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संजय गुप्ता

श्रीमद्भागवत से ली गयी,राजा नृग(गिरगिट) और कृष्ण कथा!!!!!!!!

एक दिन की बात है साम्ब, प्रद्दुम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घुमने के लिये उपवन में गये। खेलते-खेलते उन्हें प्यास लग गई। पानी की तलाश में इधर-उधर गए तो एक कुआ दिखाई दिया। उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा। यह जीव पर्वत के समान आकार का एक गिरगिट था। इसे देखकर सभी ने इसे बाहर निकालने का प्रयास किया। लेकिन बाहर नही निकाल पाये।

तब भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये। उसे देखकर उन्होंने बायें हाथ से खेल-खेल में—अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया। जैसे ही भगवान श्री कृष्ण के कर कमलों का स्पर्श उसे मिला तो उसने गिरगिट की योनि ही छोड़ दी और एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणत हो गया। उसकी देह सोने की तरह चमक रही थी।

भगवान कृष्ण उसके बारे में सब जानते थे फिर भी जगत को बताने के लिए भगवान उससे पूछते हैं की तुम कौन हो और तुम्हे गिरगिट की देह क्यों मिली? यदि तुम बताना चाहो तो अपना परिचय अवश्य दो।

इन्होंने भगवान कृष्ण को प्रणाम किया और कहते हैं- प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। जब कभी किसी ने आपके सामने दानियों की गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानों में पड़ा होगा। क्योंकि आप सब जानते हैं।

पृथ्वी में जितने धूलिकण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जल की धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं । वे सभी गौएँ दुधार, नौजवान, सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा और कपिला थीं। उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था। सबके साथ बछड़े थे। उनके सींगों में सोना मढ़ दिया गया था और खुरों में चाँदी। उन्हें वस्त्र, हार और गहनों से सजा दिया जाता था। ऐसी गौएँ मैने दी थीं ।

मैं युवावस्था से सम्पन्न श्रेष्ठ ब्राम्हणकुमारों को गौओं का दान करता । इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दसियों के सहित कन्याएँ, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न, गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कुएँ, बावली आदि बनवाये।

एक दिन किसी अप्रतिग्रही (दान न लेने वाले), तपस्वी ब्राम्हण की एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजान में उसे किसी दूसरे ब्राम्हण को दान कर दिया। जब उस गाय को वे ब्राम्हण ले चले, तब उस गाय के असली स्वामी ने कहा—‘यह गौ मेरी है।’ दाने ले जाने वाले ब्राम्हण ने कहा—‘यह तो मेरी है, क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसका दान किया है’।

वे दोनों ब्राम्हण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास आये। एक ने कहा—यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है’ और दूसरे ने कहा कि ‘यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।’

उन दोनों ब्राम्हणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया । मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि ‘मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आप लोग मुझे यह गाय दे दीजिये । मैं आप लोगों का सेवक हूँ। मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है। मुझ पर आप लोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्ट से तथा घोर नरक में गिरने से बचा लीजिये’।

राजन्! मैं इसके बदले मैं कुछ नहीं लूँगा।’ यह कहकर गाय का स्वामी चला गया। ‘तुम इसके बदले में एक लाख ही नहीं, दस हजार गाएँ और दो तो भी मैं लेने का नहीं।’ इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राम्हण भी चला गया।

इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज के दूत आये और मुझे यमपुरी ले गये। वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा— ‘राजन्! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है’।

तब मैंने यमराज से कहा—‘देव! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ।’ और उसी क्षण यमराज ने कहा—‘तुम गिर जाओ।’ उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ ।

प्रभो! मैं ब्राम्हणों का सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था। मुझे इस बात अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ। इस प्रकार आपकी कृपा से मेरे पूर्वजन्मों की स्मृति नष्ट न हुई । भगवन्! आप परमात्मा हैं।

बड़े-बड़े शुद्ध-ह्रदय योगीश्वर उपनिषदों की दृष्टि से (अभेददृष्टि से) अपने ह्रदय में आपका ध्यान करते हैं। इन्द्रियातीत परमात्मन्! साक्षात् आप मेरे नेत्रों के सामने कैसे आ गये! क्योंकि मैं तो अनेक प्रकार के व्यसनों, दुःखद कर्मों में फँसकर अंधा हो रहा था। आपका दर्शन तो तब होता है, जब संसार के चक्कर से छुटकारा मिलने का समय आता है ।

देवताओं के भी आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत् तथा जीवों के स्वामी हैं। अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है। अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियों के स्वामी हैं । प्रभो! श्रीकृष्ण! मैं अब देवताओं के लोक में जा रहा हूँ। आप मुझे आज्ञा दीजिये। आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलों में ही लगा रहे ।

आप समस्त कार्यों और कारणों के रूप में विद्यमान हैं। आपकी शक्ति अनन्त हैं और आप स्वयं ब्रम्ह हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। सच्चिंदानन्दस्वरुप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ ।

फिर राजा नृग ने भगवान की परिक्रमा की और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श करके प्रणाम किया। फिर उनसे आज्ञा लेकर सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमानपर सवार हो गये।

राजा नृग के चले जाने के बाद वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्ब के लोगों से कहा- ‘जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राम्हणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। फिर जो अभिमानवश झूठ-मूठ अपने को लोगों का स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं ? मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राम्हणों का धन ही परम विष है, उसको पचा लेने के लिये पृथ्वी में कोई औषध, कोई उपाय नहीं है ।

हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है और आग भी जल के द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राम्हण के धन रूप अरणि से जो आग पैदा होती है, वह सारे कुल को समूल जला डालती है । ब्राम्हण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगने वाले, उसके लड़के और पौत्र-इन तीन पीढ़ियों को ही चौपट करता है।

परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषों की दस पिधियाँ और आगे की भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं । जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मी के घमंड से अंधे होकर ब्राम्हणों का धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरक में जाने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतन के कैसे गहरे गड्ढ़े में गिरना पड़ेगा । जिन उदारह्रदय और बहु-कुटुम्बी ब्राम्हणों की वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोने पर उनके आँसू की बूँदों से धरती के जितने धूलकण भीगते हैं, उतने वर्षों तक ब्राम्हण के स्वत्व को छिनने वाले उस उच्छ्रंखल राजा और उसके वंशजों को कुम्भी पाक नरक में दुःख भोगना पड़ता है । जो मनुष्य अपनी या दूसरों की दी हुई ब्राम्हणों की वृत्ति, उनकी जीविका के साधन छीन लेते हैं, वे साथ हजार वर्ष तक विष्ठा के कीड़े होते हैं ।

इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राम्हणों का धन कभी भूल से भी मेरे कोष में न आये, क्योंकि जो लोग ब्राम्हणों के धन की इच्छा भी करते हैं—उसे छिनने की बात तो अलग रही—वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओं से पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद भी दूसरों को कष्ट देने वाले साँप ही होते हैं ।

इसलिए ब्राह्मण का कभी भी भूल से भी अपराध न करें। यदि ब्राह्मण अपराध भी करें तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुम लोग सदा नमस्कार ही करो । जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानी से तीनों समय ब्राम्हणों को प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी किया करो।

जो मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा । यदि ब्राम्हण के धन का अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करने वाले को—अनजान में उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी—अधःपतन के गड्ढ़े में डाल देता है।

जैसे ब्राम्हण की गाय ने अनजान में उसे लेने वाले राजा नृग को नरक में डाल दिया था । समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारकावासियों को इस प्रकार उपदेश देकर अपने महल में चले गये।

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