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#एकउदाहरणकिनेहरूकोकिसतरहमहानबनायागया
हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या ढाई लाख के करीब ही रहती है। लेकिन इस वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले भक़्तों की संख्या ने नया रिकॉर्ड बना दिया।
बालटाल और पहलगाम मार्गों के जरिए गत 28 जून से शुरू हुई अमरनाथ तीर्थयात्रा 26 अगस्त को सम्पन्न हुई। इस दौरान 2,85,006 श्रद्धालुओं ने बाबा अमरनाथ के दर्शन किये। इनमें बहुत बड़ी संख्या महिलाओं बुजुर्गों और बच्चों की थी।
यह खबर पढ़ने के बाद मुझे कुछ याद आ गया। बात मेरे बचपन की है।
मुझे अब ठीक से याद नहीं कि वो कक्षा 7 की किताब थी या कक्षा 8 की। लेकिन हिन्दी विषय की उस किताब के पाठ्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गयी कहानी #मेरी
अमरनाथ_यात्रा हम बच्चों को पढ़ाई जाती थी। उस कहानी का धर्म, आस्था या बाबा अमरनाथ से कोई लेनादेना नहीं था। इसके बजाय उस कहानी में ऑक्सीजन के सिलेंडरों, उनमें खत्म होती ऑक्सीजन का सनसनीखेज जिक्र करके हम बच्चों के दिमाग में यह ठूंसा जाता था कि अमरनाथ यात्रा जानलेवा जोखिमों से भरपूर अत्यन्त दुर्गम यात्रा है और जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जान जोखिम में डालकर इतनी खतरनाक अमरनाथ यात्रा को पूरा किया। कुल मिलाकर उस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह सिखाना/पढ़ाना/समझाना था कि जवाहरलाल नेहरू केवल राजनेता ही नहीं बल्कि बहुत जांबाज़ और बहादुर व्यक्ति भी था।
ध्यान रहे कि आज भी बालटाल और पहलगाम के बाद अमरनाथ गुफा तक की यात्रा दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर ही पूर्ण की जाती है। नेहरू ने भी बालटाल और पहलगाम के बाद यह यात्रा पैदल ही की थी। सैकड़ों वर्ष से वो रास्ते ज्यों के त्यों हैं। अमरनाथ गुफा जिस स्थान पर है उसकी ऊंचाई घटी नहीं है। लाखों की संख्या में महिलाएं बुजुर्ग और बच्चे भी प्रतिवर्ष यह यात्रा करते हैं, वह भी बिना किसी ऑक्सीजन सिलेण्डर के।
अतः बचपन में सरकारी पाठ्य पुस्तक में पढ़ी गयी नेहरू की अमरनाथ यात्रा की वह कहानी याद आती है तो समझ में आता है कि आज़ादी के बाद किसतरह नेहरू परिवार को महान महामानव सिद्ध करने का सुनियोजित षड्यंत्र इस देश में दशकों तक चला। उस षड़यंत्र का शिकार स्कूली बच्चों को बनाया गया।

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