Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

स्वार्थी जीवन मृत्यु से बुरा है।

यूनान के संत सुकरात कहा कहते थे कि “यह पेड़ और आरण्य मुझे कुछ नहीं सिखा सकते, असली शिक्षा तो मुझे सड़कों पर मिलती है।” उनका तात्पर्य यह था कि दुनिया से अलग होकर एकान्त जीवन बिताने से न तो परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है और न आत्मोन्नति हो सकती है। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए संत पुरुषों को समाज में भरे बुरे लोगों के बीच में अपना कार्य जारी रखना चाहिये।

संत सुकरात जीवन भर ऐसी ही तपस्या करते रहे। वे गलियों में, चौराहों पर, हाट बाजारों में, दुकानों और उत्सवों में बिना बुलाये पहुँच जाते और बिना पूछे भीड़ को संबोधित करके अपना व्याख्यान शुरू कर देते। उनका प्रचार तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और अनीतिपूर्ण शासन के विरुद्ध होता, उनके अन्तःकरण में सत्य था। सत्य में बड़ी प्रभावशाली शक्ति होती है। उससे अनायास ही लोग प्रभावित होते हैं।

उस देश के नवयुवकों पर सुकरात का असाधारण असर पड़ा, जिससे प्राचीन पंथियों और अनीतिपोषक शासकों के दिल हिलने लगे, क्योंकि उनके चलते हुए व्यापार में बाधा आने की संभावना थी। सुकरात को पकड़ लिया गया, उन पर मुकदमा चला जिसमें दो इल्जाम लगाये गए।
1. प्राचीन प्रथाओं का खंडन करना,
2. नवयुवकों को बरगलाना। इन दोनों अपराधों में विचार करने के लिये न्याय सभा बैठी, सभासदों में से 220 की राय छोड़ देने की थी और 281 की राय मृत्यु दंड देने की हुई। इस प्रकार बहुमत से मृत्यु का फैसला हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि वह देश छोड़ कर बाहर चले जायँ या व्याख्यान देना, विरोध करना बन्द कर दे तो मृत्यु की आज्ञा रद्द कर दी जायेगी।

सुकरात ने मुकदमे की सफाई देते हुए कहा- ”कानून मुझे दोषी ठहराता है। तो भी मैं अपने अन्तरात्मा के सामने निर्दोष हूँ। दोनों अपराध जो मेरे ऊपर लगाये गये हैं, मैं स्वीकार करता हूँ कि वे दोनों ही मैंने किये हैं और आगे भी करूंगा। एकान्त सेवन करके मुर्दे जैसा बन जाने का निन्दित कार्य कोई भी सच्चा संत नहीं कर सकता। यदि मैं घोर स्वार्थी या अकर्मण्य बन कर अपने को समाज से पृथक कर लूँ और संसार की भलाई की तीव्र भावनाएँ जो मेरे हृदय में उठ रही हैं, उन्हें कुचल डालूँ तो मैं ब्रह्म हत्यारा कहा जाऊंगा और नरक में भी मुझे स्थान न मिलेगा। मैं एकान्तवासी, अकर्मण्य और लोक सेवा से विमुख अनुदार जीवन को बिताना मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक समझूंगा। मैं लोक सेवा का कार्य बन्द नहीं कर सकता, न्याय सभा के सामने मैं मृत्यु को अपनाने के लिये निर्भयतापूर्वक खड़ा हुआ हूँ।”

संसार का उज्ज्वल रत्न, महान दार्शनिक संत सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा। उसने खुशी से विष को होठों से लगाया और कहा- ”स्वार्थी एवं अनुपयोगी जीवन बिताने की अपेक्षा यह प्याला मेरे लिये कम दुखदायी है।” आज उस महात्मा का शरीर इस लोक में नहीं है, पर लोक सेवा वर्ग का महान् उपदेश उसकी आत्मा सर्वत्र गुँजित कर रही है।

अखण्ड ज्योति

Posted in श्री कृष्णा

हे आनंद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
नन्द के आनंद भयो जय कनैया लाल की

हे ब्रज में आनंद भयो जय यशोदा लाल की
नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

हे आनंद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
गोकुल के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

जय यशोदा लाल की जय हो नन्द लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

जय हो नन्द लाल की जय यशोदा लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

हे आनंद उमंग भयो जय कन्हैया लाल की

हे कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

हे गौने चराने आये जय हो पशुपाल की
नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

आनंद से बोलो सब जय हो ब्रज लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

जय हो ब्रज लाल की पावन प्रतिपाल की
हे नन्द के आनंद भयो जय हो नन्द लाल की

जय श्री कृष्ण

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

विपिन खुराना

वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में कैसे बदल गया?

जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते। – मनु स्मृतिअर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज बनता है। मनुस्मृति का वचन है- ‘विप्राणं ज्ञानतो ज्येष्ठम् क्षत्रियाणं तु वीर्यतः। ’ अर्थात् ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ज्ञान से है तथा क्षत्रिय की बल वीर्य से। जावालि का पुत्र सत्यकाम जाबालि अज्ञात वर्ण होते हुए भी सत्यवक्ता होने के कारण ब्रह्म-विद्या का अधिकारी समझा गया। वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में ७ द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसमें जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न भिन्न जगहर पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था। जाति को आज अलग अर्थों में लिया जाता है। जाति, समाज या संप्रदाय पर अध्ययन करने वाले जानते हैं कि सभी का अलग-अलग अर्थ होता है। आज हम जिसे जातिवाद कहते हैं वह दुनिया के सभी धर्मों में विद्यमान है। ऊँच और नीच की भावना सभी धर्मों में विद्यमान है।
यहां यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि गैर-हिन्दू धर्मों में कौन-सा समाज खुद को ऊँचा मानता है। तथाकथित जातिवादी व्यवस्था की आड़ में सनातन हिंदू धर्म को तोड़ने का कुचक्र बढ़ा है। सैकड़ों वर्ष की गुलामी के काल में जातिवाद इतना नहीं था जितना की आजादी के इन ७० वर्षों में देखने को मिलता है। इसके पीछे कारण भी है। एक अंग्रेज लेखक ने सही कहा था कि जिन लोगों के हाथों में आप सत्ता सौंप रहे हैं, वे मात्र ३०-४० वर्ष में सब कुछ चौपट करके रख देंगे। आज हालत यही है। खैर, हम आपको बताना चाहते हैं कि किस तरह ‘रंग’ बन गया जातिवाद का ‘जहर’। पहले हम सुर और असुर, फिर वैष्णव और शैव में बदल गए। फिर ब्राह्मण और शूद्र में बदल कर धर्म का नाश कर दिया। इस दौरान लोगों ने अपने अपने वंश चलाएं। फिर ये वंश समाज में बदल गए। उक्त सभी का धर्म से कोई लेना देना नहीं है। वेदों में जहां धर्म की बातें हैं वहीं उक्त काल की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख भी है। धर्म ने नहीं अपने हितों की रक्षा के लिए राजा और पुरोहितों ने बदला समाज। जैसा कि आज के राजनीतिज्ञ और तथाकथित स्वयंभू संत कर रहे हैं। जहां तक सवाल जाति का है तो जातियों के प्रकार अलग होते थे जिनका सनातन धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। जातियां होती थी द्रविड़, मंगोल, शक, हूण, कुशाण आदि। आर्य जाति नहीं थी बल्कि उन लोगों का समूह था जो सामुदायिक और कबीलाई संस्कृति से निकलकर सभ्य होने के प्रत्येक उपक्रम में शामिल थे और जो सिर्फ वेद पर ही कायम थे। लेकिन यह भी सच है कि उस काल में लोग खुद को आर्य नहीं कहते थे। वे अपने नाम के आगे आर्य नहीं लगाते थे। वे सभी यदु, कुरु, पुरु, द्रहु, आनव, अत्रि, कश्यप, भृगु, मारीच, स्वायंभुव, अंगिरस, भारद्वाज, गौतम, अगस्त्य, विश्‍वकर्मा, वशिष्ठ, गर्ग, वैवस्वत आदि हजारों हिमालय पुत्रों की संतानें हैं। उल्लेखनी है कि उक्त काल के ऋषियों के नाम के आगे वर्तमान में लिखे जाने वाले पंडित, चतुर्वेदी, त्रिपाठी, सिंह, राव, गुप्ता, नंबूदरी आदि जैसे जातिसूचक शब्द नहीं होते थे। ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।

वर्ण का अर्थ रंग : रंगों का सफर कर्म से होकर आज की तथाकथित जाति पर आकर पूर्णत: विकृत हो चला है। अब इसके अर्थ का अनर्थ हो गया है। वैदिक काल में ऐसी मान्यता थी कि जो श्वेत रंग का है वह ब्राह्मण, जो लाल रंग का है वह क्षत्रिय, जो काले रंग का है वह क्षुद्र और जो मिश्रित रंग का होता था उसे वैश्य माना जाता था। यह विभाजन लोगों की पहचान और मनोविज्ञान के आधार पर किए जाते थे। इसी आधार पर कैलाश पर्वत की चारों दिशाओं में लोगों का अलग-अलग समूह फैला हुआ था। काले रंग का व्यक्ति भी आर्य होता था और श्वेत रंग का भी। विदेशों में तो सिर्फ गोरे और काले का भेद है किंतु भारत देश में चार तरह के वर्ण (रंग) माने जाते थे। गौरतलब है कि बहुत प्राचीनकाल में धरती का कुछ ही भाग जल में डूबा हुआ नहीं था और वह भाग था हिमालय के आसपास का। बाकी संपूर्ण धरती जल में डूबी हुई थी।
रक्त की शुद्धता : श्वेत लोगों का समूह श्वेत लोगों में ही रोटी और बेटी का संबंध रखता था। पहले रंग, नाक-नक्क्ष और भाषा को लेकर शुद्धता बरती जाती थी। आज भी ऐसा होता है। उस काल में किसी समुदाय, कबीले, समाज या अन्य भाषा का व्यक्ति दूसरे कबीले की स्त्री से विवाह कर लेता था तो उसे उस समुदाय, कबीले, समाज या भाषायी लोगों के समूह से बहिष्कृत कर दिया जाता था। उसी तरह जो कोई श्वेत रंग का व्यक्ति काले रंग की लड़की से विवाह कर लेता था तो उसे उक्त समूह के लोग उसे बहिष्कृत कर देते थे या उसका तिरस्कार करते थे। कालांतर में बहिष्कृत लोगों का भी अलग समूह और समाज बनने लगा। लेकिन इस तरह के भेदभाव का संबंध धर्म से कतई नहीं माना जा सकता। यह समाजिक चलन, मान्यता और परम्पराओं का हिस्सा हैं। जैसा कि आज लोग अनोखे विवाह करने लगे हैं…गे या लेस्बियन। क्या इस तरह के विवाह को धर्म का हिस्सा माने। लोग या जनता बनाते हैं समाज और जाति और बदलते भी वही है।

रंग बना कर्म: कालांतर में वर्ण अर्थात रंग का अर्थ बदलकर कर्म होने लगा। कहना चाहिए की रंग के कारण उत्पन्न हुए तनाव को समाप्त करने के लिए उस काल के अग्रजों ने इसे कर्म आधारित स्थापित करने का कार्य किया। माना जाता है कि राजा मनु ने अपनी राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए समाज में हजारों तरह की बिखरी जातियों को चार तरह के कर्म सौंप दिए। राज्य में पुरोहितों, क्षत्रियों, वैश्यों और दासों की नियुक्त होती थी। जो भी व्यक्ति जिस भी योग्यता का होता था उसके लिए उस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था और योग्यता के आधार पर नियुक्ति हो जाती थी। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चर्तुवर्णयम् माया श्रीष्टाम् गुणकर्म विभागसा’ अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर मेरे द्वारा समाज को चार वर्णों में विभक्त किया गया है। स्मृति काल में कार्य के आधार पर लोगों को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या दास कहा जाने लगा। वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ज्ञान देने वाले को ब्राह्मण, क्षेत्र का प्रबंधन और रक्षा करने वाले को क्षत्रिय, राज्य की अर्थव्यवस्था व व्यापार को संचालित करने वाले को वैश्य और राज्य के अन्य कार्यो में दक्ष व्यक्ति को दास अर्थात सेवक कहा जाने लगा। कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता अनुसार कुछ भी हो सकता था। जैसा कि आज बनता है कोई सोल्जर्स, कोई अर्थशास्त्री, कोई व्यापारी और कोई शिक्षक। योग्यता के आधार पर इस तरह धीरे-धीरे एक ही तरह के कार्य करने वालों का समूह बनने लगा (जैसा कि आजकल डॉक्टरों, वकीलों आदि का समूह या संगठन होता है) और बाद में यही समूह अपने हितों की रक्षा के लिए समाज में बदलकर अपने ही समाज से रोटी और बेटी का व्यवहार करने लगा। उक्त समाज को उनके कार्य के आधार पर पुकारा जाने लगा। जैसे की कपड़े सिलने वाले को दर्जी, कपड़े धोने वाले को धोबी, बाल काटने वाले को नाई, शास्त्र पढ़ाने वाले को शास्त्री, पुरोहिताई करने वाले को पुरोहित आदि।
प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार के पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता।

कर्म कब बना जाति: ऐसे कई समाज निर्मित होते गए जिन्होंने स्वयं को दूसरे समाज से अलग करने और दिखने के लिए नई परम्पराएं निर्मित कर ली। जैसे कि सभी ने अपने-अपने कुल देवी-देवता अलग कर लिए। अपने-अपने रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित करने लगे, जिन पर स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रभाव ही ज्यादा देखने को मिलता है। उक्त सभी की परंपरा और विश्वास का सनातन हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं। स्मृति के काल में कार्य का विभाजन करने हेतु वर्ण व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया था। जो जैसा कार्य करना जानता हो, वह वैसा ही कार्य करें, जैसा की उसके गुण और स्वभाव में है तब उसे उक्त वर्ण में शामिल समझा जाए। आज यह व्यवस्था जाति व्यवस्था में बदलकर विकृत हो चली है।
उदाहरणार्थ : चार मंजिला भवन में रह रहे लोगों के लिए ऊपर या नीचे आने जाने के लिए सीढ़ियां हुआ करती थी। यदि कोई व्यक्ति अपने क्षत्रिय कर्म छोड़कर ब्राह्मण होना चाहे तो हो जाता था जैसा कि विश्वामित्र ने किया। कोई ब्राह्मण नीचे उतरकर क्षत्रिय बनना चाहे तो बन सकता था जैसा कि परशुराम ने किया। इसी तरह जबाला का पुत्र भी दास होकर भी ब्राह्मण बन गया। ऐसे कई उदाहरण है। गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार ही कर्म का निर्णय होना होता है, जिसे जाति मान लिया गया है। वर्ण का अर्थ समाज या जाति से नहीं वर्ण का अर्थ स्वभाव और रंग से माना जाता रहा है। लेकिन अब यह व्यवस्था विकृत हो चली है और इसके समाप्त हो जाने में ही हिन्दू धर्म की भलाई है। अगर ऋग्वेद की ऋचाओं व गीता के श्लोकों को गौर से पढ़ा जाए तो साफ परिलक्षित होता है कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था का कोई आधार नहीं है। सनातन हिंदू धर्म मानव के बीच किसी भी प्रकार के भेद को नहीं मानता। उपनाम, गोत्र, जाति आदि यह सभी कई हजार वर्ष की परंपरा का परिणाम है। कुछ व्यक्ति योग्यता या शुद्धाचरण न होते हुए भी स्वयं को ऊंचा या ऊंची जाति का और पवित्र मानने लगे हैं और कुछ अपने को नीच और अपवित्र समझने लगे हैं। बाद में इस समझ को क्रमश: बढ़ावा मिला मुगल काल, अंग्रेज काल और फिर भारत की आजादी के बाद भारतीय राजनीति के काल में जो अब विराट रूप ले चुका है। धर्मशास्त्रों में क्या लिखा है यह कोई जानने का प्रयास नहीं करता और मंत्रों तथा सूत्रों की मनमानी व्याख्या करता रहता है।

इस तरह बदला समाज को: प्राचीन काल में धर्म से संचालित होता था राज्य। हमारे धर्म ग्रंथ लिखने वाले और समाज को रचने वाले ऋषि-मुनी जब विदा हो गए तब राजा और पुरोहितों में सांठगाठ से राज्य का शासन चलने लगा। धीरे-धीरे अनुयायियों की फौज ने धर्म को बदल दिया। बौद्ध काल में जब यह व्यवस्था विकृ हो चली तो इस नए सिरे से स्थापित करने के लिए कई संतों और समाज सुधारकों ने प्रयास किया और समाज की नए सिरे से रचना की। हर्षवर्धन के जाने के बाद जब भारत का पतन होना शुरू हुआ और विदेशी आक्रांताओं ने भारत में घुसकर कई भूभाग कर कब्जा कर लिया तब यह पुण्य भूमि एक युद्ध और अराजक स्थिति में बदल गई। दहशत और डर के कारण लोग खुद को बदलते रहे। लंबे समय तक अराजक स्थिति बनी रही। मुगल काल में हिन्दू ग्रंथों पुराणों आदि के साथ छेड़खानी की गई। अयोध्या, मथुरा, काशी और वाराणसी के पुरोहितों आदि को मुगलों के अनुसार धर्म को संचालित करना होता था, क्योंकि हिन्दुओं के धर्म के यही असली गढ़ थे। बाद में अंग्रेजों ने भारत के इतिहास का सत्यानाश कर दिया। फिर अंग्रेज जिन लोगों के हाथों में सत्ता दे गए थे वे सभी मूर्ख वामपंथी और अंग्रेजोँ के पिट्ठू थे, जिन्होंने ३० से ४० वर्ष में भारत को बर्बाद ही कर दिया।

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Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

#एकउदाहरणकिनेहरूकोकिसतरहमहानबनायागया
हर वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या ढाई लाख के करीब ही रहती है। लेकिन इस वर्ष बाबा अमरनाथ के दर्शन करने वाले भक़्तों की संख्या ने नया रिकॉर्ड बना दिया।
बालटाल और पहलगाम मार्गों के जरिए गत 28 जून से शुरू हुई अमरनाथ तीर्थयात्रा 26 अगस्त को सम्पन्न हुई। इस दौरान 2,85,006 श्रद्धालुओं ने बाबा अमरनाथ के दर्शन किये। इनमें बहुत बड़ी संख्या महिलाओं बुजुर्गों और बच्चों की थी।
यह खबर पढ़ने के बाद मुझे कुछ याद आ गया। बात मेरे बचपन की है।
मुझे अब ठीक से याद नहीं कि वो कक्षा 7 की किताब थी या कक्षा 8 की। लेकिन हिन्दी विषय की उस किताब के पाठ्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी गयी कहानी #मेरी
अमरनाथ_यात्रा हम बच्चों को पढ़ाई जाती थी। उस कहानी का धर्म, आस्था या बाबा अमरनाथ से कोई लेनादेना नहीं था। इसके बजाय उस कहानी में ऑक्सीजन के सिलेंडरों, उनमें खत्म होती ऑक्सीजन का सनसनीखेज जिक्र करके हम बच्चों के दिमाग में यह ठूंसा जाता था कि अमरनाथ यात्रा जानलेवा जोखिमों से भरपूर अत्यन्त दुर्गम यात्रा है और जवाहरलाल नेहरू ने अपनी जान जोखिम में डालकर इतनी खतरनाक अमरनाथ यात्रा को पूरा किया। कुल मिलाकर उस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह सिखाना/पढ़ाना/समझाना था कि जवाहरलाल नेहरू केवल राजनेता ही नहीं बल्कि बहुत जांबाज़ और बहादुर व्यक्ति भी था।
ध्यान रहे कि आज भी बालटाल और पहलगाम के बाद अमरनाथ गुफा तक की यात्रा दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर ही पूर्ण की जाती है। नेहरू ने भी बालटाल और पहलगाम के बाद यह यात्रा पैदल ही की थी। सैकड़ों वर्ष से वो रास्ते ज्यों के त्यों हैं। अमरनाथ गुफा जिस स्थान पर है उसकी ऊंचाई घटी नहीं है। लाखों की संख्या में महिलाएं बुजुर्ग और बच्चे भी प्रतिवर्ष यह यात्रा करते हैं, वह भी बिना किसी ऑक्सीजन सिलेण्डर के।
अतः बचपन में सरकारी पाठ्य पुस्तक में पढ़ी गयी नेहरू की अमरनाथ यात्रा की वह कहानी याद आती है तो समझ में आता है कि आज़ादी के बाद किसतरह नेहरू परिवार को महान महामानव सिद्ध करने का सुनियोजित षड्यंत्र इस देश में दशकों तक चला। उस षड़यंत्र का शिकार स्कूली बच्चों को बनाया गया।

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ईश्वर प्राप्ति की मनोदशा


ईश्वर प्राप्ति की मनोदशा

Santosh Chaturvedi

एक जिज्ञासु ने किसी महात्मा से पूछा-ईश्वर किन को मिल सकता है? महात्मा ने कुछ उत्तर न दिया। कई दिन वही प्रश्न पूछने पर एक दिन महात्मा उसे नदी में स्नान कराने ले गये और उस जिज्ञासु को साथ लेकर गले तक पानी में घुस गये। यहाँ पहुँचकर उनने उस व्यक्ति की गरदन पकड़ ली और जोर से पानी में दबोच दिया। कई मिनट बाद उसे छोड़ा तो वह साँस घुटने से बुरी तरह हाँफ रहा था।

महात्मा ने पूछा जब तुम्हें पानी में डुबाया गया तो उस समय तुम्हारी मनोदशा क्या थी? उसमें उत्तर दिया में केवल यह सोचता था कि किसी प्रकार मेरे प्राण बचें और बाहर निकले, इसके अतिरिक्त और कोई विचार मेरे मन में नहीं उठ रहा था। महात्मा ने कहा-जैसी तुम्हारी मनोदशा पानी में डूबे रहते थी, वैसी ही व्याकुलता और एक मात्र इच्छा यदि परमात्मा के प्राप्त करने के लिये किसी की हो जाय तो उसे अविलम्ब परमात्मा मिल सकता है।

परमात्मा को प्राप्त करने के लिये जिसमें तीव्र लगन और सच्ची आकांक्षा है उसको प्रभु की प्राप्ति में बहुत विलम्ब नहीं लगता।

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जुकाम के अनुभूत उपचार प्रयोग


कारण-
असंयमित खानपान , चाय, नमकीन , तेल युक्त पदार्थों का अति सेवन, फ्रिज की चीजें, कोल्ड्रिंग , आइसक्रीम का अति सेवन इसके अतिरिक्त ऋतु परिवर्तन ठंड लगना, पानी में भीग जाना , ठंडे पानी का अति सेवन तथा सर्दियों में बिना कान मुंह सर ढके के हवा में घूमने से भी सर्दी जुकाम की तकलीफ हो जाती है-
लक्षण-
सर्दी जुकाम होते ही कब्ज रहने लगता है जिससे भूख कम लगती है सिर दर्द, बदन दर्द , शरीर में ज्वर, आंख से पानी गिरता है , गले में खराश व छाले आते हैं, मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है , थूक निगलने में व भोजन निगलने में कठिनाई होती है, गले में दर्द होता है तथा कभी-कभी नाक से पानी आना या नाक बंद हो जाना जैसी समस्या होती है  आवाज बैठ जाना, बार-बार खांसी चलना, छाती में दर्द होना, पीठ में दर्द होना तथा कमजोरी लगना यह लक्षण सर्दी खासी पुरानी होने पर पाए जाते हैं-
सर्दी जुकाम नजले के लिए घरेलू नुस्खे-
1- शहद और अदरक का रस  एक एक चम्मच मिलाकर सुबह-शाम पीने से जुकाम ठीक हो जाता है-
2- नागर वेल के 2-4 कोरे पत्ते चबा लेने से सर्दी जुकाम में आराम मिलता है –
3- अजवाइन को पीसकर उसमें प्याज का रस मिलाकर छाती पर मलने से जुकाम में बदन दर्द में व हल्के बुखार में आराम मिलता है  इससे शरीर में स्फूर्ति आती है जुकाम कम होता है-
4- सोंठ के चूर्ण में गुड और थोड़ा सा घी डालकर 30-40 ग्राम के लड्डू बनाएं  यह लड्डू सुबह-शाम खाने से जुकाम दूर हो जाता है –
5- कुछ लोगों को हमेशा जुकाम रहता है ऐसे व्यक्तियों ने तुलसी का रस लहसुन का रस काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम लेने से जुकाम से पूर्ण रुप से छुटकारा मिल जाता है –
6- कुनकुने पानी में एप्सम साल्ट  मिलाकर उसमें पैर रखने से जुकाम व बदन दर्द में आराम मिलता है-
7- गुड़ की डली के बीच जरा सी पीसी हुई हींग और दो काली मिर्च कूटकर डालकर गोली बनाए  इस गोली का सुबह शाम सेवन करने से जुकाम में आराम होता है-
8- पांच बरगद के कोमल पत्ते तथा सात तुलसी के पत्तों को उबालकर चाय बना ले इसमें आधा चम्मच मिश्री मिला लें इस चाय को दिन में दो बार पीने से नजला, जुखाम, तथा कफ संबंधित समस्याए दूर होती है –
9- सोंठ काली मिर्च और अजवाइन का चूर्ण खांसी अरुचि दूर करता है  इसके सेवन से पाच्नाग्नि प्रदीप्त होती है यह चूर्ण 1 ग्राम शहद के साथ कुकुर खांसी में भी लाभदायक है-
10- सुदर्शन चूर्ण को गर्म पानी के साथ दिन में दो बार लेने से  नजला जुखाम बदन दर्द तथा ज्वर में भी लाभ होता है –
11- नीलगिरी का तेल छाती पीठ व कनपटी पर मलने से तथा सूंधने से जुकाम ठीक होता है  बंद नाक खुलती है छाती का भारीपन कम होता है-
12- रात्रि को सोने से पहले दोनों नासा छिद्रों में गाय के घी की कुछ बूंदे नस्य रुप से डालने से सर दर्द, माइग्रेन, साइनस तथा सर्दी दूर होती है -सरसों के तेल को कान में तथा नाक में डालने से सर्दी जुकाम नजला में राहत मिलती है –
13- खट्टे दही में गुड़ मिलाकर और उसमें काली मिर्च का चूर्ण डालकर सेवन करने से नया पुराना सब प्रकार का जुकाम नजला दूर होता है –
Posted in श्री कृष्णा

कृष्ण जन्म का रहस्य


कृष्ण जन्म का रहस्य…..♡

Abhimanyu “Krishnaa” Kashyap
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कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है।

असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वे सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती है। एक कविता जन्मती है, तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। बहुत अनकांशस डार्कनेस में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ कोई रोशनी नहीं पहुँचती जगत की, वहाँ होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है, तो सब गहन अंधकार में। गहन अंधकार से अर्थ है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता। जहाँ सोच-समझ में कुछ भी नहीं आता, हाथ को हाथ नहीं सूझता है।

कृष्ण का जन्म जिस रात में हुआ, कहानी कहती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, इतना गहन अंधकार था। लेकिन इसमें विशेषता खोजने की जरूरत नहीं है। यह जन्म की सामान्य प्रक्रिया है।

दूसरी बात कृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है- बंधन में जन्म होता है, कारागृह में। किसका जन्म है जो बंधन और कारागृह में नहीं होता है? हम सभी कारागृह में जन्मते हैं। हो सकता है कि मरते वक्त तक हम कारागृह से मुक्त हो जाएँ, जरूरी नहीं है हो सकता है कि हम मरें भी कारागृह में। जन्म एक बंधन में लाता है, सीमा में लाता है। शरीर में आना ही बड़े बंधन में आ जाना है, बड़े कारागृह में आ जाना है। जब भी कोई आत्मा जन्म लेती है तो कारागृह में ही जन्म लेती है।

लेकिन इस प्रतीक को ठीक से नहीं समझा गया। इस बहुत काव्यात्मक बात को ऐतिहासिक घटना समझकर बड़ी भूल हो गई। सभी जन्म कारागृह में होते हैं। सभी मृत्युएँ कारागृह में नहीं होती हैं। कुछ मृत्युएँ मुक्ति में होती है। कुछ अधिक कारागृह में होती हैं। जन्म तो बंधन में होगा, मरते क्षण तक अगर हम बंधन से छूट जाएँ, टूट जाएँ सारे कारागृह, तो जीवन की यात्रा सफल हो गई।

कृष्ण के जन्म के साथ एक और तीसरी बात जुड़ी है और वह यह है कि जन्म के साथ ही उन्हें मारे जाने की धमकी है। किसको नहीं है? जन्म के साथ ही मरने की घटना संभावी हो जाती है। जन्म के बाद – एक पल बाद भी मृत्यु घटित हो सकती है। जन्म के बाद प्रतिपल मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मौत घट सकती है। मौत के लिए एक ही शर्त जरूरी है, वह जन्म है। और कोई शर्त जरूरी नहीं है। जन्म के बाद एक पल जीया हुआ बालक भी मरने के लिए उतना ही योग्य हो जाता है, जितना सत्तर साल जीया हुआ आदमी होता है। मरने के लिए और कोई योग्यता नहीं चाहिए, जन्म भर चाहिए।

लेकिन कृष्ण के जन्म के साथ एक चौथी बात भी जुड़ी है कि मरने की बहुत तरह की घटनाएँ आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहें कि मौत ही उनके लिए मर जाती है। मौत सब उपाय करती है और बेकार हो जाती है। कृष्ण ऐसी जिंदगी हैं, जिस दरवाजे पर मौत बहुत रूपों में आती है और हारकर लौट जाती है।

वे सब रूपों की कथाएँ हमें पता हैं कि कितने रूपों में मौत घेरती है और हार जाती है। लेकिन कभी हमें खयाल नहीं आया कि इन कथाओं को हम गहरे में समझने की कोशिश करें। सत्य सिर्फ उन कथाओं में एक है, और वह यह है कि कृष्ण जीवन की तरफ रोज जीतते चले जाते हैं और मौत रोज हारती चली जाती है।

मौत की धमकी एक दिन समाप्त हो जाती है। जिन-जिन ने चाहा है, जिस-जिस ढंग से चाहा है कृष्ण मर जाएँ, वे-वे ढंग असफल हो जाते हैं और कृष्ण जीए ही चले जाते हैं। लेकिन ये बातें इतनी सीधी, जैसा मैं कह रहा हूँ, कही नहीं गई हैं। इतने सीधे कहने का पुराने आदमी के पास कोई उपाय नहीं था। इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

जितना पुरानी दुनिया में हम वापस लौटेंगे, उतना ही चिंतन का जो ढंग है, वह पिक्चोरियल होता है, चित्रात्मक होता है, शब्दात्मक नहीं होता। अभी भी रात आप सपना देखते हैं, कभी आपने खयाल किया कि सपनों में शब्दों का उपयोग करते हैं कि चित्रों का?

सपने में शब्दों का उपयोग नहीं होता, चित्रों का उपयोग होता है। क्योंकि सपने हमारे आदिम भाषा हैं, प्रिमिटिव लैंग्वेज हैं। सपने के मामले में हममें और आज से दस हजार साल पहले के आदमी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। सपने अभी भी पुराने हैं, प्रिमिटिव हैं, अभी भी सपना आधुनिक नहीं हो पाया। अभी भी सपने तो वही हैं जो दस हजार साल, दस लाख पुराने थे। गुहा-मानव ने एक गुफा में सोकर रात में जो सपने देखे होंगे, वही एयरकंडीशंड मकान में भी देखे जाते हैं। उससे कोई और फर्क नहीं पड़ा है। सपने की खूबी है कि उसकी सारी अभिव्यक्ति चित्रों में है।

जितना पुरानी दुनिया में हम लौटेंगे- और कृष्ण बहुत पुराने हैं, इन अर्थों में पुराने हैं कि आदमी जब चिंतन शुरू कर रहा है, आदमी जब सोच रहा है जगत और जीवन के बाबत, अभी जब शब्द नहीं बने हैं और जब प्रतीकों में और चित्रों में सारा का सारा कहा जाता है और समझा जाता है, तब कृष्ण के जीवन की घटनाएँ लिखी गई हैं। उन घटनाओं को डीकोड करना पड़ता है। उन घटनाओं को चित्रों से तोड़कर शब्दों में लाना पड़ता है। और कृष्ण शब्द को भी थोड़ा समझना जरूरी है।

कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस पर सारी चीजें खिंचती हों। जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिँचती हैं और आकृष्ट होती हैं।

शरीर खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, समाज खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, जगत खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व निर्मित होता है। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है।

कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है। महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौटकर निर्मित होती है।

पीछे लौटकर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है। जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिंदगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है।

हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएँ होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है। इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूँ। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।

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एक द्वीप था जिस पर सारी


K.LlKakkad

एक द्वीप था जिस पर सारी भावनाएं एक साथ रहती थीं। संपन्नता, गर्व, खुशी, दुख, प्रेम सब मिलकर रहते थे। एक बार घनघोर बारिश हुई। धीरे-धीरे द्वीप को भी पानी छूने लगा। एक समय ऐसा आया कि द्वीप भी डूबने लगा और सारी की सारी भावनाएं द्वीप छोड़कर सुरक्षित स्थान की ओर भागने लगीं, लेकिन प्रेम वहीं रुका रहा। जब द्वीप के गले तक पानी पहुंच गया तो प्रेम को भी लगा कि मुझे भी चलना चाहिए। सो उसने मदद की गरज से संपन्नता को पुकारा। संपन्नता ने जवाब दिया कि मेरी नाव तो सोने, चांदी, रुपये- पैसों से भरी है। उसमें तुम्हारे लिए कोई जगह भला कैसे हो सकती है ? इस बीच प्रेम बारिश के पानी से थोड़ा गीला हो गया था। उसने गर्व से भी मदद की गुहार लगाई। गर्व ने भी यह कहकर उसकी मदद करने से इंकार कर दिया कि तुम गीले हो गए हो और यदि इस हालत में तुम मेरी नाव पर चढ़ोगे तो वह गंदी हो जाएगी। प्रेम ने सोचा कि दुख तो मेरा परम प्रिय मित्र रहा है, वह तो कम से कम मेरी मदद करने से इंकार नहीं करेगा। लेकिन उसने भी प्रेम की मदद नहीं की और खुशी तो अपने आपमें इतनी मगन थी कि उसने प्रेम की बात तक नहीं सुनी। तभी प्रेम को एक आवाज सुनाई दी कि तुम परेशान मत होओ, मैं तुम्हारी मदद करूंगा। आओ, मैं तुम्हें सूखे स्थान पर छोड़ देता हूं। प्रेम उस पर सवार होकर सूखे स्थान पर पहुंच गया, लेकिन जिस पर सवार होकर आया था वह उसे छोड़कर तुरंत अदृश्य हो गया। उस सूखे स्थान पर प्रेम की मुलाकात ज्ञान से हुई। ज्ञान से उसने पूछा कि वह कौन था जिसने बिना मांगे मेरी मदद की और बिना धन्यवाद लिए वह चला भी गया। ज्ञान ने उसे बताया, “वह समय था, क्योंकि उसे ही प्रेम की कीमत मालूम है।” तात्पर्य यह कि समय ही प्रेम को समझ सकता है इसलिए समय की हमेशा कद्र करनी चाहिए।

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कोलाहले काककुलस्य जाते विराजते कोकिलकूजितं किम्।
परस्परं संवदतां खलानां मौनं विधेयं सततं सुधीभिः॥

सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

कौवों के झुंड द्वारा बनाए गए जोरदार शोर के बीच, क्या एक कोयल की मधुर बोली कभी सुनाई दे सकती हैं? दुष्ट व्यक्तियों के आपसी बातचीत के दौरान अक्लमंद व्यक्तियों का शांत रहना उचित हैं।

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कर्म पीछा नहीं छोड़ते ??


कर्म पीछा नहीं छोड़ते ??

જ઼યોતિ આગ્રવાલ

एक सेठ जी ने अपने मैनेजर को इतना डाटा— की मैनेजर को बहुत गुस्सा आया पर सेठ जी को कुछ बोल ना सका-

– वह अपना गुस्सा किस पर निकाले- हो गया सीधा अपने कंपनी स्टाफ के पास और सारा गुस्सा कर्मचारियों पर निकाल दिया।

  • अब कर्मचारी किस पर अपना गुस्सा निकाले-?

तो जाते-जाते अपने गेट वॉचमैन पर उतारते गए- – अब वॉचमैन किस पर निकाला अपना गुस्सा-? – तो वह घर गया और अपनी बीवी को डांटने लगा बिना किसी बात पर।

अभी भी उठी और अपने बच्चे की पीठ पर 2 धमाक धमाक लगा दिया– — सारा दिन tv देखता रहता है काम कुछ करता नहीं है– – अब बच्चा घर से गुस्से से निकला, और सड़क पर सो रहे कुत्ते को पत्थर दे मारा,

— कुत्ता हड़बड़ाकर भागा और सोचने लगा कि इसका मैंने क्या बिगाड़ा-? – और गुस्से में उस कुत्ते ने एक आदमी को काट खाया- — और कुत्ते ने जिसे काटा वह आदमी कौन था-? — वही सेठ जी थे, जिन्होंने अपने मैनेजर को डांटा था।

  • सेठ जी जब तक जिए तब तक यही सोचते रहे कि उस कुत्ते ने आखिर मुझे क्यों काटा-? – —लेकिन बीज किसने बोया ?

— आया कुछ समझ में– कर्म के फलपीछा नहीं छोड़ते बाबा— जाने अनजाने में कितने लोग हमारे व्यवहार से त्रस्त होते हैं, परेशान होते हैं और कितने का तो नुकसान भी होता है।

— पर हमें तो उसका अंदाजा भी नहीं होता, क्योंकि हम तो अपनी मस्ती में ही मस्त है।

पर प्रकृति सब देखती है और उसका फल फिर किसी और के निमित्त से हमें मिलता है, और हमें लगता है कि लोग हमें बेवजह ही परेशान कर रहे हैं