Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अमेरिका मे जब एक कैदी को फॉसी की सजा सुनाई गई तो वहॉ के कुछ बैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों न इस कैदी पर कुछ प्रयोग किया जाय ! तब कैदी को बताया गया कि हम तुम्हें फॉसी देकर नहीं परन्तु जहरीला कोबरा सॉप डसाकर मारेगें !
और उसके सामने बड़ा सा जहरीला सॉप ले आने के बाद कैदी की ऑखे बंद करके कुर्सी से बॉधा गया और उसको सॉप नहीं बल्कि दो सेफ्टी पिन्स चुभाई गई !
और क्या हुआ कैदी की कुछ सेकेन्ड मे ही मौत हो गई, पोस्टमार्डम के बाद पाया गया कि कैदी के शरीर मे सॉप के जहर के समान ही जहर है ।
अब ये जहर कहॉ से आया जिसने उस कैदी की जान ले ली ……वो जहर उसके खुद शरीर ने ही सदमे मे उत्पन्न किया था । हमारे हर संकल्प से पाजिटीव एवं निगेटीव एनर्जी उत्पन्न होती है और वो हमारे शरीर मे उस अनुसार hormones उत्पन्न करती है ।
75% वीमारियों का मूल कारण नकारात्मक सोंच से उत्पन्न ऊर्जा ही है ।
आज इंसान ही अपनी गलत सोंच से भस्मासुर बन खुद का विनाश कर रहा है ……
अपनी सोंच सदैव सकारात्मक रखें और खुश रहें
25 साल की उम्र तक हमें परवाह नहीँ होती कि “लोग क्या सोचेंगे ? ?
50 साल की उम्र तक इसी डर में जीते हैं कि ” लोग क्या सोचेंगे ! !
50 साल के बाद पता चलता है कि
हमारे बारे में कोई सोच ही नहीँ रहा था ! !
#apne_aap_se_khavi_mat_haaro_

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

!!

स्पृश्याश्पृश्य !!

न ज्ञायते कुलं यस्य बीजशुद्धिं विना तत:!

तस्य खादन् पिबन् वापि साधु: सीदति तत्क्षणात्!!

जिसके कुल का ज्ञान ना हो,जिसके जन्म में वीर्यशुद्धि का आभाव हो,उसका अन्न खाने वाला और जल पीने वाला तत्काल कष्ट में पड़ जाता है!!
—>
इस बात को रेलवे ने भी माना है, किसी अनजान व्यक्ति से कुछ न खाएं!!

अब इस बात को रेलवे या कोई और कहे तो निर्देश!
और शास्त्र कहें तो स्पृश्याश्पृश्य??😊😊

प्रश्न—
यदि सभी जीव में शिव हैं,तो ऊंच नीच भेदभाव क्यों??

उत्तर–///

यदि सभी में शिव हैं तो भोजन त्यागकर मिट्टी क्यों न खाया जाय??

राख धूल क्यों नहीं फांकते??

इसलिये संसार की व्यवहार सिद्धि के लिये एक मर्यादा स्थापित की गयी है, जो समय से सफल होती है,अन्यथा नहीं!

जैसे—//
सुवर्ण के बने हुए बहुत से आभूषण होते हैं,उनमें कोई विशुद्ध स्वर्ण के होते हैं,कुछ खोटे भी होते हैं!

खरे खोटे सभी आभूषणों में सुवर्ण तो है ही!

इसी प्रकार ऊंच नीच,शुद्ध अशुद्ध सब में भगवान् शिव हैं!

खोटा सुवर्ण भी शोधित होने पर शुद्ध सुवर्ण की एकता प्राप्त कर लेता है!

उल्टा नाम जपत जग जाना!
वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना!!

जय श्री राम!!💐

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) क्या फिरोज गांधी मुसलमान थे और इंदिरा गांधी ने निकाह के समय मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था ? हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित उर्दू अखबार ‘दैनिक मुंसिफ ने इस तरह का दावा किया है।

Read more at: https://hindi.oneindia.com/news/india/has-indira-gandhi-embraced-islam-after-her-marriage-340529.html
लेख में नेहरू डायनेस्टी के लेखक के एन.राव के हवाले से दावा किया गया कि इंदिरा और फिरोज ने लंदन में एक मस्जिद में जाकर निकाह कर लिया था और इंदिरा को मुसलमान धर्म स्वीकार करना पड़ा।

वैदिक पद्धति से शादी जब इस बात की सूचना महात्मा गांधी को मिली तो उन्होंने इन दोनों को भारत बुला कर वैदिक पद्धति से उनकी शादी करवा दी। फिरोज जहांगीर खान का नाम बदलकर फिरोज गांधी कर दिया गया। 1942 में राजीव के जन्म के बाद दोनों पति-पत्नी अलग हो गए थे। मोहम्मद यूनुस ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि संजय गांधी का मुसलमान ढंग से खतना किया गया था। फिरोज गांधी के पिता जहांगीर खान मुसलमान थे। जबकी उनकी मां रत्तीमाई जो कि पहले पारसी थी, बाद में मुसलमान बन गई थी। फिरोज गांधी की कब्र इलाहाबाद के कब्रिस्तान में मौजूद है जबकि पारसियों की कब्र नहीं बनाई जाती। बाबा के नाम से परहेज इस लेख में एक तरह से सवाल पूछा गया कि वरुण गांधी तक ने अपने नाम के साथ इंदिरा, नेहरू शब्द तो जोड़े पर कभी अपने बाबा के नाम से खुद को नहीं जोड़ा। वैसे कुछ कांग्रेस नेता उन्हें याद करते रहते थे और हर साल अपना पैसा खर्च करके किसी रेस्टोरेंट में उनके जन्मदिन पर छोटी सी पार्टी कर लेते थे। इनमें से एक दिवंगत ब्रजमोहनजी भी थे। फिरोज थे नापसंद मुंसिफ में छपे लेख में दावा किया गया है कि फिरोज गांधी के ससुर जवाहरलाल नेहरू उन्हें सख्त नापसंद करते थे। मूंधरा कांड, जीप घोटाले सरीखे नेहरू सरकार के भ्रष्टाचार के मामले उठाने के कारण, जवाहरलाल नेहरू उनसे काफी नाराज थे।

लेखक ने आगे यह भी दावा किया है कि 12 सितंबर 2012 को फिरोज गांधी की जन्म शताब्दी थी मगर उन्हें केंद्र में सत्तारुढ़ कांग्रेस सरकार ने याद करने की कोई जरुरत नहीं समझी। ऐसा प्रतीत होता है कि फिरोज गांधी के परिवारजनों ने उन्हें भुला दिया है या वह जानबूझकर उनका उल्लेख नहीं करना चाहते। फिरोज गांधी नदरअंदाज आखिर क्या कारण है कि राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की वर्षगांठ पर समाचार पत्रों को 8-8 करोड़ के विज्ञापन देने वाली सरकार फिरोज गांधी को बिल्कुल नजरअंदाज क्यों करती रही। हालांकि उस समय सत्ता की बागडोर फिरोज गांधी की पुत्रवधु सोनिया के हाथों में थीं। लेखक ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की है कि फिरोज गांधी को शुरु से ही उसका परिवार नजरअंदाज करता रहा है। उनके नाम पर न तो किसी मार्ग का नाम रखा गया है और न ही कोई योजना बनाई गई है। जबकि सैकड़ों जगहें राजीव और इंदिरा गांधी व जवाहरलाल नेहरू के नाम से जुड़ी हुई है। मगर फिरोज गांधी का कोई नाम लेने वाला नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व की बात है कि राहुल गांधी इलाहाबाद के दौरे पर गए थे तो रात के अंधेरे में वह फिरोज गांधी की कब्र भी देख आए। यह समाचार सिर्फ एक पारसी समाचारपत्र ने ही प्रकाशित किया था। फिरोज गांधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और उनसे खुद जवाहरलाल नेहरू भयभीत रहते थे। फिरोज गांधी अनेक बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। फिरोज गांधी को भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने अपने युग के आर्थिक घोटाले का पर्दाफाश किया था और उसके कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। फिरोज के इस रवैये से नेहरू बहुत परेशान थे। 1960 में जब फिरोज गांधी का निधन हुआ तो दोनों ने चैन की सांस ली।😉🤪😜

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लष्मीकांत विजेगाधिया

‘बहू कहां मर गई?

(लंबी है लेकिन पढ़िए जरूर, प्रतिक्रिया भी दें)

अंदर से आवाज- जिंदा हूं माँ जी।
तो फिर मेरी चाय क्यूं अभी तक नहीं आई, कब से पूजा करके बैठी हूं

ला रही हूं माँ जी,
बहू चाय के साथ, भजिया भी ले आयी, सास ने कहा तेल का खिलाकर क्या मरोगी?
बहू ने कहा- ठीक हैं माँ जी ले जाती हूं।
सास ने कहा- रहने दे अब बना दिया हैं तो खा लेती हूं। सास ने भजिया उठाई और कहा- कितनी गंदी भजिया बनाई हैं तुमने। बहू- माँ जी मुझे कपड़े धोने हैं मैं जाती हूं। बहू दरवाजे के पास छिपकर खड़ी हो गयी। सास भजिया पर टूट पड़ी और पूरी भजिया खत्म कर दी। बहू मुस्कुराई और काम पर लग गई।

दोपहर के खाने का वक्त हुआ। सास ने फिर आवाज लगाई- कुछ खाने को मिलेगा। बहू ने आवाज नहीं दी। सास फिर चिल्लाई- भूखे मारोगी क्या, बहू आयी सामने खिचड़ी रख दी।
सास गुस्से से- ये क्या है, मुझे इसे नहीं खाना इसे। ले जाओ। बहू ने कहा- आपको डॉक्टर ने दिन में खिचड़ी खाने को कहा है, खाना तो पड़ेगा ही। सास मुंह बनाते हुए, हाँ तू मेरी माँ बन जा, बहू फिर मुस्कुराई और चली गई।

आज इनके घर पूजा थी, बहू सुबह 4 बजे से उठ गयी। पहले स्नान किया, फिर फूल लाई। माला बनाई। रसोई साफ की। पकवान और भोज बनाया। सुबह के 10 बज गए। अब सास भी उठ चुकी थी। बहू अब पंडित जी के साथ भगवान के वस्त्र तैयार कर रही थी। आज ऑफिस की छुट्टी भी थीय़ उनके पति भी घर पर थे।

पूजा शुरू हुई, सास चिल्लाती बहू ये नहीं है, वो नही है। बहू दौड़ी-दौड़ी आती और सब करती। अब दोपहर के 3 बज गये थे, आरती की तैयारी चल रही थी, पंडित जी ने सबको आरती के लिए बुलाया और सबके हाथों में थाली दी, जैसे ही बहू ने थाली पकड़ी, थाली हाथों से गिर पड़ी। शायद भोज बनाते हुए बहू के हाथों मे तेल लगा था, जिसे वो पोंछना भूल गयी थी।

सारे लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। कैसी बहू है, कुछ नहीं आता। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकती। ना जाने कैसी बहू उठा लाए। एक आरती की थाली भी संभाल नहीं सकीय़ उसके पति भी गुस्सा हो गए पर सास चुप रही। कुछ नहीं कहा। बस यही बोल के छोड़ दिया सीख रही है, सब सीख जाएगी धीरे-धीरे।

अब सबको खाना परोसा जाने लगा, बहू दौड़-दौड़ के खाना देती, फिर पानी लाती। करीब 70- 80 लोग हो गये थे, इधर दो नौकर और बहू अकेली फिर भी वहाँ सारा काम, बहुत ही अच्छे तरीके से करती।

अब उसकी सास और कुछ आसपड़ोस के लोग खाने पर बैठे, बहू ने खाना परोसना शुरू किया, सब को खाना दे दिया गया, जैसे ही पहला निवाला सास ने खाया- तुमने नमक ठीक नहीं डाला क्या। एक काम ठीक से नहीं करती। पता नहीं मेरे बाद कैसे ये घर संभालेगी। आस-पड़ोस वालों को तो जानते ही हो ना साहब। वो बस बहाना ढूंढते हैं नुक्स निकालने का। फिर वो सब शुरू हो गये, ऐसा खाना है, ऐसी बहू है, ये वो वगैरहा-वगैरहा। दिन का खाना हो चुका था, अब बहू बर्तन साफ करने नौकरों के साथ लग गई।

रात में जगराता का कार्यक्रम रखा गया था। बहू ने भी एक दो गीत गाने के लिए स्टेज पर चढ़ी। सास जोर से चिल्लाई- मेरी नाक मत कटा देना, गाना नहीं आता तो मत गा, वापस आ जा। बहू मुस्कुराई और गाने लगी। सबने उसके गाने की तारीफ की, पर सास मुंह फूलाते हुए बोली, इससे अच्छा तो मैं गाती थी जवानी में, तुझे तो कुछ भी नहीं आता। बहू मुस्कुराई और चली गई।

अब रात का खाना खिलाया जा रहा था। उसके पति के ऑफिस के दोस्त साइड में ही ड्रिंक करने लगे। उसका पति चिल्लाता थोड़ा बर्फ लाओ, तो सास चिल्लाती यहाँ दाल नहीं है, फिर चिल्लाता कोल्ड ड्रिंग नहीं है, पापड़ ले आओ। इधर-उधर आखिरी में उसके पति की शराब गिर पड़ी उसके एक दोस्त पर और बोलत टूट गई। पति गुस्से में दो झापड़ अपनी पत्नी को लगाते हुए कहता है- जाहिल कहीं की। देखकर नहीं कर सकती। तुझे इतना भी काम नहीं आता। सारे लोग देखने लगे। उसकी पत्नी रोते हुए कमरे की तरफ दौड़ी, फिर उसके दोस्तों ने कहा- क्या यार पूरा मूड खराब कर दिया, यहाँ नहीं बुलाया होता, हम कहीं और पार्टी कर लेते। कैसी अनपढ़-गंवार बीवी ला रखी है तूने। उसे तो मेहमानों की इज्जत और काम करना तक नहीं आता, तुमने तो हमारी बेईजती कर दी।

अब आस पड़ोस की औरतों को और बहाना मिल गया था। वो कहने लगीं, देखो क्या कर दिया तुम्हारी बहू ने। कोई काम कीं नही है। मैं तो कहती हूं अपने बेटे की दूसरी शादी करा दो, छुटकारा पाओ इस गंवार से।
सास उठी और अपने बेटे के पास जाकर उसे थप्पड़ मारा और कहा- अरे नालायक, तुमने मेरी बहू को मारा, तेरी हिम्मत कैसे हुई। तेरी टाँग तोड़ दूंगी, उसके बेटे के दोस्त कुछ कहने ही वाले थे कि उसकी माँ ने घूरते हुए- कहा चुप बिल्कुल चुप। यहाँ दारू पीने आये हो, जबकि पता है आज पूजा है और तुम्हें पार्टी करनी है, कैसे संस्कार दिये हैं तुम्हारे, माता-पिता ने।
और किसने मेरी बहू को जाहिल बोला, जरा इधर आओ। चप्पल से मारूंगी अगर मेरी बहू को किसी ने शब्द भी कहा तो। अरे पापी, तूने उस लड़की को बस इसलिए मारा कि तेरी शराब टूट गयी, पापी वो बच्ची सुबह चार बजे से उठी है। घर का सारा काम कर रही है। ना सुबह से नाश्ता किया ना दिन का खाना खाया। फिर भी हंसते हुए सबकी बातें सुनते हुए, ताने सुनते हुए घर के काम में लगी रही। तेरे यार दोस्तो को वो अच्छी नहीं लगी। जूते से मारूंगी तेरे दोस्तों को जो कभी उन्होंने ऐसा कहा। उसके यार दोस्त चुपके से खिसक लिए।

अब सास, बहू के कमरे मे गयी, और बहू का हाथ पकड़कर बाहर लाई। सबके सामने कहने लगी, किसने कहा था अपनी बहू को घर से निकाल के दूसरी बहू ले आना। जरा सामने आओ। कोई सामने नहीं आया। फिर सास ने कहा, तुम जानते भी क्या हो इस लड़की के बारें में। ये मेरी “माँ” भी है, बेटी भी।
माँ इसलिए मुझे गलत काम करने पर डाँटती हैं और बेटी इसलिए, कभी-कभी मेरी दिल की भावनाएं समझ जाती हैं। मेरी दिन-रात सेवा करती है। मेरे हजार ताने सुनती है पर एक शब्द भी गलत नहीं कहती। ना सामने ना पीठ पीछे,
और तुम कहते हो, दूसरी बहू ले आऊं। याद है ना छुटकी की दादी, अपनी बहू की करतूत, सास ने गुस्से से पड़ोस की महिला को कहा, अभी पिछले हफ्ते ही तुम्हें मियां-बीवी भूखे छोड़ घूमने चले गये थे। मेरी इसी बहू ने 7 दिनों तक तुम्हारे घर पर खाना-पानी यहाँ तक कि तुम्हारे पैर दबाने जाती थी और तुम इसे जाहिल बोलती हो। जाहिल तो तुम सब हो जो कोयले और हीरे में फर्क नही जानते। अगर आइंदा मेरी बहू के बारे में किसी ने एक लफ्ज भी बोला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा क्यूंकि ये मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।

बहू_सिसकियाँ लेते हुये फिर कमरें में चली गई। सास ने एक प्लेट उठायी और भोजन परोसा और बहू के कमरे में खुद ले गयी, सास को भोजन लाते देखा तो बहू ने कहा- अरे माँ जी आप क्या कर रही हों, मैं खुद ले लेती। सास ने प्यार से ताना मारते हुये कहा, डर मत इसमें जहर नही हैं, मार नहीं डालूंगी तुझे। तुझे नई सास चाहिए होगी, पर मुझे अभी भी तू ही मेरे घर की बहू चाहिए

बहू ने अपनी सास को रोते हुए गले से लगा लिया। सास भी रो दी पहली बार और कहा- चल खाना खा ले। फिर उसके आंसू पोंछते हुए बोली…… अरे तु मेरी बहु नही मेरी बेटी है……

कुछ रिश्ते बहुत मीठे होते हैं, बस बातें कड़वी होती है…..

Posted in हिन्दू पतन

यौन अपराध इस्लाम की देन
~बलात्कार का आरंभ~

मुझे पता है 90 % बिना पढ़े ही निकल लेंगे😢

आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी ~~

आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।

तब आखिर ऐसा क्या हो गया ?? कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??

~श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।

~महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।

अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~

220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक “डेमेट्रियस प्रथम” ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

~इसके बाद “युक्रेटीदस” भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने “तक्षशिला” को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

~”डेमेट्रियस” के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक “वृहद्रथ” को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

~”सिकंदर” ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा “पुरु” की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और “बेबिलोन” वापस चला गया ।

विजेता होने के बाद भी “यूनानियों” (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही “धर्म परिवर्तन” करवाया ।

~इसके बाद “शकों” ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। “सिन्ध” नदी के तट पर स्थित “मीननगर” को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।

~इसके बाद तिब्बत के “युइशि” (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति “कुषाणों” ने “काबुल” और “कंधार” पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें “कनिष्क प्रथम” (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ।जिसका राज्य “कश्मीर से उत्तरी सिन्ध” तथा “पेशावर से सारनाथ” के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।

~इसके बाद “अफगानिस्तान” से होते हुए भारत तक आये “हूणों” ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।

~इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे “नेपालवंशी” “शक्य” आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।

अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~

जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण~

और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन ।

~सबसे पहले 711 ईस्वी में “मुहम्मद बिन कासिम” ने सिंध पर हमला करके राजा “दाहिर” को हराने के बाद उसकी दोनों “बेटियों” को “यौनदासियों” के रूप में “खलीफा” को तोहफा भेज दिया।

तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें “हारे हुए राजा की बेटियों” और “साधारण भारतीय स्त्रियों” का “जीती हुयी इस्लामी सेना” द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।

~फिर आया 1001 इस्वी में “गजनवी”। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने “इस्लाम को फ़ैलाने” के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।

“सोमनाथ के मंदिर” को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों “काफिर औरतों” का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर “बाजारों में बोलियाँ” लगाकर “जानवरों” की तरह “बेच” दिया ।

~फिर “गौरी” ने 1192 में “पृथ्वीराज चौहान” को हराने के बाद भारत में “इस्लाम का प्रकाश” फैलाने के लिए “हजारों काफिरों” को मौत के घाट उतर दिया और उसकी “फौज” ने “अनगिनत हिन्दू स्त्रियों” के साथ बलात्कार कर उनका “धर्म-परिवर्तन” करवाया।

~ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।

~मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,

~अपने हरम में “8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ”।

~ इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए “मीना बाजार” लगवाने वाला “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर”।

~मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों “काफिर महिलाओं” “(माल-ए-गनीमत)” का बेरहमी से बलात्कार किया और “जेहाद के इनाम” के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह “सिपहसालारों” में बांटा तो कभी बाजारों में “जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी” गई।

~ये असहाय और बेबस महिलाएं “हरमों” से लेकर “वेश्यालयों” तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।

~एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम “आक्रमणकारी” अपने साथ “औरतों” को लेकर नहीं आए थे।

~वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा “पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार” करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे “अपनी जीत” या “जिहाद का इनाम” (माल-ए-गनीमत) मानते थे।

~केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा।

~बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।

~गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए “दिल दहला” देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।

~इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।

~इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया।

~ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।

~महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।

~1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।

~इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि “पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों” से “बलात्कार” किये बिना एक भी “काफिर स्त्री” वहां से वापस नहीं आ सकती थी।

~जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।

~जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि “हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं”।

~विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की “नग्न यात्राएं (धिंड) “निकाली गयीं, “बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं”

~और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।

~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म “पिंजर” और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।

~इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे।

~वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके “स्तनों को काटकर” तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।

अंत में कश्मीर की बात~

~19 जनवरी 1990~

~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था~ “या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर “।

~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं।

~वह कहते हैं कि “मस्जिदों के लाउडस्पीकर” लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, “निजाम-ए-मुस्तफा”, ‘आजादी का मतलब क्या “ला इलाहा इलल्लाह”, ‘कश्मीर में अगर रहना है, “अल्लाह-ओ-अकबर” कहना है।

~और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ “रोअस ते बतानेव सान” जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।

~सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।

~सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये।

~उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके “नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया”।

~कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया।

~कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी।

~बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया।

~कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।

~लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, ‘मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो’।

~राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, “कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।

~1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’।

~घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।

~कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया।

~आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल काफिर होने की सजा मिली।

~घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।

~लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।

~अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर “अबू बकर अल बगदादी” के जेहादियों को काफिर “यजीदी महिलाओं” को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।

~पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।

~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी।

~यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।

~केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया।

~परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी…
बलात्कार के रूप में ।

~आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।

~जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है ।

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🐜 🐝एक समय की बात है एक चींटी और एक टिड्डा था .

गर्मियों के दिन थे,

🐜चींटी दिन भर मेहनत करती और अपने रहने के लिए घर को बनाती,

खाने के लिए
भोजन भी इकठ्ठा करती

जिस से की सर्दियों में उसे खाने पीने की
दिक्कत न हो और वो आराम से अपने घर में रह सके,

जबकि

🐝टिड्डा दिन भर मस्ती करता

गाना गाता

और 🐜चींटी को बेवकूफ समझता

मौसम बदला

और सर्दियां आ गयीं,

🐜चींटी अपने बनाए मकान में आराम से रहने लगी

उसे खाने पीने की कोई दिक्कत नहीं थी

परन्तु

🐝 टिड्डे के पास रहने के लिए न घर था

और न खाने के लिए खाना,

वो बहुत परेशान रहने लगा .

दिन तो उसका जैसे तैसे कट जाता

परन्तु

ठण्ड में रात काटे नहीं कटती.

एक दिन टिड्डे को उपाय सूझा

और उसने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई.

सभी
न्यूज़ चैनल वहां पहुँच गए .

तब 🐝 टिड्डे ने कहा कि ये कहाँ का इन्साफ है की एक देश में

एक समाज में रहते हुए

🐜चींटियाँ तो आराम से रहें और भर पेट खाना खाएं और और हम 🐝टिड्डे ठण्ड में भूखे पेट ठिठुरते रहें ……….?

मिडिया ने मुद्दे को जोर – शोर से उछाला,

और जिस से पूरी विश्व बिरादरी के कान खड़े हो गए…….. !

बेचारा

🐝टिड्डा सिर्फ इसलिए अच्छे खाने और घर से महरूम रहे की वो गरीब है और जनसँख्या में कम है….

बल्कि

🐜चीटियाँ बहुसंख्या में हैं और अमीर हैं तो क्या आराम से जीवन जीने का अधिकार उन्हें मिल गया……

बिलकुल नहीं

ये 🐝टिड्डे के साथ अन्याय है…..

इस बात पर कुछ समाजसेवी, 🐜चींटी के घर के सामने धरने पर बैठ गए ….

तो कुछ भूख हड़ताल पर,

कुछ ने 🐝टिड्डे के लिए घर की मांग की.

कुछ राजनीतिज्ञों ने इसे पिछड़ों के प्रति अन्याय बताया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने🐝 टिड्डे के वैधानिक अधिकारों को याद दिलाते हुए…..

भारत सरकार की निंदा की.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर,,,

🐝 टिड्डे के समर्थन में बाड़ सी आ गयी,

विपक्ष के नेताओं ने भारत बंद का एलान कर दिया.

कमुनिस्ट पार्टियों ने समानता के अधिकार के तहत 🐜चींटी पर “कर” लगाने

और

🐝टिड्डे को अनुदान की मांग की,

एक नया क़ानून लाया गया

“पोटागा” (प्रेवेंशन ऑफ़ टेरेरिज़म अगेंस्ट ग्रासहोपर एक्ट).

🐝टिड्डे के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी.

अंत में पोटागा के अंतर्गत🐜 चींटी पर फाइन लगाया गया …..

उसका घर सरकार ने अधिग्रहीत कर टिड्डे
को दे दिया …….!

इस प्रकरण को मीडिया ने पूरा कवर किया

🐝 टिड्डे को इन्साफ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की .

समाजसेवकों ने इसे समाजवाद की स्थापना कहा

तो किसी ने न्याय की जीत,

कुछ

राजनीतिज्ञों ने उक्त शहर का नाम बदलकर

🐝”टिड्डा नगर” कर दिया,

रेल मंत्री ने🐝 “टिड्डा रथ”

के नाम से नयी रेल चलवा दी………!

और कुछ नेताओं ने इसे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की संज्ञा दी.

🐜चींटी भारत छोड़क
अमेरिका चली गयी ……… !

वहां उसने फिर से मेहनत
की …..

और एक कंपनी की स्थापना की …..

जिसकी दिन रात
तरक्की होने लगी……..!

तथा अमेरिका के विकास में सहायक सिद्ध हुई

🐜चींटियाँ मेहनत करतीं रहीं

🐝टिड्डे खाते रहे ……..!

फलस्वरूप

धीरे
धीरे,,,,

🐜चींटियाँ भारत छोड़कर जाने लगीं…….

और 🐝टिड्डे झगड़ते रहे ……..!

एक दिन खबर आई
की …

अतिरिक्त आरक्षण की मांग को लेकर ….

सैंकड़ों 🐝🐝🐝टिड्डे मारे गए……………..!

ये सब देखकर अमेरिका में बैठी 🐜चींटी ने कहा ”

इसीलिए शायद भारत आज
भी विकासशील देश है”

चिंता का विषय:

जिस देश में लोगो में

“पिछड़ा”

बनने की होड़ लगी हो

वो “देश”

आगे कैसे बढेगा।।

🙏🙏🙏🙏

आप से मेरा निवेदन है कि यदि पोस्ट पसंद आया तो शेयर जरूर करियेगा।

धन्यवाद।

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ના તારી મોરલીએ મારું મન મોહ્યું ( એક સત્ય ઘટના)


કાના તારી મોરલીએ મારું મન મોહ્યું ( એક સત્ય ઘટના) …

ઇટાલીના સરમુખત્યાર મુસોલિનીની આત્મકથામાં પડેલો આ પ્રસંગ વાંચીને દરેક ભારતવાસી પોતાની પ્રાચીન સંસ્કૃતિ માટે ગૌરવનો અનુભવ કરી શકે તેમ છે.

*ભારતના મહાન સંગીતકાર ઓમકારનાથ ઠાકુર એ દિવસોમાં ઇટાલીના પ્રવાસે ગયેલા. *

*ભારતના એ મહાન સંગીતજ્ઞના માનમાં મુસોલિનીએ એક ભોજન સમારંભનું આયોજન કરેલ. *

આ રાજકીય ભોજન સમારંભમાં ઓમકારનાથ ઠાકુરની સાથે ઇટાલીમાં વસેલા ઘણા અગ્રગણ્ય ભારતીયો તથા ભારતના દૂતાવાસના સભ્યોને પણ ઉપસ્થિત હતા..

સમારંભમાં મુસોલિનીએ ભારતની પાંચ હજાર જૂની સંસ્કૃતિની મજાક કરતા બધા મહેમાનોની વચ્ચે ઓમકારનાથ ઠાકુરને કહ્યું કે, ‘મી. ઠાકુર મેં સાંભળ્યું છે કે તમારા દેશમાં કૃષ્ણ જ્યારે વાંસળી વગાડતા ત્યારે આજુબાજુના વિસ્તારની બધી ગાયો નાચવા લાગતી, મોર કળા કરવા લાગતા, ગોપીઓ સૂધબૂધ ખોઈને કૃષ્ણ જ્યાં વાંસળી વગાડતા હોય ત્યાં દોડી આવતી,શું તમે આ વાતને માનો છો?’

*ઇટાલીના સરમુખત્યારને ભારતના એ સપૂતે ભોજન સમારંભમાં બધાની વચ્ચે જે કરી બતાવ્યું તે જાણીને પ્રત્યેક ભારતીયનું મસ્તક ગૌરવથી ઊંચું થઈ જશે… *

*ઠાકુરે કહ્યું, ‘કૃષ્ણ જેટલું તો મારું સાર્મથ્ય નથી કે નથી સંગીતની બાબતમાં મારી તેમના જેટલી સમજણ. *

*સાચું તો એ છે કે સંગીત સંબંધે આ પૃથ્વી ઉપર આજ સુધીમાં કૃષ્ણ જેટલી સમજણવાળો કોઈ બીજો પેદા થયો હોવાનું પણ જાણવા મળતું નથી. *

પરંતુ, સંગીતનું જે થોડું ઘણુ જ્ઞાન મને છે, તે તમે કહો તો તમને કહું અથવા કરી બતાવું…’

મુસોલિનીએ મજાકમાં જ કહ્યું કે, ‘જો કે સંગીતના કોઈ સાધનો અહીં ઉપલબ્ધ નથી છતાં પણ જો શક્ય હોય તો કંઈક કરી બતાવો તો અહીં ઉપસ્થિત મહાનુભાવોને પણ ભારતીય સંસ્કૃતિનો પરિચય મળે.’

*ઓમકારનાથ ઠાકુરે ડાઈનીંગ ટેબલ ઉપર પડેલા કાચના જુદા જુદા પ્યાલામાં ઓછું વધારે પાણી ભરીને તેના ઉપર છરી કાંટાથી જલતરંગની જેમ વગાડવું શરૂ કર્યું. બે મિનિટમાં તો ભોજન સમારંભની હવા ફરી ગઈ. *

*વાતાવરણમાં એક પ્રકારની ઠંડક વર્તાવા લાગી. પાંચ મિનિટ, સાત મિનિટ અને મુસોલિનીની આંખો ઘેરાવા લાગી. વાતાવરણમાં એક પ્રકારનો નશો છવાવા લાગ્યો. *

મદારી બીન વગાડે અને અવસ થઈને જેમ સાપ ડોલવા લાગે તેમ મુસોલીની ડોલવા લાગ્યો અને તેનું માથું જોરથી ટેબલ સાથે અથડાયું.

*બંધ કરો… બંધ કરો… મુસોલિની બૂમ પાડી ઉઠ્યો. સમારંભમાં સન્નાટો છવાઈ ગયો. *

બધા લોકોએ જોયું તો મુસોલિનીના કપાળમાં ફૂટ પડી હતી અને તેમાંથી લોહી વહેતું હતું.

*મુસોલિનીએ આત્મકથામાં લખાવ્યું છે કે ભારતની સંસ્કૃતિ માટે મેં કરેલ મજાક માટે હું ભારતની જનતાની માફી માંગું છું. *

ફક્ત છરીકાંટા વડે પાણી ભરેલા કાચના વાસણોમાંથી ઉદભવેલા એ અદભૂત સંગીતથી જો આ સભ્ય સમાજનો મારા જેવો મજબૂત મનનો માનવી પણ ડોલવા લાગે તો હું જરૂર માનું છું કે એ જમાનામાં કૃષ્ણની વાંસળી સાંભળીને જંગલના જાનવરો પણ શાંત થઈ જતાં હશે અને માનવીઓ પણ સૂધબૂધ ખોઈને ભેળા થઈ જતાં હશે.

*ભારતના ઋષિઓએ હજારો વર્ષ પૂર્વે ધ્વનિશાસ્ત્ર – નાદબ્રહ્મની સાધના કરી અને મંત્રયોગ દ્વારા માનવીના ચિત્તના તરંગોને અનેક પ્રકારે રૂપાંતરિત કરવાની પ્રક્રિયાઓ શોધેલ. *

*ધ્વનિ અને મંત્રોમાં એવી અદભૂત શક્તિઓ ભરી પડી છે કે તે જડ તત્વોને ચૈતન્યમય બનાવી શકે છે. *

ઓમકારનાથ ઠાકુરે તેનો એક નાનકડો પ્રયોગ ઇટાલીમાં કરીને ત્યાં ઉપસ્થિત બધાને આશ્ચર્ય ચકિત કરી દીધા હતા