Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

जय श्री राधेकृष्ण

पुटिलाल मौर्य

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जन्माष्टमी परमात्मा श्री कृष्ण के सम्पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर अवतार का समय है। परमात्मा के सगुण रूप और शक्ति का साक्षात्कार पृथ्वी के मनुष्यों को कराने हेतु श्री कृष्ण ने कंस के कारागार में जन्म लिया ताकि ईश्वर और उसकी सत्ता पर विश्वास दृढ़ हो। जन्म के साथ ही उनकी लीला प्रारम्भ हो गई। जो कभी नहीं हुआ था वह हुआ। स्वयं ही रक्षकों का सो जाना, कारागार के ताले खुल जाना, भादों की अँधेरी अष्टमी की रात में बाढ़ से लबालब यमुना को बिना किसी की सहायता के वसुदेव का कृष्ण को सर पर रख कर सहज ही पार कर लेना, नन्द जी के घर में बिना किसी के जाने कृष्ण को यशोदा के पास रखना और बदले में बच्ची को सर पर रख कर सुरक्षित वापस आ जाना फिर कारागार का माहौल पूर्ववत हो जाना – धरती पर आते ही इतने सारे चमत्कार एक साथ हो जाना कृष्णलीला का अद्-भुत प्रारम्भ था। श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में ही परमात्मा की शक्तियों का ऐसा प्रदर्शन हुआ जो अभूतपूर्व था, अकल्पनीय था। बाल्यावस्था में ही उनकी बुद्धि से बड़े -बड़े प्रभावित थे। उनका प्रभाव ही था कि समाज में बदलाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। कई रूढ़ियाँ टूटीं, इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ हुई।
भगवान श्रीकृष्ण की चतुराई के कौन बुद्धिमान कायल नहीं थे। अर्जुन ने भगवान की अक्षौहिणी सेना के बदले स्वयं भगवान को ही चुना। वह भी तब जब श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में अस्त्र शस्त्र का स्वयं उपयोग न करने हेतु वचनबद्ध थे। सारथी के रूप में भी सेना के बदले अर्जुन को श्रीकृष्ण स्वीकार्य थे। महाभारत एक ऐसा अभूतपूर्व युद्ध था जिसमे एक से बढ़कर एक महारथी योद्धा विध्वंशकारी अस्त्र शस्त्र के साथ उपस्थित थे, उन्होंने दर्शनीय युद्ध भी किये परंतु पूरे अठारह दिनों तक चले महायुद्ध का नायक सहज ही निःशस्त्र श्रीकृष्ण थे। जिस बर्बरीक ने पूरा युद्ध स्वयं देखा उनके इस स्पष्ट अभिमत से कौन सहमत न होगा। वही बर्बरीक जिसने भगवान की लीलाओं को इस लोकवासियों को देखने हेतु अपना जीवन दान कर दिया और भगवान ने प्रसन्न हो कर उन्हें अपना नाम और वरदान दिया। उन बर्बरीक को हम खाटू – श्याम के नाम से जानते हैं।

             भगवान श्रीकृष्ण की चतुराई और रणनीति कालयवन के वध के प्रसंग में अचरज भरी है। अपनी लीलाओं में कभी वे सीधे बल का प्रयोग करते हैं तो कहीं बुद्धि का, कहीं वे कठोर दीखते है तो कहीं करुणा से परिपूर्ण, कहीं अपने भक्तों के हृदय से अभिमान का छोटा सा कतरा भी निकालने से नहीं चूकते तो कहीं निष्काम प्रेम का अनुपम उदाहरण देते हैं।कौन सी कला नहीं दिखलाते हमें ? गोपियों के साथ निष्काम प्रेम को वही समझ सकता है जिसके हृदय में भगवान के चरण कमल बसते हों अन्यथा अनेक तो इसे  लैला - मजनू जैसा प्रेम समझते हैं। गोपियों का बिना किसी फल की इच्छा के श्रीकृष्ण के प्रति ऐसा समर्पण भक्ति की उस दिशा को दिखलाता है जिधर पहले किसी ने न देखा था। न ज्ञान चाहिए न योग चाहिए, न यज्ञ चाहिए न कर्मकांड - बस भगवान के चरणों में अनवरत निष्काम प्रेम चाहिए। ईश्वर कुछ देने को भी तैयार हो तो यही मांगें कि इसी तरह उनके चरणों में अनुराग बना रहे। इच्छा भी हो तो मोक्ष की नहीं जो ज्ञानीजन बतलाते हैं बल्कि मरने के बाद भी ईश्वर के चरणों में ही गति मिले। जब ऐसे भाव भक्त के हृदय में घर करते हैं तो प्रेम की अधिकता से जहाँ भी श्रीकृष्ण की प्रतिमा के दर्शन होते हैं आंखें भर आती हैं।

                हम साधारण मनुष्यों की तो क्या बात जब वेद व्यास जैसे ज्ञानी भी अनेक पुराण लिखने के बाद भी बेचैन रहें और उन्हें चैन तभी आये जब वे श्रीमद्भागवत महापुराण लिख लें। वही भागवत कथा जिसे सुनकर राजा परीक्षित का मृत्यु भय दूर हुआ। वही भागवत कथा जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और अन्य कथाओं का विस्तृत विवरण है पर मात्र चार श्लोकों में भगवान ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि वे कौन हैं, उनकी माया क्या हैं और ये जगत क्या है -इन चार श्लोकों को "चतुश्लोकी भागवत" के नाम से जाना जाता है जो पूरे श्रीमद्भागवत महापुराण का सार है।    

              महाभारत प्रारम्भ होने से पहले गीता का जो उपदेश भगवान ने दिया वह आज भी करोड़ों हिंदुओं का सच्चे मार्ग पर चलने हेतु मार्गदर्शन करता है। कृष्ण जन्म भगवान का हम मनुष्यों पर महाउपकार है। उनके जन्म की वर्षगॉँठ को "जन्माष्टमी" त्यौहार के रूप में प्रतिवर्ष मनायें। इस दिन उपवास रख, फलाहार रख या सात्विक आहार के साथ जैसे भी हो परंतु भक्तिभाव के साथ भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उनके नाम संकीर्तन के साथ प्रतीक्षा करें ताकि हमारे जीवन में कभी भय-क्लेश का प्रवेश न हो और सुखपूर्वक हमारा जीवन भगवद्भक्ति के साथ बीते।

जय श्री राधेकृष्ण !

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अविचल धैर्य की महिमा

संतोष चतुर्वेदी

एक बार एक तपस्वी जंगल में तप कर रहा था। नारद जी उधर से निकले तो उसने साष्टांग प्रणाम किया और पूछा-मुनिवर कहाँ जा रहे हैं? नारदजी ने कहा-विष्णुलोक को भगवान के दर्शन करने जा रहे हैं। तपस्वी ने कहा-एक प्रश्न मेरा भी पूछते आइए कि-मुझे उनके दर्शन कब तक होंगे?

नारद जी विष्णुलोक पहुँचे तो उनने उस तपस्वी का भी प्रश्न पूछा-भगवान ने कहा-84 लाख योनियों में अभी 18 बार उसे और चक्कर लगाने पड़ेंगे तब कही मेरे दर्शन होंगे। वापिस लौटने पर नारदजी ने यही उत्तर उस तपस्वी को सुना दिया।

तपस्वी अधीर नहीं हुआ। समय की उसे जल्दी न थी। इतना आश्वासन उसे पर्याप्त लगा कि भगवान के दर्शन देर सबेर में उसे होंगे अवश्य! इससे उसे बड़ी प्रसन्नता हुईं और दूने उत्साह के साथ अपनी तपस्या में लग गया। उसकी इस अविचल निष्ठा और धैर्य को देखकर भगवान बड़े प्रसन्न हुये और उनने तुरन्त ही उस तपस्वी को दर्शन दे दिये।

कुछ दिन बाद नारद जी उधर से फिर निकले तो भक्त ने कहा-मुझे तो आपके जाने के दूसरे दिन ही दर्शन हो गये थे। इस पर नारद जी बहुत दुखी हुये और विष्णु भगवान के पास जाकर शिकायत की कि आपने मुझसे कहा इनको लंबी अवधि में दर्शन होंगे और आपने तुरन्त ही दर्शन देकर मुझे झूठा बनाया।

भगवान ने कहा- नारद जिसकी निष्ठा अविचल है जिसमें असीम धैर्य है उसके तो मैं सदा ही समीप हूँ। देर तो उन्हें लगती है तो सघन पल में उतावली करते है। उस भक्त के प्रश्न में उतावली का आभास देखकर मैंने लंबी अवधि बताई थी पर जब देखा कि वह तो बहुत ही धैर्य वान है तो उतना विलंब लगाने की आवश्यकता न समझ और तुरन्त दर्शन दे दिये।

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🏻 डीआईजी नवनीत सिकेरा ने एक बेहद मार्मिक स्टोरी पोस्ट की।

संजय गुप्ता
एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक???
“”रोंगटे खड़े”” कर देने वाली स्टोरी को जरूर पढ़े और लोगों को शेयर करें।

⚡कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया.
करीब 7 बजे होंगे,
शाम को मोबाइल बजा ।
उठाया तो उधर से रोने की आवाज…
मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?
उधर से आवाज़ आई..
आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?
मैंने कहा:- “आप परेशानी बताइये”
और “भाई साहब कहाँ हैं…?माताजी किधर हैं..?” “आखिर हुआ क्या…?”
लेकिन
उधर से केवल एक रट कि “आप आ जाइए”, मैंने आश्वाशन दिया कि कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;
देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;
भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

मैंने भाई साहब से पूछा कि “”आखिर क्या बात है””???

“”भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे “”.

फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं,
मैंने पूछा – ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. “”प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है””.
लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर है,
बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है.
मैंने घर के नौकर से कहा।

मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ;

कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की.
लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक “मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे “बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.
पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली. कि “”मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती””ना तो ये उनसे बात करती थी
और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी. नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे
माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे.
मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की.
जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके *””मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ””. लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.
उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ. पिछले 3 दिनों से

मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ,जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

मुझे आज भी याद है जब..
“”मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती””.

एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था. उसका शरीर गर्म था, तप रहा था. मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है.
लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया. मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थींकि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए.

   कहते-कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे"".

हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं,आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, “”जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते””,
जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो “मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ”.

आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ
.
जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।

सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।

और अगर इतना सब कुछ कर के “”माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है””, तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा.

माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी.

जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे.

बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।

मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा.
उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.
बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला. भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ,
चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,
भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ,
उस चौकीदार ने कहा:-

“”जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,
औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब”

इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया.
अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी.
उसने बड़े कातर शब्दों में कहा:-
“2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो

मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?”

मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये. ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं.
अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ.

केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है.
मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए
लेकिन जब मैंने कहा हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी

आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए.
उनकी भी आँखें नम थीं
कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.
सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे…….

लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे.घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.

👩 💐 भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी 💐

मैं भी चल दिया. लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे.

👵 💐“”माँ केवल माँ है”” 💐👵

उसको मरने से पहले ना मारें.

माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें , अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की “”रीढ़ कमज़ोर”” हो जाएगी , बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें, अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो “ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा”, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर “”सुकून नहीं होगा”” , सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस *आँचल को बिखरने मत देना
✍👏👏💐💐👏👏
इस मार्मिक दास्तान को खुद भी पढ़िये और अपने बच्चों को भी पढ़ाइये ताकि पश्चाताप न करना पड़े
धन्यवाद!!!
🙏🏻💐🌷

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“माता अंजना को कैसे मिली मुक्ति वानर अवतार से”

संजय गुप्ता

ब्रह्मा जी के महल में हजारों सेविकाएं थीं, जिनमें से एक थीं अंजना। अंजना की सेवा से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा। अंजना ने हिचकिचाते हुए उनसे कहा- कि “उन पर एक तपस्वी साधु का श्राप है , अगर हो सके तो उन्हें उससे मुक्ति दिलवा दें”। ब्रह्मा ने उनसे कहा- कि “वह उस श्राप के बारे में बताएं, क्या पता वह उस श्राप से उन्हें मुक्ति दिलवा दें”।

अंजना ने उन्हें अपनी कहानी सुनानी शुरू की। अंजना ने कहा- ” बालपन में जब मैं खेल रही थी तो मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा, मेरे लिए यह एक बड़ी आश्चर्य वाली घटना थी, इसलिए मैंने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए। बस यही मेरी गलती थी, क्योंकि वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु थे। मैंने उनकी तपस्या भंग कर दी और क्रोधित होकर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया, कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी”। मेरे बहुत गिड़गिड़ाने और माफी मांगने पर उस साधु ने कहा- कि “मेरा चेहरा वानर होने के बावजूद उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा”।

अपनी कहानी सुनाने के बाद अंजना ने कहा- कि “अगर ब्रह्म देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी”। ब्रह्म देव ने उन्हें कहा- कि “इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए अंजना को धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजना को इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।”

ब्रह्मा की बात मानकर अंजना धरती पर चली गईं और एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित होने लगीं। जैसे ही उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं, अंजना का चेहरा वानर जैसा हो गया। अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, जब वह युवक उनके पास आया और उनकी पीड़ा का कारण पूछा, तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए उसे बताया कि वह बदसूरत हो गई हैं। अंजना ने उस बलशाली युवक को दूर से देखा था, लेकिन जब उसने उस व्यक्ति को अपने समीप देखा तो पाया कि उसका चेहरा भी वानर जैसा था ।

अपना परिचय बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा- कि “वह कोई और नहीं वानर राज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं।” अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जंगल में केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया।

भगवान शिव के भक्त होने के कारण केसरी और अंजना अपने आराध्य की तपस्या में मग्न थे। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। अंजना ने शिव को कहा- कि “साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें।” “तथास्तु, कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए। इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और किसी दूसरे कोने में महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे। अग्नि देव ने उन्हें दैवीय “पायस” दिया जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस पायस की कटोरी में थोड़ा सा पायस अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया। अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया और कुछ ही समय बाद उन्होंने वानर मुख वाले हनुमान जी को जन्म दिया। हनुमान जी के जन्म के बाद अंजाना को श्राप से मुक्ति मिल जाती है।

Posted in महाभारत - Mahabharat

इन पाँच गांवों की वजह से हुआ था महाभारत का युद्ध, अब ऐसा है उनका हाल, इनकी बदौलत टल सकता था युद्ध!!!!!!!

संजय गुप्ता

लालच, स्त्री का अपमान, जैसी जैसी कई चीजों के परिणाम स्वरूप महाभारत का युद्ध हुआ। जमीन या राज्य का बंटवारा भी इन्हीं कारणों में से एक था। जमीन के लालच में कौरवों ने कई षड्यंत्र रचे। पांडवों को मारने का प्रयास भी किया और तो और भरी सभा में अपनी कुलवधू द्रोपदी का चीरहरण करके उन्हें अपमानित भी किया।

इस सब के बावजूद युधिष्ठिर युद्ध नहीं चाहते थे, क्योंकि वे जानते थे कि युद्ध से उनका पूरा वंश तबाह हो जाएगा। इसलिए उन्होंने मात्र 5 गांवों के बदले युद्ध ना करने का प्रस्ताव रखा था। अगर दुर्योधन उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता तो इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध टल जाता।

आखिर क्या है पूरा किस्सा? कौन-से थे वे 5 गांव और आज वे कहां मौजूद है? आइये जानते हैं।

युधिष्ठिर के निवेदन पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, पांडवों की ओर से शांतिदूत बनकर कौरवों के पास गए थे। हस्तिनापुर पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण ने पांडवों का संदेश देते हुए कहा था कि अगर कौरव उन्हें मात्र 5 गांव प्रदान कर दें तो यह युद्ध नहीं होगा।

पांडवों का प्रस्ताव सुनने के बाद धृतराष्ट्र इसे स्वीकार करना चाहते थे, लेकिन दुर्योधन ने अपने पिता को भड़काते हुए कहा कि ये पांडवों की चाल है। वे जानते हैं कि हमारी विशाल सेना के आगे वे पलभर भी नहीं टिक पाएंगे इसलिए ये चाल चल रहे हैं।

श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को फिर से समझाते हुए कहा था कि पांडव युद्ध से डरते नहीं हैं। वे बस कुल का नाश होते नहीं देखना चाहते। आगे श्रीकृष्ण ने कहा कि अगर वो पांडवों को आधा राज्य लौटा दें तो युद्ध तो टल ही जाएगा, साथ ही पांडव दुर्योधन को युवराज के रूप में भी स्वीकार कर लेंगे।

धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, गुरु द्रोण सभी ने दुर्योधन को समझाने की बहुत कोशिशें कीं। यहां तक कि गांधारी ने भी दुर्योधन से पांडवों का प्रस्ताव स्वीकार करने की विनती की, लेकिन हठी दुर्योधन ने किसी की बात नहीं मानी। परिणाम स्वरूप युद्ध में पूरे कौरव वंश का नाश हो गया।

ये था महाभारत का वो रोचक किस्सा, जिसमें पांच गांवों का जिक्र किया गया था। चलिए अब आपको बताते हैं कौन-से थे वे पांच गांव और आज कहां, किस नाम से मौजूद हैं।

पहला गांव- इंद्रप्रस्थ : – महाभारत में इंद्रप्रस्थ को कहीं-कहीं पर श्रीपत के नाम से भी पुकारा गया है। जब कौरवों और पांडवों के बीच मदभेद होने लगे थे, तब धृतराष्ट्र ने यमुना किनारे स्थित खांडवप्रस्थ क्षेत्र पांडवों को देकर, राज्य से अलग कर दिया था। इस जगह पर हर तरफ जंगल ही जंगल था। तभी पांडवों ने रावण के ससुर और महान शिल्पकार मायासुर से यहां महल बनाने की विनती की। पांडवों के कहने पर मयासुर ने यहां सुंदर नगरी बनाई और इस जगह का नाम इंद्रप्रस्थ रख दिया गया। आज की दिल्ली का दक्षिणी इलाका महाभारत काल का इंद्रप्रस्थ माना जाता है।

दूसरा गांव- व्याघ्रप्रस्थ : – व्याघ्रप्रस्थ यानी बाघों के रहने की जगह। महाभारत काल का व्याघ्रप्रस्थ आज बागपत कहा जाता है। मुगलकाल से इस जगह को बागपत के नाम से जाना जाने लगा था। आज ये जगह उत्तरप्रदेश में मौजूद है। कहा जाता है कि इसी जगह पर दुर्योधन ने पांडवों को मरवाने के लिए लाक्षागृह का निर्माण करवाया था।

तीसरा गांव- स्वर्णप्रस्थ : – स्वर्णप्रस्थ का मतलब है ‘सोने का शहर’। महाभारत का स्वर्णप्रस्थ आज सोनीपत के नाम से जाना जाता है। आज ये हरियाणा का एक प्रसिद्ध शहर है। समय के साथ इसका नाम पहले ‘सोनप्रस्थ’ हुआ और फिर सोनीपत।

चौथा गांव- पांडुप्रस्थ : – हरियाणा का पानीपत महाभारत के समय पांडुप्रस्थ कहा जाता था। कुरुक्षेत्र, जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, पानीपत के पास ही स्थित है। नई दिल्ली से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थिर इस जगह को ‘सिटी ऑफ वीबर’ यानी ‘बुनकरों का शहर’ भी कहा जाता है।

पांचवा गांव- तिलप्रस्थ : – महाभारत काल में तिलप्रस्थ के नाम से प्रसिद्ध ये जगह आज तिलपत बन चुकी है। यह हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित एक कस्बा है।

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एकाग्रचित्त बनें………
ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढें…

संजय गुप्ता
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एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।
सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी।
उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकर उस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया।
बोला, ‘दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।’
कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम फटाफट करना चाहता है। किसी के पास धैर्य नहीं है। इसी तरह पचासों योजनाएं एक साथ चलाता है और पूरी एक भी नहीं हो पाती।
सांसारिक काम को सफल बनाना हो या रूहानियत की भजन बन्दगी में तरक्की करने का काम हो , बिना एकाग्रता ,परिश्रम और धैर्य के संभव नही ।

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सम्पाती और जटायु के बारे में ये सात रहस्य जानकर चौंक जाएंगे!!!!!!!

संजय गुप्ता

रामायण काल में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। एक और जहां कौए के आकार के काक भुशुण्डी की चर्चा मिलती है तो दूसरी ओर देव पक्षी गरूड़ और अरुण का उल्लेख भी मिलता है। गरूढ़ ने ही श्रीराम को नागपाश मुक्त कराया था। इसके बाद सम्पाती और जटायु का विशेष उल्लेख मिलता है। जटायु को श्रीराम की राह में शहीद होने वाला पहला सैनिक माना जाता है।

लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया। वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामायण गरूड़ को सुना दी थी।

इससे पूर्व हनुमानजी ने संपूर्ण रामायण पाठ लिखकर समुद्र में फेंक दी थी। वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे और उन्होंने रामायण तब लिखी, जब रावण-वध के बाद राम का राज्याभिषेक हो चुका था। खैर…आओ जानते हैं सम्पाति और जटायु के बारे में ऐसी बातें जो अपने अभी नहीं जानी होगी…

सम्पाती और जटायु कौन थे?

राम के काल में सम्पाती और जटायु नाम के दो गरूड़ थे। ये दोनों ही देव पक्षी अरुण के पुत्र थे। दरअसल, प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के दो पुत्र हुए- गरूड़ और अरुण। गरूड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।

कहां रहते थे जटायु :पुराणों के अनुसार सम्पाती और जटायु दो गरुढ़ बंधु थे। सम्पाती बड़ा था और जटायु छोटा। ये दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे और संपूर्ण दंडकारण्य क्षेत्र विचरण करते रहते थे। एक ऐसा समय था जबकि मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में गिद्ध और गरूढ़ पक्षियों की संख्या अधिक थी लेकिन अब नहीं रही।

जटायु और सम्पाती की होड़ :बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य-मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लंबी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु जलने लगे तब सम्पाति ने उन्हें अपने पक्ष ने नीचे सुरक्षित कर लिया, लेकिन सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वे समुद्र तट पर गिरकर चेतनाशून्य हो गए।

चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।

राजा दशरथ के मित्र थे जटायु :जब जटायु नासिक के पंचवटी में रहते थे तब एक दिन आखेट के समय महाराज दशरथ से उनकी मुलाकात हुई और तभी से वे और दशरथ मित्र बन गए। वनवास के समय जब भगवान श्रीराम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहने लगे, तब पहली बार जटायु से उनका परिचय हुआ।

जटायु का बलिदान :रावण जब सीताजी का हरण कर लेकर आकाश में उड़ गया तब सीताजी का विलाप सुनकर जटायु ने रावण को रोकने का प्रयास किया लेकिन अन्त में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और रावण सीताजी को लेकर लंका की ओर चला गया।

सीता की खोज करते हुए राम जब रास्ते से गुजर रहे थे तो उन्हें घायल अवस्था में जटायु मिले। जटायु मरणासन्न थे। जटायु ने राम को पूरी कहानी सुनाई और यह भी बताया कि रावण किस दिशा में गया है। जटायु के मरने के बाद राम ने उसका वहीं अंतिम संस्कार और पिंडदान किया।

छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में जटायु का मंदिर है। मान्यता अनुसार यह वह स्थान है जब सीता का अपहरण कर रावण पुष्पक विमान से लंका जा रहा था, तो सबसे पहले जटायु ने ही रावण को रोका था। राम की राह में जटायु पहले शहीद थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। जटायु की राम से पहली मुलाकाता पंचवटी (नासिक के पास) हुई थी जहां वे रहते थे। लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई।

सम्पाती ने सैंकड़ों किलोमीट से माता सीता को देख लिया था :जामवंत, अंगद, हनुमान आदि जब सीता माता को ढूंढ़ने जा रहे थे तब मार्ग में उन्हें बिना पंख का विशालकाय पक्षी सम्पाति नजर आया, जो उन्हें खाना चाहता था लेकिन जामवंत ने उस पक्षी को रामव्यथा सुनाई और अंगद आदि ने उन्हें उनके भाई जटायु की मृत्यु का समाचार दिया। यह समाचार सुनकर सम्पाती दुखी हो गया।

सम्पाती ने तब उन्हें बताया कि हां मैंने भी रावण को सीता माता को ले जाते हुए देखा। दरअसल, जटायु के बाद रास्ते में सम्पाती के पुत्र सुपार्श्व ने सीता को ले जा रहे रावण को रोका था और उससे युद्ध के लिए तैयार हो गया। किंतु रावण उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा और इस तरह वहां से बचकर निकल आया। हुआ यूं था कि पंख जल जाने के कारण संपाती उड़ने में असमर्थ था, इसलिए सुपार्श्व उनके लिए भोजन जुटाता था। एक शाम सुपार्श्व बिना भोजन लिए अपने पिता के पास पहुंचा तो भूखे संपाती ने मांस न लाने का कारण पूछा तो सुपार्श्व ने बतलाया- ‘कोई काला राक्षस सुंदर नारी को लिए चला जा रहा था। वह स्त्री ‘हा राम, हा लक्ष्मण!’ कहकर विलाप कर रही थी। यह देखने में मैं इतना उलझ गया कि मांस लाने का ध्यान नहीं रहा।’

अर्थात सम्पाती ने तब अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की। सम्पाती रावण से इसलिये नहीं लड़ सका क्योंकि वह बहुत कमजोर हो चला था क्योंकि सूर्य के ताप से उनके पंख जल गए थे। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया था।

सम्पादी ने दिव्य वानरों अंगद और हनुमान के दर्शन करके खुद में चेतना शक्ति का अनुभव किया और अंतत: उन्होंने अंगद के निवेदन पर अपनी दूरदृष्टि से देखकर बताया कि सीमा माता अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं। सम्पाति ने ही वानरों को लंकापुरी जाने के लिए प्रेरित और उत्साहित किया था। इस प्रकार रामकथा में सम्पाती ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अमर हो गए।

जटायु का तप स्थल जटाशंकर :मध्यप्रदेश के देवास जिले की तहसील बागली में ‘जटाशंकर’ नाम का एक स्थान है जिसके बारे में कहा जाता है कि जटायु वहां तपस्या करते थे। कुछ लोगों के अनुसार यह ऋषियों की तपोभूमि भी है और सबमें बड़ी खासियत की यहां स्थित पहाड़ के ऊपर से शिवलिंग पर अनवरत जलधारा बहती हुई नीचे तक जाती है जिसे देखकर लगता है कि शिव की जटाओं से धारा बह रही है। संभवत: इसी कारण इसका नाम जटा शंकर पड़ा होगा। बागली के पास ही गिदिया खोह है जहां कभी हजारों की संख्‍या में गिद्ध रहा करते थे।

दुर्गम जंगल से घिरा यह क्षेत्र हमें मंत्र मुग्ध कर देता है। यहां पहुंचते ही सच में ही लगता है कि हम किसी ऋषि की तपोभूमि में आ गए हैं। किंवदंती हैं कि जटायु के बाद यह स्थल कई ऋषियों का तप स्थल रहता आया है। बागली के बियाबान जंगल में बसे इस स्थान पर वैसे तो कम ही लोग आते-जाते हैं लेकिन यहां हर श्रावण मास में भजन, पूजन और भंडारे का आयोजन किया जाता है।

इस मंदिर केशवदास फरयाली बाबा के शिष्य बद्रीदास महाराज ने यहां की गद्दी संभाल रखी है। केशवदास महाराज की यहां पर समाधी भी है। यहां के स्थानीय निवासी सुभाषसिंह और मांगीलाल के अनुसार इस मंदिर का शिवलिंग प्राचीन काल से विद्यमान है। यहां स्थि‍त पहाड़ का झरना बारह माह ही इसी तरह निरंतर बहता रहता है। न कम होता है और न ज्यादा। किंवदंती हैं भगवान राम के समय से यह झरना बह रहा है, कहां से इसकी धारा फूटी है और इसकी थाह क्या है? यह किसी को पता नहीं। हमारे पूर्वजों से सुनते आए हैं कि यह बहुत ही प्राचीन स्थान है।

जैन धर्मानुसार :जैन धर्म अनुसार राम, सीता तथा लक्ष्मण दंडकारण्य में थे। उन्होंने देखा- कुछ मुनि आकाश से नीचे उतरे। उन तीनों ने मुनियों को प्रणाम किया तथा उनका आतिथ्य किया। वहां पर बैठा हुआ एक गरूढ़ उनके चरणोदक में गिर पड़ा। साधुओं ने बताया कि पूर्वकाल में दंडक नामक एक राजा था किसी मुनि के संसर्ग से उसके मन में संन्यासी भाव उदित हुआ। उसके राज्य में एक परिव्राजक था। एक बार वह अंत:पुर में रानी से बातचीत कर रहा था राजा ने उसे देखा तो दुश्चरित्र जानकर उसके दोष से सभी श्रमणों को मरवा डाला।

एक श्रमण बाहर गया हुआ था। लौटने पर समाचार ज्ञात हुआ तो उसके शरीर से ऐसी क्रोधाग्नि निकली कि जिससे समस्त स्थान भस्म हो गया। राजा के नामानुसार इस स्थान का नाम दंडकारगय रखा गया। मुनियों ने उस दिव्य ‘गरूढ़’ की सुरक्षा का भार सीता और राम को सौंप दिया। उसके पूर्व जन्म के विषय में बताकर उसे धर्मोपदेश भी दिया। रत्नाभ जटाएं हो जाने के कारण वह ‘जटायु’ नाम से विख्यात हुआ।

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।।।।।। भगवान के भोग का फल ।।।।।।।।।।

संजय गुप्ता

एक सेठजी बड़े कंजूस थे। एक दिन दुकान पर् बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया। अकस्मात एक संत आये जो अलग अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे, लड़के से कहा बेटा जरा नमक देदो। लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया। सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था, सेठजी ने कहा कि क्या बेचा, बेटा बोला एक सन्त जो तालाब पर् रहते हैं उनको एक चम्मच नमक दिया था। सेठ का माथा ठनका अरे मूर्ख इसमें तो जहरीला पदार्थ है।
  अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान के भोग लगाकर  थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे सेठजी दूर से ही बोले महाराजजी रुकिए आप जो नमक लाये थे वो जहरीला पदार्थ था।आप भोजन नहीं करें।
   संतजी बोले भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते हाँ अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और शुरू कर दिया भोजन। सेठजी के होश उड़ गए, बैठ गए वहीं पर्। रात पड़ गई सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे। सोचते सोचते नींद आ गई। सुबल जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं। सेठजी ने कहा महाराज तबियत तो ठीक है। सन्त बोले भी भगवान की कृपा है, कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान का श्री विग्रह के दो भाग हो गए शरीर कला पड़ गया। अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का जहर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया।
 सेठजी ने आज घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण चले गए।

शिक्षा :- भगवान को निवेदन करके भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है।
आइये आज से ही नियम लें कि भोजन बिना भोग लगाएं नहीं करेंगे।

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हालीवुड के एक्शन हीरो और बाडी बिल्डर एथलीट रहे अर्नाल्ड शेवारडनेजर ने एक फोटो पोस्ट की है –
अपनी मूर्ति के नीचे सोते हुए जो उस होटल मे लगी है जिसका फीता उन्होने कैलीफोर्निया के गवर्नर रहते काटा था ,होटल ने उनकी मूर्ति लगाते हुए उन्हे आजीवन होटल मे रूम फ्री मे देने की घोषणा की थी , रिटायर होने के बाद एक दिन होटल में रूम मांगने पर होटल ने बुकिंग फुल है कह मना कर दिया , अपनी ही मूर्ति के पास सोये और लिखा – पद और रसूख जाने के बाद दुनिया आपके लिए एक आम आदमी की तरह है , इससे
सीखो और जियो👇

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संजय गुप्ता

स्वामी विवेकानंद रोज की तरह अपने पीतल के लोटे को मांज रहे थे। काफी देर तक लोटा मांजने के बाद जब वह उठे तो उनके एक शिष्य ने सवाल किया कि रोज-रोज इतनी देर तक इस लोटे को मांजने की क्या जरूरत है? सप्ताह में एक बार मांज लें या ज्यादा से ज्यादा तीन बार। बाकी दिनों में तो इसे पानी से सिर्फ खंगाल कर काम चलाया जा सकता है। इससे इसकी चमक बहुत फीकी तो नहीं होगी। विवेकानंद ने कहा – ‘बात तो सही ही कहते हो। रोज-रोज पांच-दस मिनट इसमें बर्बाद ही होते हैं।’

उसके बाद उन्होंने उसे नही मांजा। कुछ ही दिनों में उस लोटे की चमक फीकी पड़ने लगी। सप्ताह भर बाद विवेकानंद ने उस शिष्य को बुलाया और कहा कि मैंने इसे रोज मांजना छोड़ दिया, अब आज फुरसत में हो तो इस लोटे को साफ कर दो। शिष्य ने हामी भरी और कुएं पर ले जाकर मूंज से लोटे को मांजना शुरू कर दिया। बहुत देर मांजने के बाद भी वह पहले वाली चमक नहीं ला सका। फिर और मांजा, तब जाकर लोटा कुछ चमका।

विवेकानंद मुस्कुराए और बोले – ‘इस लोटे से सीखो। जब तक इसे रोज मांजा जाता रहा, यह रोज चमकता रहा। तुमको इसकी रोज की चमक एक सी लगती होगी, लेकिन मुझे यह रोज थोड़ा सा और ज्यादा चमकदार दिखता था। मैं इसे जितना मांजता, यह उतना ज्यादा चमकता। रोज ना मांजने के कारण इसकी चमक जाती रही। ठीक ऐसे ही साधक होता है। अगर वह रोज मन को साफ न करे तो मन संसारी विचारो से अपनी चमक खो देता है,इसको रोज ज्ञान से चमकाना चाहिए।यदि एक दिन भी अभ्यास छोड़ा तो चमक फीकी पड़ जाएगी।
इसलिए अगर स्वयं को मजबूत स्तंभ देना चाहते हो तो अभ्यास करो, तभी इस लोटे की तरह चमक कर समाज में ज्ञान की, परमात्मा की रोशनी बिखेरोगे।