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क्रान्तिवीर भंगी गंगू मेहतर


बलिदान दिवस #

क्रान्तिवीरभंगीगंगूमेहतर गंगू मेहतर को कई नामों से पुकारा जाता है । भंगी जाति के होने से गंगू मेहतर, पहलवानी का शौक होने से गंगू पहलवान, सती चौरा गांव में इनका पहलवानी का अखाड़ा था, कुश्ती के दांव पेच एक मुस्लिम उस्ताद से सीखने के कारण गंगूदीन और लोग इन्हें श्रद्धा प्रकट करने के लिए गंगू बाबा कहकर भी पुकारते हैं । गंगू मेहतर के पुरखे जिले कानपुर के अकबरपुरा गांव के रहने वाले थे । उच्चवर्णों की बेगार, शोषण और अमानवीय व्यवहार से दुखी होकर इनके पुरखे कानपुर शहर के चुन्नी गंज इलाके में आकर रहने लगे थे । कानपुर में जन्मे ग़दर के जाबांज गंगादीन मेहतर जिन्हें गंगू बाबा के नाम से भी जाना जाता है । गंगू बाबा एक उच्च कोटि के पहलवान भी थे । वह 1857 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सतीचौरा के करीब वीरता से लड़े । 1857 की लडा़ई में इन्होने 200 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था । और 200 अंग्रेजो की मौत के कारण अंग्रेजी सरकार बहुत सहम सी गई थी । अंग्रेजी कुत्तों ने गंगू मेहतर जी को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया । और अंग्रेज़ कुत्ते की तरह इनके पीछे लग गए और वीर गंगू मेहतर जी अंग्रेजों से घोड़े पर सवार होकर वीरता से लड़ते रहे । अंत में गिरफ्तार कर लिए गए । जब वे गिरफ्तार हुए उनको हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर जेल की काल कोठरी में रखा गया था और कड़ा पहरा लगा दिया गया था । उसके बाद कानपुर में इन्है बिच चौराहा पर #8सितंबर_1859 फाँसी दे दी गई । लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के इतिहास में इनका नामो निशान नही है । यह नाम जातिवाद के कारण इतिहास के पन्नों में कहीं सिमट सा गया है । अंतिम सांस तक अंग्रेजों को ललकारते रहे,, “भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का खून व कुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आजाद होगा ।” ~शहीद सिरोमणी गंगू मेहतर जी ऐसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रान्ति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए । कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गई है । वहां इनकी स्मृति में हर वर्ष मेला लगता है । लोग श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं ।। इंकलाब जिन्दाबाद ।। इस तस्वीर कानपुर के सिविल सर्जन जॉन निकोलस का जिन्होंने गंगू मेहतर को फांसी देने के पहले ये तस्वीर लिया था । ~आजाद

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धैर्य साधना की शक्ति

देव शर्मा
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वर्षों पुरानी बात है। एक राज्य में महान योद्धा रहता था। कभी किसी से नहीं हारा था। बूढ़ा हो चला था, लेकिन तब भी किसी को भी हराने का माद्दा रखता था। चारों दिशाओं में उसकी ख्याति थी। उससे देश-विदेश के कई युवा युद्ध कौशल का प्रशिक्षण लेने आते थे।

एक दिन एक कुख्यात युवा लड़ाका उसके गांव आया। वह उस महान योद्धा को हराने का संकल्प लेकर आया था, ताकि ऐसा करने वाला पहला व्यक्ति बन सके। बेमिसाल ताकतवर होने के साथ ही उसकी खूबी दुश्मन की कमजोरी पहचानने और उसका फायदा उठाने में महारत थी। वह दुश्मन के पहले वार का इंतजार करता। इससे वह उसकी कमजोरी का पता लगाता। फिर पूरी निर्ममता, शेर की ताकत और बिजली की गति से उस पर पलटवार करता। यानी, पहला वार तो उसका दुश्मन करता लेकिन आखिरी वार इस युवा लड़ाके का ही होता था।

अपने शुभचिंतकों और शिष्यों की चिंता और सलाह को नजरअंदाज करते हुए बूढ़े योद्धा ने युवा लड़ाके की चुनौती कबूल की। जब दोनों आमने-सामने आए तो युवा लड़ाके ने महान योद्धा को अपमानित करना शुरू किया। उसने बूढ़े योद्धा के ऊपर रेत-मिट्टी फेंकी। चेहरे पर थूका भी। बूढ़े योद्धा को गालियां देता रहा। जितने तरीके से संभव था, उतने तरीके से उसे अपमानित किया। लेकिन बूढ़ा योद्धा शांतचित्त, एकाग्र और अडिग रहा और उसके प्रत्येक क्रियाकलाप को पैनी नज़रों से देखता रहा ।

युवा लड़ाका थकने लगा। अंतत: अपनी हार सामने देखकर वह शर्मिंदगी के मारे भाग खड़ा हुआ।

बूढ़े योद्धा के कुछ शिष्य इस बात से नाराज और निराश हुए कि उनके गुरु ने गुस्ताख युवा लड़ाके से युद्ध नहीं किया। उसे सबक नहीं सिखाया। इन शिष्यों ने गुरु को घेर लिया और सवाल किया, ‘आप इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? आपने उसे भाग जाने का मौका कैसे दे दिया?’

महान योद्धा ने जवाब दिया, ‘यदि कोई व्यक्ति आपके लिए कुछ उपहार लाए, लेकिन आप लेने से इनकार कर दें। तब यह उपहार किसके पास रह गया?’देने वाले के पास ही न ।

इसी प्रकार साधना में भी कई प्रकार की बाधाएं आएँगी उनसे लड़ने में अपनी शक्ति न गवाएं बल्कि कुछ समय मौन रहें साधना में निरन्तरता रखें सहज होने की कोशिश रखें । थोड़े ही समय बाद आप उन परिस्तिथियों से आगे निकल जायेंगे। और हमेशा विजयी ही रहेंगे। साधना से जो बड़ी बात अंदर पैदा होती है वो है असीम शांति जिसके सम्पर्क में आते ही बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति भी अपनी कोशिशें कर के थक जाती हैं और भाग जाती हैं या साधक के शरणागत हो जाती है बस जरूरत है धैर्य की और असीम शांति की।

अगर परिस्तिथिवश कभी लड़ना भी पड़े तो अंदर शांत रहते हुए पूरी परिस्तिथियों को देखते हुए लड़ो बिना क्रोध किये कोई भी शक्ति होगी आपके ऊपर प्रभाव न डाल सकेगी।
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Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

‼भगवत्कृपा हि केवलम्

गीतासुगीताकर्तव्याकिमन्यैःशास्त्रविस्तरैः।
यास्वयंपद्मनाभस्यमुखपद्माद्विनिःसृता ।।
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भावार्थ – जो स्वयं पद्मनाभ श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है, वह गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ और हृदयस्थ करना चाहिए । अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नही है, केवल गीता का स्वाध्याय करते हुए तदनुसार आचरण करके जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है ।
आपका आज का दिन मंगलमय रहे

*सुप्रभातम् *

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बोधकथा🙏

ज्योति अग्रवाल

अपमान आणि उपकार

एकदा दोन मित्र वाळवंटातून चाललेले असतात, रस्त्यात त्यांच्यात काहीतरी बाचाबाची होते आणि बाचाबाचीचे रुपांतर भांडणात होते. इतके कडाक्याचे भांडण होते कि एक मित्र दुसऱ्या मित्राच्या थोबाडीत ठेवून देतो. ज्याला थोबाडीत बसते तो दुसरा मित्र खूप दुःखी होतो, गप्प बसतो आणि वाळूमध्ये बोटाने लिहितो,” आज माझ्या प्राणप्रिय मित्राने मला थोबाडीत दिली, ज्याला मी जीवापाड मैत्री करतो त्याने मला आज मारले.” ज्याने थोबाडीत मारलेली असते तो हे पाहतो पण काहीच न बोलता दोघेही पुढे चालत राहतात. पुढे गेल्यावर त्यांना एक तलाव दिसतो, दोघेही जण पाण्यात उतरून स्नान करायचे ठरवतात, अंघोळ करता करता थोबाडीत खाल्लेला मित्र अचानक पाण्यात घसरतो, तिथे नेमकी दलदल असते, तो जोरजोराने ओरडायला सुरुवात करतो. ज्याने थोबाडीत मारलेली असते तो मित्र क्षणाचाही विचार न करता आपल्या मित्राच्या सहाय्याला धावतो आणि त्याला त्या दलदलीतून बाहेर ओढून काढतो. जेंव्हा तो बुडणारा मित्र पाण्याबाहेर येतो, अंग कोरडे करतो तेंव्हा तो एका दगडाने दगडावर कोरून लिहितो,”आज माझ्या प्राणप्रिय मित्राने मला मरणाच्या दारातून ओढून परत आणले, मी आज मेलोच असतो पण त्याने स्वतःचा जीव धोक्यात घालून मला वाचविले.” हे पण तो थोबाडीत देणारा वाचतो आणि त्याला राहवत नाही तो त्या मित्राला विचारतो कि,”पहिले मी तुला मारले तर ते तू वाळूत लिहिले आणि आता तुला पाण्यातून वाचविले तर ते तू दगडावर कोरून लिहिले हे असे का?” लिहिणारा मित्र म्हणाला,” जेंव्हा कोणी आपल्या हृदयाला, मनाला, भावनेला ठेच लावेल तेंव्हा ते सर्व काही वाळूत लिहावे कारण काही काळानंतर वाळू हि विस्कळीत होऊन जाते आणि मनातील भावनाही फार काळ एकसारख्या राहत नाहीत. पण जर कुणी उपकार केले तर ते मात्र दगडावर कोरून लिहिले कारण दगडावर कोरलेले जसे कायमस्वरूपी टिकून राहते तसे उपकार हे कायम लक्षात ठेवले जावेत.

तात्पर्य :-“माणसाने अपमान तत्काळ विसरून जावा आणि उपकार आजन्म लक्षात ठेवावे.”

🙏🙏

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हिंदुओ के मूल ग्रन्थ

देव शर्मा

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(१)👉 वेद { जिनको श्रुति भी कहते हैं }
ऋग्वेद ( ज्ञान ) = १०५७९ मंत्र
यजुर्वेद ( कर्म ) = १९७५ मंत्र
सामवेद ( उपासना ) = १८७५ मंत्र
अथर्ववेद ( विज्ञान ) = ५९७० मंत्र
कुल मंत्र = २०४१६
वेदों के अर्थों को समझाने के लिए जिन ग्रन्थों का प्रवचन वैदिक ऋषियों ने किया है, उनको शाखा कहते हैं ।
कुल शाखाएँ = ११२७
वर्तमान में उपलब्ध शाखाएँ = १२

उपलब्ध शाखाओं के नाम
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{१} ऋग्वेद की उपलब्ध शाखाएँ
(क) शाकल (ख) वाष्कल

{२} यजुर्वेद की उपलब्ध शाखाएँ
(क) काण्व (ख) मध्यन्दिनी (ग) तैत्तिरीय संहिता (घ) काठक (ङ) मैत्रायणी

{३} सामवेद की उपलब्ध शाखाए
(क) जैमिनीया (ख) राणायसीम

{४} अथर्ववेद की उपलब्ध शाखाएँ
(क) शौनक (ख) पिप्पलाद

वेदों में से कुछ लघु वेद भी ऋषियों ने बनाए थे जिनको उपवेद कहते हैं , भिन्न भिन्न विषयों को समझाने के लिए चार उपवेद हैं।

{१} ऋग्वेद ——————- आयुर्वेद
{२} यजुर्वेद——————- धनुर्वेद
{३} सामवेद —————— गन्धर्ववेद
{४} अथर्ववेद —————– अर्थवेद

चारों वेदों में से विज्ञान के उत्कृष्ट स्वरूप को समझाने के लिए वेदों में से ब्राह्मण ग्रन्थ भी बनाए हैं।

{१} ऋग्वेद का ब्राह्मण ————- ऐतरेय
{२} यजुर्वेद का ब्राह्मण ————- शतपथ
{३} सामवेद का ब्राह्मण ———— सामविधान
{४} अथर्ववेद का ब्राह्मण ———– गोपथ
[ इन्हीं ब्राह्मणों को पुराण भी कहते हैं । ]

६ वैदिक शास्त्र :–
(क) न्याय (ख) वैशेषिक
(ग) साङ्ख्य (घ) योग
(ङ) मिमांसा (च) वेदांत
{ ये छः शास्त्र तर्क प्रणाली को प्रस्तुत करते हैं, इनको पढ़ने से तर्क के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म के भेद को जान सकता है }

६ वेदाङ्ग वे हैं जिनको पढ़कर मनुष्य वेदों का अर्थ करने में समर्थ होता है।
(क) शिक्षा
(ख) कल्प
(ग) व्याकरण
(घ) निरुक्त
(ङ) छंद
(च) ज्योतिष

वेदांत शास्त्र को ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं और इसको समझने के लिए ११ मुख्य उपनिषदें हैं :-
(१) ईश
(२) कठ
(३) केन
(४) प्रश्न
(५) मुण्डक
(६) माण्डुक्य
(७) ऐतरेय
(८) तैत्तिरीय
(९) छांदोग्य
(१०) बृहदारण्यक
(११) श्वेताश्वतर

ऐतिह्या ( इतिहास ग्रन्थ ) :-
(१) योगवशिष्ठ महारामायण
(२) वेदव्यास कृत महाभारतम्
समृति ग्रन्थ :-
(१) मनुस्मृति ( विशुद्ध – कर्म पर आधारित न कि जन्म पर )
(२) विधुर नीति
(३) चाणक्य नीति

ओ३म् तत् सत्
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जय माता दी (y)

संजय गुप्ता
एक बार कबीरदास जी हरि भजन करते एक गली से निकल रहे थे।
उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थीं ।
उनमें से एक स्त्री की शादी कहीं तय हुई होगी तो उसके ससुरालवालों ने शगुन में एक नथनी भेजी थी ।
वह लड़की अपनी सहेलियों को बार-बार नथनी के बारे में बता रही थी कि नथनी ऐसी है वैसी है
ये ख़ास उन्होंने मेरे लिए भेजी है…
बार बार बस नथनी की ही बात…
उनके पीछेे चल रहे कबीरजी
के कान में सारी बातें पड़ रही थी ।
तेजी से कदम बढाते कबीर उनके पास से निकले और कहा-
“नथनी दीनी यार ने,
तो चिंतन बारम्बार, और
नाक दीनी जिस करतार ने,
उनको तो दिया बिसार..”
सोचो यदि नाक ही ना होती तो
नथनी कहां पहनती !
यही जीवन में हम भी करते हैं।
भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से संबंधित सारी वस्तुऐं, सभी रिश्ते-नाते दिए, उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता ।
इसलिए सदा उस दाता, उस ईश्वर के आभारी रहना है.
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_/_ 🙂

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एक आदमी था

संजय गुप्ता
बाह रोज सुबह घूमने जाता था
कोई उसे अच्छी नज़र से नहीं देखता था क्योकि वह गरीब था
उसकी फसल अच्छी हो गयी उसने बाजार में बेचा उसे अन्य लोगो से ज्यादा पैसे मिले देखते ही देखते वह उस गांव का सबसे आमिर सेठ बन गया
वह पहले की तरह सुबह घूमने निकला एक आदमी ने उससे कहा
जय जिनेंद्र सेठ जी
सेठ जी ने कहा कह दूंगा


फिर दूसरे दिन भी किसी ने कहा
जय जिनेंद्र सेठ जी
उन्होंने फिर कहा कह दूंगा



ऐसा लगातार सेठ जी कहते थे एक दिन किसी ने उनसे पूछ ही लिया की आपसे हर कोई जय जिनेंद्र बोलता है आप कहते है कह दूंगा आखिर मुझे भी बताइये आप किस्से कह देंगे
सेठ जी ने बड़ा ही सुन्दर उत्तर दिया
की जब में गरीब था तो कोई मुझसे बात भी नहीं करना चाहता था
आज मेरे पास पैसा है तो हर कोई मुझसे जय जिनेंद्र बोल रहा है
इसलिए ही में कहता हु की में घर पर जाकर पैसे से कह दूंगा उन्होंने तुमसे जय जिनेंद्र कहा

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सुख दुख आते जाते रहेंगे !!

संजय गुप्ता
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घुप्प अंधेरी रात में एक व्यक्ति नदी में कूद कर आत्महत्या करने का विचार कर रहा था. वर्षा के दिन थे और नदी पूरे उफान पर थी. आकाश में बादल घिरे थे और रह-रहकर बिजली चमक रही थी.
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वह उस देश का बड़ा धनी व्यक्ति था लेकिन अचानक हुए घाटे से उसकी सारी संपत्ति चली गई. उसके भाग्य का सूरज डूब गया था. चारों ओर निराशा ही निराशा. भविष्य नजर नहीं आ रहा था.
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उसे कुछ सूझता न था कि क्या करे. उसने स्वयं को समाप्त करने का विचार कर लिया था. नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के छोर पर खड़ा होकर वह अंतिम बार ईश्वर का स्मरण करने लगा तभी दो बुजुर्ग परंतु मजबूत बांहों ने उसे रोक लिया.
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बिजली की चमक में उसने देखा कि एक वृद्ध साधु उसे पकड़े हुए है ! उस वृद्ध ने उससे निराशा का कारण पूछा. किनारे लाकर उसकी सारी कथा सुनी फिर हंसकर बोला- तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे.
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सेठ बोला- हाँ मेरे भाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था. सब ओर मान-सम्मान संपदा थी. अब जीवन में सिवाय अंधकार और निराशा के कुछ भी शेष नहीं है.
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वृद्ध फिर हंसा और बोला- दिन के बाद रात्रि है और रात्रि के बाद दिन. जब दिन नहीं टिकता तो रात्रि भी कैसे टिकेगी ? परिवर्तन प्रकृति का नियम है ठीक से सुनो और समझ लो.
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जब तुम्हारे अच्छे दिन हमेशा के लिए नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे. जो इस सत्य को जान लेता है वह सुख में सुखी नहीं होता और दुख में दुखी नहीं होता !
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उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भांति हो जाता है जो वर्षा और धूप में समान ही बनी रहती है ! सुख और दुख को जो समभाव से ले, समझ लो कि उसने स्वयं को जान लिया.
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सुख-दुख तो आते-जाते रहते हैं. यही प्रकृति की गति है. ईश्वर का इंसाफ. जो न आता है और न जाता है वह है स्वयं का अस्तित्व. इस अस्तित्व में ठहर जाना ही समत्व है.
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सोचो यदि किसी ने जीवन में एक जैसा ही भाव देखा. हमेशा सुख का ही. जिस चीज की आवश्यकता हुई उससे पहले वह मिल गई. तो क्या वह कुछ उपहार पाने की खुशी का अनुभव कैसे कर सकता है ?
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दुख न आए तो सुख का स्वाद क्या होता कोई कैसे जाने ? जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन बंधनों से मुक्त हो जाता है.
Jai Shri Krishna

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महाबली महादानी राजा बलि के दस रहस्य !!!!!

संजय गुप्ता

असुरों के राजा बलि या बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। दान-पुण्य करने में वह कभी पीछे नहीं रहता था। उसकी सबसे बड़ी खामी यह थी कि उसे अपनी शक्तियों पर घमंड था और वह खुद को ईश्वर के समकक्ष मानता था और वह देवताओं का घोर विरोधी था।भारतीय और हिन्दू इतिहास में राजा बलि की कहानी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ऐसा माना जाता है कि प्राचीनकाल में देवी और देवता हिमालय क्षेत्र में रहते थे। हिमालय में ही देवराज इंद्र का एक क्षेत्र था जिसमें नंदन कानन वन था। इंद्र के इस क्षेत्र के पास ही गंधर्वों का क्षेत्र था। यहीं पर कैलाश पर्वत पर भगवान शिव का निवास था। पहले धरती पर बर्फ की अधिकता थी और अधिकतर हिस्सा जलमग्न था।

मानव गुफाओं में रहता था और सुर और असुर अपनी शक्तियों के बल पर संपूर्ण धरती पर विचरण करते थे। नागलोक का विस्तार दूर-दूर तक था और समुद्र में विचित्र-विचित्र किस्म के प्राणियों का जन्म हो चुका था।

धनतेरस और ओणम पर्व राजा बालि की याद में मनाया जाता है। प्रारंभिक जातियां- सुर और असुर कौन थे?
आप किसकी तरफ हैं : सुर या असुर?

प्राचीनकाल में सुर और असुरों का ही राज्य था। सुर को देवता और असुरों को दैत्य कहा जाता था। दानवों और राक्षसों की प्रजाति अलग होती थी। गंधर्व, यक्ष और किन्नर भी होते थे। असुरों के पुरोहित शुक्राचार्य भगवान शिव के भक्त और सुरों के पुरोहित बृहस्पति भगवान विष्णु के भक्त थे। इससे पहले भृगु और अंगिरा ऋषि असुर और देव के पुरोहित पद पर थे। सुर और असुरों में साम्राज्य, शक्ति, प्रतिष्ठा और सम्मान की लड़ाई चलती रहती थी।

दुनिया में दो ही तरह के धर्मों में प्राचीनकाल से झगड़ा होता आया है। एक वे लोग जो देवताओं के गुरु बृहस्पति के धर्म को मानते हैं और दूसरे वे लोग जो दैत्यों (असुरों) के गुरु शुक्राचार्य के धर्म को मानते आए हैं।
अगले पन्ने पर जानिए पहला रहस्य…

राजा बलि के पूर्व जन्म की कथा : पौराणिक कथाओं अनुसार राजा बलि अपने पूर्व जन्म में एक जुआरी थे। एक जुए से उन्हें कुछ धन मिला। उस धन से इन्होंने अपनी प्रिय वेश्या के लिए एक हार खरीदा। बहुत खुशी-खुशी ये हार लेकर वेश्या के घर जाने लगा। लेकिन रास्ते में ही इनको मृत्यु ने घेर लिया। यह मरने ही वाला था कि इसने सोचा कि अब ये हार वेश्या तक तो पहुंचा नहीं पाऊंगा, चलो इसे शिव को ही अर्पण कर दूं। ऐसा सोचकर उसने हार शिव को अर्पण कर दिया और मृत्यु को प्राप्त हुआ।

मरकर वह यमराज के समक्ष उपस्‍थित हुआ। चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर कहा कि इसने तो पाप ही पाप किए हैं, लेकिन मरते-समय इसने जुए के पैसे से वेश्या के लिए खरीदा हार ‘शिवार्पण’ कर दिया है। ये ही एकमात्र इसका पुण्य है। चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने उससे (जुआरी बलि से) पूछा- रे पापी, तू ही बता पहले पाप का फल भोगोगे कि पुण्य का। जुआरी ने कहा कि पाप तो बहुत हैं, पहले पुण्य का फल दे दो। उस पुण्य के बदले उसे दो घड़ी के लिए इंद्र बनाया गया।

इंद्र बनने पर वह अप्सराओं के नृत्य और सुरापान का आनंद लेने लगा। तभी नारदजी आते हैं, उसे देखकर हंसते हैं और एक बात बोलते हैं कि अगर इस बात में संदेह हो कि स्वर्ग-नर्क हैं तब भी सत्कर्म तो कर ही लेना चाहिए वर्ना अगर ये नहीं हुए तो आस्तिक का कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर हुए तो नास्तिक जरूर मारा जाएगा। यह बात सुनते ही उस जुआरी को होश आ गया। उसने दो घड़ी में ऐरावत, नंदन वन समेत पूरा इन्द्रलोक दान कर दिया। इसके प्रताप से वह पापों से मुक्त हो इंद्र बना और बाद में राजा बलि हुआ।

दूसरा रहस्य =====ऐसे हुई बलि की उत्पत्ति :कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ।

जब हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का जन्म हुआ था, तब धरती पर अंधकार छा गया था। देवी और देवताओं के साथ ही ऋषियों ने घोषणा की थी कि धरती पर अब शैतानी शक्ति का उदय हो गया है। सभी ने इसके प्रति चिंता व्यक्ति की थी।

तीसरा रहस्य =====दक्षिण भारत में था राजा बलि का राज्य :राजा बलि का राज्य संपूर्ण दक्षिण भारत में था। उन्होंने महाबलीपुरम को अपनी राजधानी बनाया था। आज भी केरल में ओणम का पर्व राजा बलि की याद में ही मनाया जाता है। राजा बली को केरल में ‘मावेली’ कहा जाता है। यह संस्कृत शब्द ‘महाबली’ का तद्भव रूप है। इसे कालांतर में ‘बलि’ लिखा गया जिसकी वर्तनी सही नहीं जान पड़ती।

देश भर में कई ऐसे समुदाय हैं जो राजा बली के राज्य में प्रजाओं की सुख-समृद्धि को स्मरण करते हैं और राजा बली के लौटने की कामना करते हैं। केरल में मनाया जाने वाला विश्वप्रसिद्ध ओणम त्योहार महाबली की स्मृति में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध पौराणिक पात्र वृत्र (प्रथम मेघ) के वंशज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद था। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का पुत्र महाबली था।

माना जाता है कि मोटे तौर पर वृत्र या मेघ ऋषि के वंशजों को मेघवंशी कहा जाता हैं। पौराणिक कथाओं में जिन मानव समूहों को असुर, दैत्य, राक्षस, नाग, आदि कहा गया वे सिंधु घाटी सभ्यता के मूल निवासी थे और मेघवंशी थे। आर्यों और अन्य के साथ पृथ्वी (भूमि) पर अधिकार हेतु संघर्ष में वे पराजित हुए।

चौथा रहस्य =====अश्वमेध यज्ञ :राजा बलि ने विश्वविजय की सोचकर अश्वमेध यज्ञ किया और इस यज्ञ के चलते उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी। अग्निहोत्र सहित उसने 98 यज्ञ संपन्न कराए थे और इस तरह उसके राज्य और शक्ति का विस्तार होता ही जा रहा था, तब उसने इंद्र के राज्य पर चढ़ाई करने की सोची।

इस तरह राजा बलि ने 99वें यज्ञ की घोषणा की और सभी राज्यों और नगरवासियों को निमंत्रण भेजा।

माना जाता है कि देवता और असुरों की लड़ाई जम्बूद्वीप के इलावर्त क्षे‍त्र में 12 बार हुई। देवताओं की ओर गंधर्व और यक्ष होते थे, तो दैत्यों की ओर दानव और राक्षस। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद और उनके पुत्र राजा बलि के साथ इन्द्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए, तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया।

पांचवां रहस्य. ====समुद्र मंथन :जब इन्द्र दैत्यों के राजा बलि से युद्ध में हार गए, तब हताश और निराश हुए देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर श्रीहरि विष्णु के आश्रय में गए और उनसे अपना स्वर्गलोक वापस पाने के लिए प्रार्थना करने लगे।

श्रीहरि ने कहा कि आप सभी देवतागण दैत्यों से सुलह कर लें और उनका सहयोग पाकर मदरांचल को मथानी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मंथन करें। समुद्र मंथन से जो अमृत प्राप्त होगा उसे पिलाकर मैं आप सभी देवताओं को अजर-अमर कर दूंगा तत्पश्चात ही देवता, दैत्यों का विनाश करके पुनः स्वर्ग का आधिपत्य पा सकेंगे।

देवताओं के राजा इन्द्र दैत्यों के राजा बलि के पास गए और उनके समक्ष समुद्र मंथन का प्रस्ताव रखा और अमृत की बात बताई। अमृत के लालच में आकर दैत्य ने देवताओं का साथ देने का वचन दिया। देवताओं और दैत्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर मदरांचल पर्वत को उठाकर समुद्र तट पर लेकर जाने की चेष्टा की लेकिन नहीं उठा पाए तब श्रीहरि ने उसे उठाकर समुद्र में रख दिया।

मदरांचल को मथानी एवं वासुकि नाग की रस्सी बनाकर समुद्र मंथन का शुभ कार्य आरंभ हुआ। श्रीविष्णु की नजर मथानी पर पड़ी, जो कि अंदर की ओर धंसती चली जा रही थी। यह देखकर उन्होंने स्वयं कच्छप बनाकर अपनी पीठ पर मदरांचल पर्वत को रख लिया।

तत्पश्चात समुद्र मंथन से लक्ष्मी, कौस्तुभ, पारिजात, सुरा, धन्वंतरि, चंद्रमा, पुष्पक, ऐरावत, पाञ्चजन्य, शंख, रम्भा, कामधेनु, उच्चैःश्रवा और अंत में अमृत कुंभ निकला जिसे लेकर धन्वन्तरिजी आए। उनके हाथों से अमृत कलश छीनकर दैत्य भागने लगे ताकि देवताओं से पूर्व अमृतपान करके वे अमर हो जाएं। दैत्यों के बीच कलश के लिए झगड़ा शुरू हो गया और देवता हताश खड़े थे।

श्रीविष्णु अति सुंदर नारी का रूप धारण करके देवता और दैत्यों के बीच पहुंच गए और उन्होंने अमृत को समान रूप से बांटने का प्रस्ताव रखा। दैत्यों ने मोहित होकर अमृत का कलश श्रीविष्णु को सौंप दिया। मोहिनी रूपधारी विष्णु ने कहा कि मैं जैसे भी विभाजन का कार्य करूं, चाहे वह उचित हो या अनुचित, तुम लोग बीच में बाधा उत्पन्न न करने का वचन दो तभी मैं इस काम को करूंगी।

सभी ने मोहिनी रूपी भगवान की बात मान ली। देवता और दैत्य अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए। मोहिनी रूप धारण करके विष्णु ने छल से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया, लेकिन इससे दैत्यों में भारी आक्रोश फैल गया।

छठा रहस्य =====इंद्र-बलि युद्ध :समुद्र मंथन से प्राप्त जब अमृत पीकर देवता अमर हो गए, तब फिर से देवासुर संग्राम छिड़ा और इंद्र द्वारा वज्राहत होने पर बलि की मृत्यु हो गई। ऐसे में तुरंत ही शुक्राचार्य के मंत्रबल से वह पुन: जीवित हो गया। लेकिन उसके हाथ से इंद्रलोक का बहुत बड़ा क्षेत्र जाता रहा और फिर से देवताओं का साम्राज्य स्थापित हो गया।

सातवां रहस्य. ====पुन: देवताओं को हराया :राजा बलि ने देवताओं द्वारा हार जाने के बाद अपनी शक्ति एकत्रित की और तपस्या के बदल पर वह फिर से शक्तिशाली बना। तब उसने देवताओं से बदला लेने की ठानी। इसके लिए उसने एक बार फिर अश्वमेध यज्ञ किया। यह उसका सौवां यज्ञ था। उसने अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ एक बार फिर इंद्र के राज्य पर कब्जा कर लिया।

एक बार फिर देवताओं पर संकट आ गया था। बगैर अमृत पीकर भी राजा बलि इतना मायावी बन बैठा था कि उसको मारने की किसी में शक्ति नहीं थी।

आठवां रहस्य. =====वामन अवतार :वामन ॠषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे। वे आदित्यों में बारहवें थे। ऐसी मान्यता है कि वह इन्द्र के छोटे भाई थे और राजा बलि के सौतेले भाई। विष्णु ने इसी रूप में जन्म लिया था।

देवता बलि को नष्ट करने में असमर्थ थे। बलि ने देवताओं को यज्ञ करने जितनी भूमि ही दे रखी थी। सभी देवता अमर होने के बावजूद उसके खौफ के चलते छिपते रहते थे। तब सभी देवता विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने कहा कि वह भी (बलि भी) उनका भक्त है, फिर भी वे कोई युक्ति सोचेंगे।

तब विष्णु ने अदिति के यहां जन्म लिया और एक दिन जब बलि यज्ञ की योजना बना रहा था तब वे ब्राह्मण-वेश में वहां दान लेने पहुंच गए। उन्हें देखते ही शुक्राचार्य उन्हें पहचान गए। शुक्र ने उन्हें देखते ही बलि से कहा कि वे विष्णु हैं। मुझसे पूछे बिना कोई भी वस्तु उन्हें दान मत करना। लेकिन बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं सुनी और वामन के दान मांगने पर उनको तीन पग भूमि दान में दे दी। जब जल छोड़कर सब दान कर दिया गया, तब ब्राह्मण वेश में वामन भगवान ने अपना विराट रूप दिखा दिया।

एक पग में भूमंडल नाप लिया। दूसरे में स्वर्ग और तीसरे के लिए बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखूं? पूछने पर बलि ने मुस्कराकर कहा- इसमें तो कमी आपके ही संसार बनाने की हुई, मैं क्या करूं भगवान? अब तो मेरा सिर ही बचा है। इस प्रकार विष्णु ने उसके सिर पर तीसरा पैर रख दिया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उस पाताल में रसातल का कलयुग के अंत तक राजा बने रहने का वरदान दे दिया। तब बलि ने विष्णु से एक और वरदान मांगा…

नौवां रहस्य === विष्णु को बनाया रक्षक :राजा बलि ने कहा कि भगवान यदि आप मुझे पाताल लोक का राजा बना ही रहे हैं तो मुझे वरदान ‍दीजिए कि मेरा साम्राज्य शत्रुओं के प्रपंचों से बचा रहे और आप मेरे साथ रहें। अपने भक्त के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने राजा बलि के निवास में रहने का संकल्प लिया।

पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर भगवान विष्णु सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे और इस तरह बलि निश्चिंत होकर सोता था और संपूर्ण पातालपुरी में शुक्राचार्य के साथ रहकर एक नए धर्म राज्य की व्यवस्था संचालित करता था।

दसवां रहस्य ,बलि फिर छला गया: – इधर वैकुण्ठ में सभी देवी-देवता समेत लक्ष्मीजी अत्यंत चिंतित हो गईं। तब इस कठिन काल में नारदजी ने माता लक्ष्मी को एक युक्ति बताई। उन्होंने कहा कि एक रक्षासूत्र लेकर वे राजा बलि के पास अपरिचित रूप में दीन-हीन दुखियारी बनकर जाएं और राजा बलि को भाई बनाकर दान में प्रभु को मांग लाएं।

लक्ष्मीजी राजा बलि के दरबार में उपस्थित हुईं और उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें भाई बनाना चाहती हैं। राजन ने उनका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और उनसे रक्षासूत्र बंधवा लिया और कहा‍ कि अपनी इच्छा के अनुरूप कुछ भी उनसे मांग लें। लक्ष्मीजी इसी हेतु तो वहां आई थीं।

उन्होंने राजा से कहा कि आप मुझे अपनी सबसे प्रिय वस्तु दे दें। राजन घबरा गए। उन्होंने कहा मेरा सर्वाधिक प्रिय तो मेरा यह प्रहरी है, परंतु इसे देने से पूर्व तो मैं प्राण त्यागना अधिक पसंद करूंगा।

तब लक्ष्मीजी ने अपना परिचय उन्हें दिया और बताया कि मैं आपके उसी प्रहरी की पत्नी हूं जिन्हें उन्होंने बहन माना था। उसके सुख-सौभाग्य और गृहस्थी की रक्षा करना भी उन्हीं का दायित्व था और यदि बहन की ओर देखते तो उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय अपने इष्ट का साथ छोडऩा पड़ता, पर राजन भक्त, संत और दानवीर यूं ही तो न थे।

उन्होंने अपने स्वार्थ से बहुत ऊपर बहन के सुख को माना और प्रभु को मुक्त कर उनके साथ वैकुण्ठ वास की सहमति दे दी, परंतु इसके साथ ही उन्होंने लक्ष्मीजी से आग्रह किया कि जब बहन-बहनोई उनके घर आ ही गए हैं तो कुछ मास और वहीं ठहर जाएं और उन्हें आतिथ्य का सुअवसर दें।

लक्ष्मीजी ने उनका आग्रह मान लिया और श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) से कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि (धनतेरस) तक विष्णु और लक्ष्मीजी वहीं पाताल लोक में राजा बलि के यहां रहे। धनतेरस के बाद प्रभु जब लौटकर वैकुण्ठ को गए तो अगले दिन पूरे लोक में दीप-पर्व मनाया गया।

माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन से धनतेरस तक विष्णु लक्ष्मी संग राजा बलि के यहां रहते हैं और दीपोत्सव के अन्य कई कारणों संग एक कारण यह भी है।

अंत में एक महत्वपूर्ण रहस्य…

मान्यता है कि प्राचीन काल में जब धरती का अधिकतर हिस्सा बर्फ से ढंका था तब आज के मिश्र, साऊदी अरब, सीरिया, इराक, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान, इसराइल आदि को पातालपुरी कहा जाता था। यहीं कहीं रसातल भी होता था। दलजा, फरात और नील नदियों के आसपास ही सभ्यताएं बसती थी।

इसी पातालपुरी में राम के काल में अहिरावण का राज था। राम से पूर्व रसातल का क्षेत्र राजा बलि को सौंप दिया गया था। 4000 साल पुराने यहूदी धर्म का आधिपत्य मिस्र, इराक, इजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। उससे भी पूर्व यहां पर हिन्दुओं की कई जातियां निवास करती थी जिनका प्रमुख तीर्थ मक्का होता था।

मान्यता अनुसार उस दौर में मक्का में एक ज्योतिर्लिंग था जिसे राजा बलि और शुक्राचार्य ने स्थापित किया था। यहीं पर राजा बलि की एक प्राचीन मूर्ति रखी थी और साथ ही कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी शिवलिंग के साथ स्थापित थी।

यहां के लोग इस काबा मंदिर की सात परिक्रमा करते थे। आज भी काबा से हटाई गई मूर्तियां इस्तांबूल के एक म्यूजियम में रखी है। पहले मक्का को मखा कहते थे जिसका संस्कृत में अर्थ होता है अग्नि।

मक्का के काबा के पास ही जम जम का एक कुआं है जिससे जल लेकर लोग शिवलिंग पर चढ़ाते थे। कुछ विद्वान मानते हैं कि मक्का के इस काबा मंदिर का पुन: निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। शुक्राचार्य का एक नाम काव्या भी था यही काव्या बिगड़कर काबा हो गया। राजा बलि ने यहां कई वर्षों तक शासन किया। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई यह हम नहीं जानते क्योंकि यह शोध का विषय है।

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इस कहानी को ध्यान से पढ़ कर सोचिये और समझिये…

संजय गुप्ता

किसी गाँव में चार मित्र रहते थे।चारों में इतनी घनी मित्रता थी कि हर समय साथ रहते उठते बैठते, योजनाएँ बनाते।

एक ब्राह्मण
एक ठाकुर
एक बनिया और
एक नाई था

पर कभी भी चारों में जाति का भाव नहीं था गज़ब की एकता थी।

इसी एकता के चलते वे गाँव के किसानों के खेत से गन्ने चने आदि उखाड़ कर खा लेते थे।

एक दिन इन चारों ने किसी किसान के खेत से चने के झाड़ उखाड़े और खेत में ही बैठकर हरी हरी फलियों का स्वाद लेने लगे।

खेत का मालिक किसान आया।चारों की दावत देखी उसे बहुत क्रोध आया उसका मन किया कि लट्ठ उठाकर चारों को पीटे, पर चार के आगे एक? वो स्वयं पिट जाता। सो उसने एक युक्ति सोची।

चारों के पास गया। ब्राह्मण के पाँव छुए, ठाकुर साहब की जयकार की , बनिया महाजन से राम जुहार और फिर नाई से बोला–
देख भाई, ब्राह्मण देवता धरती के देव हैं, ठाकुर साहब तो सबके मालिक हैं अन्नदाता हैं, महाजन सबको उधारी दिया करते हैं। ये तीनों तो श्रेष्ठ हैं। तो भाई इन तीनों ने चने उखाड़े सो उखाड़े पर तू? तू तो ठहरा नाई तूने चने क्यों उखाड़े?

इतना कहकर उसने नाई के दो तीन लट्ठ रसीद किये।बाकी तीनों ने कोई विरोध नहीं किया क्योंकि उनकी तो प्रशंसा हो चुकी थी।

अब किसान बनिए के पास आया और बोला-
तू साहूकार होगा तो अपने घर का पण्डित जी और ठाकुर साहब तो नहीं है ना! तूने चने क्यों उखाड़े?

बनिये के भी दो तीन तगड़े तगड़े लट्ठ जमाए। पण्डित और ठाकुर ने कुछ नहीं कहा।

अब किसान ने ठाकुर से कहा–
ठाकुर साहब, माना आप अन्नदाता हो पर किसी का अन्न छीनना तो ग़लत बात है। अरे पण्डित महाराज की बात दीगर है, उनके हिस्से जो भी चला जाये दान पुन्य हो जाता है पर आपने तो बटमारी की!

ठाकुर साहब को भी लट्ठ का प्रसाद दिया।पण्डित जी बोले नहीं, नाई और बनिया अभी तक अपनी चोट सहला रहे थे।

जब ये तीनों पिट चुके तब किसान पण्डितजी के पास गया और बोला–
माना आप भूदेव हैं पर इन तीनों के गुरु घण्टाल आप ही हैं। आपको छोड़ दूँ ये तो अन्याय होगा
तो दो लट्ठ आपके भी पड़ने चाहिए।

मार खा चुके बाकी तीनों बोले हाँ हाँ, पण्डित जी को भी दण्ड मिलना चाहिए। अब क्या था, पण्डित जी भी पीटे गए।

किसान ने इस तरह चारों को अलग अलग करके पीटा किसी ने किसी के पक्ष में कुछ नहीं कहा,
उसके बाद से चारों कभी भी एक साथ नहीं देखे गये।

मित्रों, पिछली दो तीन सदियों से हिंदुओं के साथ यही होता आया है। कहानी सच्ची लगी हो तो समझने का प्रयास करो और अगर कहानी केवल कहानी लगी हो तो आने वाले समय के लट्ठ तैयार है..
राष्ट्रधारा
भारत