Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

Sanjay Gupta

ईश्वर और विश्वास
एक पादरी महाशय समुद्री जहाज से यात्रा कर
रहे थे, रास्ते में एक रात तुफान आने से जहाज को
एक द्वीप के पास लंगर डालना पडा। सुबह पता
चला कि रात आये तुफान में जहाज में कुछ
खराबी आ गयी है, जहाज को एक दो दिन वहीं
रोक कर उसकी मरम्मत करनी पडेगी। पादरी
महाशय नें सोचा क्यों ना एक छोटी बोट से
द्वीप पर चल कर घूमा जाये, अगर कोई मिल जाये
तो उस तक प्रभु का संदेश पहँचाया जाय और उसे
प्रभु का मार्ग बता कर प्रभु से मिलाया जाये।
तो वह जहाज के केप्टन से इज़ाज़त ले कर एक छोटी
बोट से द्विप पर गये, वहाँ इधर उधर घूमते हुवे तीन
द्वीपवासियों से मिले। जो बरसों से उस सूने
द्विप पर रहते थे। पादरी महाशय उनके पास जा
कर बातचीत करने लगे।
उन्होंने उनसे ईश्वर और उनकी आराधना पर चर्चा
की.. उन्होंने उनसे पूछा- “क्या आप ईश्वर को
मानाते हैं?”
वे सब बोले- “हाँ..।“
फिर पादरी ने पूछा- “आप ईश्वर की आराधना
कैसे करते हैं?”
उन्होंने बताया- ”हम अपने दोनो हाथ ऊपर करके
कहते हैं “हे ईश्वर हम आपके हैं, आपको याद करते हैं,
आप भी हमें याद रखना”..॥”
पादरी महाशय ने कहा- “यह प्रार्थना तो ठीक
नही है।”
एक ने कहा- “तो आप हमें सही प्रार्थना सिखा
दीजिये।”
पादरी महाशय ने उन सबों को बाईबल पढना,
और प्रार्थना करना सिखाया।
तब तक जहाज बन गया। पादरी अपने सफर पर आगे
बढ गये…।
तीन दिन बाद पादरी ने जहाज के डेक पर टहलते
हुवे देखा, वह तीनो द्वीपवासी जहाज के
पीछे-2 पानी पर दौडते हुवे आ रहे हैं। उन्होने
हैरान होकर जहाज रुकवाया, और उन्हे ऊपर
चढवाया।
फिर उनसे इस तरह आने का कारण पूछा- “वे बोले
”फादर!! आपने हमें जो प्रार्थना सिखाई थी, हम
उसे अगले दिन ही भूल गये। इसलिये आपके पास उसे
दुबारा सीखने आये हैं, हमारी मदद कीजिये।”
पादरी ने कहा- ” ठीक है, पर यह तो बताओ तुम
लोग पानी पर कैसे दौड सके?”
उसने कहा- ” हम आपके पास जल्दी पहुँचना चाहते
थे, सो हमने ईश्वर से विनती करके मदद माँगी और
कहा.., “हे ईश्वर!! दौड तो हम लेगें बस आप हमें
गिरने मत देना।” और बस दौड पडे।“
अब पादरी महाशय सोच में पड गये.. उन्होने
कहा- ” आप लोग और ईश्वर पर आपका विश्वास
धन्य है। आपको अन्य किसी प्रार्थना की
आवश्यकता नहीं है। आप पहले कि तरह प्रार्थना
करते रहें।”
ये कहानी बताती है… ईश्वर पर विश्वास, ईश्वर
की आराधना प्रणाली से अधिक महत्वपूर्ण है॥
संत कबीरदास ने कहा है…
“माला फेरत जुग गया, फिरा ना मन का फेर,
कर का मन का डारि दे, मनका-मनका फेर॥“
“हे ईश्वर!! दौड तो हम लेंगे, बस आप हमें गिरने मत
देना॥”…🙏🙏🙏🙏

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Sanjay Gupta

एक कस्बे के होटल का छोटा सा कमरा …!

विवाह की बात चलायी जा रही है
लडका-लडकी को एक दूसरे को जानने के लिये अकेला छोड दिया गया है!

बिना समय गँवाये लडके ने पहल कर दी है
मेरा परिवार मेरे लिये सब कुछ है
माँ को एक ऐसी बहू चाहिये
जो पढी लिखी हो
घर के काम में हुनरमंद हो
संस्कारी हो
सबका ख्याल रखे
उनके बेटे के साथ कदम से कदम मिलाकर चले !

परिवार पुराने ख्यालात का तो नहीं पर ये जरूर चाहता है
कि ऐसा कोई आये जो हमारे रीति रिवाज को अपना ले!

परिवार की महिलायें ‘चश्मा’ नहीं लगातीं हैं!

भगवान की कृपा से हमारे पास सब कुछ है
हमें आपसे कुछ नहीं चाहिये
बस लडकी घर को जोडकर रखने वाली चाहिये!

मेरी कोई विशेष पसंद नहीं है
बस मुझे समझने वाली चाहिये
थोडा बहुत देश-समाज की भी जानकारी रखती हो
हाँ लम्बे बाल और साडी वाली लडकियाँ अच्छी लगतीं हैं!

आपकी कोई इच्छा हो तो बताईये !

बहुत देर से मौन बैठी लडकी ने लाज का घूँघट हटाकर
स्वाभिमान की चूनर सिर पर रख ली है!

पूरे विश्वास से बोलना शुरू कर दिया है
मेरा परिवार मेरी ताकत है
बाबा को दामाद के रूप में ऐसा बेटा चाहिये
जो उनके हर सुख दुख में ‘बिना अहसान’ उनके साथ खडा रहे
बिटिया के साथ घर के काम में कुछ मदद भी करे
जिसे अपनी माँ और पत्नी के बीच ‘पुल’ बनना आता हो
और जो उनकी बेटी को अपने परिवार की ‘केयर टेकर’ बनाकर न ले जाये !

जीवनसाथी से बहुत उम्मीद तो नहीं
पर ऐसा कोई जो अपनी पत्नी को परिवार में सम्मान दिला पाये
‘पठानी सूट’ में बिना मूँछ-दाढी वाले लडके पसंद हैं!

अपने ‘स्पैक्ट्स’ को खुद से भी ज्यादा प्यार करती हूँ!

‘सरनेम’ बदलना या न बदलना अपने अधिकार क्षेत्र में रखना चाहूँगी
आप और हम पढे लिखे हैं
तो विवाह का खर्च आधा आधा दोनों परिवार उठायें
देश के विकास में ये भी एक पहल होनी चाहिये !
और हाँ…..
हर बात सिर झुकाकर मानते रहना संस्कारी होने की निशानी नहीं है!

लडका हकलाने लगा है!

लडकी कमरा छोडकर जा चुकी है
चारों तरफ सन्नाटा पसर गया है !

कहीं दूर सभ्यता का तराजू मंद मंद मुस्कुरा रहा है
आज सदियों बाद उसके दोनों पलडे बराबर जो आ गये हैं!!

Posted in संस्कृत साहित्य

Sanjay Gupta

आपने हमेशा यह देखा होगा कि कैसी भी पूजा हो उसमें पंडित या पुरोहित लोगों को मौली या कलावा बांधते हैं क्या आप जानते हैं कि आखिर यह मौली या कलावा क्यों बांधा जाता है| अगर नहीं पता है तो आज हम आपको बताते हैं कि आखिर पंडित या पुरोहित क्यों बांधते हैं मौली या कलावा|

तो आइये जाने आखिर क्यों बांधा जाता है मौली या कलावा-

मौली का अर्थ है सबसे ऊपर जिसका अर्थ सिर से भी लिया जाता है। त्रिनेत्रधारी भगवान शिव के मस्तक पर चन्द्रमा विराजमान है जिन्हें चन्द्र मौली भी कहा जाता है। शास्त्रों का मत है कि हाथ में मौली बांधने से त्रिदेवों और तीनों महादेवियों की कृपा प्राप्त होती है। महालक्ष्मी की कृपा से धन सम्पत्ति महासरस्वती की कृपा से विद्या-बुद्धि और महाकाली की कृपा से शाक्ति प्राप्त होती है।

इसके आलावा हिन्दू वैदिक संस्कृति में मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते है ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे। मौली कच्चे सूत के धागे से बनाई जाती है। यह लाल रंग, पीले रंग, या दो रंगों या पांच रंगों की होती है। इसे हाथ गले और कमर में बांधा जाता है।

हम किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत मौली बांधकर ही करते है। शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। ऐसी भी मान्यता है कि इसे बांधने से बीमारी अधिक नहीं बढती है। पुराने वैद्य और घर परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिये लाभकारी था।

ब्लड प्रेशर, हार्ट एटेक, डायबीटिज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिये मौली बांधना हितकर बताया गया है। मौली शत प्रतिशत कच्चे धागे (सूत) की ही होनी चाहिये। आपने कई लोगों को हाथ में स्टील के बेल्ट बांधे देखा होगा। कहते है रक्तचाप के मरीज को यह बैल्ट बांधने से लाभ होता है। स्टील बेल्ट से मौली अधिक लाभकारी है। मौली को पांच सात आंटे करके हाथ में बांधना चाहिये।

मौली को किसी भी दिन बांध सकते है, परन्तु हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल, आंकडे या बड के पेड की जड में डालना चाहिये

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Sanjay Gupta

कहानी (हमारी-तुम्हारी)

एक धन सम्पन्न व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ रहता था।
पर कालचक्र के प्रभाव से धीरे धीरे वह कंगाल हो गया।
उस की पत्नी ने कहा कि सम्पन्नता के दिनों में तो राजा के यहाँ आपका अच्छा आना जाना था।
क्या विपन्नता में वे हमारी मदद नहीं करेंगे जैसे श्रीकृष्ण ने सुदामा की की थी?
पत्नी के कहने से वह भी सुदामा की तरह राजा के पास गया।

द्वारपाल ने राजा को संदेश दिया कि एक निर्धन व्यक्ति आपसे मिलना चाहता है और स्वयं को
आपका मित्र बताता है।
राजा भी श्रीकृष्ण की तरह मित्र का नाम सुनते ही दौड़े चले आए और मित्र को इस हाल में
देखकर द्रवित होकर बोले कि मित्र बताओ, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?
मित्र ने सकुचाते हुए अपना हाल कह सुनाया।

चलो, मै तुम्हें अपने रत्नों के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर अपनी जेब में रत्न भर कर ले जाना।
पर तुम्हें केवल 3 घंटे का समय ही मिलेगा।
यदि उससे अधिक समय लोगे तो तुम्हें खाली हाथ बाहर आना पड़ेगा।
ठीक है, चलो।
वह व्यक्ति रत्नों का भंडार और उनसे निकलने वाले प्रकाश की चकाचौंध देखकर हैरान हो गया।
पर समय सीमा को देखते हुए उसने भरपूर रत्न अपनी जेब में भर लिए।
वह बाहर आने लगा तो उसने देखा कि दरवाजे के पास रत्नों से बने छोटे छोटे खिलौने रखे
थे जो बटन दबाने पर तरह तरह के खेल दिखाते थे।
उसने सोचा कि अभी तो समय बाकी है, क्यों न थोड़ी देर इनसे खेल लिया जाए?
पर यह क्या?
वह तो खिलौनों के साथ खेलने में इतना मग्न हो गया कि समय का भान ही नहीं रहा।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह निराश होकर खाली
हाथ
ही बाहर आ गया।
राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने स्वर्ण के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर सोना अपने थैले में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।

उसने देखा कि वह कक्ष भी सुनहरे प्रकाश से जगमगा रहा था।
उसने शीघ्रता से अपने थैले में सोना भरना प्रारम्भ कर दिया।
तभी उसकी नजर एक घोड़े पर पड़ी जिसे सोने की काठी से सजाया गया था।
अरे! यह तो वही घोड़ा है जिस पर बैठ कर मैं राजा साहब के साथ घूमने जाया करता था।
वह उस घोड़े के निकट गया, उस पर हाथ फिराया और कुछ समय के लिए उस पर सवारी
करने की इच्छा से उस पर बैठ गया।
पर यह क्या?
समय सीमा समाप्त हो गई और वह अभी तक सवारी का आनन्द ही ले रहा था।
उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और वह घोर निराश होकर
खाली हाथ ही बाहर आ गया।

राजा ने कहा- मित्र, निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
चलो, मैं तुम्हें अपने रजत के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर चाँदी अपने ढोल में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान अवश्य रखना।
ठीक है।
उसने देखा कि वह कक्ष भी चाँदी की धवल आभा से शोभायमान था।
उसने अपने ढोल में चाँदी भरनी आरम्भ कर दी।
इस बार उसने तय किया कि वह समय सीमा से पहले कक्ष से बाहर आ जाएगा।
पर समय तो अभी बहुत बाकी था।
दरवाजे के पास चाँदी से बना एक छल्ला टंगा हुआ था।
साथ ही एक नोटिस लिखा हुआ था कि इसे छूने पर उलझने का डर है।
यदि उलझ भी जाओ तो दोनों हाथों से सुलझाने की चेष्टा बिल्कुल न करना।
उसने सोचा कि ऐसी उलझने वाली बात तो कोई दिखाई नहीं देती।
बहुत कीमती होगा तभी बचाव के लिए लिख दिया होगा।
देखते हैं कि क्या माजरा है?
बस! फिर क्या था।
हाथ लगाते ही वह तो ऐसा उलझा कि पहले तो एक हाथ से सुलझाने की कोशिश करता
रहा।
जब सफलता न मिली तो दोनों हाथों से सुलझाने लगा।
पर सुलझा न सका और उसी समय घंटी बजी जो समय सीमा समाप्त होने का संकेत था और
वह निराश होकर खाली हाथ ही बाहर आ गया।

राजा ने कहा- मित्र, कोई बात नहीं
निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
अभी तांबे का खजाना बाकी है।
चलो, मैं तुम्हें अपने तांबे के खजाने में ले चलता हूँ।
वहां से जी भरकर तांबा अपने बोरे में भर कर ले जाना।
पर समय सीमा का ध्यान रखना।
ठीक है।

मैं तो जेब में रत्न भरने आया था और बोरे में तांबा भरने की नौबत आ गई।
थोड़े तांबे से तो काम नहीं चलेगा।
उसने कई बोरे तांबे के भर लिए।
भरते भरते उसकी कमर दुखने लगी लेकिन फिर भी वह काम में लगा रहा।
विवश होकर उसने आसपास सहायता के लिए देखा।
एक पलंग बिछा हुआ दिखाई दिया।
उस पर सुस्ताने के लिए थोड़ी देर लेटा तो नींद आ गई और अंत में वहाँ से भी खाली हाथ
बाहर निकाल दिया गया।

क्या इसी प्रकार हम भी अपने जीवन में अपने साथ कुछ नहीं ले जा पाएंगे?
बचपन खिलौनों के साथ खेलने में, जवानी विवाह के आकर्षण में और गृहस्थी की उलझन में
बिता दी।
बुढ़ापे में जब कमर दुखने लगी तो पलंग के सिवा कुछ दिखा नहीं।
समय सीमा समाप्त होने की घंटी बजने वाली है।

संत कहते हैं- सावधान! सावधान!!
“यूँ ही आता रहा, यूँ ही जाता रहा, लख चौरासी के चक्कर लगाता रहा।
क्यों न पहचान पाया तू श्वासों का मोल, अपना हीरा जन्म यूँ गँवाता रहा।”🔔🔔

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Sanjay Gupta

।। क्यों किया जाता है किसी मंत्र का 108 बार जाप आये जाने इस पोस्ट के द्वारा ।।

माला में 108 दाने होते हैं, जब भी किसी मंत्र का जाप किया जाता है तो वो 108 बार ही किया जाता है। क्या आप जानते हैं माला में 108 दाने क्यों होते हैं और क्यों किया जाता है किसी मंत्र का 108 बार जाप किया जाता है आइए जानते हैं इसके बारे में….
ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अतः ग्रहों की संख्या 9 का गुणा किया जाए राशियों की संख्या 12 में तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है। इसके साथ ही कुल 27 नक्षत्र होते हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इन्हीं कारणों से माला में 108 मोती होते हैं।
माला कार्यानुसार तुलसी, वैजयंती, रुद्राक्ष, कमल गट्टे, स्फटिक, पुत्रजीवा, अकीक, रत्नादि किसी की भी हो सकती है। अलग-अलग कार्य सिद्धियों के अनुसार ही इन मालाओं का चयन होता है।
माला के 108 मनके हमारे हृदय में स्थित 108 नाड़ियों के प्रतीक स्वरूप हैं। माला का 109वां मनका सुमेरु कहलाता है। जप करने वाले व्यक्ति को एक बार में 108 जाप पूरे करने चाहिए। इसके बाद सुमेरु से माला पलटकर पुनः जाप आरंभ करना चाहिए।

किसी भी स्थिति में माला का सुमेरु लांघना नहीं चाहिए। माला को अंगूठे और अनामिका से दबाकर रखना चाहिए और मध्यमा उंगली से एक मंत्र जपकर एक दाना हथेली के अंदर खींच लेना चाहिए। तर्जनी उंगली से माला का छूना वर्जित माना गया है। मानसिक रूप से पवित्र होने के बाद किसी भी सरल मुद्रा में बैठें जिससे कि वक्ष, गर्दन और सिर एक सीधी रेखा में रहे। मंत्र जप पूरे करने के बाद अंत में माला का सुमेरु माथे से छुआकर माला को किसी पवित्र स्थान में रख देना चाहिए।

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Jyoti Agrawaal

🌼विकारोकेपांच_गधे 🌼

➖✴एक महात्मा कहीं जा रहे थे। रास्ते में वो आराम करने के लिये रुके। एक पेड के नीचे लेट कर सो गये नींद में उन्होंने एक स्वप्न देखा कि… “वे रास्ते में जा रहे हैं ,और उन्हें एक सौदागर मिला, जो पांच गधों पर बड़ी- बड़ी गठरियां लादे हुए जा रहा था। गठरियां बहुत भारी थीं, जिसे गधे बड़ी मुश्किल से ढो पा रहे थे।

➖✴फकीर ने सौदागर से प्रश्न किया- “इन गठरियों में तुमने ऐसी कौन-सी चीजें रखी हैं, जिन्हें ये बेचारे गधे ढो नहीं पा रहे हैं?”

✴सौदागर ने जवाब दिया- “इनमें इंसान के इस्तेमाल की चीजें भरी हैं। उन्हें बेचने मैं बाजार जा रहा हूं।

✴“ फकीर ने पूछा- “अच्छा! कौन-कौन सी चीजें हैं, जरा मैं भी तो जानूं!”

✴सौदागर ने कहा- “यह जो पहला गधा आप देख रहे हैं इस पर अत्याचार की गठरी लदी है।

✴“ फकीर ने पूछा- “भला अत्याचार कौन खरीदेगा?”

✴ सौदागर ने कहा- “इसके खरीदार हैं राजा- महाराजा और सत्ताधारी लोग। काफी ऊंची दर पर बिक्री होती है इसकी।

✴ फकीर ने पूछा-“इस दूसरी गठरी में क्या है?

✴ सौदागर बोला- “यह गठरी अहंकार से लबालब भरी है और इसके खरीदार हैं पंडित और विद्वान।

✴तीसरे गधे पर ईर्ष्या की गठरी लदी है और इसके ग्राहक हैं वे धनवान लोग, जो एक दूसरे की प्रगति को बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसे खरीदने के लिए तो लोगों का तांता लगा रहता है।

✴“ फकीर ने पूछा- “अच्छा! चौथी गठरी में क्या है भाई?”

➖सौदागर ने कहा- “इसमें बेईमानी भरी है और इसके ग्राहक हैं वे कारोबारी, जो बाजार में धोखे से की गई बिक्री से काफी फायदा उठाते हैं। इसलिए बाजार में इसके भी खरीदार तैयार खड़े हैं।“

➖ फकीर ने पूछा- “अंतिम गधे पर क्या लदा है?”

➖सौदागर ने जवाब दिया- “इस गधे पर छल-कपट से भरी गठरी रखी है और इसकी मांग उन औरतों में बहुत ज्यादा है जिनके पास घर में कोई काम-धंधा नहीं हैं और जो छल-कपट का सहारा लेकर दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश करती रहती हैं। वे ही इसकी खरीदार हैं।

“✴ तभी महात्मा की नींद खुल गई।

✴इस सपने में उनके कई प्रश्नों का उत्तर उन्हें मिल गया। सही अर्थों में कहें तो वह सौदागर स्वयं शैतान था, जो संसार में बुराइयाँ फैला रहा था। और उसके शिकार कमजोर मानसिकता के स्वार्थी लोग बनते हैं।

✴शैतान का शिकार बनने से बचने का एक ही उपाय है कि…ईश्वर पर सच्ची आस्था रखते हुवे अपने मन को ईश्वर का मंदिर बनाने का प्रयत्न किया जाय। ईश्वर को इससे मतलब नहीं कि कौन मंदिर गया, या किसने कितने वक्त तक पूजा की,

✴पर उन्हें इससे अवश्य मतलब होगा कि किसने अपने किन अवगुणों का त्याग कर किन गुणों का अपने जीवन में समावेश किया ,और उसके रचे संसार को कितना सजाया-संवारा।

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Sanjay Gupta

👩 कागज✍️ एक बार कहानी अवश्य पढ़ें

राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे। चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए। राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा। राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे। दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी। इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।
सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था। मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं। राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।

घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने। सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था। नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला “ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा” राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लौटी और न नवीन लाने गया।

राधिका की माँ बोली” कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?” “चुप रहो माँ”
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया। बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया। राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही। फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया। नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया ” रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।” गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी। “क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था”

“कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।” सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

“नही चाहिए। वो दस लाख भी नही चाहिए” “क्यूँ?” कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया। “बस यूँ ही” राधिका ने मुँह फेर लिया। “इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।” इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी। राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई। वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर। जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई। सधे अंदाज में बोली “इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?”

“मैंने नही तलाक तुमने दिया” “दस्तखत तो तुमने भी किए” “माफी नही माँग सकते थे?” “मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।” “घर भी आ सकते थे”?

“हिम्मत नही थी?” राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। “अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया”

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी। राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।” फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं। कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से? फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी। कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।

बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।

अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला–” मत जाओ,,, माफ कर दो” शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।

और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।

दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गणेश चतुर्थी ,,,,

Sanjay Gupta

चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए,,,गणेश चतुर्थी के दिन भगवान विनायक का जन्मोत्सव शुरू हो जाएगा। यद्यपि चंद्रमा उनके पिता शिव के मस्तक पर विराजमान हैं, किंतु गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए ,,शास्त्रीय मान्यता है कि इस दिन चंद्रदर्शन से मनुष्य को निश्चय ही मिथ्या कलंक का सामना करना पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार भाद्र शुक्ल चतुर्थी के दिन श्रीकृष्ण ने चंद्रमा का दर्शन कर लिया।,,,फलस्वरूप उन पर भी मणि चुराने का कलंक लगा। कि इस दिन किसी भी सूरत में चंद्रमा का दर्शन करने से बचना चाहिए। शास्त्रों में इसे कलंक चतुर्थी भी कहा गया है,,,चंद्रदर्शन देता मिथ्या कलंक
जब श्री गणेश का जन्म हुआ, तब उनके गज बदन को देख कर चंद्रमा ने हंसी उड़ाई। क्रोध में गणेश जी ने चंद्रमा को शाप दे दिया कि उस दिन से जो भी व्यक्ति चंद्रमा का दर्शन करेगा, उसे कलंक भोगने पड़ेंगे।
चंद्रमा के क्षमा याचना करने पर गणपति ने अपने शाप की अवधि घटाकर केवल अपने जन्मदिवस के लिए कर दी। फलस्वरूप यदि गलती से चंद्रमा का दर्शन गणेश चतुर्थी के दिन हो जाए तो गणेश सहस्त्रनाम का पाठ कर दोष निवारण करना चाहिए।,,,,गणपति की बेडोल काया देख कर चंद्रमा उन पर हंसे थे, इसलिए श्रीगणेश ने उन्हें श्रापित कर दिया था।,,,गणपति के श्राप के कारण चतुर्थी का चंद्रमा दर्शनीय होने के बावजूद दर्शनीय नहीं है। गणेश ने कहा था कि इस दिन जो भी तुम्हारा दर्शन करेगा, उसे कोई न कोई कलंक भुगतना पडे़गा। इस दिन यदि चंद्रदर्शन हो जाए, तो चांदी का चंद्रमा दान करना चाहिए।
द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने चतुर्थी का चांद देख लिया तो उन पर स्यमन्तक मणि की चोरी का झूठा आरोप लगा था।
तुलसीदासजी ने भी रामचरित मानस में बताया है, ‘पर नारी पर लीलार गौसांई, तजहूं चौथ के चंद्र की नांई।’ गणेश पुराण में बताया है कि केवल भाद्रपद शुक्लपक्ष विनायकी गणेश चतुर्थी का चंद्रदर्शन नहीं करना चाहिए। वर्ष भर की अन्य चतुर्थीयों की पूजा चंद्रदर्शन से ही पूर्ण होती है।
गणेशजी ने चंद्रमा को दिया था श्राप,,,,,एक बार गणेशजी कहीं जा रहे थे तो गजमुख व लम्बोदर देखकर चंद्रमा ने उनका मजाक उड़ाया था। तभी गणेशजी ने चंद्रमा को श्राप दिया कि आज से जो भी तुम्हे देखेगा, उस पर मिथ्या ”कलंक”” लगेगा।
यदि अनजाने में चंद्रमा का दर्शन हो जाए, तो इस दोष की शान्ति हेतु श्रीमद् भागवत जी के दशमस्कन्ध के 57 वें अध्याय को पढ़कर स्यमन्तक मणि की कथा सुने।
इसके अलावा इस श्लोक का पाठ भी कर सकते हैं –
सिह: प्रसेनम् अवधीत्, सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्मेषस्यमन्तक: !!

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Sanjay gupta

भगवान शिव का लोकमंगल-रूप

कालकूट सबसे विध्वंसकारी विष है। ऐसा विष जिसके तनिक से स्पर्शमात्र से प्राण नष्ट हो जाते हैं। संसार के समस्त जीव, पशु-पक्षी, कीट- पतंगतक क्षणभर में मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं।

देवों और दानवों ने जब अमृत पाने की इच्छा से समुद्रमंथन किया था तो मंथन में सर्वप्रथम सर्वाधिक विषैला कालकूट विष निकला। कालकूट की भयंकरता से प्राणिमात्र जीवन धारण करने के लिए चिंतित हो उठा।

यदि जीवों में कालकूट ने अपना विषैला प्रभाव दिखाया तो ब्रह्माजी की यह सृष्टि कैसे बचेगी? प्राणी तो क्या देवता तथा दानवों में से कोई भी प्राणी- जलचर, नभचर, पृथ्वी पर सांस लेने वाला कोई भी न बचेगा। यहां तक कि शस्यश्यामला धरा की उर्वरक शाक्ति भी सदा के लिए विनष्ट हो जाएगी।

विष को जहां रखिए वहीं अपना दूषित प्रभाव दिखाता है। जिस पात्र में रखा जाए, वही उसकी ज्वाला से जल-भुनकर गल जाता है। विष को सावधानी से रखना, दूसरों को हानि न हो वे बचे रहें, यह अत्यंत आवश्यक है।

कालकूट की ज्वाला से विश्व के प्राणी झुलसने लगे । सृष्टि की रक्षा के लिए देव-दानव सभी चिंतित हो उठे।

कोई ऐसा उपाय किया जाए कि हलाहत फिर से कहीं दबा पड़ा रहे। संसार में प्रकट न हो । कालकूट का किसी गहन गह्वर में छिपा रहना ही हितकर है। अन्यथा उससे हानि-ही-हानि है।

कहां रखा जाय इस विष को? देव और दानव दोनों में देर तक मंत्रणा होती रही। ऐसा कौन सा स्थान है, जहां विष का असर न हो?

केवल भगवान शिव ही रक्षा कर सकते हैं। रक्षा की भावना से जो भी शंकर की शरण जाता है, शंभु के शांतिमय, मुक्त, क्षमाशील और कल्याणरूप का स्मरण करके सहायता की आर्त पुकार करता है, वह सुरक्षा अवश्य पाता है।

शिव का अर्थ मंगलमय, कुशल-क्षेम और मुक्ति- प्रदाता है। जो प्राणों पर शासन करते हैं, वे शिवात्मा कहलाते हैं। जो वायु को वश में रखते हैं वे सदाशिव शुद्धात्मा कहलाते हैं, जो जीवन को वश में रखते हैं, वे परम शिव कहलाते हैं।

देवताओं और दानवों ने भगवान शंकर की विनती की- ‘शिवस्य तु वशे कालो न कालस्य वशे शिव:।‘ हे शिव! काल आपके अधीन है, आप काल से मुक्त चिदानंद हैं। जिसे मृत्यु को जीतना हो, उसे हे भगवन् ! आपमें स्थित होना चाहिए। आपका मंत्र ही मृत्युंजय है। हे शंकर ! आप त्र्यंबक अर्थात् तीन नेत्रों वाले हैं। ‘सत्यम्, शिवम् और सुंदरम्’ आपके तीन नेत्र हैं। आप कर्म, भाक्ति और ज्ञान को धारण करते हैं। भगवन्! भू:, भुव: और स्व: भूमि, अंतरिक्ष और द्युलोक सर्वत्र आप ही परिव्याप्त हैं। जीवन, मृत्यु और मुक्ति तीनों ही आपके नेत्र हैं। आप बालचंद्र, गंगा और शक्ति तीनों ही धारण करते हैं। अत: कालकूट की दाहक ज्वाला से प्राणि मात्र की रक्षा कीजिए। यदि आपने रक्षा न की तो यह विष तीनों लोकों को भस्म करने के लिए बढ़ रहा है।

उस विषम स्थिति में सबके हाथ विनती में शिव के आगे जुड़े हुए थे। सबने एकाग्र होकर बड़ी श्रद्धापूर्वक भगवान शिव का ध्यान किया। शिव का ध्यान सदा ही कल्याणकारी होता है-

न हि कल्याणकृत्ककिश्चद्दुर्गतिं तात गच्छाति।।
गीता ६।४०

‘हे तात! कल्याणकारी कर्म करने वाले की कभी दुर्गति नहीं होती।‘

भक्तों की आर्त पुकार सुनकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने दुष्ट कालकूट की प्राणि मात्र को जलाने वाली ज्वालाएं देखीं। वे सृष्टि का अंत आते देखकर अचानक चिंतित हो उठे !

सोचने लगे ‘यदि सृष्टि में मानव- समुदाय में कहीं भी यह विष- कलह- क्लेश रूप विष, मतभेद, राग- द्वेष, वाद-विवाद, संघर्ष, दोष- दुर्गुण आदि रहे तो प्राणिमात्र अशांत होकर जलने लगेगा। इसे सुरक्षित रखने को ऐसी जगह होनी चाहिए कि यह किसी को नुकसान न पहुंचा सके। सभी जीव सुरक्षित रहें।‘ ऐसा निरामद सुरक्षित स्थान मेरा, स्वयं मेरा ही कण्ड- प्रदेश है। यदि हलाहत पेट में चला गया तो मृत्यु निश्चित है, बाहर रह गया तो सारी सृष्टि ही भस्म हो जाएगी। ‘फिर यह कहां रहे?’

उन्होंने एक ही आचमन में लोक-संहारी विष को अपने गले में धारण कर लिया। तभी से विष के प्रभाव से उनका कण्ठ नीले रंग का हो गया, वे नीलकण्ठ कहलाने लगे और देवों के भी देव महादेव बन गए। हमारे जीवन में नित्य नये-नये विष-विकार राग-द्वेष, कलह, झगड़े होते रहते हैं, किंतु शिवभक्त उनसे अशांत नहीं होते। विवेकपूर्ण निर्णय लेते हैं और शिव की पराभक्ति से उनके परम धाम को प्राप्त करते हैं।

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Sanjay Gupta

आखिर क्या था रहस्य जो कृष्ण ने शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा कर दिए थे?????

श्रीकृष्ण ने प्रण किया था कि मैं शिशुपाल के 100 अपमान क्षमा करूंगा अर्थात उसे सुधरने के 100 मौके दूंगा। लेकिन यह प्रण क्यों किया था? इसके लिए पढ़िये पुरी कथा।

कौन था शिशुपाल ?????

शिशुपाल 3 जन्मों से श्रीकृष्ण से बैर-भाव रखे हुआ था। इस जन्म में भी वह विष्णु के पीछे पड़ गया। दरअसल, शिशुपाल भगवान विष्णु का वही द्वारपाल था जिसे कि सनकादि मुनियों ने शाप दिया था। वे जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा अंतिम तीसरे जन्म में कंस और शिशुपाल बने।

शिशुपाल क्यों करता था अपमान?

क्योंकि शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था और रुक्मणि के माता-पिता रुक्मणि का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्म ने शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। कृष्ण रुक्मणि का हरण कर ले आए थे।

दूसरा कारण यह कि चेदि के यादव वंशी राजा शिशुपाल कंस और जरासंध मित्र था। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को घेरने के लिए जरासंध का हर मौके पर साथ दिया था। शिशुपाल को यह भी मालूम था कि श्रीकृष्ण मुझे 100 अपराध करने तक नहीं मारेंगे।

क्यों श्रीकृष्ण ने 100 बार क्षमा करने का प्रण लिया था?

शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था।

माता-पिता उससे घबराकर उसका परित्याग कर देना चाहते थे, लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा।

इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया। अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया।

इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया।

शिशुपाल का वध : – एक बार की बात है कि जरासंघ का वध करने के बाद श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम इन्द्रप्रस्थ लौट आए, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारी करवा दी। उस यज्ञ के ऋतिज आचार्य होते थे।

यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेद व्यास, भारद्वाज, सुनत्तु, गौतम, असित, वशिष्ठ, च्यवन, कण्डव, मैत्रेय, कवष, जित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिन, क्रतु, पैल, पाराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतहोत्र, मधुद्वंदा, वीरसेन, अकृतब्रण आदि सभी को आमंत्रित किया। इसके अलावा सभी देशों के राजाधिराज को भी बुलाया गया।

यज्ञ पूजा के बाद यज्ञ की शुरुआत के लिए समस्त सभासदों में इस विषय पर विचार होने लगा कि सबसे पहले किस देवता की पूजा की जाए? तब सहदेवजी उठकर बोले- श्रीकष्ण ही सभी के देव हैं जिन्हें ब्रह्मा और शंकर भी पूजते हैं, उन्हीं को सबसे पहले पूजा जाए।

पांडु पुत्र सहदेव के वचन सुनकर सभी ने उनके कथन की प्रशंसा की। भीष्म पितामह ने स्वयं अनुमोदन करते हुए सहदेव का समर्थन किया। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने शास्त्रोक्त विधि से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आरंभ किया।

इस कार्य से चेदिराज शिशुपाल अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘हे सभासदों! मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कालवश सभी की मति मारी गई है।

क्या इस बालक सहदेव से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति इस सभा में नहीं है, जो इस बालक की हां में हां मिलाकर अयोग्य व्यक्ति की पूजा स्वीकार कर ली गई है? क्या इस कृष्ण से आयु, बल तथा बुद्धि में और कोई भी बड़ा नहीं है? क्या इस गाय चराने वाल ग्वाले के समान कोई और यहां नहीं है? क्या कौआ हविश्यान्न ले सकता है? क्या गीदड़ सिंह का भाग प्राप्त कर सकता है? न इसका कोई कुल है, न जाति, न ही इसका कोई वर्ण है।

राजा ययाति के शाप के कारण राजवंशियों ने इस यदुवंश को वैसे ही बहिष्कृत कर रखा है। यह जरासंघ के डर से मथुरा त्यागकर समुद्र में जा छिपा था। भला यह किस प्रकार अग्रपूजा पाने का अधिकारी है?’

इस प्रकार शिशुपाल श्रीकृष्ण को अपमानित कर गाली देने लगा। यह सुनकर शिशुपाल को मार डालने के लिए पांडव, मत्स्य, केकय और सृचयवर्षा नरपति क्रोधित होकर हाथों में हथियार ले उठ खड़े हुए, किंतु श्रीकृष्ण ने उन सभी को रोक दिया। वहां वाद-विवाद होने लगा, परंतु शिशुपाल को इससे कोई घबराहट न हुई। कृष्ण ने सभी को शांत कर यज्ञ कार्य शुरू करने को कहा।

किंतु शिशुपाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने फिर से श्रीकृष्ण को ललकारते हुए गाली दी, तब श्रीकृष्ण ने गरजते हुए कहा, ‘बस शिशुपाल! मैंने तेरे एक सौ अपशब्दों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की थी इसीलिए अब तक तेरे प्राण बचे रहे। अब तक सौ पूरे हो चुके हैं। अभी भी तुम खुद को बचा सकने में सक्षम हो। शांत होकर यहां से चले जाओ या चुप बैठ जाएं, इसी में तुम्हारी भलाई है।’

लेकिन शिशुपाल पर श्रीकृष्ण की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ अतः उसने काल के वश होकर अपनी तलवार निकालते हुए श्रीकृष्ण को फिर से गाली दी। शिशुपाल के मुख से अपशब्द के निकलते ही श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चला दिया और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर कटकर गिर गया। उसके शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गई।