक प्रकार की घास जैसी हो जाती हैं । दूर्वा की पत्तियां ३, ५, ७ की विषम संख्या में हों ।

४. दूर्वा की लंबाई कितनी हो ?

पूर्वकाल में गणपति की मूर्ति की ऊंचाई लगभग एक मीटर होती थी, इसलिए समिधा की लंबाई जितनी दूर्वा अर्पण करते थे । मूर्ति यदि समिधा जितनी लंबी हो, तो लघु आकार की दूर्वा अर्पण करें; परंतु मूर्ति बहुत बडी हो, तो समिधा के आकार की ही दूर्वा चढाएं । जैसे समिधा एकत्र बांधते हैं, उसी प्रकार दूर्वा को भी बांधते हैं । ऐसे बांधने से उनकी सुगंध अधिक समय टिकी रहती है । उसे अधिक समय चैतन्यमय (ताजा) रखने के लिए जल में भिगोकर चढाते हैं । इन दोनों कारणों से गणपति के पवित्रक बहुत समयतक मूर्ति में रहते हैं ।

५. दूर्वा की संख्या कितनी होनी चाहिए ?

विषम संख्याएं शक्ति से संबंधित होती हैं । दूर्वा अधिकतर विषम संख्या में (न्यूनतम ३ अथवा ५, ७, २१ आदि) अर्पण करते हैं । विषम संख्या के कारण मूर्ति में अधिक शक्ति आती है । गणपति को विशेषतः २१ दूर्वा अर्पण करते हैं । संख्याशास्त्रानुसार २१ अंक २ + १ = ३, इस प्रकार है । श्री गणपति ३ की संख्या से ुसंबंधित है । ३ का अंक कर्ता, धर्ता एवं हर्ता भी होने के नाते उस शक्तिद्वारा ३६० तरंगों को नष्ट करना संभव हो जाता है । सम संख्या में दूर्वा चढाने से अधिकाधिक ३६० तरंगें आकर्षित होती हैं एवं तदुपरांत १०८ तरंगें भी आकर्षित होती हैं । (रावण प्रतिदिन ३६० + १०८ = ४६८ दूर्वा अर्पण करता था ।)

६. दूर्वा अर्पण करने की पद्धति

मुख को छोडकर, संपूर्ण गणपति को दूर्वा से ढक देना चाहिए । उससे मूर्ति के आसपास दूर्वा की सुगंध फैलने लगती है । गणपति को दूर्वा से ढकने पर यह सुगंध गणपति के आकार में संचारित होती है; इसलिए गणपति के पवित्रकों के आकार का इस आकार की ओर आना सरल हो जाता है । यह है ‘मूर्ति का समाकारिकत्व ग्रहण करना ।’ इसी को ‘मूर्ति जागृत हुई’ भी कहते हैं । मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा इसलिए करते हैं कि, उसमें आए पवित्रक निकल न जाएं उसी में रहें । जबतक सुगंध होती है, पवित्रक अधिक मात्रा में रहते हैं । पवित्रक टिके रहें, इस हेतु से दिन में तीन बार (पहले चढाई हुई दूर्वा को हटाकर) चढाते हैं एवं उसके लिए दिन में तीन बार पूजा करते हैं ।

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पापाके प्रति सो

ज्योति अग्रवाल
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मिडिल क्लास फॅमिली में पली बढ़ी खुशबू अपने जिंदगी में सबसे ज्यादा गुस्सा अपने पापा से थी। पापा के लिए उसके मन में नफरत के अलावा कुछ न था।
22 साल की हो चुकी खुशबू ने आज तक एक भी वेलेंटाइन नहीं बनाया था…जबकि उसकी क्लास मेट्स…. हर साल अलग अलग बॉयज के साथ वेलेंटाइन डे मनाती थी …
खैर, आज खुशबू आग्नेय से शादी के वक़्त सबसे ज्यादा खुश थी… कि आखिर इस बेहद स्ट्रिक्ट, कड़क और डिसिप्लिनड पापा से छुटकारा तो मिला।”ये न करो” “वो न करो” ऐसे कपड़े न पहनों”,लेट नाईट पार्टियाँ नहीं,”लड़कों से दोस्ती नहीं।”
आज तक एक स्मार्टफोन खरीद तक नहीं दिया…!… सारे सपनों और अरमानों को अपने नैरो माइंडेड सोच के कारण कुचलकर रख दिया ।अब मैं आग्नेय के साथ सारी दबी इच्छाएँ पूरी करूँगी।….आग्नेय और खुशबू पिछले तीन सालों से एक ही कॉलेज में साथ साथ पढ़ते थे और एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे एक दूसरे की पसंद नापसंद का अच्छे से ख्याल रखते थे। खुशबू ने बहुत डरते डरते पापा से आग्नेय के साथ शादी की इच्छा जताई थी।और पापा ने आग्नेय और उसके परिवार वालों से मिलकर शादी के लिए हामी भर दी।

खुशबू ने विदाई समय पहली बार पापा को उससे लिपटकर बच्चों की तरह फूट फूट कर रोते देखा पर खुशबू को पापा के इमोशन से कोई मतलब न था वह बस पत्थर की बुत बन खड़ी थी,जाते जाते पापा ने ढ़ेर सारे गिफ्ट के साथ एक बंद लिफाफा भी खुशबू को दिया।
ससुराल पहुँचते ही सबसे पहले खुशबू ने लिफाफा खोल पापा की चिट्ठी को पढ़ना शुरु किया ” खुशबू बेटा मैं जानता हूँ कि पिछले दस सालों से मैं तुम्हारे साथ बैड डैड की तरह पेश आता रहा।मैं तुम्हारे सामने स्ट्रिक्ट इसलिए बनता था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा भी हाल रागिनी जैसा हो ।रागिनी मेरे साथ कॉलेज में पढ़ने वाली एक बहुत अच्छे घर की पढ़ने में तेज शरीफ लड़की थी परंतु फैशन और नकली ग्लैमर के चक्कर में उसने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली थी।
“उसने वो सब किया जिससे मैं तुम्हें हमेशा रोकता रहा।फैशनेबल कपड़े ,लड़को से दोस्ती,लेट नाईट पार्टियाँ सब करती थी ,सोचती चरित्र अच्छा है तो इन सब में कोई हर्ज नहीं।फिर एक दिन उसके ड्रिंक्स में नशा डालकर उसके कुछ दोस्तों ने ………।इस घटना से वो अपना दिमागी संतुलन खो बैठी और समाज के तानों और लोगों से बचने के लिए उसके पापा ने उसकी माँ और छोटी बहन के साथ सल्फास खाकर सुसाइड कर लिया।”
खुशबू बेटा, आज से तुम अब दो परिवारों की इज़्ज़त हो और मैं तुमसे यही उम्मीद करूँगा कि तुम ऐसा कोई काम नही करोगी जिससे दोनों परिवारों की इज़्ज़त पे कोई दाग लगे और हो सके तो अपने बैड डैड को माफ कर देना।
चिट्ठी पढ़कर खुशबू फूट फूट कर रोते हुए तुरंत फ़ोन लगाकर भर्राए आवाज़ में पापा से कहा” मुझे माफ़ कर दीजिए पापा ! मैं आपके गुस्से के पीछे के प्यार को नही देख पाई!!! आपके चिल्लाहट के पीछे की केअर नहीं देख पाई!आपकी झुंझलाहट के पीछे का समर्पण नही देख पाई !”
” मैं हर जन्म में आपकी ही बेटी बनना चाहूँगी पापा …….”

वक़्त बीतता गया ….
खुशबू को ससुराल आए लगभग एक साल होने को आया…मगर ऐसा कोई दिन ना था जिस दिन उसने अपने पापा को याद ना किया हो।आज उसके पापा का जन्मदिन था।सुबह मंदिर गई ।पूजा की …पापा की खुशी और सलामती के लिए दुआएँ माँगी।फिर शाम में केक लाकर अपने ससुरालवालों के साथ उनका जन्मदिन मनाने का प्रोग्राम बनाया।
फिर केक काटने से पहले पापा को वीडियो कॉल लगाया उधर पापा मम्मी के साथ उदास बैठे थे।खुशबू उन्हें देखते ही चहक के बोली ” हैप्पी बर्थडे टू यू माई स्वीट पापा !!!! पता है पापा …… यहाँ मैं आपकी डाँट… आपके गुस्से… को हर दिन मिस करती हूँ ।यहाँ सारे लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं स्पेशली सासू माँ!पता है पापा …..एक दिन घर में मुहल्ले की औरतों सासु माँ को जब ये बोल रहीँ थीं कि कितनी अच्छी बहु मिली है तुम्हे ।….कपड़ो ,बोली और स्वभाव में शालीनता जरूर इसके मम्मी पापा से विरासत में मिले है।….आज कल की लड़कियों में इतने संस्कार अब कहाँ मिलते हैं।आपके लिए ये शब्द सुनकर पापा मेरा सर फक्र से ऊँचा हो गया।”

” आज मुझे आपपे प्राउड है पापा । आप मम्मा को हमेशा बोलते थे कि” सारी दुनिया को तो सुधार नही सकते बस अपना दामन बचा के रखना होगा।”
जानती हूँ पापा और महसूस भी किया है मैंने कि…आजकल लड़कियों के लिए बॉयफ्रेंड बनाना ,ड्रिंक्स करना, लिव इन रिलेशन रहना और ट्रांसपेरेंट ड्रेस पहनना फैशन सा है पर आपने एक सुरक्षा कवच बनकर मुझे इन बुराइयों से बचाये रखा।
आपको पता है पापा जब मैं यहाँ बी.एड. का एग्जाम पास कर टीचर बनूँगी ना….तो बच्चो को यही सिखाऊंगी कि “डैड के तेज गुस्से के पीछे का प्यार महसूस कर सको तो कर लो, ऐसा न हो कि बाद में सिर्फ पछताने के सिवा कुछ न रहे!!!”

दूसरी तरफ पापा के होंठ काँप रहे थे .. वो बोल रहे थे आँखों से लगातार आँसू लिए मुँह से अपनी खुशबू बेटी के लिए ” खुश रहो भगवान करे तुम्हें मेरी उम्र और खुशियाँ लग जाए बेटा “….

माता-पिता की डाँट मैं ही अपार प्रेम होता हैं बस समझने का फर्क हैं ।

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🍁 ☘ आराधना ☘ 🍁

राज कुमार

एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था, रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।

एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत जी बिराजिए” कहते हैं, तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ?

अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला! महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं, हमें बड़ा रस आता है, परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?

साधु महाराज ने कहा: हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है, कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।

वकील ने कहा: महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए। आपको साबित करके दिखाना चाहिए, कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।

महाराज जी ने बहुत समझाया, कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए, यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है। आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ, या आप कथा में आना छोड़ दो।

लेकिन वकील नहीं माना। कहता ही रहा, कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा, कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर साधु महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।

जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।

कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।

महाराज ने कहा: हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है।

वकील ने कहा: मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ?

साधु ने कहा: मैं कथा वाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।

अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए, काफी भीड़ हो गई, पंडाल भर गया। श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था।

साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे। गद्दी रखी गई।

महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले: “आइए हनुमंत जी बिराजिए” ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे। मन ही मन साधु बोले… प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं, बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।

फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया, आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं। वकील साहब खड़ेे हुए।

उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।

महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले, महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।

प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है, लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है, तो प्रभु बिराजते है।

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