Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

●~● चोर का हाथ और वज़ीर की ज़ुबान ●~●

संजय गुप्ता

एक बादशाह ने गधों को क़तार में चलता देखा तो धोबी से पूछा, “ये कैसे सीधे चलते है..?”

धोबी ने जवाब दिया, “जो लाइन तोड़ता है उसे मैं सज़ा देता हूँ, बस इसलिये ये सीधे चलते हैं।”

बादशाह बोला, “मेरे मुल्क में अमन क़ायम कर सकते हो..?”
धोबी ने हामी भर ली।

धोबी शहर आया तो बादशाह ने उसे मुन्सिफ बना दिया, और एक चोर का मुक़दमा आ गया, धोबी ने कहा चोर का हाथ काट दो।
जल्लाद ने वज़ीर की तरफ देखा और धोबी के कान में
बोला, “ये वज़ीर साहब का ख़ास आदमी है।”

धोबी ने दोबारा कहा इसका हाथ काट दो, तो वज़ीर ने सरगोशी की कि ये अपना आदमी है ख़याल करो।

इस बार धोबी ने कहा, “चोर का हाथ और वज़ीर की ज़ुबान दोनों काट दो, और एक फैसले से ही मुल्क में अमन क़ायम हो गया…।

बिलकुल इसी न्याय की जरुरत हमारे देश को है ।

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Posted in रामायण - Ramayan

अतुल सोनी

जानिए रामायण का एक अनजान सत्य!!!!!!!
केवल लक्ष्मण ही मेघनाद का वध कर सकते थे.. क्या कारण था ?

हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी। लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया।

भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥ अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥

उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥ ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥ लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥ श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥

अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो…..

(१) चौदह वर्षों तक न सोया हो,
(२) जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और
(३) चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥

श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा॥ मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥ अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥

प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥ अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥ लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥

प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?, फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?, और १४ साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ?

लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥ आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं।

चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे। मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था। निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥

निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥ आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।

अब मैं १४ साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे? मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥ सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥

प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥ प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?

लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं :—

१-जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥

२–जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥

३–जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे, ।

४–जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,।

५–जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक मेंरहे,।

६–जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी,

७और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥ इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥

भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया ।

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. 🌿 निधिवन 🌿

संजय गुप्ता

एक बार कलकत्ता का एक भक्त अपने गुरु की सुनाई हुई भागवत कथा से इतना मोहित हुआ कि वह हर समय वृन्दावन आने की सोचने लगा उसके गुरु उसे निधिवन के बारे में बताया करते थे और कहते थे कि आज भी भगवान यहाँ रात्रि को रास रचाने आते है उस भक्त को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था,

और एक बार उसने निश्चय किया कि वृन्दावन जाऊंगा और ऐसा ही हुआ। श्री राधा रानी की कृपा हुई और आ गया वृन्दावन उसने जी भर कर बिहारी जी का राधा रानी का दर्शन किया लेकिन अब भी उसे इस बात का यकीन नहीं था कि निधिवन में रात्रि को भगवान रास रचाते हैं।

उसने सोचा कि एक दिन निधिवन रुक कर देखता हू इसलिए वो वही पर रूक गया और देर तक बैठा रहा और जब शाम होने को आई तब एक पेड़ की लता की आड़ में छिप गया।

जब शाम के वक़्त वहा के पुजारी निधिवन को खाली करवाने लगे तो उनकी नज़र उस भक्त पर पड गयी और उसे वहाँ से जाने को कहा तब तो वो भक्त वहाँ से चला गया, लेकिन अगले दिन फिर से वहा जाकर छिप गया और फिर से शाम होते ही पुजारियों द्वारा निकाला गया और आखिर में उसने निधिवन में एक ऐसा कोना खोज निकाला जहा उसे कोई न ढूंढ़ सकता था, और वो आँखे मूंदे सारी रात वही निधिवन में बैठा रहा और अगले दिन जब सेविकाए निधिवन में साफ़ सफाई करने आई तो पाया कि एक व्यक्ति बेसुध पड़ा हुआ है और उसके मुह से झाग निकल रहा है।

तब उन सेविकाओं ने सभी को बताया तो लोगो कि भीड़ वहाँ पर जमा हो गयी सभी ने उस व्यक्ति से बोलने की कोशिश की लेकिन वो कुछ भी नहीं बोल रहा था, लोगो ने उसे खाने के लिए मिठाई आदि दी लेकिन उसने नहीं ली और ऐसे ही वो ३ दिन तक बिना कुछ खाए-पीये ऐसे ही बेसुध पड़ा रहा और ५ दिन बाद उसके गुरु जो कि गोवर्धन में रहते थे, बताया गया तब उसके गुरूजी वहाँ पहुँचे और उसे गोवर्धन अपने आश्रम में ले आये।

आश्रम में भी वो ऐसे ही रहा और एक दिन सुबह सुबह उस व्यक्ति ने अपने गुरूजी से लिखने के लिए कलम और कागज़ माँगा गुरूजी ने ऐसा ही किया और उसे वो कलम और कागज़ देकर मानसी गंगा में स्नान करने चले गए जब गुरूजी स्नान करके आश्रममें आये तो पाया कि उस भक्त ने दीवार के सहारे लग कर अपना शरीर त्याग दिया था, और उस कागज़ पर कुछ लिखा हुआ था।

उस पर लिखा था- “गुरूजी मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई है, पहले सिर्फ आपको ही बताना चाहता हूँ, आप कहते थे न कि निधिवन में आज भी भगवान रास रचाने आते है और मैं आपकी कही बात पर यकीन नहीं करता था, लेकिन जब मैं निधिवन में रूका तब मैंने साक्षात बांके बिहारी का राधा रानी के साथ गोपियों के साथ रास रचाते हुए दर्शन किया और अब मेरी जीने की कोई भी इच्छा नहीं है, इस जीवन का जो लक्ष्य था वो लक्ष्य मैंने प्राप्त कर लिया है और अब मैं जीकर करूँगा भी क्या..? श्याम सुन्दर की सुन्दरता के आगे ये दुनिया वालों की सुन्दरता कुछ भी नहीं है, इसलिए आपके श्री चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार कीजिये।”

वो पत्र जो उस भक्त ने अपने गुरु के लिए लिखा था आज भी मथुरा के सरकारी संघ्रालय में रखा हुआ है और बंगाली भाषा में लिखा हुआ है।

कहा जाता है निधिवन के सारी लतायें गोपियाँ हैं, जो एक दूसरे कि बाहों में बाहें डाले खड़ी है। जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जी के साथ रास लीला करती है तो वहाँ की लतायें गोपियाँ बन जाती हैं, और फिर रास लीला आरंभ होती है, इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता,दिन भर में हजारों बंदर, पक्षी, जीव जंतु निधिवन में रहते है पर जैसे ही शाम होती है,सब जीव जंतु बंदर अपने आप निधिवन से बाहर चले जाते हैं। एक परिंदा भी फिर वहाँ पर नहीं रुकता, यहाँ तक कि जमीन के अंदर के जीव चीटी आदि भी जमीन के अंदर चले जाते हैं, रास लीला को कोई नहीं देख सकता क्योकि रास लीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है। रास तो अलौकिक जगत की “परम दिव्यातिदिव्य लीला” है कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता. जो बड़े बड़े संत है उन्हें निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है।

जब रास करते करते राधा रानी जी थक जाती हैं तो बिहारी जी उनके चरण दबाते है, और रात्रि में शयन करते हैं। आज भी निधिवन में शयन कक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान, फुल और प्रसाद रखते हैं, और जब सुबह पट खोलते हैं, तो जल पीला मिलता है, पान चबाया हुआ मिलता है, और फूल बिखरे हुए मिलते है।

🙏 राधे…… 🙏 राधे……..

वृन्दावन धाम या बरसाना कोई घूमने फिरने या पिकनिक मनाने की जगह नहीं है, ये आपके इष्ट की जन्मभूमि लीलाभूमि व तपोभूमि है। सबसे ख़ास बात ये प्रेमभूमि है, जब भी आओ इसको तपोभूमि समझ कर मानसिक व शारीरिक तप किया करो, शरीर से सेवा, व वाणी से राधा नाम गाया जाए, तब ही धाम मे आना सार्थक है।

एक अद्भुत मस्ती ताकत व् आनंद ले कर वापिस जाया करो .आप की धाम निष्ठां मे वृद्धि हो इसी कामना से बोलो..

      🙋 जय जय श्री राधे.. 🌷💐
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”अपनी खूबी पहचानें“

संतोष चतुर्वेदी

एक बार भगवान ने एक मेंढक की भक्ति से प्रसन्न होकर उससे उसकी इच्छा पूछी। मेंढक ने कहा- ”हे ईश्वर मेरे मन में कोई आकांक्षा नहीं है।” उसने कहा कि भक्ति में मुझे हर पल आनंद आता है और मैं इसमें बेहद खुश हूं। मगर एक कठिनाई है, मैं जब भी ध्यान करने बैठता हूं, एक चूहा मेरे ध्यान में विघ्न डालने की कोशिश करता है।

भगवान ने कहा- ”मैं तुम्हे बिल्ली के रूप में परिवर्तित कर देता हूं, फिर तुम निर्भय होकर रह पाओगे।“

मेंढक ने बिन सोचे समझे हामी भर दी और बिल्ली बन गया। अब बिल्ली को कुत्ते का भय सताने लगा। एक दिन पुनः भगवान प्रकट हुए, तो बिल्ली ने अपनी पूरी समस्या रखी। तब भगवान ने उसे बिल्ली से कुत्ता बना दिया।

अब अपने भय के कारण वो कुत्ते से चीता और फिर चीते से शेर बन गया। शेर बनने के बाद अब उसे शिकारी का भय सताने लगा। इस तरह मेंढक रोज़ रोज़ के बदलाव से थक चुका था। उसने बहुत सोचा और अपने पुरूषार्थ पर भरोसा करने का दृढ़ निश्चय लिया।
उसने भगवान से दोबारा प्रार्थना की और मेंढक पुनः अपने मूल रूप में वापिस आ गया। दरअसल, हम सभी को भगवान ने इस संसार में जो कुछ भी दिया है, वो बेहद सोच समझ कर दिया है। चाहे वो जीवन हो, दुख हो या फिर सुख।

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बहूत सुंदर कथा

ज्योति अग्रवाल

            मेरा वृन्दावन

एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया
और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से
बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और
सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की
माला सेवक के हाथ से भेजा करता था.पुजारी वह माला बिहारीजी
को पहना देते थे. जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे. यह रोज का
नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका.
उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना
आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और
बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ
गया. पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला
राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं
मिला.जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने
मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला
मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला
उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है.यह सुनकर
पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख
ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा
दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला
उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसाछल करता है, यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह
सफ़ेद बाल किसका है.? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं
तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यहसफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है.भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा-
पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के
समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या
काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया.अब पुजारी रोकर
बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके
सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया. अपने गले में डाली
माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का
सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे
नाथ अब नहींहोगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो
कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते
रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज
प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा. इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट
हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग
दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी
चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे
ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून
कीधार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा
मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे
लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं.
उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद
करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए.

कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर.श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण
होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।।जय श्री राधे राधे जी

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सॉरी आंटी

ज्योति अग्रवाल
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अपनी किटी पार्टी का पूरा ग्रुप रिया को बहुत पसंद था. अपनी घर-गृहस्थी को थोड़ी देर भूलकर महीने में एक बार पंद्रह महिलाएं इकट्ठा होकर एंजॉय करती थीं. रिया को इस दिन का इंतज़ार रहता था. दो बच्चों की मां, चालीस वर्षीया रिया स्वभाव से ख़ुशमिज़ाज, मिलनसार महिला थी. अपने गु्रप में वह अच्छी-ख़ासी लोकप्रिय थी. इस गु्रप में तीस साल से लेकर साठ साल की मीरा, पैंसठ साल की सुमन और सत्तर साल की रेखा आंटी भी थीं. तीनों आंटी को सब बहुत पसंद करते थे. सुमन आंटी अकेली रहती थीं. कुछ साल पहले उनके पति का देहांत हो गया था. एक ही बेटी थी, जो ऑस्ट्रेलिया में अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी. सुमन आंटी की जीवनशैली किटी के बाकी सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत थी. अकेले कैसे जिया जाता है, इसका जीवंत उदाहरण थीं सुमन आंटी. रेखा आंटी के पति का भी स्वर्गवास हो चुका था. वे अपने बेटे के साथ रहती थीं. मीरा आंटी के भी पति नहीं रहे थे. दो विवाहित बेटियां थीं और वे अपनी छोटी बेटी के साथ रहती थीं.
पर पता नहीं क्यों रिया की ऐसी सोच थी कि वह अपने ग्रुप की तीनों बुज़ुर्ग सदस्याओं से सहज नहीं थी. रिया ने नोट किया था कि बाकी सब तो तीनों को बहुत प्यार करती थीं, लेकिन रिया उनसे दूरी बनाए रखती थी. तीनों अच्छी तरह से पहन-ओढ़कर रहतीं. कभी तीनों मिलकर बाहर भी खाने-पीने जातीं, मूवी भी देख आतीं. रिया भी सोचती कि क्या बुराई है अगर ये तीनों अच्छी तरह से लाइफ एंजॉय कर रही है? फिर वह इन्हें नापसंद क्यों करती है? वह अपनी सोच पर हैरान हो जाती. वह कहीं ईर्ष्यालु प्रवृत्ति की महिला तो नहीं बनती जा रही है, जो उन अकेली स्त्रियों को ख़ुश देखकर ख़ुश नहीं हो पाती. फिर सोचती, नहीं-नहीं वह क्यों जलेगी. वह तो अपने जीवन से संतुष्ट है.
कभी वह सोचती हमारे गु्रप में बुज़ुर्ग सदस्याओं की क्या ज़रूरत है, इन्हें तो भजन-कीर्तन मंडली में होना चाहिए. ये हमारी किटी में आकर क्यों एंजॉय करती हैं. तीनों हर गेम को उत्साह से खेलतीं और इनाम मिलने पर बच्चों-सी ख़ुश हो जातीं. सब एक ही सोसायटी में रहती थीं. कई बार ऐसा भी हुआ था, जब रिया के पति अनिल या उसकी कुछ ख़ास सहेलियों ने उसके गु्रप का मज़ाक उड़ाया था यह कहकर कि, ‘तुम्हारा तो उम्रदराज़ आंटी लोगों का गु्रप है.’ यह सुनकर रिया को और ग़ुस्सा आता था. रिया स्वभाव से काफ़ी भावुक महिला थी, पर पता नहीं क्यों इन उम्रदराज़ स्त्रियों की उपस्थिति उसे नागवार गुज़रती. वह कई बार अपनी ख़ास सहेली टीना को कह चुकी थी, “अब किसी आंटी को अपने गु्रप में नहीं लेना है, धीरे-धीरे यह किटी नानी-दादी की किटी होती जा रही है.” टीना ने उसे समझाया, “थोड़ी देर हम लोगों के साथ बैठकर, खा-पीकर ख़ुश हो लेती हैं. अच्छा ही तो है, इसमें बुरा क्या है.” यही तो रिया समझ नहीं पा रही थी कि वह क्यों मन ही मन चिढ़ती रहती है. टीना ने यह भी कहा था, “रिया, कल हम भी तो उस उम्र में पहुंचेंगी, तो क्या तब हमारा मन नहीं होगा सबके साथ गु्रप में हंसने-बोलने का या तुम किसी मंदिर में बैठकर भजन ही करनेवाली हो तब?” रिया कुछ बोली नहीं थी. धीरे-धीरे इस किटी पार्टी को शुरू हुए पांच साल बीत गए थे, सब लोग अब तक घर की सदस्याएं-सी हो गई थीं, पर रिया की मनोस्थिति आज भी वही थी.
वह किटी में भरपूर आनंद उठाकर जब लौटती, तो कभी उसके पति या आस-पड़ोस के युवा बच्चे या कोई परिचित स्त्री कह देती, “क्या मज़ा आता है तुम्हें इस गु्रप में, उम्र देखी है सबकी? कैसे एंजॉय करती हो.” रिया को ग़ुस्सा तो बहुत आता, पर चुप रह जाती. वो कर भी क्या सकती थी?
इसी बीच रिया को पास की ही बिल्डिंग में अपने बेटे की ट्यूशन टीचर से मिलने जाना था. बारिश का मौसम था, लेकिन आसमान साफ़ था, तो वह बिना छतरी के ही घर से निकल गई. टीचर के घर की डोरबेल बजाकर कुछ देर इंतज़ार किया. जब किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला, तो उसे लगा कि शायद घर पर कोई नहीं है. इसी बीच अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई. वह सोच में पड़ गई कि अब क्या करे? घर तक जाने में तो पूरी भीग जाएगी. टीचर के सामनेवाला फ्लैट सुमन आंटी का ही था. रिया ने सोचा, सुमन आंटी से छतरी मांग लेनी चाहिए, पर उनसे मिलने का उसका मन नहीं था. इतने में सुमन आंटी ने अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोल दिया. बहुत प्यार से बोलीं, “रिया, मैंने तुम्हें खिड़की से बिल्डिंग के अंदर आते देखा, तो अंदाज़ा लगाया कि शायद तुम सामने टीचर से मिलने आई होगी. वे तो बाहर गई हैं, आओ न, अंदर आ जाओ.”
“नहीं आंटी, मैं चलती हूं, पर छतरी नहीं है मेरे पास, आपके पास एक्स्ट्रा छतरी है क्या?”
“हां है, पर पहले तुम्हें अंदर आकर एक कप चाय पीनी पड़ेगी मेरे साथ.” सुमन आंटी हंसते हुए बोलीं और रिया का हाथ स्नेहपूर्वक पकड़कर अंदर ले गईं.
साफ़-सुथरे घर के कोने-कोने से गृहस्वामिनी का कलाप्रेम दिखाई दे रहा था. सोफे पर बहुत बड़ा-सा टेडी बेयर रखा हुआ था. रिया ने पूछा, “आंटी, यह किसका है?”
“मेरा ही है.”
रिया चौंकी, “आपका?”
“हां, इसे यहां रख दिया मैंने, इसे देखकर मुझे लगता है कि सोफे पर कोई बैठा है, घर में है कोई.” आंटी के चेहरे पर भले ही मुस्कुराहट थी, पर उनकी आवाज़ की उदासी ने रिया के मन में हलचल-सी मचा दी थी. उनकी उदास आंखों की तरफ़ देखती हुई वह कुछ बोल नहीं पाई. आंटी ने स्नेहभरे स्वर में कहा, “आज पहली बार अकेली आई हो न! हमेशा किटी में ही आती हो, बैठो, मैं चाय लाती हूं.” जब तक आंटी चाय लाईं, रिया ड्रॉइंगरूम में रखी कलाकृतियां, सुंदर साफ़ शीशे से चमकते शोपीस, उनके स्वर्गीय पति की फोटो, बेटी और उसके परिवार की फोटो देखती रही, पर घर में जो सन्नाटा पसरा था, वह दिल को अजीब लग रहा था. एकदम शांत, पर उदास-सा घर.
सुमन आंटी चाय ले आईं और रिया के साथ ही चाय पीते हुए उसके परिवार और बच्चों के बारे में पूछती रहीं. अपनी बेटी के बारे में भी बहुत-सी बातें बताते हुए कहने लगीं, “सुबह तो मैं फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर कभी-कभी अख़बार पढ़ते हुए बाहर खड़ी हो जाती हूं और बीच-बीच में स्कूल जाते हुए बच्चों को देखती रहती हूं. लगता है चलो, सुबह कोई तो दिखा वरना अंदाज़ा लगा ही सकती हो कैसा लगता होगा अकेले.” आंटी की आवाज़ में जो कुछ भी था, वह रिया के संवेदनशील, भावुक मन को अंदर तक छू गया. एक स्त्री होकर भी वह कभी अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई कि इन अकेली जी रही आंटियों के जीवन में कितना अकेलापन होगा. कितनी तन्हा हैं सब, अकेले रहकर ख़ुश रहने की कोशिश में लगी रहती हैं. सबके साथ जो थोड़ा-बहुत हंस-बोल लेती हैं, यह देखकर वह क्यों कभी ख़ुश नहीं हुई. यहां थोड़ी देर में ही घर में फैली उदासी उसे व्यथित कर रही है और ये अकेलापन, उदास रात-दिन उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. इसके बावजूद ये लोग कभी अपने जीवन में आई कमियों का रोना नहीं रोतीं. अपने सुख-दुख अकेले ही सहेजती हुई कैसे जी रही हैं सब और वह कितनी अविवेकी, असंवेदनशील है. ये सब थोड़ी देर सबके साथ बैठकर अपना अकेलापन कुछ पल के लिए भूल जाती हैं, तो उसे इस पर आपत्ति है. छि:, क्या कभी वह नहीं पहुंचेगी उम्र के इस पड़ाव पर! और सोचती रहती थी कि छोड़ देगी इस गु्रप को, कोई हम उम्र सदस्याओं वाला गु्रप जॉइन करेगी. आज सुमन आंटी की बातों में उनकी उम्र की उदासी, अकेलापन साफ़-साफ़ दिखा रिया को, वह अचानक कह उठी, “आंटी, आप जब भी चाहें, मेरे पास आ जाया करें, घर और बच्चों के काम के कारण मेरा जल्दी निकलना नहीं होता है. आप आती रहा करें. मुझे अपनी बेटी जैसी ही समझें, आंटी.”
“हां, और क्या, मैं अपनी बेटी से भी यही कहती हूं कि मेरे ग्रुप में मेरी कई बेटियां हैं, जिनके साथ बैठकर मैं सब कुछ भूल जाती हूं. कितनी अच्छी हो तुम सब, तुम लोगों के साथ बैठकर तो जी उठती हैं हम तीनों. ढेरों शुभकामनाएं निकलती हैं तुम लोगों के लिए. कितना प्यार, सम्मान देती हो तुम सब.” रिया मन ही मन आत्मग्लानि लिए बस हल्की मुस्कुराहट के साथ आंटी की बातें सुन रही थी और फिर बस ‘बाय’, बोलकर चल पड़ी, पर उसका रोम-रोम अपने पिछले सालों के रूखे व्यवहार पर बस दो शब्द बोल रहा था, ‘सॉरी आंटी.’
पूनम अहमद

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अतुल सोनी

🕉 नमः शिवाय महादेवाय नारायणाय नमः 🕉
(((( भगवान् के प्रिय ))))
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एक बार भगवान् नारायण अपने वैकुंठ लोक में सोये हुए थे । उन्होंने एक स्वप्न देखा,
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स्वप्न में वे क्या देखते है कि करोड़ों चन्द्रमाओं की कान्ति वाले, त्रिशूल डमरू धारी, स्वर्णाभरण भूषित, सुरेन्द्र वन्दित, अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान् शिव प्रेम और आनन्दातिरेक़ से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है ।
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उन्हें देखकर भगवान् श्री हरि हर्ष गदगद हो सहसा शय्या पर उठ कर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे ।
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उन्हें इस प्रकार बैठेे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि
भगवन् ! आपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है ?
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भगवान् ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनन्द मे निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे ।
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अन्त मे कुछ स्वस्थ होने पर वे गदगद कंठ से इस प्रकार बोले –
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देवि ! मैंने अभी स्वप्न में भगवान् श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है, उन की छवि ऐसी अपूर्व आनन्दमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी ।
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मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है । अहोभाग्य ! चलो, कैलास में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करे । यह कहकर दोनों कैलास की ओर चल दिये ।
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मुश्किल से आधी दूर गए होंगे कि देखते है भगवान् शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी ओर चले आ रहे है ।
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अब भगवान् के आनन्द का क्या ठिकाना ? मानो घर बैठे निधि मिल गयी ।
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पास आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले । मानो प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा।
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एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्र से आनन्दाश्रु बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया । दोनों ही एक दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर मूकवत् खड़े रहे ।
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प्रश्नोत्तर होने पर मालूम हुआ कि शंकरजी को भी रात्रि मे इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानो विष्णु भगवान् को वे उसी रूप में देख रहे हैं जिस रूप में वे अब उनके सामने खड़े थे ।
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दोनो के स्वप्न का वृत्तान्त अवगत होने पर दोनों ही लगे एक दूसरे से अपने यहाँ लिवा ले जाने का आग्रह करने ।
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नारायण कहते वैकुंठ चलिए और शम्मु कहते कैलास की ओर प्रस्थान कीजिये ।
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दोनों के आग्रह में इतना आलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाय ?
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इतने ही में क्या देखते है कि बीणा बजाते, हरिगुण गाते नारदजी कहीं से आ निकले ।
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बस, फिर क्या था लगे दोनों ही उनसे निर्णय कराने कि कहा चला जाय ।
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नारदजी तो स्वयं परेशान थे उस अलौकिक मिलन को देखकर; वे तो स्वयं अपनी सुध बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने ।
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अब निर्णय कौन करे ? अन्त में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है ।
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भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं । अन्त में वे दोनों को लक्ष्य करके बोली-
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नाथ ! नारायण ! आप लोगो के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ मे आता है कि आपके निवास स्थान अलग अलग नहीं है,
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जो कैलास है वही वैकुंठ है और जो वैकुंठ है वही कैलास है, केवल नाम में ही भेद है ।
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यही नहीं, मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल शरीर देखने में दो है ।
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और तो और, मुझे तो अब यह स्पष्ट दीखने लगा है कि आपकी भार्याएँ भी एक ही है दो नहीं ।
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जो मैं हूँ वही श्रीलक्ष्मी है और जो श्रीलक्ष्मी है वही मैं हूँ ।
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केवल इतना भी नहीं, मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गयी है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह मानो दूसरे के प्रति ही करता है,
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एक की जो पूजा करता है, वह स्वाभाविक ही दूसरे की भी करता है और जो एक को अपूज्य मानता है, वह दूसरे की भी पूजा नहीं करता ।
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मैं तो यह समझती हूँ कि आप दोनों में जो भेद मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है।
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मैं देखती हूँ कि आप मुझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवञ्चना कर रहे हैं मुझे चक्कर में डाल रहे है, मुझे भुला रहे है।
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अब मेरी यह प्रार्थना है कि आपलोग दोनों ही अपने अपने लोक को पधारिये।
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श्रीविष्णु यह समझें कि हम शिवरूप से वैकुंठ जा रहे है और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णुरूप से कैलास गमन कर रहे है।
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इस उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए दोनों प्रणाम आलिंगन के अनन्तर हर्षित हो अपने अपने लोक को चले गये।
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लौटकर जब श्री विष्णु वैकुंठ पहुंचे तो श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि- प्रभो ! उसे अधिक प्रिय आपको कौन है ?
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इस पर भगवान् बोले- प्रिये । मेरे प्रियतम केवल श्रीशंकर है। देहधारियों को अपने देह की भाँति वे मुझे अकारण ही प्रिय है।
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एक बार मै और श्री शंकर दोनों ही पृथ्वी पर घूमने निकले।
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मै अपने प्रियतम की खोज़ मे इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज मे देश देशान्तर में भटक रहा होगा, वही मुझे अकारण प्रिय होगा।
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थोडी देर के बाद मेरी श्रीशंकर जी से भेंट हो गयी।
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ज्यों ही हम लोगों की चार आँखे हुई कि हम लोग पूर्व जन्मार्जित विद्या की भांति एक दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गये।
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वास्तव में मैं ही जनार्दन हूँ और मैं ही महादेव हूँ । अलग -अलग दो घड़ो में रखे हुए जल की भाँति मुझमें और उनमें कोई अन्तर नहीं है।
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शंकर जी के अतिरिक्त श्री शिव की अर्चा करने वाला शिवभक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है ।
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इसके विपरीत जो शिवकी पूजा नहीं करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।
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शिव द्रोही वैष्णवो को और विष्णु द्रोही शैवों को इस प्रसंग पर अवश्य ध्यान देना चाहिये।
जय श्री राधे जी 🙏🙏

<br />((((((( जय जय श्री राधे )))))))