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विपिन खुराना

वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में कैसे बदल गया?

जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते। – मनु स्मृतिअर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज बनता है। मनुस्मृति का वचन है- ‘विप्राणं ज्ञानतो ज्येष्ठम् क्षत्रियाणं तु वीर्यतः। ’ अर्थात् ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ज्ञान से है तथा क्षत्रिय की बल वीर्य से। जावालि का पुत्र सत्यकाम जाबालि अज्ञात वर्ण होते हुए भी सत्यवक्ता होने के कारण ब्रह्म-विद्या का अधिकारी समझा गया। वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में ७ द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसमें जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न भिन्न जगहर पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था। जाति को आज अलग अर्थों में लिया जाता है। जाति, समाज या संप्रदाय पर अध्ययन करने वाले जानते हैं कि सभी का अलग-अलग अर्थ होता है। आज हम जिसे जातिवाद कहते हैं वह दुनिया के सभी धर्मों में विद्यमान है। ऊँच और नीच की भावना सभी धर्मों में विद्यमान है।
यहां यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि गैर-हिन्दू धर्मों में कौन-सा समाज खुद को ऊँचा मानता है। तथाकथित जातिवादी व्यवस्था की आड़ में सनातन हिंदू धर्म को तोड़ने का कुचक्र बढ़ा है। सैकड़ों वर्ष की गुलामी के काल में जातिवाद इतना नहीं था जितना की आजादी के इन ७० वर्षों में देखने को मिलता है। इसके पीछे कारण भी है। एक अंग्रेज लेखक ने सही कहा था कि जिन लोगों के हाथों में आप सत्ता सौंप रहे हैं, वे मात्र ३०-४० वर्ष में सब कुछ चौपट करके रख देंगे। आज हालत यही है। खैर, हम आपको बताना चाहते हैं कि किस तरह ‘रंग’ बन गया जातिवाद का ‘जहर’। पहले हम सुर और असुर, फिर वैष्णव और शैव में बदल गए। फिर ब्राह्मण और शूद्र में बदल कर धर्म का नाश कर दिया। इस दौरान लोगों ने अपने अपने वंश चलाएं। फिर ये वंश समाज में बदल गए। उक्त सभी का धर्म से कोई लेना देना नहीं है। वेदों में जहां धर्म की बातें हैं वहीं उक्त काल की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख भी है। धर्म ने नहीं अपने हितों की रक्षा के लिए राजा और पुरोहितों ने बदला समाज। जैसा कि आज के राजनीतिज्ञ और तथाकथित स्वयंभू संत कर रहे हैं। जहां तक सवाल जाति का है तो जातियों के प्रकार अलग होते थे जिनका सनातन धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। जातियां होती थी द्रविड़, मंगोल, शक, हूण, कुशाण आदि। आर्य जाति नहीं थी बल्कि उन लोगों का समूह था जो सामुदायिक और कबीलाई संस्कृति से निकलकर सभ्य होने के प्रत्येक उपक्रम में शामिल थे और जो सिर्फ वेद पर ही कायम थे। लेकिन यह भी सच है कि उस काल में लोग खुद को आर्य नहीं कहते थे। वे अपने नाम के आगे आर्य नहीं लगाते थे। वे सभी यदु, कुरु, पुरु, द्रहु, आनव, अत्रि, कश्यप, भृगु, मारीच, स्वायंभुव, अंगिरस, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, विश्‍वकर्मा, वशिष्ठ, गर्ग, वैवस्वत आदि हजारों हिमालय पुत्रों की संतानें हैं। उल्लेखनी है कि उक्त काल के ऋषियों के नाम के आगे वर्तमान में लिखे जाने वाले पंडित, चतुर्वेदी, त्रिपाठी, सिंह, राव, गुप्ता, नंबूदरी आदि जैसे जातिसूचक शब्द नहीं होते थे। ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।

वर्ण का अर्थ रंग : रंगों का सफर कर्म से होकर आज की तथाकथित जाति पर आकर पूर्णत: विकृत हो चला है। अब इसके अर्थ का अनर्थ हो गया है। वैदिक काल में ऐसी मान्यता थी कि जो श्वेत रंग का है वह ब्राह्मण, जो लाल रंग का है वह क्षत्रिय, जो काले रंग का है वह क्षुद्र और जो मिश्रित रंग का होता था उसे वैश्य माना जाता था। यह विभाजन लोगों की पहचान और मनोविज्ञान के आधार पर किए जाते थे। इसी आधार पर कैलाश पर्वत की चारों दिशाओं में लोगों का अलग-अलग समूह फैला हुआ था। काले रंग का व्यक्ति भी आर्य होता था और श्वेत रंग का भी। विदेशों में तो सिर्फ गोरे और काले का भेद है किंतु भारत देश में चार तरह के वर्ण (रंग) माने जाते थे। गौरतलब है कि बहुत प्राचीनकाल में धरती का कुछ ही भाग जल में डूबा हुआ नहीं था और वह भाग था हिमालय के आसपास का। बाकी संपूर्ण धरती जल में डूबी हुई थी।
रक्त की शुद्धता : श्वेत लोगों का समूह श्वेत लोगों में ही रोटी और बेटी का संबंध रखता था। पहले रंग, नाक-नक्क्ष और भाषा को लेकर शुद्धता बरती जाती थी। आज भी ऐसा होता है। उस काल में किसी समुदाय, कबीले, समाज या अन्य भाषा का व्यक्ति दूसरे कबीले की स्त्री से विवाह कर लेता था तो उसे उस समुदाय, कबीले, समाज या भाषायी लोगों के समूह से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उसी तरह जो कोई श्वेत रंग का व्यक्ति काले रंग की लड़की से विवाह कर लेता था तो उसे उक्त समूह के लोग उसे बहिष्कृत कर देते थे या उसका तिरस्कार करते थे। कालांतर में बहिष्कृत लोगों का भी अलग समूह और समाज बनने लगा। लेकिन इस तरह के भेदभाव का संबंध धर्म से कतई नहीं माना जा सकता। यह समाजिक चलन, मान्यता और परम्पराओं का हिस्सा हैं। जैसा कि आज लोग अनोखे विवाह करने लगे हैं…गे या लेस्बियन। क्या इस तरह के विवाह को धर्म का हिस्सा माने। लोग या जनता बनाते हैं समाज और जाति और बदलते भी वही है।

रंग बना कर्म: कालांतर में वर्ण अर्थात रंग का अर्थ बदलकर कर्म होने लगा। कहना चाहिए की रंग के कारण उत्पन्न हुए तनाव को समाप्त करने के लिए उस काल के अग्रजों ने इसे कर्म आधारित स्थापित करने का कार्य किया। माना जाता है कि राजा मनु ने अपनी राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए समाज में हजारों तरह की बिखरी जातियों को चार तरह के कर्म सौंप दिए। राज्य में पुरोहितों, क्षत्रियों, वैश्यों और दासों की नियुक्त होती थी। जो भी व्यक्ति जिस भी योग्यता का होता था उसके लिए उस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था और योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो जाती थी। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चर्तुवर्णयम् माया श्रीष्टाम् गुणकर्म विभागसा’ अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर मेरे द्वारा समाज को चार वर्णों में विभक्त किया गया है। स्मृति काल में कार्य के आधार पर लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या दास कहा जाने लगा। वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञान देने वाले को ब्राह्मण, क्षेत्र का प्रबंधन और रक्षा करने वाले को क्षत्रिय, राज्य की अर्थव्यवस्था व व्यापार को संचालित करने वाले को वैश्य और राज्य के अन्य कार्यो में दक्ष व्यक्ति को दास अर्थात सेवक कहा जाने लगा। कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार कुछ भी हो सकता था। जैसा कि आज बनता है कोई सोल्जर्स, कोई अर्थशास्त्री, कोई व्यापारी और कोई शिक्षक। योग्यता के आधार पर इस तरह धीरे-धीरे एक ही तरह के कार्य करने वालों का समूह बनने लगा (जैसा कि आजकल डॉक्टरों, वकीलों आदि का समूह या संगठन होता है) और बाद में यही समूह अपने हितों की रक्षा के लिए समाज में बदलकर अपने ही समाज से रोटी और बेटी का व्यवहार करने लगा। उक्त समाज को उनके कार्य के आधार पर पुकारा जाने लगा। जैसे की कपड़े सिलने वाले को दर्जी, कपड़े धोने वाले को धोबी, बाल काटने वाले को नाई, शास्त्र पढ़ाने वाले को शास्त्री, पुरोहिताई करने वाले को पुरोहित आदि।
प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार के पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता।

कर्म कब बना जाति: ऐसे कई समाज निर्मित होते गए जिन्होंने स्वयं को दूसरे समाज से अलग करने और दिखने के लिए नई परम्पराएं निर्मित कर ली। जैसे कि सभी ने अपने-अपने कुल देवी-देवता अलग कर लिए। अपने-अपने रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित करने लगे, जिन पर स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रभाव ही ज्यादा देखने को मिलता है। उक्त सभी की परंपरा और विश्वास का सनातन हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं। स्मृति के काल में कार्य का विभाजन करने हेतु वर्ण व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया था। जो जैसा कार्य करना जानता हो, वह वैसा ही कार्य करें, जैसा की उसके गुण और स्वभाव में है तब उसे उक्त वर्ण में शामिल समझा जाए। आज यह व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदलकर विकृत हो चली है।
उदाहरणार्थ : चार मंजिला भवन में रह रहे लोगों के लिए ऊपर या नीचे आने जाने के लिए सीढ़ियां हुआ करती थी। यदि कोई व्यक्ति अपने क्षत्रिय कर्म छोड़कर ब्राह्मण होना चाहे तो हो जाता था जैसा कि विश्वामित्र ने किया। कोई ब्राह्मण नीचे उतरकर क्षत्रिय बनना चाहे तो बन सकता था जैसा कि परशुराम ने किया। इसी तरह जबाला का पुत्र भी दास होकर भी ब्राह्मण बन गया। ऐसे कई उदाहरण है। गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार ही कर्म का निर्णय होना होता है, जिसे जाति मान लिया गया है। वर्ण का अर्थ समाज या जाति से नहीं वर्ण का अर्थ स्वभाव और रंग से माना जाता रहा है। लेकिन अब यह व्यवस्था विकृत हो चली है और इसके समाप्त हो जाने में ही हिन्दू धर्म की भलाई है। अगर ऋग्वेद की ऋचाओं व गीता के श्लोकों को गौर से पढ़ा जाए तो साफ परिलक्षित होता है कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कोई आधार नहीं है। सनातन हिंदू धर्म मानव के बीच किसी भी प्रकार के भेद को नहीं मानता। उपनाम, गोत्र, जाति आदि यह सभी कई हजार वर्ष की परंपरा का परिणाम है। कुछ व्यक्ति योग्यता या शुद्धाचरण न होते हुए भी स्वयं को ऊंचा या ऊंची जाति का और पवित्र मानने लगे हैं और कुछ अपने को नीच और अपवित्र समझने लगे हैं। बाद में इस समझ को क्रमश: बढ़ावा मिला मुगल काल, अंग्रेज काल और फिर भारत की आजादी के बाद भारतीय राजनीति के काल में जो अब विराट रूप ले चुका है। धर्मशास्त्रों में क्या लिखा है यह कोई जानने का प्रयास नहीं करता और मंत्रों तथा सूत्रों की मनमानी व्याख्या करता रहता है।

इस तरह बदला समाज को: प्राचीन काल में धर्म से संचालित होता था राज्य। हमारे धर्म ग्रंथ लिखने वाले और समाज को रचने वाले ऋषि-मुनी जब विदा हो गए तब राजा और पुरोहितों में सांठगाठ से राज्य का शासन चलने लगा। धीरे-धीरे अनुयायियों की फौज ने धर्म को बदल दिया। बौद्ध काल में जब यह व्यवस्था विकृ हो चली तो इस नए सिरे से स्थापित करने के लिए कई संतों और समाज सुधारकों ने प्रयास किया और समाज की नए सिरे से रचना की। हर्षवर्धन के जाने के बाद जब भारत का पतन होना शुरू हुआ और विदेशी आक्रांताओं ने भारत में घुसकर कई भूभाग कर कब्जा कर लिया तब यह पुण्य भूमि एक युद्ध और अराजक स्थिति में बदल गई। दहशत और डर के कारण लोग खुद को बदलते रहे। लंबे समय तक अराजक स्थिति बनी रही। मुगल काल में हिन्दू ग्रंथों पुराणों आदि के साथ छेड़खानी की गई। अयोध्या, मथुरा, काशी और वाराणसी के पुरोहितों आदि को मुगलों के अनुसार धर्म को संचालित करना होता था, क्योंकि हिन्दुओं के धर्म के यही असली गढ़ थे। बाद में अंग्रेजों ने भारत के इतिहास का सत्यानाश कर दिया। फिर अंग्रेज जिन लोगों के हाथों में सत्ता दे गए थे वे सभी मूर्ख वामपंथी और अंग्रेजोँ के पिट्ठू थे, जिन्होंने ३० से ४० वर्ष में भारत को बर्बाद ही कर दिया।

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