Posted in हास्यमेव जयते, ઉત્સવ

[11/08, 9:44 a.m.] ‪+91 88511 97413‬: जब भी मैं भगवान शिव की यह तस्वीर देखता हूं तो मुझे बहुत दुख होता है। दिल रोता है। अपने खुद के नशे की लत के लिए हम और कितना महादेव जी को बदनाम करेंगे ?? भगवान शिव की कृपा से मैंने कुछ समय पहले शिव पुराण पढ़ा था ओर कहीं भी यह वर्णन नहीं आया कि भगवान शिव ने गांजा या चरस फूंकी हो, विपरीत इसके महादेव जी ने संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष पिया था, लेकिन इसके बारे में कोई बात तक भी नहीं करता , परंतु हां 80% गंजेडी-चरसी जब गांजा चरस फूंकते है तो वे यही कहते हैं कि फिर क्या हुआ यह तो भोले का प्रसाद है। इन जैसे लोगों ने ना तो कभी भगवान शिव को जाना होता है ना कभी पढ़ा होता है ओर ना कभी जानने की कोशिश करते हैं परन्तु हां फूंकने के समय इनको शिव जी की याद आ जाती है। ऐसे लोगों को मैं कहना चाहूंगा कि ज़रा सोचो जो शिव ब्रह्मांड पिता है ब्रह्मांड रचियता है ब्रह्मांड आत्मा है ,जो कण कण में समाया हुआ है , जो निराकार होके भी साकार है , जो निर्गुण होके भी सगुण है , जिनके आंखे मूंदते ही यह ब्रह्मांड अंधकारमय हो जाता है , क्या ऐसे शिव को किसी भी तरह के नशे की जरूरत है ?? वे भगवान है ना कि हम जैसे तुच्छ इंसान । उनको किसी सहारे की जरूरत नहीं है ,अपने आप में ही संपूर्ण हैं शिव। हां उन्हें भांग के पत्ते अवश्य चढ़ते हैं क्योंकि आयुर्वेद में भांग को एक बहुत ही उपयोगी औषधि माना जाता है और इसे अब पूरा विश्व भी स्वीकार कर रहा है। शिव पुराण के अनुसार समुद्र मंथन सावन के महीने में हुआ था तो जब मंथन में से अमृत निकला था तो उस अमृत को पाने के लिए तो देवता दैत्यों में भगदड़ मच गई थी परंतु ठीक जब अमृत के बाद पृथ्वी को नष्ट कर देने वाला हलाहल विष निकला तो कोई आगे ना आया,तब भगवान शिव आए और उन्होंने उस भयानक विष को अपने कंठ में धारण किया, जिसके कारण वे नीलकंठ व देवों के देव महादेव कहलाए। भगवान शिव के सहस्त्रो नाम में एक नाम है कर्पूरगौरम , जिसका अर्थ है पूर्णतः सफेद । लेकिन उस हलाहल विष के सेवन के बाद उनका शरीर नीला पड़ना शुरू हो गया था , भगवान शिव का शरीर तपने लगा लेकिन शिव फिर भी पूर्णतः शांत थे लेकिन देवताओं ने सेवा भावना से भगवान शिव की तपण शांत करने के लिए उन्हें जल चढ़ाया और विष के प्रभाव कम करने के लिए विजया ( भांग का पौधा )को दूध में मिला कर भगवान शिव को औषधि रूप में पिलाया। बस यही एक प्रमाण है भगवान शिव के भांग सेवन का,ओर हमने उन्हें चरस गांजा फूंकने वाला एक साधारण बना दिया,अब आप ही बताइए कि क्या हम सही न्याय कर रहे हैं उस ब्रह्मांड पिता की छवि के साथ ?? क्या हम उनका नाम बदनाम नहीं कर रहे ??
[11/08, 2:36 p.m.] ‪+91 73891 60409‬: एक सुपर स्टार थे राजेश खन्ना ।
शूटिंग के बाद रात तीन बजे तक स्काच पीते थे चार बजे खाना खाते थे । शूटिंग होती थी सुबह दस बजे पहुंचते थे शाम चार बजे ।। एक दिन एक बहुत स्वाभिमानी निर्माता ने कहा काका घड़ी देख रहो हो । घमंड से चूर काका ने कहा – हम नहीं , घड़ी हमारा टाइम देखती हैं

निर्देशक ने बिना शूटिंग किए पैकअप किया और बोले जो वक्त की इज्ज़त नहीं करता वक्त उन्हें सबक सिखा देता है।

एक समय ऐसा भी आया जब काका के पास वक़्त ही वक़्त था । ना फिल्में थीं, न शूटिंग थी, ना बीवी थी, ना बच्चे थे और न ही पैक अप कहने वाला ।

चमचों के साथ अपनी पुरानी फिल्मों को देख कभी खुश होते तो कभी रोते रहते । सभी साथ छोड़ गए अकेले पीकर और दो कौर खाकर लुढ़क जाना ही उनकी नियति बन गयी थी और बाकी आगे की कहानी आपसभी जानते है ।

ये वक़्त है , जो सबका आता है लेकिन हमेशा के लिऐ नहीं । समय और भाग्य अगर आपके साथ नही हैं तो आपकी कीमत दो कौड़ी की है । जीवन मे कर्म और पुरुषार्थ की महत्ता है , लेकिन कर्म करने के लिए आप जिंदा भी रहेंगे या नहीं ये आपका भाग्य तय करता है आपका पुरुषार्थ नहीं ।

अच्छे समय को भरपूर जियें लेकिन बुरे वक्त के लिए भी तैयार रहें । आपके बुरे वक्त में कोई आपके साथ हो न हो अपने अच्छे समय मे आप किसी को मत दुत्कारिये ।

विनम्रता अच्छे समय की पूंजी है और अहंकार आपके अच्छे समय को असमय ही खत्म कर देने वाला हथियार । भाग्य की सीढ़ी का सहारा लेकर ऊपर चढ़ते समय ये ध्यान जरूर रखें कि नीचे उतरते समय फिर वही लोग आपसे मिलेंगे ।

ये पोस्ट सिर्फ राजनीति या सार्वजनिक जीवन जीने वालों के लिए ही नहीं ये एक शाश्वत सत्य है जो सब पर बराबर लागू होता है.

👌✍
[11/08, 5:27 p.m.] ‪+91 83080 30439‬: मैंने फैसला किया है कि अब खाना खाते समय साउथ की फिल्म नहीं देखुंगा

अभी अभी एक स्कॉर्पियो का टायर मेरी थाली में आते आते बचा

😂😂😜😜😜😜
[12/08, 11:22 a.m.] Vishnu Arodaji: गुलामी के दिन थे। प्रयाग में कुम्भ मेला चल रहा था। एक अंग्रेज़ अपने द्विभाषिये के साथ वहाँ आया। गंगा के किनारे एकत्रित अपार जन समूह को देख अंग्रेज़ चकरा गया।

उसने द्विभाषिये से पूछा, “इतने लोग यहाँ क्यों इकट्टा हुए हैं?”

द्विभाषिया बोला, “गंगा स्नान के लिये आये हैं सर।”

अंग्रेज़ बोला, “गंगा तो यहां रोज ही बहती है फिर आज ही इतनी भीड़ क्यों इकट्ठा है?”

द्विभाषीया: – “सर आज इनका कोई मुख्य स्नान पर्व होगा।”
अंग्रेज़ :- ” पता करो कौन सा पर्व है ?”

द्विभाषिये ने एक आदमी से पूछा तो पता चला कि आज बसंत पंचमी है।

अंग्रेज़:- “इतने सारे लोगों को एक साथ कैसे मालूम हुआ कि आज ही बसंत पंचमी है?”

द्विभाषिये ने जब लोगों से पुनः इस बारे में पूछा तो एक ने जेब से एक जंत्री निकाल कर दिया और बोला इसमें हमारे सभी तिथि त्योहारों की जानकारी है।

अंग्रेज़ अपनी आगे की यात्रा स्थगित कर जंत्री लिखने वाले के घर पहुँचा। एक दड़बानुमा अंधेरा कमरा, कंधे पर लाल फटा हुआ गमछा, खुली पीठ, मैली कुचैली धोती पहने एक व्यक्ति दीपक की मद्धिम रोशनी में कुछ लिख रहा था। पूछने पर पता चला कि वो एक गरीब ब्राह्मण था जो जंत्री और पंचांग लिखकर परिवार का पेट भरता था।

अंग्रेज़ ने अपने वायसराय को अगले ही क्षण एक पत्र लिखा :- “इंडिया पर सदा के लिए शासन करना है तो सर्वप्रथम ब्राह्मणों का समूल विनाश करना होगा सर क्योंकि जब एक दरिद्र और भूँख से जर्जर ब्राह्मण इतनी क्षमता रखता है कि दो चार लाख लोगों को कभी भी इकट्टा कर सकता है तो सक्षम ब्राह्मण क्या कर सकते हैं, गहराई से विचार कीजिये सर।”

इसी युक्ति पर आज भी सत्ता की चाह रखने वाले चल रहे हैं, “अबाध शासन करना है तो बुद्धिजीवियों और राष्ट्रभक्तों का समूल उन्मूलन करना ही होगा.”

#साभार 🙏🌹
[12/08, 12:17 p.m.] ‪+91 94137 78285‬: सुपर मेसेज 👌👌👌👌👌

एक मनोवैज्ञानिक स्ट्रेस मैनेजमेंट के बारे में,
अपने दर्शकों के सामने था..

उसने पानी से भरा एक गिलास उठाया…
सभी ने समझा की अब “आधा खाली या आधा भरा है”.. यही पूछा और समझाया जाएगा..

मगर मनोवैज्ञानिक ने पूछा..
कितना वजन होगा इस पानी के गिलास का ?
सभी ने 300 से 400 ग्राम तक अंदाज बताया..

मनोवैज्ञानिक ने कहा..
कुछ भी वजन मान लो..फर्क नहीं पड़ता..
फर्क इस बात का पड़ता है.. कि
मैं कितनी देर तक इस गिलास उठाए रखता हूँ ?

अगर मैं इस गिलास को एक मिनट तक उठाए रखता हूँ.. तो क्या होगा? शायद कुछ भी नहीं…

अगर मैं इस गिलास को एक घंटे तक उठाए रखता हूँ.. तो क्या होगा? मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा और शायद अकड़ भी जाए.

अब अगर मैं इस गिलास को एक दिन तक उठाए रखता हूँ.. तो ??

मेरा हाथ… यकीनऩ, बेहद दर्दनाक हालत में होगा, हाथ पैरालाईज भी हो सकता है और मैं हाथ को हिलाने तक में असमर्थ हो जाऊंगा ।

लेकिन… इन तीनों परिस्थितियों में ग्लास के पानी का वजन न कम हुआ.. न ज्यादा.

चिंता और दुःख का भी जीवन में यही परिणाम है।

यदि आप अपने मन में इन्हें एक मिनट के लिए रखेंगे.. आप पर कोई दुष्परिणाम नहीं होगा..

यदि आप अपने मन में इन्हें एक घंटे के लिए रखेंगे आप दर्द और परेशानी महसूस करने लगेंगें..

लेकिन यदि आप अपने मन में इन्हें पूरा पूरा दिन बिठाए रखेंगे..

ये चिंता और दुःख.. हमारा जीना हराम कर देगा.. हमें पैरालाईज कर के कुछ भी सोचने – समझने में असमर्थ कर देगा..

और याद रहे..
इन तीनों परिस्थितियों में चिंता और दुःख.. जितना था, उतना ही रहेगा..

इसलिए.. यदि हो सके तो.. अपने चिंता और दुःख से भरे “ग्लास” को…एक मिनट के बाद.. नीचे रखना न भुलें..
[12/08, 1:51 p.m.] ‪+91 98299 94321‬: एक बोध कथा
|| कर्मो की दौलत ||

एक राजा था जिसने ने अपने राज्य में क्रूरता से बहुत सी दौलत इकट्ठा करके( एकतरह शाही खजाना ) आबादी से बाहर जंगल एक सुनसान जगह पर बनाए तहखाने मे सारे खजाने को खुफिया तौर पर छुपा दिया था खजाने की सिर्फ दो चाबियां थी एक चाबी राजा के पास और एक उसकेएक खास मंत्री के पास थी इन दोनों के अलावा किसी को भी उस खुफिया खजाने का राज मालूम ना था एक रोज़ किसी को बताए बगैर राजा अकेले अपने खजाने को देखने निकला , तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख देख कर खुश हो रहा था , और खजाने की चमक से सुकून पा रहा था।

उसी वक्त मंत्री भी उस इलाके से निकला और उसने देखा की खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कही कल रात जब मैं खजाना देखने आया तब शायद खजाना का दरवाजा खुला रह गया होगा, उसने जल्दी जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और वहां से चला गया . उधर खजाने को निहारने के बाद राजा जब संतुष्ट हुआ , और दरवाजे के पास आया तो ये क्या …दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था . उसने जोर जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहां उनकी आवाज सुननेवाला उस जंगल में कोई ना था ।

राजा चिल्लाता रहा , पर अफसोस कोई ना आया वो थक हार के खजाने को देखता रहा अब राजा भूख और पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था , पागलो सा हो गया.. वो रेंगता रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला ए दुनिया के नायाब हीरो मुझे एक गिलास पानी दे दो.. फिर मोती सोने चांदी के पास गया और बोला ए मोती चांदी सोने के खजाने मुझे एक वक़्त का खाना दे दो..राजा को ऐसा लगा की हीरे मोती उसे बोल रहे हो की तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती..राजा भूख से बेहोश हो के गिर गया ।

जब राजा को होश आया तो सारे मोती हीरे बिखेर के दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया , वो दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था ।

राजा ने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया . उधर मंत्री और पूरी सेना लापता राजा को ढूंढते रहे पर बहुत दिनों तक राजा ना मिला तो मंत्री राजा के खजाने को देखने आया , उसने देखा कि राजा हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है , और उसकी लाश को कीड़े मोकड़े खा रहे थे . राजा ने दीवार पर खून से लिखा हुआ था…ये सारी दौलत एक घूंट पानी ओर एक निवाला नही दे सकी…

यही अंतिम सच है |आखिरी समय आपके साथ आपके कर्मो की दौलत जाएगी , चाहे आप कितनी बेईमानी से हीरे पैसा सोना चांदी इकट्ठा कर लो सब यही रह जाएगा |इसीलिए जो जीवन आपको प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है , उसमें अच्छे कर्म लोगों की भलाई के काम कीजिए बिना किसी स्वार्थ के ओर अर्जित कीजिए अच्छे कर्मो की अनमोल दौलत |जो आपके सदैव काम आएगी |
[12/08, 2:13 p.m.] ‪+91 94137 78285‬: बड़े बावरे हिन्दी के मुहावरे
😄😄
हिंदी के मुहावरे, बड़े ही बावरे हैं,
खाने पीने की चीजों से भरे हैं….
कहीं पर फल है तो कहीं आटा-दालें हैं,
कहीं पर मिठाई है, कहीं पर मसाले हैं,
फलों की ही बात ले लो…

आम के आम और गुठलियों के भी दाम मिलते हैं, कभी अंगूर खट्टे हैं,
कभी खरबूजे, खरबूजे को देख कर रंग बदलते हैं,
कहीं दाल में काला है तो कहीं किसी की दाल ही नहीं गलती,

कोई डेड़ चावल की खिचड़ी पकाता है
तो कोई लोहे के चने चबाता है,
कोई घर बैठा रोटियाँ तोड़ता है,
कोई दाल भात में मूसरचंद बन जाता है,
मुफलिसी में जब आटा गीला होता है
तो आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाता है,

सफलता के लिए बेलने पड़ते है कई पापड़,
आटे में नमक तो जाता है चल,
पर गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है,
अपना हाल तो बेहाल है, ये मुंह और मसूर की दाल है,

गुड़ खाते हैं और गुलगुले से परहेज करते हैं
और कभी गुड़ का गोबर कर बैठते हैं,
कभी तिल का ताड़, कभी राई का पहाड़ बनता है,
कभी ऊँट के मुंह में जीरा है, कभी कोई जले पर नमक छिड़कता है,
किसी के दांत दूध के हैं तो कई दूध के धुले हैं,

कोई जामुन के रंग सी चमड़ी पा के रोई है,
तो किसी की चमड़ी जैसे मैदे की लोई है,
किसी को छटी का दूध याद आ जाता है,
दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक पीता है
और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है,

शादी बूरे के लड्डू हैं, जिसने खाए वो भी पछताए और जिसने नहीं खाए, वो भी पछताते हैं, पर शादी की बात सुन, मन में लड्डू फूटते है,
और शादी के बाद, दोनों हाथों में लड्डू आते हैं,

कोई जलेबी की तरह सीधा है, कोई टेढ़ी खीर है,
किसी के मुंह में घी शक्कर है, सबकी अपनी अपनी तकदीर है…
कभी कोई चाय-पानी करवाता है, कोई मक्खन लगाता है
और जब छप्पर फाड़ कर कुछ मिलता है,
तो सभी के मुंह में पानी आता है,

भाई साहब अब कुछ भी हो,
घी तो खिचड़ी में ही जाता है,
जितने मुंह है, उतनी बातें हैं,
सब अपनी-अपनी बीन बजाते है,
पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है,
सभी बहरे है, बावरें है
ये सब हिंदी के मुहावरें हैं…

ये गज़ब मुहावरे नहीं बुजुर्गों के अनुभवों की खान हैं…
सच पूछो तो हिन्दी भाषा की जान हैं…😊
[12/08, 3:40 p.m.] ‪+91 98803 03018‬: 👦पति– जब हमारी नई-नई शादी हुई थी,
तब तुम कितना तहजीब से बोलती थी
और अब….???

👩पत्नि — पहले मै रामायण देखती थी,
और
अब क्राईम पेट्रोल देखती हू ।😂😂😂😉😉
[13/08, 7:48 a.m.] ‪+91 80584 98386‬: यूपी ,हरियाणा और राजस्थान की रोडवेज बसें ,

ड्राइवर के बीड़ी पीने से चलती है …..😂😂
[13/08, 7:48 a.m.] ‪+91 80584 98386‬: एक अंग्रेज़, भारतीय रेल के Toilet में Bisleri की बोतल देख के बेहोश हो गया।

Oh my God! हम तो इसे पीते हैं, ……😝😝😝😝😝
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: अब्दुल की फेसबुक पर एक लड़की से दोस्ती हो गयी। अब्दुल ने उसे इम्प्रेस करने के लिये लिखा ..,
“चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो”.. 😍

थोड़ी देर में लड़की का जवाब आ गया, 🤠

आफताब ही हूँ अब्दुल भाई, फेक आईडी बनाई थी, फिर भी आपने पहचान लिया..
😳😬😂

By @sap_saket
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: आदमी हवाई जहाज़ 🛬से उतरा
तो दरवाज़े पर खड़ी एयर होस्टेस बोली,
“उम्मीद है फ्लाइट में घर जैसा माहौल मिला होगा”!
आदमी ~ जी बिल्कुल नहीं, घर में तो मेरी कोई नहीं सुनता पर यहां तो बटन दबाते ही चार चार आ जाती हैं।।😜😂


दुनियादारी का फर्क तब समझ में आया 😉
जब एक कुंवारे के दरवाज़े पर लिखा देखा:
“Sweet Home”
.
और 😎
.
शादी-शुदा के दरवाजे पे : “ॐ शांति ॐ” 😝😀😁😂


ससुर का फ़ोन: दामाद जी, कल तुम्हारे साले के लिये लड़की देखने जाना है , हो सके तो आ जाओ

दामाद: आप लोग देखलो, मेरा तो खुदका डिसीजन गलत हुआ पड़ा है 😉😜


Wife : शादी से पहले तुम बहुत मंदिर जाते थे । अब क्या हो गया ?

HUsband : फिर तुमसे शादी हो गयी …
और भगवान से भरोसा उठ गया…….😜😜😜😜😜


साला आज-कल के साबुन देख कर,

पता ही नहीं चलता की नहाने के लिए है या खाने के लिए!!

मलाई..दूध..केशर..युक्त.😋😜


👼.. Bacha: मम्मी आप तो कहते थे कि परी उड़ती है ……….फिर अपनी पड़ोसन आंटी क्यों नहीं उड़ती????!!!

मम्मी : उस बंदरिया को परी किसने कहा??

बच्चा :डैडी ने . . .
मम्मी: तो फिर ….बेटा आज उड़ेगी ….वो भी और तेरा baap भी….
😄😜😜😜😝😝😂😂
[13/08, 10:40 a.m.] ‪+91 94144 62843‬: 😜😜

😃”….अरे बेटा ये पैर में पट्टी कैसी बांध रखी है क्या हुआ”,
“….कुछ नही अंकल बाइक से गिर गया चोट लग गयी है”
“….ओह हो हो बेटा “दवा-दारु” ले ली”
….”हां अंकल दारू तो गिरने से पहले ही ली थी और दवा गिरने के बाद….”

😇😁

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Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला, रात हो जाने पर एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका आनंद ने साधु की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर फिर उसे विदा किया।
साधु ने आनंद के लिए प्रार्थना की –
“भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।”
साधु की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला
अरे भाई, जो है, यह भी नहीं रहने वाला
साधु आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया।

दो वर्ष बाद साधु फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है।
साधु आनंद से मिलने गया। आनंद ने अभाव में भी साधु का स्वागत किया। झोंपड़ी में जो फटी चटाई थी उस पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधु की आँखों में आँसू थे। साधु कहने लगा – “हे भगवान् ! ये तूने क्या किया ?”
आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “आप क्यों दु:खी हो रहे हो ? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान् मनुष्य को जिस हाल में रखे, मनुष्य को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो !
यह भी नहीं रहने वाला ।”

साधु ने मन में सोचा कि
सच्चा साधु तो तू ही है, आनंद।

कुछ वर्ष बाद साधु फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है। मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया। साधु ने आनंद से कहा – “अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया । भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।
यह सुनकर आनंद फिर हँस पड़ा और कहने लगा – “साधु ! अभी भी तेरी नादानी बनी हुई है”
साधु ने पूछा – “क्या यह भी नहीं रहने वाला ?”
आनंद उत्तर दिया – “हाँ, यह भी चला जाएगा जो इसको अपना मानता है वो ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा का अंश आत्मा।”
आनंद की बात को साधु ने गौर से सुना और चला गया।

साधु कुछ साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।

साधु कहता है – “अरे मनुष्य ! तू किस बात का अभिमान करता है ? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता । तू सोचता है, पडोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ । लेकिन सुन, न तो तेरी मौज रहेगी और न ही तेरी मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे मनुष्य वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते है और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।”

साधु कहने लगा – “धन्य है, आनंद ! तेरा सत्संग और धन्य है तुम्हारे सद्गुरु !
मैं तो झूठा साधु हूँ, असली साधु तो तेरी जिन्दगी है। अब तेरी तस्वीर पर कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं ।”

साधु दुसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद ने अपनी तस्वीर पर लिखवा रखा है – “आखिर में यह भी नहीं रहेगा”

Posted in महाभारत - Mahabharat

आचार्य विकाश

महाभारत से सीखें सफलता पाने के 6 टिप्स
जीवन और करियर में सफलता पाने के लिए धार्मिक ग्रंथों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. जी हां, भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ महाभारत से स्टूडेंट काफी सीख सकते हैं.

जीवन और करियर में सफलता पाने के लिए भारत के धार्मिक ग्रंथ से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. जी हां, भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ महाभारत से स्टूडेंट काफी सीख ले सकते हैं.
महाभारत से सीखें सफलता पाने के 6 टिप्स
1. बुरी संगत हमेशा नुकसान दायक: हम सब ने महाभारत पढ़कर या सीरियल देखकर जरूर यह सोचा होगा कि शकुनी ने कौरवों की जिंदगी नर्क बना दी और उनका सब कुछ बर्बाद कर दिया जो भी उनका हो सकता था. शकुनी के माध्यम से स्टूडेंट के लिए यह सीख है कि वो हमेशा ऐसे लोगों से बचे जो अच्छे व्यवहार वाले नहीं होते हैं.

  1. बिना शर्तों के साथ रहने वाले दोस्त होते हैं अच्छे: भगवान कृष्ण ने पांडवों का साथ हर मुश्किल वक्त में देकर यह साबित कर दिया था कि दोस्त वही अच्छे होते हैं जो किसी भी परिस्थिति में आपके साथ रहते हैं. दोस्ती में शर्तों के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए एक स्टूडेंट को भी ऐसे ही दोस्त अपने आस-पास रखने चाहिए जो हर मुश्किल परिस्थिति में उनका साथ दे सकता हो.

  2. जिदंगी में हर वक्त सीखते रहना: महाभारत का सबसे बड़ा योद्धा अर्जुन ने ना केवल अपने गुरू से सीख लिया बल्कि वह अपने अनुभवों से हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहे. यह सीख हर स्टूडेंट के लिए जरूरी है. स्टूडेंट को शिक्षक के अलावे अपनी गलतियों और असफलताओं से हमेशा सीखना चाहिए.

  3. अधूरे ज्ञान मतलब खतरे की घंटी: महाभारत में अभिमन्यू अपनी वीरता के लिए जाना जाता है लेकिन चक्रव्यूह भेदने के उनके अधूरे ज्ञान ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया. स्टूडेंट को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि वह जो भी नॉलेज पाए उसे पूरा पाएं ना कि अधूरा, यह आपको कई बार परेशानी में डाल सकता है.

  4. सफलता पाने के लिए जुनूनी होना जरूरी: महाभारत के एकलव्य से ज्यादा जुनूनी हमें शायद ही कहीं और मिले. एकलव्य से हमें यह सीखना चाहिए कि सफलता उसी को मिलेगी जो जुनूनी होगा. स्टूडेंट के लिए एकलव्य एक अच्छा उदाहरण है.

  5. मास्टर स्ट्रैटजी: अगर पांडवों के पास भगवान कृष्ण की मास्टर स्ट्रैटजी ना होती तो शायद ही पांडव युद्ध में जीत पाते. इसलिए किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए स्ट्रैटजी बनानी आवश्यक है.

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजय गुप्ता

श्रीमद्भागवत से ली गयी,राजा नृग(गिरगिट) और कृष्ण कथा!!!!!!!!

एक दिन की बात है साम्ब, प्रद्दुम्न, चारुभानु और गदा आदि यदुवंशी राजकुमार घुमने के लिये उपवन में गये। खेलते-खेलते उन्हें प्यास लग गई। पानी की तलाश में इधर-उधर गए तो एक कुआ दिखाई दिया। उसमें जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा। यह जीव पर्वत के समान आकार का एक गिरगिट था। इसे देखकर सभी ने इसे बाहर निकालने का प्रयास किया। लेकिन बाहर नही निकाल पाये।

तब भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये। उसे देखकर उन्होंने बायें हाथ से खेल-खेल में—अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया। जैसे ही भगवान श्री कृष्ण के कर कमलों का स्पर्श उसे मिला तो उसने गिरगिट की योनि ही छोड़ दी और एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणत हो गया। उसकी देह सोने की तरह चमक रही थी।

भगवान कृष्ण उसके बारे में सब जानते थे फिर भी जगत को बताने के लिए भगवान उससे पूछते हैं की तुम कौन हो और तुम्हे गिरगिट की देह क्यों मिली? यदि तुम बताना चाहो तो अपना परिचय अवश्य दो।

इन्होंने भगवान कृष्ण को प्रणाम किया और कहते हैं- प्रभो! मैं महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ। जब कभी किसी ने आपके सामने दानियों की गिनती की होगी, तब उसमें मेरा नाम भी अवश्य ही आपके कानों में पड़ा होगा। क्योंकि आप सब जानते हैं।

पृथ्वी में जितने धूलिकण हैं, आकाश में जितने तारे हैं और वर्षा में जितनी जल की धाराएँ गिरती हैं, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थीं । वे सभी गौएँ दुधार, नौजवान, सीधी, सुन्दर, सुलक्षणा और कपिला थीं। उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था। सबके साथ बछड़े थे। उनके सींगों में सोना मढ़ दिया गया था और खुरों में चाँदी। उन्हें वस्त्र, हार और गहनों से सजा दिया जाता था। ऐसी गौएँ मैने दी थीं ।

मैं युवावस्था से सम्पन्न श्रेष्ठ ब्राम्हणकुमारों को गौओं का दान करता । इस प्रकार मैंने बहुत-सी गौएँ, पृथ्वी, सोना, घर, घोड़े, हाथी, दसियों के सहित कन्याएँ, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न, गृह-सामग्री और रथ आदि दान किये। अनेकों यज्ञ किये और बहुत-से कुएँ, बावली आदि बनवाये।

एक दिन किसी अप्रतिग्रही (दान न लेने वाले), तपस्वी ब्राम्हण की एक गाय बिछुड़कर मेरी गौओं में आ मिली। मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला। इसलिये मैंने अनजान में उसे किसी दूसरे ब्राम्हण को दान कर दिया। जब उस गाय को वे ब्राम्हण ले चले, तब उस गाय के असली स्वामी ने कहा—‘यह गौ मेरी है।’ दाने ले जाने वाले ब्राम्हण ने कहा—‘यह तो मेरी है, क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसका दान किया है’।

वे दोनों ब्राम्हण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिये मेरे पास आये। एक ने कहा—यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है’ और दूसरे ने कहा कि ‘यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है।’

उन दोनों ब्राम्हणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया । मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की और कहा कि ‘मैं बदले में एक लाख उत्तम गौएँ दूँगा। आप लोग मुझे यह गाय दे दीजिये । मैं आप लोगों का सेवक हूँ। मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है। मुझ पर आप लोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्ट से तथा घोर नरक में गिरने से बचा लीजिये’।

राजन्! मैं इसके बदले मैं कुछ नहीं लूँगा।’ यह कहकर गाय का स्वामी चला गया। ‘तुम इसके बदले में एक लाख ही नहीं, दस हजार गाएँ और दो तो भी मैं लेने का नहीं।’ इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राम्हण भी चला गया।

इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज के दूत आये और मुझे यमपुरी ले गये। वहाँ यमराज ने मुझसे पूछा— ‘राजन्! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हें ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है’।

तब मैंने यमराज से कहा—‘देव! पहले मैं अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ।’ और उसी क्षण यमराज ने कहा—‘तुम गिर जाओ।’ उनके ऐसा कहते ही मैं वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मैं गिरगिट हो गया हूँ ।

प्रभो! मैं ब्राम्हणों का सेवक, उदार, दानी और आपका भक्त था। मुझे इस बात अभिलाषा थी कि किसी प्रकार आपके दर्शन हो जायँ। इस प्रकार आपकी कृपा से मेरे पूर्वजन्मों की स्मृति नष्ट न हुई । भगवन्! आप परमात्मा हैं।

बड़े-बड़े शुद्ध-ह्रदय योगीश्वर उपनिषदों की दृष्टि से (अभेददृष्टि से) अपने ह्रदय में आपका ध्यान करते हैं। इन्द्रियातीत परमात्मन्! साक्षात् आप मेरे नेत्रों के सामने कैसे आ गये! क्योंकि मैं तो अनेक प्रकार के व्यसनों, दुःखद कर्मों में फँसकर अंधा हो रहा था। आपका दर्शन तो तब होता है, जब संसार के चक्कर से छुटकारा मिलने का समय आता है ।

देवताओं के भी आराध्यदेव! पुरुषोत्तम गोविन्द! आप ही व्यक्त और अव्यक्त जगत् तथा जीवों के स्वामी हैं। अविनाशी अच्युत! आपकी कीर्ति पवित्र है। अन्तर्यामी नारायण! आप ही समस्त वृत्तियों और इन्द्रियों के स्वामी हैं । प्रभो! श्रीकृष्ण! मैं अब देवताओं के लोक में जा रहा हूँ। आप मुझे आज्ञा दीजिये। आप ऐसी कृपा कीजिये कि मैं चाहे कहीं कहीं भी क्यों न रहूँ, मेरा चित्त सदा आपके चरणकमलों में ही लगा रहे ।

आप समस्त कार्यों और कारणों के रूप में विद्यमान हैं। आपकी शक्ति अनन्त हैं और आप स्वयं ब्रम्ह हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। सच्चिंदानन्दस्वरुप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ ।

फिर राजा नृग ने भगवान की परिक्रमा की और अपने मुकुट से उनके चरणों का स्पर्श करके प्रणाम किया। फिर उनसे आज्ञा लेकर सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमानपर सवार हो गये।

राजा नृग के चले जाने के बाद वहाँ उपस्थित अपने कुटुम्ब के लोगों से कहा- ‘जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी हैं, वे भी ब्राम्हणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते। फिर जो अभिमानवश झूठ-मूठ अपने को लोगों का स्वामी समझते हैं, वे राजा तो क्या पचा सकते हैं ? मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा होती है। वस्तुतः ब्राम्हणों का धन ही परम विष है, उसको पचा लेने के लिये पृथ्वी में कोई औषध, कोई उपाय नहीं है ।

हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है और आग भी जल के द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राम्हण के धन रूप अरणि से जो आग पैदा होती है, वह सारे कुल को समूल जला डालती है । ब्राम्हण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिये बिना भोगा जाय तब तो वह भोगने वाले, उसके लड़के और पौत्र-इन तीन पीढ़ियों को ही चौपट करता है।

परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाय, तब तो पूर्वपुरुषों की दस पिधियाँ और आगे की भी दस पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं । जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मी के घमंड से अंधे होकर ब्राम्हणों का धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरक में जाने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतन के कैसे गहरे गड्ढ़े में गिरना पड़ेगा । जिन उदारह्रदय और बहु-कुटुम्बी ब्राम्हणों की वृत्ति छीन ली जाती है, उनके रोने पर उनके आँसू की बूँदों से धरती के जितने धूलकण भीगते हैं, उतने वर्षों तक ब्राम्हण के स्वत्व को छिनने वाले उस उच्छ्रंखल राजा और उसके वंशजों को कुम्भी पाक नरक में दुःख भोगना पड़ता है । जो मनुष्य अपनी या दूसरों की दी हुई ब्राम्हणों की वृत्ति, उनकी जीविका के साधन छीन लेते हैं, वे साथ हजार वर्ष तक विष्ठा के कीड़े होते हैं ।

इसलिये मैं तो यही चाहता हूँ कि ब्राम्हणों का धन कभी भूल से भी मेरे कोष में न आये, क्योंकि जो लोग ब्राम्हणों के धन की इच्छा भी करते हैं—उसे छिनने की बात तो अलग रही—वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओं से पराजित और राज्यभ्रष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के बाद भी दूसरों को कष्ट देने वाले साँप ही होते हैं ।

इसलिए ब्राह्मण का कभी भी भूल से भी अपराध न करें। यदि ब्राह्मण अपराध भी करें तो भी उससे द्वेष मत करो। वह मार ही क्यों न बैठे या बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे, उसे तुम लोग सदा नमस्कार ही करो । जिस प्रकार मैं बड़ी सावधानी से तीनों समय ब्राम्हणों को प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी किया करो।

जो मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे मैं क्षमा नहीं करूँगा, दण्ड दूँगा । यदि ब्राम्हण के धन का अपहरण हो जाय तो वह अपहृत धन उस अपहरण करने वाले को—अनजान में उसके द्वारा यह अपराध हुआ हो तो भी—अधःपतन के गड्ढ़े में डाल देता है।

जैसे ब्राम्हण की गाय ने अनजान में उसे लेने वाले राजा नृग को नरक में डाल दिया था । समस्त लोकों को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारकावासियों को इस प्रकार उपदेश देकर अपने महल में चले गये।

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संजय गुप्ता

नागपंचमी की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा…

नागपंचमी की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसके भाई नहीं था।

एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है।’

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा। तब छोटी बहू ने उससे कहा-‘हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फँसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई।

उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- ‘तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता।

वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा माँगती हूँ, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहिन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो माँगना हो, माँग ले। वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहिन को भेज दो।’ सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था।

उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वहीं सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना। उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई।

एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- ‘मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुख बेतरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई।

परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया।

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए।’

राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मँगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए।

राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूँगा। छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहू अपने हार और धन सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी।

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

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संजय गुप्ता

नमस्कार दोस्तों
एक धार्मिक स्थल की जानकारी

जानें इस सैकड़ो वर्ष पुराने मंदिर में भगवान करतें हैं बातें, वैज्ञानिक भी हैं हैरान

इसे आप चमत्कार नही कहेंगे तो क्या कहेंगें बिहार के बक्सर जिले में एक ऐसा मंदिर है। जहाँ मुर्तियां आपस में बातें करती हैं। इसकी पुष्टि वैज्ञानिक भी कर चुके हैं।

तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध बिहार के इकलौते राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर में साधकों की हर मनोकामना पूरी होती है। देर रात तक साधक इस मंदिर में साधना में लीन रहते हैं।
मंदिर में प्रधान देवी राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी के अलावा बंगलामुखी माता, तारा माता के साथ दत्तात्रेय भैरव, बटुक भैरव, अन्नपूर्णा भैरव, काल भैरव व मातंगी भैरव की प्रतिमा स्थापित की गई है।
राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी मंदिर की सबसे अनोखी मान्यता यह है कि निस्तब्ध निशा में यहां स्थापित मूर्तियों से बोलने की आवाजें आती हैं। मध्य-रात्रि में जब लोग यहां से गुजरते हैं तो उन्हें आवाजें सुनाई पड़ती हैं।

वैज्ञानिकों की मानें, तो यह कोई वहम नहीं है। इस मंदिर के परिसर में कुछ शब्द गूंजते रहते हैं।
मंदिर में काली, त्रिपुर भैरवी, धुमावती, तारा, छिन्न मस्ता, षोडसी, मातंगड़ी, कमला, उग्र तारा, भुवनेश्वरी आदि दस महाविद्याओं की भी प्रतिमाएं हैं।
इस कारण तांत्रिकों की आस्था इस मंदिर के प्रति अटूट है। कहा जाता है कि यहां किसी के नहीं होने पर भी आवाजें सुनाई देती हैं।
यहां पर वैज्ञानिकों की एक टीम भी गई थी, जिन्होंने रिसर्च करने के बाद कहा कि यहां पर कोई आदमी नहीं है। इस कारण यहां पर शब्द भ्रमण करते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी मान लिया है कि हां पर कुछ न कुछ अजीब घटित होता है, जिससे कि यहां पर आवाज आती है।

जय माता दी

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संजय गुप्ता

कामाख्या मंदिर – सबसे पुराना शक्तिपीठ – यहाँ होती हैं योनि कि पूजा, लगता है तांत्रिकों व अघोरियों का मेला!!!!!

कामाख्या मंदिर असम के गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर देवी कामाख्या को समर्पित है। कामाख्या शक्तिपीठ 52 शक्तिपीठों में से एक है तथा यह सबसे पुराना शक्तिपीठ है। जब सती के पिता दक्ष ने अपनी पुत्री सती और उस के पति शंकर को यज्ञ में अपमानित किया और शिव जी को अपशब्द कहे तो सती ने दुःखी हो कर आत्म-दहन कर लिया।

शंकर ने सती कि मॄत-देह को उठा कर संहारक नृत्य किया। तब सती के शरीर के 51 हिस्से अलग-अलग जगह पर गिरे जो 51 शक्ति पीठ कहलाये। कहा जाता है सती का योनिभाग कामाख्या में गिरा। उसी स्थल पर कामाख्या मन्दिर का निर्माण किया गया।

इस मंदिर के गर्भ गृह में योनि के आकार का एक कुंड है जिसमे से जल निकलता रहता है। यह योनि कुंड कहलाता है। यह योनि कुंड लाल कपडे व फूलो से ढका रहता है।

इस मंदिर में प्रतिवर्ष अम्बुबाची मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर के तांत्रिक और अघौरी हिस्‍सा लेते हैं। ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बुबाची मेले’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं, और इन तीन दिन में योनि कुंड से जल प्रवाह कि जगह रक्त प्रवाह होता है । ‘अम्बुबाची मेले को कामरूपों का कुंभ कहा जाता है।

मां कामाख्या देवी की रोजाना पूजा के अलावा भी साल में कई बार कुछ विशेष पूजा का आयोजन होता है। इनमें पोहन बिया, दुर्गाडियूल, वसंती पूजा, मडानडियूल, अम्बूवाकी और मनसा दुर्गा पूजा प्रमुख हैं।

दुर्गा पूजा: – हर साल सितम्बर-अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान इस पूजा का आयोजन किया जाता है।

अम्बुबाची पूजा: – ऐसी मान्यता है,कि अम्बुबाची पर्व के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती है इसलिए तीन दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है तो इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

पोहन बिया: – पूसा मास के दौरान भगवान कमेस्शवरा और कामेशवरी की बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में यह पूजा की जाती है।

दुर्गाडियूल पूजा: – फाल्गुन के महीने में यह पूजा कामाख्या में की जाती है।

वसंती पूजा: – यह पूजा चैत्र के महीने में कामाख्या मंदिर में आयोजित की जाती है।

मडानडियूल पूजा: – चेत्र महीने में भगवान कामदेव और कामेश्वरा के लिए यह विशेष पूजा की जाती है।

कामाख्या से जुडी किवदंती!!!!!

कामाख्या के शोधार्थी एवं प्राच्य विद्या विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर शर्मा कहते हैं कि कामाख्या के बारे में किंवदंती है कि घमंड में चूर असुरराज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था।

कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छानुसार पत्नी बन जाऊँगी और यदि तुम ऐसा न कर पाये तो तुम्हारी मौत निश्चित है।

गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान प्रभात होने से पूर्व पूर्ण कर दिये और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गयी, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी `कुक्टाचकि’ के नाम से विख्यात है। बाद में मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर असुर का वध कर दिया।

कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था।

इस पुरे मंदिर परिसर में कामाख्या देवी के मुख्य मंदिर के अलावा और भी कई मंदिर है इनमे से अधिकतर मंदिर देवी के विभिन्न स्वरूपों के है। पांच मंदिर भगवान शिव के और तीन मंदिर भगवान विष्णु के है। यह मंदिर कई बार टुटा और बना है आखरी बार इसे 16 वि सदी में नष्ट किया गया था जिसका पुनः निर्माण 17 वी सदी में राजा नर नारायण द्वारा किया गया।