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झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है । रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ ??

वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी ।

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी । ज्यादातर भारतीयों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली ।

1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा ।

महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया । उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं भारत के लोग भी बराबरी से थे ।

आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं –~~~~~

15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ । ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा । ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई । तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया । गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे ।

मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए । मगर ऐसा नहीं हुआ ।

डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा । मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी । इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी । मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा ।

इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे । फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा ।

मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली । मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था । मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं । इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे ।

नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई । 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े । हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था । किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली । मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे । शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई ।

असल दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई । घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया । किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली । रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे ।

मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की । हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी ।

देखते-देखते दो साल निकल गए । ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे । मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा । मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें ।

मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया । मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे । उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए । वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए ।

ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया । वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया । मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया । वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे ।

हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया । मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की ।

उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है । रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है । बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं । इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा ।

फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की । वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए । हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था ।

सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े । मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी ।

इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी । उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली । ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया ।

दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया । 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ । दामोदर राव के दिन बहुत गरीबी और गुमनामी में बीते । इसके बाद भी अंग्रेज उन पर कड़ी निगरानी रखते थे । दामोदर राव के साथ उनके बेटे लक्ष्मणराव को भी इंदौर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी ।
इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं । रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था । तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है । झाँसी के रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भागों में रहते हैं । वे अपने नाम के साथ झाँसीवाले लिखा करते हैं ।

जब दामोदर राव नेवालकर 5 मई 1860 को इंदौर पहुँचे थे तब इंदौर में रहते हुए उनकी चाची जो दामोदर राव की असली माँ थी । बड़े होने पर दामोदर राव का विवाह करवा देती है । लेकिन कुछ ही समय बाद दामोदर राव की पहली पत्नी का देहांत हो जाता है । दामोदर राव की दूसरी शादी से लक्ष्मण राव का जन्म हुआ । दामोदर राव का उदासीन तथा कठिनाई भरा जीवन 28 मई 1906 को इंदौर में समाप्त हो गया ।

अगली पीढ़ी में लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए । कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए ।

दामोदर राव चित्रकार थे उन्होंने अपनी माँ के याद में उनके कई चित्र बनाये हैं जो झाँसी परिवार की अमूल्य धरोहर हैं । लक्ष्मण राव तथा कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाईपिस्ट का कार्य करते थे ।

अरूण राव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवानिवृत्त हुए हैं । उनका बेटा योगेश राव सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है । वंशजों में प्रपौत्र अरुणराव झाँसीवाला, उनकी धर्मपत्नी वैशाली, बेटे योगेश व बहू प्रीति धन्वंतरिनगर इंदौर में रह रहे हैं ।

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डाकू भी तो वादे का पक्का होता था

नेता और प्रधान सेवक तो हर मोड़ पर झूठ बोलते है
#डाकू_मानसिंह कभी चम्बल के बीहड़ो के सरताज हुआ करता था ।
जिसने चम्बल के बीहड़ो में वर्ष 1939 से 1955 तक एक छत्र राज्य किया। करता था
एक बार आगरा में डकैती करने गए सेठ को पहले सूचना भेज दिया गया था।
उस समय डकैती करने से पहले सूचना चिठ्ठी के द्वारा भेज दी जाती थी।
अंग्रेज पुलिस कप्तान छुट्टी लेकर आगरा से भाग जाता था
तय समय पर ही डकैती शुरू हुई।
मान सिंह सेठ के साथ उसके बैठक में बैठ गए।
सेठ ने तिजोरी की सभी चाभियां मान सिंह को दे दी और बोला मेरी चार जवान बेटिया घर में है।
इनकी इज्जत मत लूटना।
मान सिंह ने कहा हम धन लूटते है, इज्जत नहीं।
इसी बीच एक डकैत ने सेठ की एक बेटी से छेड़खानी कर बैठा।
लडकी चिल्लाने लगी।
लडकी की आवाज सुनकर सेठ घर के अंदर की ओर भागा। बेटी ने कहा, “एक डकैत ने मेरे साथ छेड़खानी की है।”
मान सिंह ने पूरे गिरोह को लाइन में खड़ा किया लड़की को अपने पास बुलाया बोले, “बेटी पहचान कौन था?”
और जैसे ही लड़की ने डाकू को पहचाना,
मानसिंह ने डाकू को गोली मार दी।
उस सेठ से माफ़ी मांगी व सारा सामान उसके घर में ही छोड़कर साथी की लाश लेकर लौट गए।
ये था भारत के डकैतो का चरित्र।
लेकिन आज के सफेदपोश राजनैतिक डकैतो ने अपनी सारी हदें पार कर दी है।
उन्नाव, कठुआ और मुजफ्फरपुर आदि की बेटियों की चीखे आज भी उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर और बिहार के वीरानों में गूंज रही है।
कोई उन चीखों को सुनना नहीं चाहता।
कोई राजनेता या कोई अधिकारी या कोई प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री इन हैवानो के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहा है। इज्जत लूटने वाले मिलकर बच्चियां का आबरू लूट लिया
विजय माल्या ,,नीरव मोदी ,,मेहुल चौकसी,,धन लूट लिया
कहाँ गई भारतीय संस्कृति की रक्षा की बड़ी बड़ी बातें करने वाला प्रधान सेवक
“यत्र नारी पूजयन्ते, तत्र रमन्ते देवता” की संस्कृति उदाहरण दम तोड़ रही है।
और राज नेता राजनैतिक अराजकता के लाल किला पर चढ़ कर खूब झूठ पे झूठ प
झूठा सपना दिखायेगा और घरयाली आंसू बहायेगा आंख से अत्याचारी बेटी को लेकर

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वोटर और गधा

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एक नेता वोट माँगने के लिए एक बूढ़े आदमी के पास गया । और उनको 1000/- रुपये पकड़ाते हुए कहा, “बाबा जी, इस बार वोट मुझे दें।”
बाबा जी ने कहा, बेटा मुझे पैसे नही चाहिए। वोट चाहिए तो एक गधा खरीद के ला दो!
नेता को वोट चाहिए था, वो गधा ढूँढने निकला। मगर कहीं भी 20,000/- से कम क़ीमत पर कोई गधा नही मिला। तो वापस आकर बाबा जी से बोला, मुनासिब क़ीमत पर कोई गधा नही मिला। कम से कम 20,000/- का एक गधा है। इसलिए मैं आपको गधा तो नहीं दे सकता।
बाबा जी ने कहा, “बेटा, वोट माँग कर शर्मिंदा ना करो!”
“तुम्हारी नज़र में मेरी कीमत गधे से भी सस्ती हैं! जब गधा 20,000/- से कम में नही बिका तो मैं तो इंसान हूँ 1000/- में कैसे बिक सकता हूँ ?
Elections 2019

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जैसी संगति वैसा चरित्र!!!!!!

संजय गुप्ता

संगति का सबसे बड़ा गहरा प्रभाव पडता है। हम जैसे साथियों के साथ रहते हैं, उनके अच्छे और बुरे स्वभाव का असर हम पर भी धीरे धीरे पडने लगता है। यदि हमारे मित्र या साथी ऐसे हैं जो बहुत ही बुद्धिमान पढ़ने में अत्यन्त रुचि रखने वाले तथा माता पिता एवं गुरुजनों के आज्ञाकारी हैं तो निश्चित रूप से एक दिन हम भी ऐसे ही बन जाएंगे लेकिन यदि हमारे साथी आवारा गाली गलौज करने वाले तथा झगडालू स्वभाव के हैं तो हमें भी गालियां देने में सकोंच नहीं होगा तथा हमारे चारों ओर जिस तरह का वातावरण होगा उसी से हम अच्छे और बुरे व्यक्ति के रूप में ढल जाएंगे।

कण्व ऋषि के वंश में सौभरि नामक एक अत्यन्त विद्वान् महापुरुष उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने गुरुकुल में रहकर वेदों का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने संसार को और परमार्थ को अच्छी तरह समझ लिया था। वे ये जान गए थे कि संसार की प्रत्येक वस्तु एक दिन समाप्त हो जाती है। जो वस्तु आज हमें सुख देती है, अत्यन्त प्रिय लगती है, उसका अधिक सेवन करने से वही बुरी लगने लगती है।

फिर यदि उसमें सुख है तो सभी को अच्छी लगनी चाहिए लेकिन कुछ उसे बिल्कुल भी पंसद नहीं करते। यह स्थिति संसार की प्रत्येक वस्तु के साथ है चाहे वह खाने पीने की हो, पहनने ओढ़ने की हो या हमारे प्रयोग में आती हो। इस प्रकार उनका मन संसार की किसी वस्तु में नहीं लगता था बस भगवान के भजन में तथा वेद शास्त्रों के अध्ययन मनन तथा चिंतन में ही वे लगे रहते थे।

उनका मन उनसे बार बार कहता कि घर छोडकर किसी शांत सुंदर प्राकृतिक स्थान पर चला जाए तथा वहां रहकर तपस्या की जाए। माता पिता को भी पुत्र की इस भावना का पता लग गया। उन्होंने उसे बहुत समझाया- ‘बेटे प्रत्येक वस्तु समय पर ही अच्छी लगती है। तुम युवा हो इस समय यद्यपि तुम्हारी भावनाएं वैराग्य की ओर हैं लेकिन युवावस्था में मन बड़ा चंचल होता है, वह जरा सी देर में डिग जाता है।

इस समय तुम्हें गृहस्थी बसाना चाहिए तथा गृहस्थी धम का पालन करने के पश्चात् फिर संसार को त्याग कर भगवान का भजन करना। कोई तुम्हारे इरादे में बाधा नहीं डालेगा और उस समय चूंकि तुम संसार को देख लोगे तुम्हारा चित्त पूरी तरह स्थिर रहेगा। तुम दृढता के साथ भगवान के भजन में लग सकोगे। लेकिन सौभरि विवाह करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हुए। उन्हें गृहस्थी बसाकर वृद्धावस्था की प्रतीक्षा करना समय बरबाद करना ही लगा।

वे दूसरों के गृहस्थ जीवन को देख चुके थे। उन्हें उस सबसे घृणा थीं। हां कभी कभी वे यह अवश्य विचार करते थे कि क्या माता पिता की आज्ञा का पालन न करना उचित है लेकिन अन्दर से फिर आवाज़ आती कि आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति अर्थात् आत्मकल्याण ही सबसे प्रिय वस्तु है। वे इस द्वंद्व में कुछ दिनों तक फंसे रहे। आख़िर इसी निश्चिय पर पहुंचे कि सत्य का अनुभव करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है और एक दिन चुपचाप घर त्यागकर वन में चले गए।

चलते चलते वह यमुना नदी के किनारे एक अत्यन्त सुन्दर स्थान पर पहुंचे जिसे उन्होंने अपनी तपस्यास्थली के रूप में चुना। वहां चारों ओर हरे भरे वृक्ष फल और फूलों से लदे हुए थे जिन पर रंगबिरंगी चिडियां चहचहाती रहती थीं।

यमुना नदी धीर गंभीर गति से बहती रहती। हवा के झोंकों द्वारा उत्पन्न छोटी छोटी लहरें किनारे से आकर टकराती और हल्की सी मीठी ध्वनि उत्पन्न करतीं जो महात्मा सौभरि के मन को गुप्त ध्वनि के समान लगती और उसी को एकाग्र होकर सुनते। जब वे जल में खडे होकर अथवा बैठकर ध्यान लगाते तो छोटी बडी मछलियां उनके चारों ओर किलोल करती रहती।

कभी कभी उनकी गोद में भी आकर रूक जातीं। शाम के समय आस पास के गांवों की विभिन्न रंग की गाएं झुंड के झुंड गले में पडीं घंटियां बजाती हुई थकी मांदी थनों में दूध के भार को लिए जब लौटती तो उन्हें देखकर महात्मा सौभरि का मन झूम उठता।

अनेक दिन ऐसे बीत गए। सर्दी और गर्मी उनके लिए समान थी। वर्षा के दिनों में नदी का जल ऊपर तक उफन आता तथा किनारे तोडकर बहने लगता लेकिन ऋषि का मन न तो बढता और न घटता। वह तो समान रूप से शांत और स्थिर रहता। धीरे धीरे वर्षों बीत गए। जो भी उनकी तपस्या को देखता आश्चर्य करता। कभी वे वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए दिनों बैठे रहते और कभी पानी के अंदर।

जाडों में जब ठण्ड के मारे शरीर अकड़ जाता बर्फीली हवाएं शरीर को कंपा देतीं, वे खुले बदन ऐसे ही बैठे रहते।

गर्मी के दिनों में जब झुलसा देने वाली लू चलती वे धूप में बैठकर अग्नि तापते। उनका शरीर जड़ हो गया था उस पर किसी प्रकार का कोई असर नहीं पडता। भूख प्यास तो पूरी तरह उनके नियन्त्रण में थीं।

जो कुछ जंगल से फल फूल मिल जाते अथवा गांव वाले कभी दे जाते वहीं उनका भोजन था। मिल गया तो ठीक नहीं तो प्रभु इच्छा। वर्षों बीत गए, यहीं पता नहीं चला कि जवानी कब चली गई। लम्बी दाढी और मूछों ने चेहरे को ढ़क लिया। सिर के बाल भी श्वेत होने लगे। अचानक मीठे दूध से भरे कटोरे में विष की बूंद गिरी या कहें कि देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी जिसमें कि वे बुरी तरह असफल हुए। वे प्रायः पानी के अंदर बैठकर तपस्या किया करते थे। मछलियां उनके चारों ओर तैरती ही रहती थीं। वे ऋषि की परिक्रमा सी करती रहतीं और उनके शरीर को छूती फिसलती रहती। वे जरा भी उनकी उपस्थिति से विचलित नहीं होतीं।

एक दिन अचानक ऋषि का ध्यान कुछ अधिक ही उनकी ओर चला गया। उन्होंने देखा कि एक मत्स्य जोडा कितने आनन्द से एक दूसरे का पीछा कर रहा है तथा किस तरह से लड़ते झगड़ते तथा मुस्कराते हुए लग रहे हैं। उनके चारों ओर उनके अनेक बच्चे इधर उधर घूम रहे हैं तथा पानी में खेल रहे हैं। अचानक ऋषि सोचने लगे, यह भी संसार का एक आनन्द है जिससे मैं वंचित रह गया। इसमें भी सुख है जिसकी वजह से लगभग सभी मनुष्य गृहस्थ धर्म का पालन करते हैं। मुझे इसे भी भोगना चाहिए था।

मेरे पिता ने मुझे कितना समझाया, लेकिन मैंने उनकी एक न मानी। वे बेचैनी के साथ पानी से बाहर निकल आए। उनका मन चंचल हो उठा। वह किसी प्रकार भी शांत न होता था और न भगवान के ध्यान में लगता था।

जब भी वे ध्यान करने बैठते उन्हें मछलियां दिखाई देने लगतीं, जो हंसी-खुशी से पानी में किलोल करती फिर रही थीं। यह उन मछलियों की नित्य प्रति की संगति का ही प्रभाव था जिसने ऋषि सौभरि की तपस्या को भंग कर दिया था । वास्तव में ऋषि ने संयम के द्वारा अपने शरीर को तो तपा लिया, अपने बस में कर लिया लेकिन वे अपने मन को नहीं बदल सके। शरीर और इन्द्रियों के नियंत्रण के साथ- साथ मन का बदलना भी आवश्यक है। जब तक वह नहीं बदलता, कुछ नहीं पाया जा सकता।

एक दिन उन्होंने कुछ निश्चय किया और अपना स्थान छोडकर एक ओर को चले दिए। चलते- चलते वे सिंध प्रदेश में सबसे अधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी राजा ‘त्रसद्दस्यु’ के दरबार में सहसा उपस्थित हो गए। राजा त्रसद्दस्यु का नाम वास्तव में साथक था उनके नाम से ही आर्यों के शत्रु दस्यु राजा कांपने लगते थे। उन्होंने कभी भी अपने शत्रुओं को सिर नहीं उठाने दिया था।

वे ऋषि-महर्षियों का भी बड़ा आदर-सम्मान करते थे। सौभरि ऋषि का नाम सारे भारत में विख्यात था उनकी तपस्या से सभी चमत्त्कृत थे। उन्हें दरबार में अचानक देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। राजा ने सिंहासन छोडकर उनका स्वागत किया तथा उन्हें जल आदि से तृप्त करके सुखपूर्वक बैठाया और तब उनसे कुशल-मंगल पूछते हुए अत्यन्त विनम्रता के साथ आने का प्रयोजन जानना चाहा।

ऋषि बोले, ‘मैं तुम्हारी कन्या से विवाह करने का इच्छुक हूँ।’ राजा इस बात को सुनते ही सकते में आ गए। वे सोचने लगे कि कहां यह वृद्ध ऋषि और कहां मेरी सुकुमारी बेटी! क्या यह उचित होगा कि मैं अपनी युवा बेटी का विवाह इस वृद्ध पुरुष के साथ कर दूँ। अन्य राजा लोग क्या कहेंगे, मेरी प्रजा में क्या ख्याति रह जाएगी। इस वृद्ध को देखो, इस आयु में गृहस्थ जीवन बिताने की सोच रहा है, लेकिन इन्कार भी नहीं किया जा सकता।

यदि कहीं क्रुद्ध हो गए तो राज्य की खैर नहीं। अंत में राजा ने एक युक्ति सोच ली। वे बोले, ‘महात्मन्, हम लोग क्षत्रिय हैं, हमारे यहाँ स्वयंवर का रिवाज है , आप मेरे साथ अंत:पुर में चलें, जो राजकुमारी आपको पसंद कर लेगी मैं उसी से आपका विवाह कर दूँगा।’ दोनों महल के रनिवास की ओर चल दिए। रास्ते में ऋषि ने अपने तपोबल से एक अत्यन्त सुंदर युवा का रूप धारण कर लिया।

वे ऐसे लगने लगे जैसे साक्षात सौन्दर्य के देवता अनंग हो। जैसे ही महल में पहुँचे और राजा ने आगन्तुक के आने का कारण बताया, सभी राजकुमारियों ने ऋषि के सौंदर्य और आकर्षण को देखकर उन्हें घेर लिया तथा सभी उनके साथ विवाह करने के लिए उत्सुक हो गई उनकी संख्या पचास थी ।

राजा ने यह स्थिति देखकर शुभ मुहुर्त में अत्यन्त उत्साह एवं उल्लास के साथ सभी राजकुमारियों का विवाह ऋषि सौभरि के साथ कर दिया। उन्हें इतना घर गृहस्थी का सामान दिया कि ऋषि को किसी प्रकार की भी कोई चिन्ता न रही । गायों के झुंड, घोडे विभिन्न प्रकार के वस्त्र, रत्न तथा आभूषण प्राप्त करके ऋषि का मन आनन्दित हो गया। रास्ते में ऋषि ने इन्द्र देवता की प्रार्थना की और उन्हें यज्ञ में उपस्थित होकर भेंट स्वीकार करने का आग्रह किया।

उन्होंने यही चाहा कि उनका यौवन सदा बना रहे, उनकी पत्नियां उनसे सदा प्रसन्न रहें। वे कभी आपस में कलह न करें। देवताओं के भवन निर्माता विश्वकर्मा उनके लिए यमुना के किनारे पर एक सोने का महल बना दें जो धन-धान्य से पूर्ण हो तथा जिसके चारों ओर स्वर्गीय फलों और फूलों की वाटिकाएं हों ताकि वे गृहस्थ का भरपूर सुख उठा सकें। इन्द्र देवता उनकी तपस्या और प्रार्थना से पहले ही संतुष्ट थे। उन्होंने ‘तथास्तु’ कहा और स्वर्ग ओर प्रस्थान कर गए। अब ऋषि आनन्दपूर्वक अपने दिन बिताने लगे।

चारों ओर सुंदर स्त्रियों का समूह, हास–परिहास तथा भांति–भांति के खेल।

वर्षों बीत गए, समय का पता नहीं चला। छोटे-छोटे बच्चों की तोतली बोली उनके मन में आनन्द की लहरें उठाती रहती। परन्तु धीरे-धीरे मन अब फिर उकताने लगा। मन ने प्रश्न किया, क्या यह सत्य है, सदा ऐसे ही रहेगें? वैराग्य की वृत्ति ने फिर सिर उठाना प्रारम्भ किया। जिस वस्तु को प्राव्त करने के लिए मन अथक परिश्रम करता है और जब उस प्राप्त कर लेता है तो वह भोगते-भोगते नीरस हो जाती है। ऋषि के मन में विचार आया कि तूने किस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए घर छोडा था और फिर एक इतना बड़ा जंगल खडा कर लिया।

जिसके लिए मैंने अपनी वर्षों की घोर तपस्या का त्याग किया क्या वास्तव में यह उससे बडी वस्तु है। क्या इसी मनुष्य सुखमय गृहस्थ जीवन कहते हैं। इससे तो मैं कल्याण का रास्ता छोड़ बैठा और संसार में फंस गया। मैनें योग का रास्ता सांसारकि भोगों के लिए छोड दिया।

कितनी बडी भूल की। इस समय उन्हें सच्चा वैराग्य उत्पन्न हो गया था। युवावस्था का वैराग्य कच्चा था, अनुभवहीन था। उन मछलियों की सगंति ने उनके स्वभाव को परिवर्तित कर दिया था। उन्होंने तपस्या के समय की शांति, सतोंष और मन की स्थिरता को देखा था और अब गृहस्थ के सुख को भी भोगा।

तब उनकी समझ में यह आया कि गृहस्थ का अनुभव भी आवश्यक है और एक दिन जब उनके सभी बच्चे समर्थ हो गए तो उन्होंने गृहस्थी का त्याग कर दिया और जंगल में जाकर पुनः तपस्या में रत हो गए तथा अंत में भगवान के दर्शन करके आवागमन के चक्र से सदा-सदा के लिए मुक्त हो गए।

उनकी पत्नियों पर भी उनकी संगति का गहरा प्रभाव पडा। वे सब भी उन्हीं के बताए हुए मार्ग पर चल पडी और सदगति को प्राप्त हुई। इसलिए सदा अच्छे मित्रों, साथियों तथा सज्जन व्यक्तियों को ढूंढते रहना चाहिए तथा उन्हीं की सगंति में रहना चाहिए।!!!!!

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संजय गुप्ता

एक दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के दरबार में एक मदारी अपने रीछ के साथ प्रस्तुत हुआ।

मदारी के द्वारा सिखाए गए करतब रीछ ने संगत के सामने प्रस्तुत करने शुरू किए।

कुछ खेल इतने हास्य से भरपूर थे कि संगत की हंसी रोके से भी ना रुक रही थी।

करतब देख श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज मुस्कुरा रहे थे।

एक सिख के ठहाकों से सारा दरबार गुंजायमान था।
वो सिख था श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज पर चवर झुलाने की सेवा करने वाला, भाई किरतिया।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने पूछा- भाई किरतिया! आप इन करतबों को देखकर बड़े आनंदित हो।

भाई किरतिया ने कहा- महाराज! इस रीछ के करतब हैं ही इतने हास्यपूर्ण।
देखिए! सारी संगत ही ठहाके लगा रही है।
और मुस्कुरा तो आप भी रहें हैं दातार।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने कहा- हम तो कुदरत के करतब देखकर मुस्कुरा रहे हैं भाई किरतिया।

भाई किरतिया ने कहा- कुदरत के करतब! कैसे महाराज?

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने कहा- भाई किरतिया! क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है?

भाई किरतिया ने कहा- नहीं दाता! ये बातें मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ?

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने बताया- भाई किरतिया! रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और कोई नहीं,
बल्कि आपके पिता भाई सोभा राम हैं।

भाई किरतिया को जैसे एक आघात सा लगा।
सर से लेकर पांव तक सारा शरीर कांप गया।
कुछ संभले तो हाथ में पकड़े चवर को गुरुपिता के चरणों में रख दिया और बोले- सारा संसार जानता है कि मेरे पिता भाई सोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की।
उन्होंने एक दिन भी गुरुसेवा के बिना व्यतीत नहीं किया।
अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है गुरु जी,
तो फिर सेवा करने का कोई लाभ ही नहीं है।

तब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने कहा- भाई किरतिया! आपके पिता भाई सोभाराम ने गुरुघर में सेवा तो खूब की,
लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नहीं मिटाया।
अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा।
एक दिन हमारा एक सिख अपनी फसल बैलगाड़ी पर लादकर मंडी में बेचने जा रहा था,
कि राह में गुरुद्वारा देखकर मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई।
बैलगाड़ी को चलता छोड़कर वो सिख गुरुघर में‌ अंदर आ गया।
गुरबानी का पावन हुक्मनामा चल रहा था।
हुक्मनामा सम्पूर्ण हुआ तो भाई सोभाराम ने प्रसाद बांटना शुरू किया।
उस सिख ने विनती की- भाई सोभाराम जी! मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये,
मेरे बैल चलते-चलते कहीं दूर ना निकल जाएं।
मेरे सिख के मैले कपड़ों से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए तेरे पिता भाई सोभाराम ने कहा- अच्छा-अच्छा! थोड़ा परे होकर बैठ।
तेरी बारी आने पर देता हूँ।
बैलगाड़ी की चिंता उस सिख को अधीर कर रही थी।
सिख ने दो-तीन बार फिर विनती की,
तो तेरे पिता भाई सोभाराम ने प्रसाद तो क्या देना था,
उल्टा मुख से दुर्वचन दे दिए और कहा- मैंने कहा न! अपनी जगह पर बैठ जा।
समझ नहीं आता क्या?
क्यों रीछ के जैसे उछल-उछल कर आगे आ रहा है।
तेरे पिता के ये कहे अपशब्द,
मेरे सिख के साथ-साथ मेरा हृदय भी वेधन कर गए।
सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी,
और उसी कण को गुरुकृपा मान अपने मुख से लगाकर वो सिख तो अपने गन्तव्य को चला गया,
लेकिन व्यथित हृदय से ये जरूर कह गया- सेवादार होने का मतलब है,
जो सब जीवों की श्री गुरु नानक देव जी जान कर सेवा करे और श्री गुर नानक देव जी जान कर ही आदर दे।
जो सेवा करते और वचन कहते ये सोचे,
कि वो वचन श्री गुरु नानक देव जी को कह रहा है।
प्रभु से किसी की भावना कहां छिपी है।
हर कोई अपने कर्म का बीजा ही खायेगा।
रीछ मैं हूँ या आप ये तो गुरु पातशाह ही जानें।
सिख तो चला गया,
लेकिन तेरे पिता की सर्व चर्चित सेवा को श्री गुरु नानक देव जी ने स्वीकार नहीं किया।
उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम‌ आज रीछ बन कर संसार में लोगों का मनोरंजन करता फिरता है।
इसका उछलना, कूदना, लिपटना और आंसू बहाना सबके लिए मनोरंजन है।

तब भाई किरतिया ने विनती की- गुरु पिता! मेरे पिता को इस शरीर से मुक्त करके अपने चरणों में निवास दीजिये।
—— हम बारिक मुग्ध इयान ——
—— पिता समझावेंगे ——
—— मोहे दूजी नाही ठौर ——
—— जिस पे हम जावेंगे ——
हे करुणानिधान! कृपा करें और मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें।

और फिर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया।
भाई सोभाराम ने रीछ का शरीर त्यागकर गुरु चरणों में स्थान पाया।

गुरु जी से क्षमा मांगकर और चवर को उठाकर भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगे।
Om shanti devine souls
Jra muskraye kaisse BHI
Radhey Radhey jee

—— तात्पर्य ——
हम जब तक मैं यानि घमंड नहीं छोड़ेंगे,
तब तक पूजा-पाठ, जप-तप और गुरु-सत्गुरु की सेवा करने का कोई भी फायदा नहीं है।

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// बेल्ट //–

ज्योति अग्रवाल
शादी के एक महीने बाद एक दिन राज ने थोडी तेज आवाज में ऋतू से बोला “यार खाने में इतनी नमक!!!!कैसे खाना बनाया तुमने”?

जब पाँच मिनट तक ऋतू की कोई जबाब नही आया तो वह फिर चिल्लाया “ऋतू कहाँ हो तुम”!!।फिर जब उठकर देखने गया तो देखा ऋतू बेहद डरी सहमी घबराई सोफे के कोने में सिकुड़ी हुई बैठी है और सामने राज के टंगे पैंट के बेल्ट की तरफ देख रही है ।कड़ाके की ठंड में भी उसका पूरा शरीर पसीने से तर बतर है।वह ऐसे काँप रही थी जैसे कोई बच्चा पिटाई के डर से काँपता है।

राज ने आज से पहले ना तो कभी ऐसे आवाज़ में ऋतू से बात की थी ना ही कभी उसे ऐसे हाल में देखा था।वह ऋतू को बहुत प्यार करता था ,जैसे ही ऋतू के पास गया “मुझे मत मारो!!!! “”मुझे मत मारो !!!!”कहते हुए एकदम एब्नार्मल सी होकर राज के पैरों में गिर गयी।बार बार उसकी नज़र पैंट के उस बेल्ट पर जा टिकती थी।

डॉ राज ने तुरंत ऋतू को अपनी बाहों में भर लिया पानी पिलाया और बड़े प्यार से पूछा की इतना डर क्यों?तुम्हें हुआ क्या? इतनी छोटी सी बात पे इतनी घबराहट क्यों?और तुम ये बार बार बेल्ट की तरफ क्यों देख रही थी?

थोडा नार्मल होते ही ऋतू न रोते हुए राज को गले लगा लिया और बोली” जब से होश संभाला तो अपने घर पे बचपन से ही देखती आयी कि माँ की छोटी छोटी गलती पे भी पापा माँ पे गुस्से से जोर जोर से चिल्लाते और मेरे सामने बेल्ट से बहुत मारते थे।बहुत बुरी तरह मार खाने के बाद भी माँ मेरे कारण जोर जोर से रोती भी न थीं और मुझे हमेशा सीने से लगाये रखतीं थी यक़ीनन मेरे लिए ही वह पूरी जिंदगी मार खाकर जिन्दा रहीँ नही तो पता नही कब की मर जाती।पापा अपनी नाकामी और ऑफिस के तनाव हमेशा माँ पे ही निकालते थे।”

मुझे तुम्हारी चिल्लाहट से लगा जैसे बेल्ट से हमेशा माँ की पिटाई होती थी वैसे ही आज मेरी होने वाली है…….

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जीने की कला

अनूप सिन्हा

                     छोड़ो  चिन्ता-दुश्चिन्ता को

तनाव का बोझ

   श्री अनन्त राव एक बड़ी कम्पनी के उपप्रबंधक थे ।  वे एक दक्ष और इमानदार तथा जिम्मेदार अधिकारी के रूप में जाने जाते थे और अन्ततः उन्हें महाप्रबंधक बना दिया गया ।  इस कार्य में उनकी सहायता हेतु अनेक लोग नियुक्त थे; तथापि महाप्रबंधक बनने के पन्द्रह दिनों के भीतर ही वे दिल की तेज धड़कन और भय से पीड़ित होने लगे ।  रात में उन्हें अच्छी नींद भी नहीं आ पाती थी ।  चिकित्सकों ने बताया कि उनके कार्यभार में अत्यधिक वृद्धि के कारण ही ऐसा हुआ है ।  महत्वपूर्ण निर्णय लेने हों या असहयोगी कर्मचारियों का सामना करना हो, वे सर्वदा स्वयं को थका हुआ तथा परिस्थितियों से तालमेल बिठा पाने में असमर्थ पाते थे ।  वे स्वीकार ही नहीं कर पाते थे कि ये उनकी बीमारी के मनोवैज्ञानिक लक्षण हैं ।  परन्तु उनके चिकित्सकों का निश्चित मत था कि मानसिक तनाव ही इसका एकमात्र कारण है ।  चिकित्सकों के परामर्श पर वे छुट्टी लेकर चले गए ।  उनकी अनुपस्थिति में एक अन्य अधिकारी ने दक्षतापूर्वक उनका कार्य सम्हाल लिया ।  उसने सभी कार्यों को सुचारूरूप से सम्पन्न किया तथा समस्याओं को निपटाया ।  बाद में छुट्टी बिताकर लौट आने पर श्री राव को अपने कार्य के संचालन में कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई और वे स्वस्थ हो गये ।
  डाक्टर अलेक्सिस कैरेल ने ठीक ही कहा कि,  'जो व्यवसायी चिन्ताओं से निपटना नहीं जानते, वे अल्पायु में ही काल-कलवित हो जाते हैं ।'

मौन-व्यथा

  सुजाता एक अच्छे खानदान की, उच्च शिक्षा प्राप्त तथा सदाचारी युवती थी ।  उसके पति सुयोग्य और अच्छे पद पर कार्यरत थे ।  विवाह के शीघ्र बाद ही उसे पता चला कि उसके पति शराबी हैं ।  उसे काफी दुःख हुआ, पर वह हताश नहीं हुई ।  उसने अपने पति की यह आदत छुड़ाने के लिए साहस तथा धैर्यपूर्वक प्रयत्न किया ।  दो वर्षों तक लगन  के साथ वह अपने इस प्रयास में जुटी रही, परन्तु पड़ोसियों के व्यंग्यवाणों को सहना उसके लिए असह्य हो गया ।  जब उसका पति सुरापान करके घर आता और उसके साथ बुरा बर्ताव करता, तो वह अवसाद से टूट जाती ।  निराशा के घने बादल कर्मशः उसके मन तथा जीवन को तमसाच्छन्न करने लगे ।  सुखद भविष्य का उसका सपना चूर-चूर हो गया ।  वह शरीर के दर्द, अनिद्रा तथा थकावट से पीड़ित हो गयी ।  ये सभी चिन्ता के दुःखद उपहार हैं ।  संकट से मुक्ति और मानसिक शान्ति बनाये रखने के लिए धैर्य तथा साहस का आश्रय लेना आवश्यक है ।  तो फिर उपाय क्या है  ? ऐसे उत्कृष्ट गुण हम कहाँ से प्राप्त करें ?
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कार्तिक परासर

💕 राधे 💕 राधे 💕
एक छ साल का छोटा सा बच्चा अक्सर परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो परमात्मा के साथ खाये।
एक दिन उसने एक थैले में पांच – छे रोटियां रखीं और परमात्मा को ढूंढने निकल पकड़ा, चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया, उसने देखा नदी के तट पर एक बुजुर्ग बूढ़ा बैठा हैं, और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों, वो छ साल का मासूम बालक, बुजुर्ग बूढ़े के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया और उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढे की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढे ने रोटी ले ली, बूढ़े के झुर्रियों वाले चेहरे पर अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे।
बच्चा बुढ़े को देखे जा रहा था, जब बुढ़े ने रोटी खा ली बच्चे ने एक और रोटी बूढ़े को दी, बूढ़ा अब बहुत खुश था, बच्चा भी बहुत खुश था, दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये, जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाज़त ले घर की ओर चलने लगा, वो बार बार पीछे मुड़ कर देखता, तो पाता बुजुर्ग बूढ़ा उसी की ओर देख रहा था, बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटा बहूत खुश नजर आ रहा था।
माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा, तो बच्चे ने बताया कि माँ, आज मैंने परमात्मा के सांथ बैठ कर रोटी खाई, आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई, माँ परमात्मा बहुत बूढ़े हो गये हैं, मैं आज बहुत खुश हूँ।
उस तरफ बूढ़ा बुजुर्ग भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा बूढ़ा बहुत खुश हैं, तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा, बूढ़ा बोलां की मैं दो दिन से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था, मुझे पता था परमात्मा आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे, भगवान आए थे, उन्होंने मेरे साथ बैठ कर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया, परमात्मा बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं…..
असल में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में परमात्मा के लिए सच्चा प्यार था, और परमात्मा ने दोनों को, दोनों के लिये, दोनों में ही खुद को भेज दिया, जब मन परमात्मा के भक्ति में रम जाता है तो हमे हर एक में वो ही नजर आने लग जाते है, इस तरह परमात्मा हमारे आस-पास ही हैं, जरूरत है तो उसे महसूस करने की….
जय श्री कृष्णा………

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लष्मीकांत विजय गढ़िया

एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं? चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?
हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वह क्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।
तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा,तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।
पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें।
उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी।
सुना है कि चित्रकार अब तक छाती पीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!
आदमी करीब-करीब इस हालत में है। परमात्मा ने जो दिया है, वह बंद है, छिपा है। और हम मांगे जा रहे हैं–दो-दो पैसे, दो-दो कौड़ी की बात। और वह जीवन की जो संपदा उसने हमें दी है, उस पर्स को हमने खोल कर भी नहीं देखा है।
जो मिला है, वह जो आप मांग सकते हैं, उससे अनंत गुना ज्यादा है। लेकिन मांग से फुरसत हो, तो दिखायी पड़े, वह जो मिला है। भिखारी अपने घर आये, तो पता चले कि घर में क्या छिपा है। वह अपना भिक्षापात्र लिये बाजार में ही खड़ा है! वह घर धीरे-धीरे भूल ही जाता है, भिक्षा-पात्र ही हाथ में रह जाता है। इस भिक्षापात्र को लिये हुए भटकते-भटकते जन्मों-जन्मों में भी कुछ मिला नहीं। कुछ मिलेगा नहीं।

Posted in साकाहारी

🔥🔥आर्य विचार 🔥🔥

नीरज आर्य

विधर्मी मुसलमानों और ईसाईयो के साथ साथ मांसाहारी हिन्दूओ तुम भी सुन लो,
महर्षि मनु लिखते है:-

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चैति घातकाः
मनु० 5.51
अर्थ:-पशु-हत्या की अनुमति देने वाला(जिसकी सम्मति के बिना ऐसी हत्या नहीं हो सकती अर्थात् सरकार) , शस्त्र से मांस काटने वाला, मारने वाला,खरीदने वाला,बेचने वाला,पकाने वाला,परोसने वाला और खाने वाला, ये सब घातक हैं,कसाई हैं,पापी हैं।

http://aryamantavya.in/manu-smriti/

ध्यान रहे, विधि-निषेध या धर्माधर्म के विषय में श्री राम भी मनुस्मृति को ही प्रमाण मानते थे। बालिवध के प्रसंग में जब बालि की आपत्तियों का राम से अन्यथा उत्तर न बन पडा तो उन्होंने मनु की ( जो उन्हीं के पूर्वजों में थे ) शरण ली और कहा —
श्रयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ ।
गृहितौ धर्मकुशलैस्तत्तथा चरितं मया ।। कि○ 18/30-31
अर्थ:-सदाचार कें प्रसंग में मनु ने दो श्लोक लिखे हैं । धर्मात्मा लोग उनके अनुसार आचरण करते हैं । मैंने वही किया है ।

आर्य समाज दे रहा आवाज,
जागो हिन्दूओ आज के आज।

आओ मिलकर चले वेदो की ओर