Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

‼भगवत्कृपा हि केवलम्

गीतासुगीताकर्तव्याकिमन्यैःशास्त्रविस्तरैः।
यास्वयंपद्मनाभस्यमुखपद्माद्विनिःसृता ।।
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भावार्थ – जो स्वयं पद्मनाभ श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है, वह गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ और हृदयस्थ करना चाहिए । अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नही है, केवल गीता का स्वाध्याय करते हुए तदनुसार आचरण करके जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है ।
आपका आज का दिन मंगलमय रहे

*सुप्रभातम् *

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