Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ज्योति अग्रवाल

—– अर्धांगिनी —

जया को रात में बुखार चढ़ गया था। दो बार उल्टी भी हुई थी। पास सोए रवि को उसने इस बात की भनक भी नहीं पड़ने दी, लेकिन सवेरे वह लाचार थी। वह रवि से बोली, “सुनिए, मुझे बुखार है और कमज़ोरी लग रही है। बिट्टू को तैयार कर के स्कूल भेज देंगे? बस साढ़े सात पर आती है।”

रवि हड़बड़ा के उठा। उसके पास एक घंटा था। सबसे पहले बिट्टू को जगाया, और चाय का पानी चढ़ाया। सोचा जया का बुखार ही नाप लूँ। एक सौ पाँच डिग्री देख कर वह घबड़ा गया। फ़ौरन ही दो बिस्कुट के साथ पैरासिटेमॉल की एक गोली जया को दी।

उधर बिट्टू दोबारा सो गया था। उसे उठा कर एक झापड़ रसीद किया तो वह रोने लगा। रवि उसे पुचकारने लगा, “बेटा, रोते नहीं… मम्मी की तबियत ख़राब है… आज मैं ही तुम्हें तैयार करूँगा। तुम क्या खा कर जाते हो और टिफ़िन में क्या ले जाते हो?”

बिट्टू था तो छोटा ही, लेकिन मम्मी की बीमारी की बात सुन कर सँभल गया। बोला, “मम्मी तो कभी टोस्ट बटर देती हैं और कभी आलू का पराँठा। लेकिन मम्मी को हुआ क्या है?”

“बुखार हो गया है,” रवि बोला। चाय का पानी उबल-उबल कर आधा हो गया था। जब तक बिट्टू तैयार होता, उसे नाश्ता व टिफ़िन दोनों तैयार करना था। पराँठे तो रवि क्या बनाता, टोस्टर में ब्रेड के स्लाइस लगा कर मक्खन का डिब्बा ढूँढने लगा।

“पापा, मेरे जूते पॉलिश नहीं है,” कमरे से बिट्टू की आवाज़ आई। रवि सब छोड़ कर जूते में पॉलिश करने लगा। तब तक टोस्ट जल गया। रवि झल्ला गया।

जब तक रवि दोबारा टोस्ट बना कर बिट्टू को तैयार करता, बाहर बस का हॉर्न दूसरी बार बज गया। भागते हुए बाहर पहुँचा तो बस जा चुकी थी। रवि रुआँसा हो गया।

भाग्य से पड़ोस के शर्मा जी का बच्चा भी लेट हो गया था और वह उसे छोड़ने कार से जा रहे थे। बिट्टू को भी शर्मा जी के साथ भेज कर रवि ने चैन की साँस ली।

इन चक्करों में रवि ने अभी तक चाय भी नहीं पी थी, और उसे स्वयं एक घंटे में ऑफ़िस के लिए निकलना था। जया के लिए डॉक्टर को कंसल्ट भी करना था। कॉलोनी में ही एक डॉक्टर थे, उन्हें घर पर बुला लिया। जया के ऑफ़िस में छुट्टी की अर्ज़ी भी भेजनी थी। रवि अपना सिर पकड़. कर बैठ गया।

उसे याद आया कि चार महीने पहले उसकी तबियत भी ख़राब हुई थी। उस समय जया ने इतना सब कैसे किया होगा?

कहने को तो जया उसकी अर्धांगिनी थी लेकिन उसे लग रहा था कि वह ख़ुद जया के बिना शून्य है, और जया वास्तव में उसकी पूर्णांगिनी है।

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ज्योति अग्रवाल

🌷मानस में भगवान शिव कहते हैं कि —

“उमा कहूं मैं अनुभव अपना ,सत हरि भजन जगत सब सपना”
अर्थात् भगवान शिव कहते हैं की हरि का भजन ही सत्य है– यानि वास्तविक ज्ञान भी यही है की हरि का भजन किया जाए-ओर जो लोग भजन नही करते उन्हें पुराणों में पशु समान कहा गया है-

“ज्ञानशून्या नरा ये तु पशव: परिकीर्तिता:”

अर्थात् जो मनुष्य वास्तविक ज्ञान यानि जो मनुष्य भजन नही करता वो पशु समान है।

क्योंकि पशु भी भजन नही करते

खाना-पीना,सोना-जागना,घर बनाना,बच्चे पैदा करना यह सब कार्य एक जानवर भी करता हैं।

अगर मनुष्य देह पाकर भी मनुष्य सारा जीवन यही काम करता रहेगा तो मनुष्य और पशु मे कोई अंतर नही रहा–

कहा भी गया हैं कि –

“आहार निद्रा भय मैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्–
धर्मो हि तेषामधिको विशेष:
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः”

अर्थात् धर्म से हीन मनुष्य पशु समान हैं

इस मानव देह की बहुत महिमा है– देवताओं ने यह नही कहा की प्रभु हमें पशु बना दो ।

देवता केवल यही प्रार्थना करते हैं की प्रभु हमे मनुष्य देह दे दीजिये।

नारद पुराण मे कहा गया —

“दुर्लभ मानुषं जन्म ,प्राथ्यते त्रिदशैरपि”

अर्थात् इस दुर्लभ मानव देह को देवता लोग भी चाहते हैं क्योंकि इस देह से हम वास्तविक आनंद प्राप्त कर सकते हैं।

इस मानव देह से ही हम भगवान के सन्मुख हो सकते हैं क्योंकि

“विमुख राम सुख पाव न कोई”

भगवान से विमुख होकर जीव को कभी सुख नही मिल सकता

इसलिए इस मानव देह में ही मनुष्य भगवान के सन्मुख होने का ज्ञान/ विवेक प्राप्त कर सकता है और अनंतकाल के लिए आनंद प्राप्त कर सकता है– पशु इस विवेक को प्राप्त नही कर सकते– केवल मानव देह से ही ये वास्तविक विवेक प्राप्त होता है।🌷

हरे कृष्ण 🙏
*श्री कृष्ण सदैव आपकी स्मृति में रहें!!

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संतोष चतुर्वेदी

“तेनालीराम का शातिर दिमाग”

एक बार राजा कृष्णदेव राय ने अपने गृहमंत्री को राज्य में अनेक कुएं बनाने का आदेश दिया। गर्मियां पास आ रही थीं इसलिए राजा चाहते थे कि कुएं शीघ्र तैयार हो जाएं ताकि लोगों को गर्मियों में थोड़ी राहत मिल सके। गृहमंत्री ने इस कार्य के लिए शाही कोष से बहुत-सा धन लिया। शीघ्र ही राजा के आदेशानुसार नगर में अनेक कुएं तैयार हो गए। इसके बाद एक दिन राजा ने नगर भ्रमण किया और कुछ कुओं का स्वयं निरीक्षण किया। अपने आदेश को पूरा होते देख वे संतुष्ट हो गए। गर्मियों में एक दिन नगर के बाहर से कुछ गांव वाले तेनालीराम के पास पहुंचे, वे सभी गृहमंत्री के विरुद्ध शिकायत लेकर आए थे। तेनालीराम ने उनकी शिकायत सुनी और उन्हें न्याय प्राप्त करने का रास्ता बताया। तेनालीराम अगले दिन राजा से मिले और बोले, ‘महाराज! मुझे विजयनगर में कुछ चोरों के होने की सूचना मिली है। वे हमारे कुएं चुरा रहे हैं।’ इस पर राजा बोले, ‘क्या बात करते हो, तेनाली! कोई चोर कुएं को कैसे चुरा सकता है?’ ‘महाराज! यह बात आश्चर्यजनक जरूर है, परंतु सच है। वे चोर अब तक कई कुएं चुरा चुके हैं।’ तेनालीराम ने बहुत ही भोलेपन से कहा। उसकी बात को सुनकर दरबार में उपस्थित सभी दरबारी हंसने लगे। महाराज ने कहा, ‘तेनालीराम, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है। आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? तुम्हारी बातों पर कोई भी व्यक्ति विश्वास नहीं कर सकता।’ ‘महाराज! मैं जानता था कि आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे इसलिए मैं कुछ गांव वालों को साथ साथ लाया हूं। वे सभी बाहर खड़े हैं। यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप उन्हें दरबार में बुलाकर पूछ लीजिए। वे आपको सारी बात विस्तारपूर्वक बता दंगे।’ राजा ने बाहर खड़े गांव वालों को दरबार में बुलवाया। एक गांव वाला बोला, ‘महाराज! गृहमंत्री द्वारा बनाए गए सभी कुएं समाप्त हो गए हैं, आप स्वयं देख सकते हैं।’ राजा ने उनकी बात मान ली और गृहमंत्री, तेनालीराम, कुछ दरबारियों तथा गांव वालों के साथ कुओं का निरीक्षण करने के लिए चल दिए। पूरे नगर का निरीक्षण करने के पश्चात उन्होंने पाया कि राजधानी के आस-पास के अन्य स्थानो तथा गांवों में कोई कुआं नहीं है। राजा को यह पता लगते देख गृहमंत्री घबरा गया। वास्तव में उसने कुछ कुओं को ही बनाने का आदेश दिया था। बचा हुआ धन उसने अपनी सुख-सुविधाओं पर व्यय कर दिया। अब तक राजा भी तेनालीराम की बात का अर्थ समझ चुके थे। वे गृहमंत्री पर क्रोधित होने लगे, तभी तेनालीराम बीच में बोल पड़ा, ‘महाराज! इसमें इनका कोई दोष नहीं है। वास्तव में वे जादुई कुएं थे, जो बनने के कुछ दिन बाद ही हवा में समाप्त हो गए।’ अपनी बात समाप्त कर तेनालीराम गृहमंत्री की ओर देखने लगा। गृहमंत्री ने अपना सिर शर्म से झुका लिया। राजा ने गृहमंत्री को बहुत डांटा तथा उसे सौ और कुएं बनवाने का आदेश दिया। इस कार्य की सारी जिम्मेदारी तेनालीराम को सौंपी गई।

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उस पांच सितारा ऑडिटोरियम के बाहर प्रोफेसर साहब की आलीशान कार आकर रुकी , प्रोफेसर बैठने को हुए ही थे कि एक सभ्य सा युगल याचक दृष्टि से उन्हें देखता हुआ पास आया और बोला ,” साहब , यहां से मुख्य सड़क तक कोई साधन उपलब्ध नही है , मेहरबानी करके वहां तक लिफ्ट दे दीजिए आगे हम बस पकड़ लेंगे । ”

रात के साढ़े ग्यारह बजे प्रोफेसर साहब ने गोद मे बच्चा उठाये इस युगल को देख अपने “तात्कालिक कालजयी” भाषण के प्रभाव में उन्हें अपनी कार में बिठा लिया । ड्राइवर कार दौड़ाने लगा ।

याचक जैसा वह कपल अब कुटिलतापूर्ण मुस्कुराहट से एक दूसरे की आंखों में देख अपना प्लान एक्सीक्यूट करने लगा । पुरुष ने सीट के पॉकेट मे रखे मूंगफली के पाउच निकालकर खाना शुरू कर दिया बिना प्रोफेसर से पूछे /मांगे ।
लड़की भी बच्चे को छोड़ कार की तलाशी लेने लगी ।एक शानदार ड्रेस दिखी तो उसने झट से उठा ली और अपने पर लगा कर देखने लगी ।
प्रोफेसर साहब अब सहन नही कर सकते थे ड्राइवर से बोले गाड़ी रोको ,लेकिन ड्राइवर ने गाड़ी नही रोकी बस एक बार पीछे पलटकर देखा , प्रोफेसर को झटका लगा ,अरे ये कौन है उनके ड्राइवर के वेश में ?? वे तीनों वहशियाना तरीके से हंसने लगे , प्रोफेसर साहब को अपने इष्टदेव याद आने लगे ,थोड़ा साहस एकत्रित करके प्रोफेसर साहब ने शक्ति प्रयोग का “अभ्यासहीन ” प्रयास करने का विचार किया लेकिन तब तक वह पुरुष अपनी जेब से एक लाइटर जैसा पदार्थ निकाल चुका था और उसका एक बटन दबाते ही 4 इंच का धारदार चाकू बाहर आ चुका था प्रोफेसर साहब की क्रांति समयपूर्व ही गर्भपात को प्राप्त हुई ।

प्रोफेसर साहब समझ चुके थे कि आज कोई बड़ी अनहोनी निश्चित है उन्होंने खुद ही अपना पर्स निकालकर सारे पैसे उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिये लेकिन वह व्यक्ति अब उनके आभूषणों की तरफ देखने लगा, दुखी मन से प्रोफेसर साहब ने अपनी अंगूठियां ,ब्रेसलेट और सोने के चेन उतार के उसके हाथ में धर दिए , अब वह व्यक्ति उनके गले में एक और लॉकेट युक्त चैन की तरफ हाथ बढ़ाने लगा । प्रोफेसर साहब याचना पूर्वक बोले – इसे छोड़ दो प्लीज यह मेरे “पुरुखों की निशानी ” है जो कुल परंपरा से मुझ तक आई है , इसकी मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक महत्ता है । लेकिन वह लुटेरा कहां मानने वाला था उसने आखिर वह निशानी भी उतार ही ली ।
बिना प्रोफ़ेसर साहब के पता बताएं वे लोग उनके आलीशान बंगले के बाहर तक पहुंच गए थे ।
युवक बोला ,” लो आ गया घर , ऐसे ढेर सूखे मेवे , कपड़े , पैसा और प्रोफेसर साहब की ल…….
उसकी आँखों मे आई धूर्ततापूर्ण बेशर्म चमक ने शब्द के अधूरेपन को पूर्णता दे दी ।

प्रोफेसर साहब अब पूरे परिवार की सुरक्षा एवं घर पर पड़े अथाह धन-धान्य को लेकर भी चिंतित हो गये उनका रक्तचाप उछाले मारने लगा लेकिन करें भी तो क्या ??
लगे गिड़गिड़ाने ,” भैया मैंने आपको आपत्ती में देखकर शरण दी और आप मेरा ही इस तरह शोषण कर रहे हैं यह अनुचित है । ईश्वर का भय मानिए यह निर्दयता की पराकाष्ठा है ।अब तो छोड़ दीजिए मुझे भगवान के लिए ।
प्रोफेसर फूट फूट कर रोने लगे ।।

वे पति पत्नी अपना बच्चा लेकर कार से उतर गये और वह ड्राइवर भी , उनके द्वारा लिया गया सारा सामान उन्होंने वापस प्रोफेसर साहब के हाथ में पकड़ाया और बोले

” क्षमा कीजिएगा सर ! अवैध घुसपैठियों के विषय मे शरणागत वत्सलता पर आज आपके द्वारा उस ऑडिटोरियम मे दिए गए “अति भावुक व्याख्यान” का तर्कसंगत शास्त्रीय निराकरण करने की योग्यता हममें नहीं थी अतः हमें यह स्वांग रचना पड़ा ।
“आप जरा खुद को भारतवर्ष और हमें रोहिंग्या समझ कर इस पूरी घटना पर विचार कीजिए और सोचिये की आपको अब क्या करना चाहिए इस विषय पर । ”

वो मूंगफली नही इस देश का अथाह प्राकृतिक संसाधन है जिसकी रक्षार्थ यंहा के सैनिक अपना उष्ण लाल लहू बहाकर करते है सर , मुफ्त नही है यह ।
वो आपकी बेटी/बेटे की ड्रेस मात्र कपड़ा नही है इस देश के नागरिकों के स्वप्न है भविष्य के जिसके लिए यंहा के युवा परिश्रम का पुरुषार्थ करते है ,मुफ्त नही है यह ।
आपकी बेटी / पत्नी मात्र नारी नही है देश की अस्मिता है सर जिसे हमारे पुरुखों ने खून के सागर बहा के सुरक्षित रखा है , खैरात में बांटने के लिए नही है यह ।
आपका ये पर्स अर्थव्यवस्था है सर इस देश की जिसे करोड़ो लोग अपने पसीने से सींचते है , मुफ्त नही है यह ।

और आपके पुरुखों की निशानी यह चैन मात्र सोने का टुकड़ा नही है सर , अस्तित्व है हमारा , इतिहास है इस महान राष्ट्र का जिसे असंख्य योद्धाओ ने मृत्यु की बलिवेदी पर ढेर लगाकर जीवित रखा है , मुफ्त तो छोड़िए इसे किसी ग्रह पर कोई वैज्ञानिक भी उत्पन्न नही कर सकते ।

कुछ विचार कीजिये सर ! कौन है जो खून चूसने वाली जोंक को अपने शरीर पर रहने की अनुमति देता है , एक बुद्धिहीन चौपाया भी तत्काल उसे पेड़ के तने से रगड़ कर उससे मुक्ति पा लेता है ।

उस युवक ने वह लाइटर जैसा रामपुरी चाकू प्रोफेसर साहब के हाथ में देते हुए कहा यह मेरी प्यारी बहन जो आपकी पुत्री है उसे दे दीजिएगा सर क्योंकि अगर आप जैसे लोग रोहिंग्या को सपोर्ट देकर इस देश में बसाते रहे तो किसी न किसी दिन ऐसी ही किसी कार में आपकी बेटी को इसकी आवश्यकता जरूर पड़ेगी।

सर ज्ञान के विषय मे तो हम आपको क्या समझा सकते हैं लेकिन एक कहानी जरूर सुनिए ,

” लाक्षाग्रह के बाद बच निकले पांडव एकचक्रा नगरी में गए थे तब वहा कोई सराय वगैरह तो थी नहीं तो वे लोग एक ब्राह्मणि के घर पहुंचे और उन्हें शरण देने के लिए याचना की ।
शरणागत धर्म के चलते हैं उस ब्राह्मणि ने उन्हें शरण दी ,शीघ्र ही उन्हें (पांडवो) को पता चला कि यहां एक बकासुर नामक राक्षस प्रत्येक पक्षांत पर एक व्यक्ति को बैलगाड़ी भरकर भोजन के साथ खा जाता है और इस बार उसी ब्राह्मणी के इकलौते पुत्र की बारी थी , उस ब्राह्मणि के शरणागत धर्म के निष्काम पालन से प्रसन्न पांडवों ने धर्म की रक्षा के लिए , निर्बलों की सहायता के लिए और अपने शरण प्रदाता के ऋण से हल्के होने के लिए स्वयं भीम को उस ब्राह्मण के स्थान पर भेजा ।
आगे सभी को पता ही है की भीम ने उस राक्षस कोे किस तरह पटक-पटक कर धोया था लेकिन यह कहानी हमें सिखाती है की शरण किसे दी जाती है ??
“जो आपके आपत्तिकाल मे आपके बेटे के बदले अपने बेटे को मृत्यु के सम्मुख प्रस्तुत कर सके वही शरण का सच्चा अधिकारी है । ”

उसी के लिए आप अपने संसाधन अपना हित अपना सर्वस्व त्याग करके उसे अपने भाई के समान शरण देते हैं और ऐसे कई उदाहरण इतिहास में उपलब्ध है ।

प्रोफेसर साहब ! ज्ञान वह नहीं है जो किताबें पढ़कर आता है , सद्ज्ञान वह है जो ऐतिहासिक घटनाएं सबक के रूप में हमें सीखाती हैं और वही वरेण्य है ।
वरना कई पढ़े-लिखे महामूर्धन्य लोगों के मूर्खतापूर्ण निर्णयो का फल यह पुण्यभूमि आज भी भुगत ही रही है। आशा है आप हमारी इस धृष्टता को क्षमा करके हमारे संदेश को समझ सकेंगे ।

प्रोफेसर साहब एक दीर्घनिश्वास के साथ उन्हें जाते हुए देख रहे थे । आज वे ज्ञान का एक विशिष्ट प्रकाश अपने अंदर स्पष्ट देख पा रहे थे ।

जय हिंद ।।
जय सनातन।।
।।नीतिवान लभते सुखं ।।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

मारवाड़ के रक्षक वीर दुर्गादास राठौड़*

🌞अपनी जन्मभूमि मारवाड़ को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त कराने वाले वीर दुर्गादास राठौड़ का जन्म १३ अगस्त, १६३८ को ग्राम सालवा में हुआ था। उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं। आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उसे सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले।

👑उस समय मारवाड़ में राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) शासक थे। एक बार उनके एक मुँहलगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया। उसने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा; पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।

💂‍♀उत्तर भारत में औरंगजेब प्रभावी था। उसकी कुदृष्टि मारवाड़ के विशाल राज्य पर भी थी। उसने षड्यन्त्रपूर्वक जसवन्त सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेज दिया। इस अभियान के दौरान नवम्बर १६७८ में जमरूद में उनकी मृत्यु हो गयी। इसी बीच उनकी रानी आदम जी ने पेशावर में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया।
जसवन्त सिंह के मरते ही औरंगजेब ने जोधपुर रियासत पर कब्जा कर वहाँ शाही हाकिम बैठा दिया। उसने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा घोषित करने के बहाने दिल्ली बुलाया। वस्तुतः वह उसे मुसलमान बनाना या मारना चाहता था।

😳इस कठिन घड़ी में दुर्गादास अजीत सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे। एक दिन अचानक मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया। अजीत सिंह की धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहां छोड़ दिया और उन्हें लेकर गुप्त मार्ग से बाहर निकल गयी।
उधर दुर्गादास ने हमला कर घेरा तोड़ दिया और वे भी जोधपुर की ओर निकल गये। उन्होेंने अजीत सिंह को सिरोही के पास कालिन्दी गाँव में पुरोहित जयदेव के घर रखवा कर मुकुनदास खीची को साधु वेश में उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। कई दिन बाद औरंगजेब को जब वास्तविकता पता लगी, तो उसने बालक की हत्या कर दी।

👊अब दुर्गादास मारवाड़ के सामन्तों के साथ छापामार शैली में मुगल सेनाओं पर हमले करने लगे। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मराठों को भी जोड़ना चाहा; पर इसमें उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली।
उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को राजा बनाने का लालच देकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया; पर दुर्भाग्यवश यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

♻अगले ३० साल तक वीर दुर्गादास इसी काम में लगे रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उनके प्रयास सफल हुए। २० मार्च, १७०७ को महाराजा अजीत सिंह ने धूमधाम से जोधपुर दुर्ग में प्रवेश किया। वे जानते थे कि इसका श्रेय दुर्गादास को है, अतः उन्होंने दुर्गादास से रियासत का प्रधान पद स्वीकार करने को कहा; पर दुर्गादास ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।
उनकी अवस्था भी अब इस योग्य नहीं थी। अतः वे अजीतसिंह की अनुमति लेकर उज्जैन के पास सादड़ी चले गये। इस प्रकार उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं –

👏माई ऐहड़ौ पूत जण,
जेहड़ौ दुर्गादास
मार गण्डासे थामियो,
बिन थाम्बा आकास।।

……………..✍हिन्दू समूह 🤺🔱🚩