Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

प्रेरक प्रसंग

जौ रोऊँ तो बल घटे

अनूप सिन्हा

  चीनी सन्त चुआँग-त्सु  की पत्नी का जब देहावसान हुआ, तो हुई-त्सु सहानुभूति व्यक्त करने के उनके पास गये ।  लेकिन उन्हें यह देख आश्चर्य हुआ कि पत्नी के निधन का शोक मनाने के बजाय चुआँग- त्सु घुटने पर उल्टा कटोरा रखकर अँगुलियों से ताल देते हुए कुछ गा रहे हैं ।  हुई-त्सु से न रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया,  "बड़े ताज्जुब की बात है कि जिसने तुम्हारे साथ अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी, उसका तुम्हें जरा भी वियोग महसूस नहीं हो रहा है ।  हद तो इस बात की है कि शोक मनाना तो दूर रहा, तुम मजे से गा-बजा रहे हो, मानों तुम्हें कुछ हुआ ही नहीं है !"
  चुआँग- त्सु ने कहा,  "आपने गलत समझ लिया ।  जिसने जिन्दगी भर मेरा साथ दिया, उसे भुलाना क्या इतना आसान है ?  दरअसल उसके विछोह में मैं हताश और निराश हो गया था और अपने को मैं बेसहारा महसूस कर रहा था ।  बाद में मैने जब सोचा-बिचारा, तो ध्यान में आया कि मौत तो आना मनुष्य के लिए कोई नयी और आश्चर्यजनक बात नहीं है, बल्कि यह तो प्रकृति की देन है और इसका हर एक को सामना करना पड़ता है ।"  सन्त ने आगे कहा, "शुरू में हम प्राणों से ही नहीं, शक्ल-सूरत से वंचित थे और शक्ल-सूरत ही क्यों, आत्मा से भी थे ।  पहले आकृतिहीन अस्पष्ट-सा पिण्ड था,  फिर उसमें आत्मा का संचार हुआ ।  आगे विकसित होने पर मृत्यु ने जीवन को ग्रसित कर लिया ।  ऋतुएँ केवल प्रकृति में ही नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में भी होती हैं ।  बसन्त,  हेमन्त एवं शिशिर का चक्र मनुष्य के जीवन के साथ भी जुड़ा हुआ है ।  जब कोई मनुष्य थका होताहै और लेटकर विश्राम करता है,  तो क्या हम उसके पास जाकर चीखते-चिल्लाते हैं ? नहीं ! तो फिर जिसका हमसे साथ छूट जाता है और जब वह एक विशाल भीतरी कक्ष में विश्राम करताहोता है,  तो हमें उसके लिए क्यों चीखना-चिल्लाना चाहिए ?  और यदि मैं ऐसा करता हूँ, तो निश्चय ही प्रकृति के नियम का उल्लंघन करता हूँ ।  बस,  इसी कारण शोक मनाना मैं अच्छा नहीं समझता ।"

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