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शुभचिंतक
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उस कलंक की पीड़ा थी, जो कभी भी अपनी कालिमा से उसके अंतर्मन को मुक्त नहीं होने देगा. कलंक की पीड़ा झेलने से ज़्यादा कष्टदायी स्थिति तो यह थी कि जिस व्यक्ति के कारण मान-सम्मान पर गहरा-आघात लगा, वो महानता और सज्जनता का पर्याय बना बरसों, बल्कि कहूंगी आजीवन प्रशंसा के फूल बटोरता रहा. जिस झटके से मैं उठी थी और जिस मनोवेग में आकर प्रबलता से सामान बांधा था, वह टूटने व क्षीण होने लगा. सहसा ही हाथ-पैर बोझिल व शिथिल होने लगे. नारीशक्ति, आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति जैसे शब्द संबलहीन हो ढहने लगे. क्या यही मेरी असली पहचान है? क्या वाकई डॉ. प्रतिमा वर्मा, हिंदी विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष डॉ. विजय वर्मा की पत्नी इतनी कमज़ोर, लाचार व असहाय होनी चाहिए? नहीं! लेकिन सच यही है. इधर पति है, सम्मान है, उसकी अपनी एक पहचान है, उधर मां-बाप हैं, जो उसके सुख में आनंद पाते हैं, उसके दुख से आकुल-व्याकुल हो उठते हैं. कुछ निर्णय ले सकूं या तय कर पाऊं ये तो दूर की बात है. पहले इस आघात को सहने की शक्ति तो मिले. जो सोच रही हूं या जो चाहत होगी वो मां-बाबा के समक्ष रख पाऊंगी? क्या चालबाज को चालबाज कह पाऊंगी? क्या मां-बाबा को इस बात का विश्वास दिला पाऊंगी?
मां तर्क भाषा तो मानेंगी, किंतु समाज के डर से उनका मन उन तर्कों को दिल से बाहर आने ही नहीं देगा. बाबा जितने शांत थे, मां उतना ही हल्ला मचाए रहती थीं और मां का यही रवैया ज़िम्मेदार था कि घर की चारदीवारी से उठकर तूफ़ान दीवारों से आर-पार हो जाता था. उस पत्र के साथ भी यही हुआ था.
नुक्कड़-नुक्कड़ पर पान की हर छोटी-बड़ी दुकान पर उस चिट्ठी की चर्चा हुई थी. बड़े शहर के छोटे-मोटे मोहल्लों में कोई बात घर की दीवारों तक सीमित नहीं रह पाती है. वो गुमनाम पत्र भी तो मां के नाम आया था. भेजनेवाला जैसे मां के स्वभाव से परिचित था. पत्र देखकर मां घबरा उठी थीं. ये हमारा नाम कैसे जानता है? अरे, ये तो राजकुमार को भी जानता है? बाबा के आते ही बोली थीं, “देखो तो, किसी ने कैसा ग़ज़ब किया है. पहले ही सांवले रंग के कारण रिश्तों का अकाल है. अब ऐसी चिट्ठी के बाद कौन करेगा रिश्ता?” कहारिन के हाथ बर्तन घिस रहे थे, लेकिन कान मां के शब्दों का ज़ायका ले रहे थे. बाबा ने चिट्ठी अपने हाथ में ले ली थी और एक ही सांस में पढ़ गए. फिर हंसते हुए चिट्ठी मेरे हाथ में थमा दी थी. चिट्ठी पढ़कर मैं पसीने-पसीने हो गई थी. फिर भी हंसने की कोशिश की थी, “पर बाबा….”
“हां, हां! मैं जानता हूं तुम्हारा इस पत्र से कोई संबंध नहीं है, किसी विकृत मनःस्थिति वाले व्यक्ति की निकृष्ट हरकत है यें. कुछ लोग इतनी नीच प्रकृति के होते हैं कि उनसे दूसरे की सुख-शांति देखी नहीं जाती. दूसरों को मानसिक यातना देने में ऐसे लोगों को सुख मिलता है.”
फिर मेरे हैरान-परेशान चेहरे को देख बोले, “बेटी, जो दूसरों को पीड़ा देने में सुख का अनुभव करे उसे तो मानसिक रोगी ही माना जाएगा ना? इसे एक दुःस्वप्न समझ कर भूल जाओ.”
मां चिंतित तो हुई थीं, परंतु बाबा की इस व्याख्या व रवैये से हल्की हो गई थीं. मैंने पत्र को मुट्ठी में ज़ोर से दबा दिया, मानो वो चिट्ठी न होकर लिखने वाले की गर्दन हो. बाद में उसे आलमारी में रख दिया. सोचा, शिल्पा को दिखाऊंगी, वो पक्की जासूस है. कुछ तो पता करेगी. लेकिन तुरंत ही ख़याल आया, यदि उसने अन्य सहेलियों को बता दिया तो? नहीं, दिखाना ग़लत होगा. बाबा ठीक कहते हैं, इसे भूल जाना ही बेहतर है. लेकिन अर्धचेतन मन में वो पत्र सदा ही साफ़ शब्दों में ज्यों का त्यों अंकित रहा.
कभी शक़ होता- स्वयं राजकुमार ने ही तो नहीं लिखी…? मुझे बदनाम करके अपने नाम के साथ मेरा नाम जोड़कर कोई अतृप्त अभिलाषा पूरी करना चाहता हो? लेकिन भला वो ऐसा क्यों करेगा? वो बुरा आदमी है दुनिया की नज़र में, लेकिन हमारे साथ उसका बिल्कुल अलग व्यवहार है. और फिर मुझे बदनाम करने की उसे क्या ज़रूरत है.
राजकुमार हमारे पड़ोसी हैं, दुनिया उन्हें बुरा आदमी कहती है. हमारे घर उनका आना-जाना नीता के कारण शुरू हुआ. नीता मेरी कॉलेज की सहेली थी. राजकुमार नीता के बड़े भाई हैं. नीता उन्हें राजू भाई कहती थी, इसलिए हम सहेलियां भी उन्हें राजू भाई कहने लगीं. उम्र में वो नीता से 5-6 साल बड़े थे. उन्हें शराब की आदत थी. रोज़ ही पीते थे, साथ ही हर तरह के जुए का शौक़ था. नीता के घर खानदानी पैसा था. माता-पिता की मृत्यु के बाद बहन की ज़िम्मेदारी राजू भाई ने ही संभाली थी. अपनी अनेक कमज़ोरियों के बावजूद वो अंग्रेज़ी साहित्य के अच्छे विद्वान थे, शौकिया तौर पर कॉलेज में इंग्लिश पढ़ाते थे. हम सहेलियां अक्सर उनसे पढ़ने पहुंच जाया करती थीं. नीता की शादी के बाद भी हमारे घर उनका आना-जाना यथावत बना रहा. कभी अपने अकेलेपन को बांटने, तो कभी बाबा से सलाह-मशविरा लेने. बाबा को राजू भाई पर इतना भरोसा था कि मुझे अकेले कहीं जाना होता तो राजूभाई ही साथ जाते थे. राजू भाई ने भी बाबा के इस विश्वास का शतप्रतिशत मान रखा.
एक शाम मां-बाबा किसी प्रसंग में गए हुए थे. उनकी अनुपस्थिति में राजू भाई आ गए. मां-बाबा घर पर नही हैं ये जानते ही वो लौटने को हुए कि मैंने आग्रह कर उन्हें थोड़ी देर के लिए रोक लिया. अकेली बहुत बोर हो रही थी. रजनीश के दर्शन पर चर्चा छिड़ी तो समय का अंदाज़ ही नहीं रहा. अचानक दरवाज़े की घंटी बजी…
खोला, तो देखा वर्माजी थे. बहुत अरसे के बाद आए थे. इसके पहले कुल जमा तीन बार तो हमारे घर आए थे. इन तीन मुलाक़ातों में ही उनकी पारखी दृष्टि ने हम सबको परख लिया था. धीरे-धीरे उनसे हमारी घनिष्ठता-सी हो गई. वर्माजी हमारी यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष थे. मैं उनके अंतर्गत शोध कर रही थी. औपचारिकता निभाते हुए मैंने दोनों का परिचय कराया, तो राजू भाई बोले, “हम एक-दूसरे से परिचित हैं.”
पिछले ह़फ़्ते मेरे पैर में फोड़ा हो जाने के कारण मैं कॉलेज नहीं जा पाई थी. अतः बड़े आग्रह से मैंने उन्हें आमंत्रित किया था. वैसे भी वर्माजी की मेरे ऊपर विशेष कृपा थी. वे पूरी दिलचस्पी से मेरे शोधकार्य में सहायता कर रहे थे.
वर्माजी वो अभी तक अविवाहित थे. बचपन में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उन्होंने अपने तीनों भाई-बहनों की शिक्षा-विवाह आदि की ज़िम्मेदारी उठाई. घर-बाहर उनके त्याग व आदर्श की चर्चा थी. परिवारों के बीच उनका उदाहरण दिया जाता था. राजू भाई के सामने भी उनके आदर्श का ज़िक्र होता था. लेकिन उन्होंने कभी उन्हें आदर्श नहीं माना. उनका मानना था कि जो व्यक्ति असामान्य ज़िंदगी जीते हैं, दुनिया की सराहना मिलने से एक आदर्श का मुखौटा चढ़ा तो लेते हैं, परंतु मानसिक तौर पर हमेशा सकारात्मक सोच नहीं रख पाते. कभी-कभी तो वे असामान्य व विकृत मानसिकता के शिकार हो जाते हैं. लेकिन प्रत्यक्ष में उन्होंने सदा ही वर्माजी का आदर किया. जबकि वर्माजी कई बार राजूभाई की कमज़ोरियों को दर्शा चुके थे. अपरोक्ष रूप से जता चुके थे कि राजू भाई की संगत उचित नहीं है. परिणामस्वरूप वर्माजी का हमारे घर आना-जाना बढ़ गया और राजूभाई का कम हो गया.
समय बीतता गया, मेरा शोधकार्य पूरा हो गया था. मैं अपने कॉलेज में पढ़ाने लगी थीं. मां मेरे विवाह को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी थी. लेकिन उस पत्र की चर्चा हर जाने-पहचाने घर में हो चुकी थी. यदि कहीं सब कुछ ठीक रहता, तो ये आधारहीन दोष दस्तक दे जाता था. देखते-देखते मां-बाबा की लाड़ली इकलौती बिटिया 30 बसंत पार कर गई और मनोनुकूल वर का संयोग न जुट पाया. आए दिन आनेवाले वर्माजी से बाबा की अधीरता व मां की चिंतायुक्त आकुल-व्याकुल अवस्था नहीं देखी गई. अपनी सज्जनता व भलमनसाहत के साथ-साथ उदार व परोपकारी प्रवृत्ति का उदाहरण दर्शाते हुए उन्होंने ख़ुद को समर्पित कर दिया. एकबारगी तो हम सब ठगे-से रह गए. धीर-गंभीर, उम्र में 10-12 साल बड़े अध्यापक को मैं पति के रूप में नहीं पचा पा रही थी. फिर दयाभाव से स्वीकारा जाना मुझे अपना अपमान लगा था. मुझमें कोई कमी तो थी नहीं, चेहरा ख़ूबसूरत भले ही न हो, किंतु सलोना आकर्षण तो था ही. न गुणों में कमी थी, न पिता के दान-दहेज में. अवगुण था तो बस इतना कि रंग सांवला था और उस सांवले रंग के साथ जुड़ा आधारहीन कलंक.
मां-बाबा तो उनके इस प्रस्ताव के सामने नतमस्तक हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर उठे रहे थे, लेकिन मैंने खुले शब्दों में विरोध किया था, “बाबा, मैं किसी की दया या एहसान का बोझ आजीवन नहीं उठा पाऊंगी.”
सुनकर वर्माजी ने मुझसे एकांत में बात करनी चाही. फिर मौका देखते ही बोले, “प्रतिमा, शायद तुम्हें विश्वास नहीं होगा, लेकिन जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरे हृदय की हर धड़कन में तुम, केवल तुम ही समायी हो. मेरा मौन प्रेम तुम्हारा शुभचिंतक रहा है. आज तक तुम्हारा हाथ न मांगना मेरी अपनी कमज़ोरी थी. एक तो उम्र का फ़ासला. दूसरे, डरता था कि कहीं तुम लोग इसे मेरी धृष्टता समझ मुझसे बिल्कुल ही किनारा न कर लो. तुम्हारी ना के बाद तो आत्महत्या के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता. सच मानो, मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करता था कि मुझे मेरी प्रतिमा का साथ जीवनभर के लिए मिल जाए. तुम किसी और से बात करती या हंसती तो मेरा मन ईर्ष्या से भर उठता था. तुमने ध्यान दिया होगा कि राजकुमार के आने पर मैं उठकर चला जाया करता था.” टकटकी बांधे मैं विजय वर्मा का चेहरा देखती रह गई थी.
“प्रतिमा, ना मत कहना, मैं कोई दया या एहसान नहीं कर रहा हूं. तुमसे अपना सर्वस्व मांग रहा हूं.” उनकी दयनीय स्थिति देख मेरे आंसू निकल गए और फिर मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया था. सोचा, सागर जैसा गहरा और विशाल प्यार नसीबवालों को ही मिलता है. बरसों से किसी के मन की राजरानी बनने की चाहत फूलों-सी महक गई.
फिर 30 वर्षीया प्रतिमा तथा 41 वर्षीय विजय वर्मा का ब्याह सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया. सचमुच ही मैं उनकी परम् आकांक्षा थी. ब्याह के बाद उनके व्यक्तित्व में और निखार आ गया. चेहरा दमकने लगा. जिसने भी देखा, इतना तो ज़रूर कहा कि कौन-सी जड़ी-बूटी पिलाई है? क्या खिलाती हो, जो दिन-पर-दिन युवा होते जा रहे हैं. विजय ऐसी बातों से तटस्थ रहते, किंतु मैं चिहुंक उठती, “देखा, यदि मैं न मिलती तो अब तक बुड्ढे हो जाते.” उस रात विजय कुछ ज़्यादा ही मूड में आ गए, बोले, “कैसे न मिलती? मैं एक साध्य बना लेने पर लक्ष्य प्राप्त करके ही साधना छोड़ता हूं. देख लो, छल, बल, प्यार, दया व सहानुभुति से आख़िर तुम्हें पा ही लिया.” छल शब्द ने जैसे मेरी छठी इंद्रिय को झंझोड़ कर जागृत कर दिया. मैं चौंक उठी. मेरे चेहरे पर उभरे भावों को देख वर्माजी सहम गए थे. मुझे वही पुराना पत्र याद आ गया.
मस्तिष्क में ‘शुभचिंतक’ स्पष्ट हो गया. बिना कुछ सवाल किए मैं एकटक उनकी ओर देखती रह गई. विजय वर्मा का चेहरा अपराधबोध से स्याह पड़ने लगा था. अपराध छोटा हो या बड़ा कभी-न-कभी सामने आता ही है. बिना किसी भूमिका के मैंने सीधा ही वार किया, “तो आप ही थे?”
वर्माजी पल भर को चुप रहे, फिर शब्द मुंह से बाहर निकले, “प्रतिमा, मुझे ग़लत मत समझो. तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. हां, अपराध मेरा भयंकर है, इसकी जो चाहे सज़ा दे लो, पर मेरे प्यार को ग़लत मत समझना.” और मेरा हाथ उठाकर विजय ने तड़ातड़ थप्पड़ अपने गाल पर लगा दिए. हाथ छुड़ा मैं सिसक उठी. आज तक जिस व्यक्ति के प्रति असीम आदर व प्रेम था, क्या कहे, क्या करे उसके साथ?
“ये कैसा प्यार किया आपने? अपने प्रिय का ऐसा अहित? आदमी जिसे प्यार करता है, उसकी ख़ुशियों से सुख पाता है. ये कैसा प्यार था जो प्रिय को कलंक देकर तुष्ट हुआ. उसकी सारी ख़ुशियां छीन लीं. आप शुभचिंतक नहीं शिकारी थे. उस पत्र को लेकर कितनी ही रातें मैंने आंखों में काटीं. क्यों किया आपने ऐसा? कैसे कर सके इतना अहित मेरा? मेरे मां-बाबा का?” असहनीय पीड़ा मन में अनंत शूल चुभोने लगी थी. बार-बार मेरा मन एक ही प्रश्न पर अटक रहा था, “क्या नारी-पुरुष के बीच एक ही रिश्ता होता है…? नहीं रहना मुझे एक मानसिक रोगी के साथ. इससे तो बेहतर होगा मैं मां-बाबा के पास लौट जाऊं. मैं उठकर दूसरे कमरे में आ गई. आंसुओं के धुंधलके में भी उस पत्र का एक-एक अक्षर अंतःस्थल से बाहर आकर स्पष्ट आकृति ले चुका था. पत्र मां के नाम था-
आदरणीय माता जी,
मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं किसी की जातीय ज़िंदगी में हस्तक्षेप करूं. ना ही मेरी अंतर्रात्मा ऐसे मामलों में बोलने की गवाही देती है. फिर भी आप जैसी सज्जन व शालीन मां की बेटी व्यभिचार का रास्ता अपना रही हो तो सूचना देना अपना कर्त्तव्य समझता हूं. (आगे आप स्वयं समझदार हैं) आपकी बेटी राजकुमार जैसे चरित्रहीन व्यक्ति के जाल में फंसती जा रही है.
आपका शुभचिंतक
मुंह में कड़वाहट भर आई, छीः शुभचिंतक. धूर्त व विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति भी कभी किसी का शुभचिंतक हो सकता है. राजू भाई ठीक ही कहते हैं. असामान्य ज़िंदगी जीने वाले लोगों में स्वस्थ मानसिकता हो ही नहीं सकती. उनके चेहरे पर आदर्श का मुखौटा चढ़ा होता है. आंसू थमने लगे, हृदय का आवेश एक निश्चय का रूप लेने लगा था. हां, संबंध-विच्छेद के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. सबेरा होते ही वह मां के घर चली जाएगी. सोचते-सोचते आंख लग गई, तो सुबह दूधवाले की घंटी से ही खुली. दूध लेकर रसोई में रखा और अटैची हाथ में लेकर बाहर निकल आई. वर्माजी मेरी हर क्रिया को बेचैनी से देख रहे थे, किंतु कुछ भी बोल पाने का साहस उनमें नहीं था…
गेट खोलकर सड़क तक पहुंच पाती कि उससे पहले ही किसी और को गेट खोल अंदर आते देखा. “अरे राजूभाई आप, इतनी सुबह?” मैं सकपका गई थी.
“क्यों, क्या आ नहीं सकता तेरे घर?” उन्होंने मेरा चेहरा गौर से देखा. अटैची पर उनका ध्यान नहीं गया था.
“वर्माजी कहां हैं?” वर्माजी भी तब तक बाहर आ गए थे. राजूभाई की पारखी दृष्टि ने हमारे चेहरे पढ़ लिए थे. लेकिन अनजान बन सहज रूप से बोले, “मैं दरअसल, तुम्हें एक ख़ुशख़बरी देना चाहता था. सोचा फ़ोन के बजाय ख़ुद ही दूं तो तुम्हारे चेहरे की रौनक भी देख सकूंगा, क्यों?”
“अब बताइए भी क्या ख़बर है.” मेरी उत्सुकता बढ़ चली थी.
“अरे भई, तुम्हारी सहेली कल अपने बेटे को लेकर पहली बार आ रही है. उसका जन्मदिन यहीं मनाया जाएगा. तैयारी का दायित्व विशेष रूप से तुम्हारे ज़िम्मे सौंपने का आदेश है. ह़फ़्तेभर यहां रहनेवाली है और आग्रह है कि तुम भी ह़फ़्ते भर के लिए अपने मां-बाबा के पास जाओ. बोलो क्या कहती हो?”
मैं कुछ प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर पाती, उसके पहले वर्माजी बोल उठे, “इसमें कहना क्या है? आपकी बहन है, जब चाहे बुला लीजिए.” वर्माजी के हृदय परिवर्तन का कारण मैं तो समझ गई, लेकिन राजूभाई चकित थे. वर्मा जी क्षमा मांग मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गए. राजू भाई को दुविधा में देख मैंने पूरा क़िस्सा सुना देना बेहतर समझा. मेरे आंसू झरते रहे और राजूभाई मेरे सिर पर हाथ फेरते रहे. आज मैंने जाना कि वास्तविक शुभचिंतक कौन है. पत्र की चर्चा राजूभाई सुन चुके थे. लेकिन उस पत्र का ज़िक्र उन्होंने कभी नहीं किया, क्योंकि वो हमारा और अधिक अपमान नहीं करना चाहते थे.
पूरी बात सुनकर बोले थे, “प्रतिमा, जहां तक मैं सोचता हूं, वैवाहिक-संबंध मात्र पति-पत्नी को ही प्रभावित नहीं करते, वो पूरे परिवार, निकट मित्रों की मान-मर्यादा सभी को कहीं न कहीं प्रभावित करते हैं. एक सीमा तक तुम्हारे फैसले से सहमत होने को जी चाहता है, लेकिन दुनिया देखी है मैंने. संबंध-विच्छेद समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.”
फिर मीठी हंसी से छेड़ते हुए बोले, “एव्रीथिंग इज़ फेयर इन लव एंड वार. इतना प्यार करनेवाला तो क़िस्मत से मिलता है. चलो, आंसू पोछो और मुस्कुराओ. जल्दी में कोई क़दम मत उठाओ. निर्णय तुम्हीं को लेना है, लेकिन सोच-विचारने के बाद.” मैं आंसू पोंछ ही रही थी कि वर्माजी लौट आए थे. उनका चेहरा स़फेद पड़ चुका था. रात भर में ही जैसे उम्र बहुत बढ़ गई.
मैं चाय बनाने रसोई में चली गई, मेरे कानों में शब्द सुनाई दिए, “राजकुमारजी, मैं आपका अपराधी हूं.” और राजूभाई का सहज स्वर, “ग़लत, आप मेरे बहनोई हैं.” उनकी महानता ने, उनकी क्षमा ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया.
चाय के साथ औपचारिक बातें होती रहीं. फिर राजूभाई चलने को हुए तो मेरा मन फिर दुविधा में हुआ और स्वाभिमान बोल उठा, “मैं भी आपके साथ चल रही हूं.” उन दोनों को मौन छोड़ मैं अपनी अटैची उठा लाई. वर्माजी का क्लांत व अनमना चेहरा उनकी क्षमा प्रार्थना का साक्षी था.
मैंने बस इतना ही कहा, “नीता के जाते ही लौट आऊंगी.” कहने के बाद देखा तो वर्माजी के चेहरे पर राहत थी. राजूभाई के चेहरे पर एक शुभचिंतक को मिली आनन्दानुभूति थी. और मेरे चेहरे पर स्व को मिला एक सुकून था कि आज मैं उन्हीं राजूभाई के साथ क़दम मिलाकर चल पा रही हूं, जिनका साया भी विजय वर्मा को नागवार था. साथ ही मन की कड़ुवाहट छट गई थी. मां-बाबा के प्रति होने वाले अन्याय से बच गई थी. अपने जीवन को एक-दूसरे अभिशाप यानी तलाक़ से बचा लिया था. हां, प्रेम और युद्ध में जायज़ है सब कुछ. और ऐसा चाहनेवाला पति नसीबवालों को ही मिलता है.

प्रसून भार्गव

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