Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महान भक्त तिक्ष्ण

संजय गुप्ता
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दक्षिण के जंगलों में सांग्रीला नाम का एक कबीला था जिसमें भील जाति के शिकारी लोग रहते थे । इस कबीले का सरदार नाग नाम का भील था जो अपने नाम के अनुसार खूंखार और शक्तिशाली था । धनुर्विद्या में प्रवीण नाग अपने बाणों पर विष लगा कर रखता था ।
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अपने शत्रु की हत्या करने में उसे देर नहीं लगती थी । नाग की पत्नी का नाम तत्ता था । तत्ता भी एक विशालकाय डरावनी औरत थी जिसके गले में सिंह के दांतों की माला पड़ी रहती थी । दोनों पति-पत्नी आस-पास के जंगलों के कबीलों में खतरनाक माने जाते थे ।
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बहुत दिनों की प्रतीक्षा के बाद तत्ता ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम तिष्ण रखा गया । नवजात शिशु जन्म के समय आठ किलो वजन का था । इसलिए उसका यही नाम उचित था । तिष्ण को वहा की भाषा में कहा जाता है भारी ।
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तिष्ण का पालन-पोषण होता रहा और वह सोलह वर्ष की आयु तक तो पर्वताकाय शरीर का स्वामी हो गया । अस्त्र-शस्त्र चलाने में वह पिता से भी कई कदम आगे था । कई बार तिष्ण ने निहत्थे ही जंगली सूअर का शिकार किया । उसकी शारीरिक शक्ति असीम थी ।
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नाग अपने पुत्र को मदमस्त गज की भांति झूमता देखता तो गर्व से उसका सीना चौड़ा हो जाता । नाग वृद्ध हो चला था । उसने तिष्ण को ही कबीले का सरदार बना दिया । नियमानुसार तिष्ण सरदार बनने के पहले दिन आखेट को निकला । तिष्ण जिधर से भी गुजरता जंगली पशुओं की लाशें गिराता जाता ।
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उसके दो नौकर नाड़ और काड़ उन्हें उठाकर एक स्थान पर एकत्र करते रहे । तिष्ण ने बहुत सारा मास एकत्र कर दिया तो उसे भूख लगी । भूख मिटाने को मांस तो बहुत था परंतु पानी नहीं था । तभी उसके दोनों अनुचर वहां आ गए ।
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अब भूख लग रही है । दिशा भ्रम भी हो गया लगता है । क्या कहीं पानी मिल सकता है ? चलकर भूख शांत की जाए । तिखा ने कहा । हां वह विशाल शाल का पेड़ देख रहे हो उसके बाद की पहाड़ी के पीछे सुवर्णा नदी बहती है । उसका पानी बहुत शीतल भी है । नाड़ ने बताया ।

वह पहाड़ी भी बहुत रमणीक है । उस पर एक मंदिर है जिसमें भगवान जटा जूटधारी की मूर्ति है । आप उनकी पूजा कर सकते हैं । काड़ भी बोला ।
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यह भगवान क्या होता है ? तिष्ण ने पूछा । काड़ वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर था । सुदूर जंगलों में आखेट के लिए भ्रमण कर चुका था और कई साधु संन्यासियों की संगत में रह चुका था । उसे थोड़ा-बहुत ज्ञान था ।
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यह पेड़-पौधे जीव-जन्तु चर-अचर जिसने बनाए हैं वह भगवान है । काड़ ने अपनी ज्ञान-सामर्थ्य के अनुसार बताया: यह हवा कहां से आती है ? जल कहां से आता है ? सब भगवान की कृपा है । तिखा का किशोर मन उस नई जानकारी पर उत्सुक हो उठा । उसने काड़ से भगवान के बारे में और भी पूछा ।
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यह भगवान कहा रहता है ? मैं ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहूंगा ।
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वह तो कण-कण में व्याप्त है । इन फूल-पत्तियों में भी है परंतु उससे मिलने के लिए उसकी भक्ति करनी पड़ती है । पूजा करनी पड़ती है ।
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मैं करूंगा । तिष्ण दृढ़ स्वर में बोला: मैं ऐसे व्यक्ति से मिलने के लिए कुछ भी कर सकता हूं जो बिना कुछ लिए इतना सब कुछ देता है ।
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तब तुम मंदिर में चलकर पूजा करो । तिष्ण के मन में प्रभु मिलन का बीज अंकुरित हो गया । उसके हृदय में भगवान की कृतज्ञता के लिए स्वाभाविक प्रेम उमड़ आया था । तीनों पहाड़ी पर चढ़ने लगे । ज्यों-ज्यों तिखा पहाड़ी पर चढ़ रहा था उसकी भूख-प्यास लुप्त हो रही थी ।
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अंतर्मन में एक अवर्णनीय उत्सुकता आनद भर रही थी । वे पहाड़ी के शिखर पर पहुंचकर मंदिर के सामने पहुंचे । महादेव की मूर्ति देखते ही तिष्ण अपनी सुध-बुध भूल गया और भाव-विह्वल होकर मूर्ति को अपने आलिंगन में बांध कर रोने लगा ।
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हे संसार को जल वायु और प्राण देने वाले! वह भावविभोर होकर बोला: तुम इतने महान होकर भी इस जंगल में अकेले रहते हो ! मूर्ति के सिर पर कुछ पुष्प रखे थे ।
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तिखा ने उन्हें उठाकर फेंक दिया । यह किसकी दुष्टता है । मेरे स्वामी के सिर पर यह फूल किसने रखे ?
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मैं अक्सर एक व्यक्ति को देखता हूं । नाड़ बोला- वह प्रात काल आता है और इनके सिर पर शीतल जल डालकर फूल-पत्तियां रखकर लम्बा लेट जाता है । साथ ही कुछ बड़बड़ाता रहता है ।
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जरूर वह कोई अघोरी है जो मेरे स्वामी को निमित्त बनाकर किसी स्वार्थ सिद्धि में लगा रहता है । तिष्ण बोला: इन्हें भोजन भी नहीं कराता होगा । मैं प्रतिदिन इन्हें ताजा मांस का भोजन कराऊगा ।
वह भोजन लेने चल पड़ा परतु मंदिर से जाने को उसका मन नहीं करता था । वह बार-बार लौटता और मूर्ति से लिपट जाता । भगवान ! मन तो जाने का नहीं करता परंतु तुम्हें भूख लग रही है इसलिए जाता हूं ।
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तिखा वहां से निकलकर पहाड़ी से नीचे उतर गया । नाड़ तो हतबुद्धि रह गया जबकि काड् तिष्ण की अवस्था समझ रहा था ।
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हमारा सर्वनाश हो गया । नाड़ बोला: स्वामी पागल हो गए । सब तुम्हारे कारण हुआ है । अब बड़े स्वामी तुझे भूनकर खा जाएंगे । काड़ ने कुछ न कहा । वह उस निर्बुद्धि को क्या समझाता ।
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तिष्ण वापस लौटा तो उसके दोनों हाथों में मांस था । उसने आते ही मांस भूना और उसे कई पत्तों पर रखा फिर प्रत्येक पत्ते का मास चखा कि कहीं कच्चा तो नहीं रह गया । तत्पश्चात संतुष्ट होकर भगवान को समर्पित किया ।
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यह तो बिल्कुल ही पगला गया है । इतना सुगंधित मांस पत्थर को भेंट कर रहा है । हमारी भूख का इसे खयाल ही नहीं । नाड़ अप्रसन्न होकर बोला ।
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तिष्ण मूर्ति के सामने बैठा भोजन करने का आग्रह कर रहा था । स्वामी ! शाम होने को आई । अब घर चलो । प्रतीक्षा हो रही होगी । नाड़ बोला ।
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मैं नहीं जा सकता । रात्रि का समय जगंली जीवों के घूमने का है । मैं भगवान को अकेला नहीं छोड़ सकता । तुम जाओ ।
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काड़ अब अपनी मृत्यु निश्चित जान । नाड़ क्रोध से बोला: तेरे कारण स्वामी ऐसी बातें करने लगे । मैं बड़े स्वामी से कहकर तुझे दंड दिलवाऊंगा । अभी जाता हूं । तू यहीं रुक इस पागल के पास ।
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नाड़ पहाड़ी से उतर गया । काड़ भी विचार करने लगा कि निर्बुद्धि नाड़ जब नाग को बताएगा तो वह महाशठ तनिक भी विचार किए बिना उसे मृत्युदंड दे देगा । अत: उसका वहा से भागना ही श्रेयस्कर था ।
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तिष्ण अकेला ही मंदिर में रह गया । रात्रि होने पर वह मंदिर के द्वार पर धनुष-बाण लेकर भगवान की रक्षा में जुट गया ।
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सारी रात जागते हुए उसने पहरा दिया । उसका प्रेम अनंतता की ओर जा रहा था । प्रात: काल होने पर तिष्ण अपने भगवान के लिए ताजा मांस लेने पहाड़ी से उतर गया । उसके जाने के कुछ क्षण बाद ही वह पुजारी आ गया जो रोज मंदिर में पूजा-अर्चना करता था ।
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मंदिर में मांस देखकर वह हतप्रभ रह गया । हे भगवान ! यह भ्रष्टता किसने की । किसी जंगली शिकारी ने मंदिर अपवित्र कर दिया । उस शिकारी को कोसते पुजारी ने जैसे-तैसे मंदिर साफ किया और स्वयं नदी में स्नान करके आया ।
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तत्पश्चात अपने महामंत्रों से स्तुति की और वापस अपने घर लौट गया । तिष्ण वापस लौटा । उसने कई जानवरों का मांस इकट्ठा करके भूना था और उसमें शहद निचोड़कर लाया था । मंदिर में फिर वही फूल-पत्ते देखकर वह क्रोधित हो गया ।
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भगवान के आचमन के लिए वह मुह में पानी भरकर लाया था । इस कारण बोल नहीं सकता था । उसने अपने पैरों से फूल-पत्ते हटाए फिर मुह का पानी मूर्ति पर उड़ेल दिया । भगवान ! मेरी अनुपस्थिति में वह दुष्ट अघोरी आया था । किसी दिन मुझे मिला तो दंडित करूंगा उसे ।
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लीजिए आप भोजन कीजिए । आज मैं ताजा मास में शहद भी निचोड़कर लाया हूं । तिष्ण बोला । इस तरह पांच दिन तक तिष्ण अपने भगवान के भोजन में दिन और रक्षक बनकर रात गुजारता रहा । उसे स्वयं तो खाने-पीने की सुध नहीं थी ।
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तिष्ण के माता-पिता उसे अन्यत्र डूंडने निकल गए क्योंकि जब वह वहा मंदिर पर आए तो वहां कोई न मिला । तब नाडू ने कहा कि अवश्य वह काड् उसे बहकाकर कहीं ले गया होगा ।
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उधर पुजारी महोदय रोज मंदिर में ऐसा हाल देखते तो उस भ्रष्टता पर विलाप करते । मंदिर साफ करते पूजा करते और लौट जाते ।
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यह भगवान की ही लीला थी कि कभी पुजारी और तिष्ण का सामना नहीं हुआ था। सभवत: तिष्ण की उग्र प्रवृत्ति से पुजारी का कोई अहित हो जाता । .
जब पुजारी उस भ्रष्टाचार पर तिष्ण को गालियां देने लगा तो एक रात स्वप्न में उसे देवाधिदेव महादेव ने दर्शन दिए ।
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हे मेरे भक्त ! तुम जिसे अपशब्द कह रहे हो उसे नहीं जानते । वह मेरा परम भक्त है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वह मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करता है ।
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उसके प्रेम में कहीं भी कोई इच्छा नहीं है । मुझे वह बहुत प्रिय है । उसकी वंदन-विधि तुम्हें अवश्य बुरी लगती है परंतु मुझे नहीं ।
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मांस उसका भोजन है जो उसने अपना सर्वस्व जानकर मुझे समर्पित कर दिया । जब वह मुझे अपनी भाषा में भोजन का आग्रह करता है तो मुझे उसका आग्रह तुम्हारे जाप और वेदमंत्रों से भी श्रेष्ठ लगता है । यदि तुम उसकी भक्ति देखना चाहते हो तो कल कहीं छुपकर देखना ।
.पुजारी जी हड़बड़ाकर जागे । कहीं कुछ नहीं था परतु स्वयं प्रभु का आदेश हुआ तो वह प्रात -काल ही मंदिर के समीप छुपकर तिष्ण के कृत्य को देखने लगे ।
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तिष्ण उस समय भगवान के लिए भोजन लेने गया था । वह वापस लौट रहा था तो रास्ते में उसे ठोकर लगी और मास पृथ्वी पर गिर गया ।
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यह अपशकुन है । कहीं मेरे भगवान को तो कुछ नहीं हुआ ? तिष्ण ने सोचा और दौड़ता हुआ पहाड़ी चढ़ने लगा । पुजारी उस विशालकाय आकृति को देखकर सहम गए । तिष्ण मंदिर में पहुचा तो उसने मूर्ति की बाईं आख से रक्त टपकता देखा । भोजन उसके हाथ से छूट गया ।
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हाय, मेरे भगवान को क्या हुआ ? किस पापी ने मेरे स्वामी को घायल किया है ? तिष्ण बैठकर रोने लगा: यदि वह दुष्ट मुझे मिला तो मैं उसका वध कर दूगा । तिखा ने भगवान की आख से रक्त पोंछा परतु रक्तधारा निरंतर बहती रही ।
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हाय मैं क्या करूं ? क्या उपचार करूं , वह जोर-जोर से रोने लगा : तुम्हें तो बहुत कष्ट हो रहा होगा भगवान । पहले मैं उस दुष्ट को दूढ़ता हूं जिसने यह दुष्ट कार्य किया है ।
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तिष्ण मंदिर से बाहर निकल आया । पुजारी जी के पर कांप उठे । कहीं उसे दिखाई पड गए तो जीवित न छोड़ेगा । हे भोलेनाथ ! रक्षा करो । परंतु सर्वेश्वर क्या तिष्ण के स्वभाव से अनभिज्ञ थे ?
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उन्हीं की लीला थी कि साफ दिखाई पड़ रहा पुजारी तिष्ण को दिखाई न दे रहा था । जब उसे कोई न दिखाई दिया तो वापस मूर्ति के समीप जाकर बैठ गया ।
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भगवान ! मैं जड़ी-बूटियां लेकर आता हूं । मैं यह तो नहीं जानता कि किस जड़ी से आपको लाभ होगा परंतु जाता हूं । अभी लौटता हूं ।
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तिष्ण पहाड़ी से नीचे उतर गया और जब लौटा तो सिर पर जगंली जड़ी-बूटियों का बड़ा-सा गट्ठर था । मंदिर आकर उसने एक-एक जड़ी भगवान की आख में निचोड़ी परंतु रक्तस्राव बंद न हुआ ।
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अब क्या उपाय करूं ? तिष्ण विचलित हो गया । तब उसे स्मरण आया कि शिकारी लोग घाव पर मनुष्य का मांस लगाते थे और घाव अच्छा हो जाता था । यह भी करके देखता हूं । भगवान की बाईं आँख नष्ट हुई है अत: मैं अपनी बाईं आँख निकालकर ही घाव पर रखता हूं संभव है लाभ हो जाए ।
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एक नुकीले तीर से उस भक्त ने अपनी बाईं आँख निकाली । स्वयं की आँख से रक्तधारा फूट पड़ी परंतु चिंता नहीं । आँख हथेली पर रखकर भगवान की आँख पर रखी और दबाई । तत्काल भगवान की आँख से खून बहना बंद हो गया ।
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तिष्ण प्रसन्नता से किलकारी मार उठा । नाचने लगा । मेरे भगवान अच्छे हो गए । परंतु यह क्या ? अब भगवान की दाहिनी आँख से रक्तस्राव होने लगा । तिष्ण स्तब्ध रह गया । चिंता मत करो प्रभु ! उपचार तो मुझे मिल गया है । अभी उपचार करता हूं ।
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तिष्ण ने फिर तीर उठाया और दाहिनी आँख निकालने को उत्सुक हुआ तभी मूर्ति से साक्षात श्री देवाधिदेव प्रकट हुए और तिष्ण का हाथ पकड़ लिया ।
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देवलोक में भी तिष्ण की ऐसी भक्ति पर उसका यशोगान होने लगा था ठहरो वत्स ! तेरा प्रेम और त्याग तो बड़े-बड़े तपस्वियों की साधना से भी उच्च कोटि का है ।
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निस्वार्थ प्रेमवश मुझे अपना दास बना लिया है । तेरी कोई इच्छा तेरे हृदय में भी नहीं । अत : मैं तुझे समस्त दिव्य ज्ञानों का वरदान देता हूं । तेरे हृदय में मेरे प्रति जितने भी प्रश्न हैं सबका उत्तर तुझे स्वयं मिल जाएगा । कैलाशपति ने भाव-विह्वल होकर कहा ।
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तिष्ण को उसी क्षण आत्मज्ञान हो गया । उसके दिव्य ज्ञानचक्षु वास्तविकता को चलचित्र की तरह देख रहे थे । वह भाव में डूब गया और अपने आराध्य के चरणों में नतमस्तक हो गया ।

दूर छुपा पुजारी उस अविश्वसनीय दृश्य का साक्षी बना और उसने ऐसे भक्त वत्सल भगवान और महान भक्त का एक साथ साक्षात्कार करके अपने जीवन को कृतार्थ किया।

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संजय गुप्ता

अपने जबरदस्त भाषणों से अटल बिहारी वाजपेयी ने सबको हिला दिया था..
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार देश का नेतृत्व किया है। इस दौरान उन्होंने अपने भाषणों से सबको हिलाकर रख दिया। वे पहली बार साल 1996 में 16 मई से 1 जून तक, 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और फिर 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी पर विरोधी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि उनको सत्ता का लोभ है।
इस पर अटल जी ने लोकसभा में खुलकर बात की और अपने भाषण से सभी को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने न सिर्फ विरोधियों को जवाब दिया, बल्कि भगवान राम का दिया हुआ श्लोक पढ़ते हुए कहा था- भगवान राम ने कहा था कि ‘मैं मरने से नहीं डरता, डरता हूं तो सिर्फ बदनामी से डरता हूं.’ जिसके बाद विरोधियों ने कभी उन पर ऐसा आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ये भाषण 28 मई 1996 में आत्मविश्वास प्रस्ताव के दौरान दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों को सुनने के लिए विपक्ष भी शांत बैठा करता था। उनके भाषण हमेशा ही मजेदार होते थे। लोग तो यहां तक कहते हैं कि अब उन सा भाषण देने वाला कोई नेता रहा ही नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर ये भी सुनने को मिलता है कि एक बार अटल जी के भाषण को सुनने के लिए लोग भीषण ठंड और बारिश में भी लंबे समय तक एक ही जगह पर डटी रही। इमरजेंसी के दौरान वाजपेयी जेल में बंद थे। फिर इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी। उसके बाद सब लोग छूट गए। चुनाव प्रचार के लिए कम वक्त मिला था। दिल्ली में जनसभा हो रही थी। जनता पार्टी के नेता आकर स्पीच देते थे। पर सब थके हुए से लगते थे। फिर भी जनता हिल नहीं रही थी। ठंड थी, और बारिश भी हल्की-हल्की होने लगी थी। तभी एक नेता ने बगल वाले से पूछा कि लोग जा क्यों नहीं रहे। बोरिंग स्पीच हो रही है और ठंड भी है। तो जवाब मिला कि अभी अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण होना है, इसीलिए लोग रुके हुए हैं।

अटल जी के भाषण की कुछ ऐसी रहती थी शैली-

बाद मुद्दत के मिले हैं दिवाने, कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने।
खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने।

इस तरह की जुगलबंदी में अटल जी माहिर थे, इन पंक्तियों को सुनाने के बाद उन्होंने खुद बताया था कि दूसरी लाइन उन्होंने तुरंत बना दी थी। जिससे जनता मंत्रमुग्ध हो गई थी। याद दिला दें कि इंदिरा गांधी ने एक बार अटल जी की आलोचना की थी कि वो बहुत हाथ हिला-हिलाकर बात करते हैं। इस पर अटल जी ने जवाब में कहा कि वो तो ठीक है, आपने किसी को पैर हिलाकर बात करते देखा है क्या।

1994 में यूएन के एक अधिवेशन में पाकिस्तान ने कश्मीर पर भारत को घेर लिया था। उस दौरान प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने भारत का पक्ष रखने के लिए नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था।वहां पर पाक के नेता ने कहा कि कश्मीर के बगैर पाकिस्तान अधूरा है। तो जवाब में वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान के बगैर हिंदुस्तान अधूरा है।

पाकिस्तान के ही मुद्दे पर अटल बिहारी की बड़ी आलोचना होती कि ताली दोनों हाथ से बजती है। अटल जी अकेले ही उत्साहित हुए जा रहे हैं। तो वाजपेयी ने जवाब में कहा कि एक हाथ से चुटकी तो बज ही सकती है।
अटल जी सबको हंसाते हुए भाषण शुरू किया करते थे-

अटल बिहारी वाजपेयी जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री बने थे, उस समय संसद में विश्वास मत के दौरान उन्होंने बहुत प्रभावी भाषण दिया था। उन्होंने सदन में भारतीय जनता पार्टी को व्यापक समर्थन हासिल नहीं होने के आरोपों को लेकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि ये कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं है कि हमें इतने वोट मिल गए हैं। ये हमारी 40 साल की मेहनत का नतीजा है। हम लोगों के बीच गए हैं और हमने मेहनत की है। हमारी 365 दिन चलने वाली पार्टी है, ये चुनाव में कोई कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाली पार्टी नहीं है। उन्होंने कहा था कि आज हमें सिर्फ इसलिए कटघरे में खड़ा कर दिया गया क्योंकि हम थोड़ी ज्यादा सीटें नहीं ला पाए।

15 अगस्त 2003 को लाल किले की प्राचीर से दिया अटल जी का अंतीम भाषण

प्यारे देशवासियो आज देश ऐसे मोड़ पर है जहां से देश एक लंबी छलांग लगा सकत है, भारत को 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के बड़े धेय्य को हासिल करने की तमन्ना सारे देश में बल पकड़ रही है। जरा पीछें मुड़कर देखिए, बड़े बड़े संकटों का सामना करके भारत आगे बढ़ रहा है।
ये बाबरी मस्जिद का विवादास्पद भाषण-

1992 को भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि वहां (अयोध्या) नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा। यज्ञ का आयोजन होगा तो कुछ निर्माण भी होगा। कम से कम वेदी तो बनेगी। मैं नहीं जानता कल वहां क्या होगा। मेरी अयोध्या जाने की इच्छा है, लेकिन मुझे कहा गया है कि तुम दिल्ली रहो।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया था ऐतिहासिक भाषण

अटल जी को हिंदी भाषा से काफी लगाव है। इस लगाव का असर उस वक्त भी देखा जा सकता था जब 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर काम कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना पहला भाषण हिंदी में देकर सभी के दिल में हिंदी भाषा का गहरा प्रभाव छोड़ दिया था।

पोखरण के परमाणु परीक्षण पर भाषण-

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए भारत ने पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया था, जिसके बाद पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक की नींद उड़ गई थी। इस परीक्षण को रोकने के लिए अमेरिका ने भारत पर नजर गड़ाए हुई थी, लेकिन सबको मात देते हुए भारत ने यह कर दिखाया। इस पर वाजपेयी का दिया भाषण ऐतिहासिक साबित हुआ था।

Posted in संस्कृत साहित्य

हवन में आहुति देते समय क्यों कहते है ‘स्वाहा’

सव्व शर्मा
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अग्निदेव की दाहिकाशक्ति है ‘स्वाहा’

अग्निदेव में जो जलाने की तेजरूपा (दाहिका) शक्ति है, वह देवी स्वाहा का सूक्ष्मरूप है। हवन में आहुति में दिए गए पदार्थों का परिपाक (भस्म) कर देवी स्वाहा ही उसे देवताओं को आहार के रूप में पहुंचाती हैं, इसलिए इन्हें ‘परिपाककरी’ भी कहते हैं।

सृष्टिकाल में परब्रह्म परमात्मा स्वयं ‘प्रकृति’ और ‘पुरुष’ इन दो रूपों में प्रकट होते हैं। ये प्रकृतिदेवी ही मूलप्रकृति या पराम्बा कही जाती हैं। ये आदिशक्ति अनेक लीलारूप धारण करती हैं। इन्हीं के एक अंश से देवी स्वाहा का प्रादुर्भाव हुआ जो यज्ञभाग ग्रहणकर देवताओं का पोषण करती हैं।

स्वाहा के बिना देवताओं को नहीं मिलता है भोजन

सृष्टि के आरम्भ की बात है, उस समय ब्राह्मणलोग यज्ञ में देवताओं के लिए जो हवनीय सामग्री अर्पित करते थे, वह देवताओं तक नहीं पहुंच पाती थी। देवताओं को भोजन नहीं मिल पा रहा था इसलिए उन्होंने ब्रह्मलोक में जाकर अपने आहार के लिए ब्रह्माजी से प्रार्थना की। देवताओं की बात सुनकर ब्रह्माजी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। भगवान के आदेश पर ब्रह्माजी देवी मूलप्रकृति की उपासना करने लगे। इससे प्रसन्न होकर देवी मूलप्रकृति की कला से देवी ‘स्वाहा’ प्रकट हो गयीं और ब्रह्माजी से वर मांगने को कहा।

ब्रह्माजी ने कहा–’आप अग्निदेव की दाहिकाशक्ति होने की कृपा करें। आपके बिना अग्नि आहुतियों को भस्म करने में असमर्थ हैं। आप अग्निदेव की गृहस्वामिनी बनकर लोक पर उपकार करें।’
ब्रह्माजी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण में अनुरक्त देवी स्वाहा उदास हो गयीं और बोलीं–’परब्रह्म श्रीकृष्ण के अलावा संसार में जो कुछ भी है, सब भ्रम है। तुम जगत की रक्षा करते हो, शंकर ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है। शेषनाग सम्पूर्ण विश्व को धारण करते हैं। गणेश सभी देवताओं में अग्रपूज्य हैं। यह सब उन भगवान श्रीकृष्ण की उपासना का ही फल है।’

यह कहकर वे भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए तपस्या करने चली गयीं और वर्षों तक एक पैर पर खड़ी होकर उन्होंने तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए।
देवी स्वाहा के तप के अभिप्राय को जानकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–’तुम वाराहकल्प में मेरी प्रिया बनोगी और तुम्हारा नाम ‘नाग्नजिती’ होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्ति से सम्पन्न होकर अग्निदेव की पत्नी बनो और देवताओं को संतृप्त करो। मेरे वरदान से तुम मन्त्रों का अंग बनकर पूजा प्राप्त करोगी। जो मानव मन्त्र के अंत में तुम्हारे नाम का उच्चारण करके देवताओं के लिए हवन-पदार्थ अर्पण करेंगे, वह देवताओं को सहज ही उपलब्ध हो जाएगा।’

देवी स्वाहा बनी अग्निदेव की पत्नी

भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से अग्निदेव का देवी स्वाहा के साथ विवाह-संस्कार हुआ। शक्ति और शक्तिमान के रूप में दोनों प्रतिष्ठित होकर जगत के कल्याण में लग गए। तब से ऋषि, मुनि और ब्राह्मण मन्त्रों के साथ ‘स्वाहा’ का उच्चारण करके अग्नि में आहुति देने लगे और वह हव्य पदार्थ देवताओं को आहार रूप में प्राप्त होने लगा।

जो मनुष्य स्वाहायुक्त मन्त्र का उच्चारण करता है, उसे मन्त्र पढ़ने मात्र से ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। स्वाहाहीन मन्त्र से किया हुआ हवन कोई फल नहीं देता है।

देवी स्वाहा के सिद्धिदायक सोलह नाम

देवी स्वाहा के सोलह नाम हैं–

  1. स्वाहा,
  2. वह्निप्रिया,
  3. वह्निजाया,
  4. संतोषकारिणी,
  5. शक्ति,
  6. क्रिया,
  7. कालदात्री,
  8. परिपाककरी,
  9. ध्रुवा,
  10. गति,
  11. नरदाहिका,
  12. दहनक्षमा,
  13. संसारसाररूपा,
  14. घोरसंसारतारिणी,
  15. देवजीवनरूपा,
  16. देवपोषणकारिणी।

इन नामों के पाठ करने वाले मनुष्य का कोई भी शुभ कार्य अधूरा नहीं रहता। वह समस्त सिद्धियों व मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
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(((( अंतरात्मा की आवाज ))))

ज्योति अग्रवाल
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किसी गांव के किनारे एक मंदिर था, मंदिर में एक साधु रहता था। गांव में एक चोर भी रहता था। चोर खाते पीते घर का बेटा था।
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चोर हो गया तो जिंदगी भी चोर की ही घसीटनी पड़ रही थी। किसी ने उसकी शादी नहीं की।
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चोर अपने ही गांव में हाथ मारता था, लोग उसे कबाड़ी चोर कहते थे। क्योंकि वह छोटी छोटी चोरी ही करता था। उसके चोरी करने से लोगों को दुख अधिक होता था हानि कम।
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चोर को लाभ कुछ नहीं था पर परेशानी दुनिया भर की। चोर ने सोचा मंदिर के चढ़ावों से साधु की थैली भरी पड़ी है। वह संपत्ति भी उसकी मुफ्त की ही है, खून पसीने की तो है नहीं।
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अब उसने साधु की कुटिया पर आना जाना शुरू कर दिया। बगुला भगत की श्रद्धा भक्ति से साधु महाराज तो गद्गद् हो उठे।
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चोर मुंह में राम बगल में छुरी लेकर दिन भर साधु महाराज की सेवा करता। वैसे साधु भी जानता था कि यह चोर खड़ग सिंह तो है नहीं, कबाड़ी चोर है।
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दिन में इसे हाथ नहीं डालना है, रात में मुझे इसको घास नहीं डालनी है, इसलिए मेरी थैली का बाल बांका होने से रहा।
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थैली के आकार को देखकर कबाड़ी चोर की तबीयत हरी होती रहती थी। उस दिन चोर रात होने पर कुटिया से उठाए नहीं उठा।
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दाव में कबाड़ी चोर और बचाव में साधु महाराज रात भर करवट पर करवट बदलते रहे। जब झाड़ी में मुर्गे ने बांग दी तो साधु महाराज की जान में जान आई।
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अगले दिन से साधु महाराज रात को थैली बाहर रख देता और सुबह भीतर। साधु रात भर खर्राटें भरता रहता। चोर रात भर थैली को ढूंढ़ता थक जाता।
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घनघोर अंधेरी रात में साधु की आत्मा ने कहा, तू पापी महात्मा है। उस थैली से तेरा क्या लगाव ? बेचारे चोर का भला कर।
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उसी रात चोर की आत्मा ने भी कहा, दो आंख, दो हाथ, दो पैर, छः संपत्ति भगवान ने तुझे दे रखी हैं। तू उनका दुरूपयोग मत कर।
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चोरी के चक्कर में पड़कर जिंदगी को गवां रहा है। करने वाला क्या नहीं कर सकता ?
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जब तक नीयत में फितूर रहेगा तब तक भाग्य भी तुझ पर मेहरबान नहीं होगा। एक लंबी जिंदगी इस थैली के सहारे कितने दिन कटेगी।
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उस रात साधु ने वह थैली बाहर नहीं रखी।
सुबह साधु महाराज ने देखा थैली तो वहीं पर है पर आज कबाड़ी चोर नहीं था।
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कबाड़ी चोर होता भी कैसे ? उसकी अंतरात्मा जाग गई थी।

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शुभचिंतक
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उस कलंक की पीड़ा थी, जो कभी भी अपनी कालिमा से उसके अंतर्मन को मुक्त नहीं होने देगा. कलंक की पीड़ा झेलने से ज़्यादा कष्टदायी स्थिति तो यह थी कि जिस व्यक्ति के कारण मान-सम्मान पर गहरा-आघात लगा, वो महानता और सज्जनता का पर्याय बना बरसों, बल्कि कहूंगी आजीवन प्रशंसा के फूल बटोरता रहा. जिस झटके से मैं उठी थी और जिस मनोवेग में आकर प्रबलता से सामान बांधा था, वह टूटने व क्षीण होने लगा. सहसा ही हाथ-पैर बोझिल व शिथिल होने लगे. नारीशक्ति, आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति जैसे शब्द संबलहीन हो ढहने लगे. क्या यही मेरी असली पहचान है? क्या वाकई डॉ. प्रतिमा वर्मा, हिंदी विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष डॉ. विजय वर्मा की पत्नी इतनी कमज़ोर, लाचार व असहाय होनी चाहिए? नहीं! लेकिन सच यही है. इधर पति है, सम्मान है, उसकी अपनी एक पहचान है, उधर मां-बाप हैं, जो उसके सुख में आनंद पाते हैं, उसके दुख से आकुल-व्याकुल हो उठते हैं. कुछ निर्णय ले सकूं या तय कर पाऊं ये तो दूर की बात है. पहले इस आघात को सहने की शक्ति तो मिले. जो सोच रही हूं या जो चाहत होगी वो मां-बाबा के समक्ष रख पाऊंगी? क्या चालबाज को चालबाज कह पाऊंगी? क्या मां-बाबा को इस बात का विश्वास दिला पाऊंगी?
मां तर्क भाषा तो मानेंगी, किंतु समाज के डर से उनका मन उन तर्कों को दिल से बाहर आने ही नहीं देगा. बाबा जितने शांत थे, मां उतना ही हल्ला मचाए रहती थीं और मां का यही रवैया ज़िम्मेदार था कि घर की चारदीवारी से उठकर तूफ़ान दीवारों से आर-पार हो जाता था. उस पत्र के साथ भी यही हुआ था.
नुक्कड़-नुक्कड़ पर पान की हर छोटी-बड़ी दुकान पर उस चिट्ठी की चर्चा हुई थी. बड़े शहर के छोटे-मोटे मोहल्लों में कोई बात घर की दीवारों तक सीमित नहीं रह पाती है. वो गुमनाम पत्र भी तो मां के नाम आया था. भेजनेवाला जैसे मां के स्वभाव से परिचित था. पत्र देखकर मां घबरा उठी थीं. ये हमारा नाम कैसे जानता है? अरे, ये तो राजकुमार को भी जानता है? बाबा के आते ही बोली थीं, “देखो तो, किसी ने कैसा ग़ज़ब किया है. पहले ही सांवले रंग के कारण रिश्तों का अकाल है. अब ऐसी चिट्ठी के बाद कौन करेगा रिश्ता?” कहारिन के हाथ बर्तन घिस रहे थे, लेकिन कान मां के शब्दों का ज़ायका ले रहे थे. बाबा ने चिट्ठी अपने हाथ में ले ली थी और एक ही सांस में पढ़ गए. फिर हंसते हुए चिट्ठी मेरे हाथ में थमा दी थी. चिट्ठी पढ़कर मैं पसीने-पसीने हो गई थी. फिर भी हंसने की कोशिश की थी, “पर बाबा….”
“हां, हां! मैं जानता हूं तुम्हारा इस पत्र से कोई संबंध नहीं है, किसी विकृत मनःस्थिति वाले व्यक्ति की निकृष्ट हरकत है यें. कुछ लोग इतनी नीच प्रकृति के होते हैं कि उनसे दूसरे की सुख-शांति देखी नहीं जाती. दूसरों को मानसिक यातना देने में ऐसे लोगों को सुख मिलता है.”
फिर मेरे हैरान-परेशान चेहरे को देख बोले, “बेटी, जो दूसरों को पीड़ा देने में सुख का अनुभव करे उसे तो मानसिक रोगी ही माना जाएगा ना? इसे एक दुःस्वप्न समझ कर भूल जाओ.”
मां चिंतित तो हुई थीं, परंतु बाबा की इस व्याख्या व रवैये से हल्की हो गई थीं. मैंने पत्र को मुट्ठी में ज़ोर से दबा दिया, मानो वो चिट्ठी न होकर लिखने वाले की गर्दन हो. बाद में उसे आलमारी में रख दिया. सोचा, शिल्पा को दिखाऊंगी, वो पक्की जासूस है. कुछ तो पता करेगी. लेकिन तुरंत ही ख़याल आया, यदि उसने अन्य सहेलियों को बता दिया तो? नहीं, दिखाना ग़लत होगा. बाबा ठीक कहते हैं, इसे भूल जाना ही बेहतर है. लेकिन अर्धचेतन मन में वो पत्र सदा ही साफ़ शब्दों में ज्यों का त्यों अंकित रहा.
कभी शक़ होता- स्वयं राजकुमार ने ही तो नहीं लिखी…? मुझे बदनाम करके अपने नाम के साथ मेरा नाम जोड़कर कोई अतृप्त अभिलाषा पूरी करना चाहता हो? लेकिन भला वो ऐसा क्यों करेगा? वो बुरा आदमी है दुनिया की नज़र में, लेकिन हमारे साथ उसका बिल्कुल अलग व्यवहार है. और फिर मुझे बदनाम करने की उसे क्या ज़रूरत है.
राजकुमार हमारे पड़ोसी हैं, दुनिया उन्हें बुरा आदमी कहती है. हमारे घर उनका आना-जाना नीता के कारण शुरू हुआ. नीता मेरी कॉलेज की सहेली थी. राजकुमार नीता के बड़े भाई हैं. नीता उन्हें राजू भाई कहती थी, इसलिए हम सहेलियां भी उन्हें राजू भाई कहने लगीं. उम्र में वो नीता से 5-6 साल बड़े थे. उन्हें शराब की आदत थी. रोज़ ही पीते थे, साथ ही हर तरह के जुए का शौक़ था. नीता के घर खानदानी पैसा था. माता-पिता की मृत्यु के बाद बहन की ज़िम्मेदारी राजू भाई ने ही संभाली थी. अपनी अनेक कमज़ोरियों के बावजूद वो अंग्रेज़ी साहित्य के अच्छे विद्वान थे, शौकिया तौर पर कॉलेज में इंग्लिश पढ़ाते थे. हम सहेलियां अक्सर उनसे पढ़ने पहुंच जाया करती थीं. नीता की शादी के बाद भी हमारे घर उनका आना-जाना यथावत बना रहा. कभी अपने अकेलेपन को बांटने, तो कभी बाबा से सलाह-मशविरा लेने. बाबा को राजू भाई पर इतना भरोसा था कि मुझे अकेले कहीं जाना होता तो राजूभाई ही साथ जाते थे. राजू भाई ने भी बाबा के इस विश्वास का शतप्रतिशत मान रखा.
एक शाम मां-बाबा किसी प्रसंग में गए हुए थे. उनकी अनुपस्थिति में राजू भाई आ गए. मां-बाबा घर पर नही हैं ये जानते ही वो लौटने को हुए कि मैंने आग्रह कर उन्हें थोड़ी देर के लिए रोक लिया. अकेली बहुत बोर हो रही थी. रजनीश के दर्शन पर चर्चा छिड़ी तो समय का अंदाज़ ही नहीं रहा. अचानक दरवाज़े की घंटी बजी…
खोला, तो देखा वर्माजी थे. बहुत अरसे के बाद आए थे. इसके पहले कुल जमा तीन बार तो हमारे घर आए थे. इन तीन मुलाक़ातों में ही उनकी पारखी दृष्टि ने हम सबको परख लिया था. धीरे-धीरे उनसे हमारी घनिष्ठता-सी हो गई. वर्माजी हमारी यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष थे. मैं उनके अंतर्गत शोध कर रही थी. औपचारिकता निभाते हुए मैंने दोनों का परिचय कराया, तो राजू भाई बोले, “हम एक-दूसरे से परिचित हैं.”
पिछले ह़फ़्ते मेरे पैर में फोड़ा हो जाने के कारण मैं कॉलेज नहीं जा पाई थी. अतः बड़े आग्रह से मैंने उन्हें आमंत्रित किया था. वैसे भी वर्माजी की मेरे ऊपर विशेष कृपा थी. वे पूरी दिलचस्पी से मेरे शोधकार्य में सहायता कर रहे थे.
वर्माजी वो अभी तक अविवाहित थे. बचपन में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उन्होंने अपने तीनों भाई-बहनों की शिक्षा-विवाह आदि की ज़िम्मेदारी उठाई. घर-बाहर उनके त्याग व आदर्श की चर्चा थी. परिवारों के बीच उनका उदाहरण दिया जाता था. राजू भाई के सामने भी उनके आदर्श का ज़िक्र होता था. लेकिन उन्होंने कभी उन्हें आदर्श नहीं माना. उनका मानना था कि जो व्यक्ति असामान्य ज़िंदगी जीते हैं, दुनिया की सराहना मिलने से एक आदर्श का मुखौटा चढ़ा तो लेते हैं, परंतु मानसिक तौर पर हमेशा सकारात्मक सोच नहीं रख पाते. कभी-कभी तो वे असामान्य व विकृत मानसिकता के शिकार हो जाते हैं. लेकिन प्रत्यक्ष में उन्होंने सदा ही वर्माजी का आदर किया. जबकि वर्माजी कई बार राजूभाई की कमज़ोरियों को दर्शा चुके थे. अपरोक्ष रूप से जता चुके थे कि राजू भाई की संगत उचित नहीं है. परिणामस्वरूप वर्माजी का हमारे घर आना-जाना बढ़ गया और राजूभाई का कम हो गया.
समय बीतता गया, मेरा शोधकार्य पूरा हो गया था. मैं अपने कॉलेज में पढ़ाने लगी थीं. मां मेरे विवाह को लेकर बेहद चिंतित रहने लगी थी. लेकिन उस पत्र की चर्चा हर जाने-पहचाने घर में हो चुकी थी. यदि कहीं सब कुछ ठीक रहता, तो ये आधारहीन दोष दस्तक दे जाता था. देखते-देखते मां-बाबा की लाड़ली इकलौती बिटिया 30 बसंत पार कर गई और मनोनुकूल वर का संयोग न जुट पाया. आए दिन आनेवाले वर्माजी से बाबा की अधीरता व मां की चिंतायुक्त आकुल-व्याकुल अवस्था नहीं देखी गई. अपनी सज्जनता व भलमनसाहत के साथ-साथ उदार व परोपकारी प्रवृत्ति का उदाहरण दर्शाते हुए उन्होंने ख़ुद को समर्पित कर दिया. एकबारगी तो हम सब ठगे-से रह गए. धीर-गंभीर, उम्र में 10-12 साल बड़े अध्यापक को मैं पति के रूप में नहीं पचा पा रही थी. फिर दयाभाव से स्वीकारा जाना मुझे अपना अपमान लगा था. मुझमें कोई कमी तो थी नहीं, चेहरा ख़ूबसूरत भले ही न हो, किंतु सलोना आकर्षण तो था ही. न गुणों में कमी थी, न पिता के दान-दहेज में. अवगुण था तो बस इतना कि रंग सांवला था और उस सांवले रंग के साथ जुड़ा आधारहीन कलंक.
मां-बाबा तो उनके इस प्रस्ताव के सामने नतमस्तक हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर उठे रहे थे, लेकिन मैंने खुले शब्दों में विरोध किया था, “बाबा, मैं किसी की दया या एहसान का बोझ आजीवन नहीं उठा पाऊंगी.”
सुनकर वर्माजी ने मुझसे एकांत में बात करनी चाही. फिर मौका देखते ही बोले, “प्रतिमा, शायद तुम्हें विश्वास नहीं होगा, लेकिन जिस दिन से तुम्हें देखा है, मेरे हृदय की हर धड़कन में तुम, केवल तुम ही समायी हो. मेरा मौन प्रेम तुम्हारा शुभचिंतक रहा है. आज तक तुम्हारा हाथ न मांगना मेरी अपनी कमज़ोरी थी. एक तो उम्र का फ़ासला. दूसरे, डरता था कि कहीं तुम लोग इसे मेरी धृष्टता समझ मुझसे बिल्कुल ही किनारा न कर लो. तुम्हारी ना के बाद तो आत्महत्या के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता. सच मानो, मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करता था कि मुझे मेरी प्रतिमा का साथ जीवनभर के लिए मिल जाए. तुम किसी और से बात करती या हंसती तो मेरा मन ईर्ष्या से भर उठता था. तुमने ध्यान दिया होगा कि राजकुमार के आने पर मैं उठकर चला जाया करता था.” टकटकी बांधे मैं विजय वर्मा का चेहरा देखती रह गई थी.
“प्रतिमा, ना मत कहना, मैं कोई दया या एहसान नहीं कर रहा हूं. तुमसे अपना सर्वस्व मांग रहा हूं.” उनकी दयनीय स्थिति देख मेरे आंसू निकल गए और फिर मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया था. सोचा, सागर जैसा गहरा और विशाल प्यार नसीबवालों को ही मिलता है. बरसों से किसी के मन की राजरानी बनने की चाहत फूलों-सी महक गई.
फिर 30 वर्षीया प्रतिमा तथा 41 वर्षीय विजय वर्मा का ब्याह सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया. सचमुच ही मैं उनकी परम् आकांक्षा थी. ब्याह के बाद उनके व्यक्तित्व में और निखार आ गया. चेहरा दमकने लगा. जिसने भी देखा, इतना तो ज़रूर कहा कि कौन-सी जड़ी-बूटी पिलाई है? क्या खिलाती हो, जो दिन-पर-दिन युवा होते जा रहे हैं. विजय ऐसी बातों से तटस्थ रहते, किंतु मैं चिहुंक उठती, “देखा, यदि मैं न मिलती तो अब तक बुड्ढे हो जाते.” उस रात विजय कुछ ज़्यादा ही मूड में आ गए, बोले, “कैसे न मिलती? मैं एक साध्य बना लेने पर लक्ष्य प्राप्त करके ही साधना छोड़ता हूं. देख लो, छल, बल, प्यार, दया व सहानुभुति से आख़िर तुम्हें पा ही लिया.” छल शब्द ने जैसे मेरी छठी इंद्रिय को झंझोड़ कर जागृत कर दिया. मैं चौंक उठी. मेरे चेहरे पर उभरे भावों को देख वर्माजी सहम गए थे. मुझे वही पुराना पत्र याद आ गया.
मस्तिष्क में ‘शुभचिंतक’ स्पष्ट हो गया. बिना कुछ सवाल किए मैं एकटक उनकी ओर देखती रह गई. विजय वर्मा का चेहरा अपराधबोध से स्याह पड़ने लगा था. अपराध छोटा हो या बड़ा कभी-न-कभी सामने आता ही है. बिना किसी भूमिका के मैंने सीधा ही वार किया, “तो आप ही थे?”
वर्माजी पल भर को चुप रहे, फिर शब्द मुंह से बाहर निकले, “प्रतिमा, मुझे ग़लत मत समझो. तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. हां, अपराध मेरा भयंकर है, इसकी जो चाहे सज़ा दे लो, पर मेरे प्यार को ग़लत मत समझना.” और मेरा हाथ उठाकर विजय ने तड़ातड़ थप्पड़ अपने गाल पर लगा दिए. हाथ छुड़ा मैं सिसक उठी. आज तक जिस व्यक्ति के प्रति असीम आदर व प्रेम था, क्या कहे, क्या करे उसके साथ?
“ये कैसा प्यार किया आपने? अपने प्रिय का ऐसा अहित? आदमी जिसे प्यार करता है, उसकी ख़ुशियों से सुख पाता है. ये कैसा प्यार था जो प्रिय को कलंक देकर तुष्ट हुआ. उसकी सारी ख़ुशियां छीन लीं. आप शुभचिंतक नहीं शिकारी थे. उस पत्र को लेकर कितनी ही रातें मैंने आंखों में काटीं. क्यों किया आपने ऐसा? कैसे कर सके इतना अहित मेरा? मेरे मां-बाबा का?” असहनीय पीड़ा मन में अनंत शूल चुभोने लगी थी. बार-बार मेरा मन एक ही प्रश्न पर अटक रहा था, “क्या नारी-पुरुष के बीच एक ही रिश्ता होता है…? नहीं रहना मुझे एक मानसिक रोगी के साथ. इससे तो बेहतर होगा मैं मां-बाबा के पास लौट जाऊं. मैं उठकर दूसरे कमरे में आ गई. आंसुओं के धुंधलके में भी उस पत्र का एक-एक अक्षर अंतःस्थल से बाहर आकर स्पष्ट आकृति ले चुका था. पत्र मां के नाम था-
आदरणीय माता जी,
मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं किसी की जातीय ज़िंदगी में हस्तक्षेप करूं. ना ही मेरी अंतर्रात्मा ऐसे मामलों में बोलने की गवाही देती है. फिर भी आप जैसी सज्जन व शालीन मां की बेटी व्यभिचार का रास्ता अपना रही हो तो सूचना देना अपना कर्त्तव्य समझता हूं. (आगे आप स्वयं समझदार हैं) आपकी बेटी राजकुमार जैसे चरित्रहीन व्यक्ति के जाल में फंसती जा रही है.
आपका शुभचिंतक
मुंह में कड़वाहट भर आई, छीः शुभचिंतक. धूर्त व विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति भी कभी किसी का शुभचिंतक हो सकता है. राजू भाई ठीक ही कहते हैं. असामान्य ज़िंदगी जीने वाले लोगों में स्वस्थ मानसिकता हो ही नहीं सकती. उनके चेहरे पर आदर्श का मुखौटा चढ़ा होता है. आंसू थमने लगे, हृदय का आवेश एक निश्चय का रूप लेने लगा था. हां, संबंध-विच्छेद के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. सबेरा होते ही वह मां के घर चली जाएगी. सोचते-सोचते आंख लग गई, तो सुबह दूधवाले की घंटी से ही खुली. दूध लेकर रसोई में रखा और अटैची हाथ में लेकर बाहर निकल आई. वर्माजी मेरी हर क्रिया को बेचैनी से देख रहे थे, किंतु कुछ भी बोल पाने का साहस उनमें नहीं था…
गेट खोलकर सड़क तक पहुंच पाती कि उससे पहले ही किसी और को गेट खोल अंदर आते देखा. “अरे राजूभाई आप, इतनी सुबह?” मैं सकपका गई थी.
“क्यों, क्या आ नहीं सकता तेरे घर?” उन्होंने मेरा चेहरा गौर से देखा. अटैची पर उनका ध्यान नहीं गया था.
“वर्माजी कहां हैं?” वर्माजी भी तब तक बाहर आ गए थे. राजूभाई की पारखी दृष्टि ने हमारे चेहरे पढ़ लिए थे. लेकिन अनजान बन सहज रूप से बोले, “मैं दरअसल, तुम्हें एक ख़ुशख़बरी देना चाहता था. सोचा फ़ोन के बजाय ख़ुद ही दूं तो तुम्हारे चेहरे की रौनक भी देख सकूंगा, क्यों?”
“अब बताइए भी क्या ख़बर है.” मेरी उत्सुकता बढ़ चली थी.
“अरे भई, तुम्हारी सहेली कल अपने बेटे को लेकर पहली बार आ रही है. उसका जन्मदिन यहीं मनाया जाएगा. तैयारी का दायित्व विशेष रूप से तुम्हारे ज़िम्मे सौंपने का आदेश है. ह़फ़्तेभर यहां रहनेवाली है और आग्रह है कि तुम भी ह़फ़्ते भर के लिए अपने मां-बाबा के पास जाओ. बोलो क्या कहती हो?”
मैं कुछ प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर पाती, उसके पहले वर्माजी बोल उठे, “इसमें कहना क्या है? आपकी बहन है, जब चाहे बुला लीजिए.” वर्माजी के हृदय परिवर्तन का कारण मैं तो समझ गई, लेकिन राजूभाई चकित थे. वर्मा जी क्षमा मांग मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गए. राजू भाई को दुविधा में देख मैंने पूरा क़िस्सा सुना देना बेहतर समझा. मेरे आंसू झरते रहे और राजूभाई मेरे सिर पर हाथ फेरते रहे. आज मैंने जाना कि वास्तविक शुभचिंतक कौन है. पत्र की चर्चा राजूभाई सुन चुके थे. लेकिन उस पत्र का ज़िक्र उन्होंने कभी नहीं किया, क्योंकि वो हमारा और अधिक अपमान नहीं करना चाहते थे.
पूरी बात सुनकर बोले थे, “प्रतिमा, जहां तक मैं सोचता हूं, वैवाहिक-संबंध मात्र पति-पत्नी को ही प्रभावित नहीं करते, वो पूरे परिवार, निकट मित्रों की मान-मर्यादा सभी को कहीं न कहीं प्रभावित करते हैं. एक सीमा तक तुम्हारे फैसले से सहमत होने को जी चाहता है, लेकिन दुनिया देखी है मैंने. संबंध-विच्छेद समस्या का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.”
फिर मीठी हंसी से छेड़ते हुए बोले, “एव्रीथिंग इज़ फेयर इन लव एंड वार. इतना प्यार करनेवाला तो क़िस्मत से मिलता है. चलो, आंसू पोछो और मुस्कुराओ. जल्दी में कोई क़दम मत उठाओ. निर्णय तुम्हीं को लेना है, लेकिन सोच-विचारने के बाद.” मैं आंसू पोंछ ही रही थी कि वर्माजी लौट आए थे. उनका चेहरा स़फेद पड़ चुका था. रात भर में ही जैसे उम्र बहुत बढ़ गई.
मैं चाय बनाने रसोई में चली गई, मेरे कानों में शब्द सुनाई दिए, “राजकुमारजी, मैं आपका अपराधी हूं.” और राजूभाई का सहज स्वर, “ग़लत, आप मेरे बहनोई हैं.” उनकी महानता ने, उनकी क्षमा ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया.
चाय के साथ औपचारिक बातें होती रहीं. फिर राजूभाई चलने को हुए तो मेरा मन फिर दुविधा में हुआ और स्वाभिमान बोल उठा, “मैं भी आपके साथ चल रही हूं.” उन दोनों को मौन छोड़ मैं अपनी अटैची उठा लाई. वर्माजी का क्लांत व अनमना चेहरा उनकी क्षमा प्रार्थना का साक्षी था.
मैंने बस इतना ही कहा, “नीता के जाते ही लौट आऊंगी.” कहने के बाद देखा तो वर्माजी के चेहरे पर राहत थी. राजूभाई के चेहरे पर एक शुभचिंतक को मिली आनन्दानुभूति थी. और मेरे चेहरे पर स्व को मिला एक सुकून था कि आज मैं उन्हीं राजूभाई के साथ क़दम मिलाकर चल पा रही हूं, जिनका साया भी विजय वर्मा को नागवार था. साथ ही मन की कड़ुवाहट छट गई थी. मां-बाबा के प्रति होने वाले अन्याय से बच गई थी. अपने जीवन को एक-दूसरे अभिशाप यानी तलाक़ से बचा लिया था. हां, प्रेम और युद्ध में जायज़ है सब कुछ. और ऐसा चाहनेवाला पति नसीबवालों को ही मिलता है.

प्रसून भार्गव